गुरुवार, 15 अक्तूबर 2009

अपनी टीआरपी कैसे बढ़ाएं...खुशदीप

कल मेरी पोस्ट...देश सबसे पहले...पर सागर की टिप्पणी आई थी कि यह हुआ सच्चा देशनामा... पिछले कुछ दिनों से ब्लोग्नामा बना हुआ था...सागर का ये तर्क मुझे अच्छा लगा...कि आखिर लिखा क्या जाए...ये कुंभ का मेला तो है नहीं जो छह या 12 साल बाद आएगा...यहां तो रोज़ ही कुंआ खोदना है...सागर ने जो प्रश्न किया वो अच्छे आलेख बनाम लोकप्रिय लेख में से क्या लिखा जाए, उसका सवाल उठाता है...

मेरे साथ आपने भी देखा होगा कि कई बहुत अच्छे और गंभीर लेख ब्लॉग पर आते हैं...लेकिन न तो वहां पाठक दिखते हैं और न ही टिप्पणियां...ये स्थिति बड़ी दुखद है...साथ ही ये लेखक के हौसले पर भी चोट करता है...मेरे साथ खुद भी ऐसा हुआ है कि जिस पोस्ट को मैंने गंभीर विषय मानते हुए बड़ी संजीदगी के साथ लिखा, वहां अपेक्षाकृत कम पाठक मिले...और जो पोस्ट मैंने हल्के-फुल्के अंदाज़ में लिखीं, वहां गजब का रिस्पांस मिला...अपनी पोस्ट को मनचाहा रिस्पांस नहीं मिलता तो स्वाभाविक है हमारी नज़र उन पोस्ट पर जाती है जो सबसे ज़्यादा पढ़ी जा रही हैं या जहां सबसे ज़्यादा टिप्पणियां आ रही हैं...फिर हम अपने लेखन को लोकप्रियता की तराजू पर तौलना भी शुरू करते हैं...आखिर कमी कहां हैं...कमी कहीं नहीं है...कमी है बस एप्रोच की...मैंने जहां तक लोकप्रियता या टीआरपी के शास्त्र को समझा है तो जो चीज सबसे ज़्यादा नापसंद की जाती है वो है किसी चीज पर आपका उपदेश देना...यहां मुझे ताऊ रामपुरिया का प्रोफाइल में लिखा वो वाक्य फिर याद आ जाता है...यहां ज्ञान मत बधारिए, यहां सब ज्ञानी है...ऐसे में कोई कह सकता है कि ये तो बड़ी विचित्र स्थिति है...कोई गंभीर लेखन कर ही नहीं सकता क्या...यहां मेरा मानना है कि गंभीर लेखन भी लोकप्रिय हो सकता है, बस थोड़ा सा अपना स्टाइल बदलना होगा...

पहली बात तो गंभीर लेखन पर हमें अखबार और ब्लॉग का फर्क समझना चाहिए...अखबार सिर्फ पढ़ा जाता है...लेकिन ब्लॉग में लेखक और पढ़ने वाले का टिप्पणियों के माध्यम से सीधा संवाद होता है...अखबार में संवाद हो तो सकता है लेकिन वो बड़ा समय-खपाऊ और पत्रों के जरिए लंबा रास्ता होता है...ब्लॉग की सबसे बड़ी खूबी इसका इंटर-एक्टिव होना ही है...हाथों-हाथ रिस्पांस मिल जाता है...ऐसे में लेखन के वक्त हमें ध्यान रखना चाहिए कि हमें सिर्फ अपने मन की बात ही नहीं कहते जाना...हमारे अंदर वो संयम और माद्दा भी होना चाहिए कि हम दूसरों को सुन भी सकें...अगर हम अपनी ही गाथा गाते रहेंगे तो ये इसी कहावत को चरित्रार्थ करेगा- पर उपदेश, कुशल बहुतेरे...

आपने देखा होगा रेडियो पर भी फाइन ट्यूनिंग होने पर ही स्टेशन पकड़ा जाता है और प्रसारण की आवाज साफ सुनी जाती है...अगर ट्यूनिंग नहीं होगी तो खरड़-खरड़ ही सुनाई देता रहेगा...मेरा ये सब लिखने का तात्पर्य यही है कि सबसे पहले आपको अपने पाठकों के साथ ट्यूनिंग बनानी होगी...उनकी वेवलैंथ को समझना होगा...तभी तो आप फ्रीक्वेंसी को पकड़ पाएंगे...अब मैं इसी बात को आपको सीधे और सरल शब्दों में बताता हूं...फरीदाबाद ब्लॉगर्स मीट में ब्लागिंग को बहुत गंभीरता और संजीदगी से लिए जाने के मुद्दे पर मैंने भी अपना पक्ष रखा था...मैंने वहां भी यही कहा था कि अगर आप कुछ कहना चाहते हैं तो साथ में आपको इस बात का भी ध्यान रखना होगा कि लोग सुनना या पढ़ना क्या चाहते हैं...आपका लेखन तभी सार्थक हो पाएगा जब लोग आपको पढ़े...इसके लिए आपको चार बातें वो लिखनी होंगी जो लोग पसंद करते हैं...इन चार बातों के बीच आप अपनी एक बात भी रख सकते हैं, जिसका कि संदेश आप देना चाहते हैं...इस तरह आपका मकसद भी पूरा हो जाएगा और लोगों को भी वो डोज़ मिल जायेगी जिसकी वो अपेक्षा रखते हैं...

यहां स्टोरी-टैलर या किस्सागो (किस्से सुनाने वालों) को अपना आदर्श बनाया जा सकता है...मुझे याद है मैं बचपन में मेरठ में अपनी दुकान पर कभी-कभी बैठा करता था...बुधवार को हमारी दुकान खुलती थी लेकिन पूरा बाजार बंद रहता था...ऐसे में हमारी साथ वाली दुकान के बाहर थड़े पर एक जड़ी-बूटियां बेचने वाला डेरा लगा लेता था...पहलवान टाइप के उस शख्स को मैं अपनी दुकान से ही देखता रहता था...लोगों का ध्यान आकर्षित करने के लिए वो सबसे पहले कमीज उतार कर पहलवान की तरह अपने बाजुओं पर हाथ मारना शुरू कर देता था...राह चलते लोगों का ध्यान अपने आप उसकी तरफ जाना शुरू हो जाता था...फिर वो पहलवान दो तीन मजेदार किस्से सुनाकर चार-पांच लोग इकट्ठे कर ही लेता था...फिर देखते ही देखते मजमा बढ़ने लग जाता था...उसका ज़ड़ी-बूटियां (कथित शक्तिवर्धक) बेचने का तरीका भी बड़ा दिलचस्प होता था...वो भीड़ मे से ही अपने ग्राहक ताड़ लेता था...फिर अकेले में उनसे बात करते हुए न जाने कौन सा मंत्र मारता था कि वो झट से जड़ी-बूटियां खरीदने के लिए तैयार हो जाते थे...उसे देखते हुए मैं यही समझता कि कितना बढ़िया सेल्समैन है और अपना माल बेचने के लिए क्या-क्या पापड़ नहीं बेलता...

लगता है जो मैं कहना चाहता था, वो आप तक पहुंच गया होगा...

स्लॉग ओवर
मक्खन बाहर से घर आया...मक्खनी के पास बैठा ही था कि मक्खनी ने कहा...क्या बाज़ार से मूली का परांठा खाकर आए हो...मक्खन ने कहा...नहीं... नहीं...सैंडविच खाया था...मक्खनी ने कहा...रहने दो...रहने दो...आदमी होठों से ही झूठ बोल सकता है और कहीं से नहीं...

31 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत ग्यान की बाते बताई आपने. कोशिश करके देखते है.

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  2. इतनी ज्ञान की गंभीर बात ! भई हम तो ये गंभीरता भरी पोस्ट के बजाय स्लॉग ओवर पढ़कर ही खिसक रहे है :)

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  3. दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएँ |

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  4. आपने भी बिल्कुल सही सूंघ लिया :)

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  5. हा हा!! स्लॉग ओवर के लिए..बाकी तो चिन्तन है...जैसे चाहे वैसे ले लें.

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  6. सत्य वचन महराज...

    अपुन भी पहले मदारीपना दिखाता है...बाद में काम की बात पे आता है

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  7. प्राइमरी के मास्टर की दीपमालिका पर्व पर हार्दिक बधाई स्वीकार करें!!!!

    तुम स्नेह अपना दो न दो ,
    मै दीप बन जलता रहूँगा !!


    अंतिम किस्त-
    कुतर्क का कोई स्थान नहीं है जी.....सिद्ध जो करना पड़ेगा?

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  8. सच है कि ब्‍लागर भाई गंभीर आलेखों को नहीं पढते हैं .. पर आज के टी आर पी से क्‍या लेना देना .. इंटरनेट में आलेख हमेशा मौजूद रहेंगे .. इसलिए गंभीर ही लिखा जाना चाहिए .. वे हमेशा ही पढे जाते रहेंगे .. वैसे हिन्‍दी पाठकों को कुछ जिम्‍मेदार होना ही चाहिए !!

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  9. आप ने मीडिया और मार्केटिंग के अपने अनुभव बांटें हैं। सारी बातें सही हैं। लेकिन आखिर हम जिस समाज के हिस्से हैं ब्लागरों की कुछ तो उस के प्रति जिम्मेदारी है। हमें उस का ध्यान तो रखना होगा। दूसरे हिन्दी नेट अभी अपने शैशवकाल में ही है, इसे विकसित होने में समय लगेगा। हम ब्लागिंग के माध्यम से जितनी उपयोगी जानकारियाँ लोगों से बांट सकते हैं बांटनी चाहिए। जितना हिन्दी नेट जानकारियों से समृद्ध होगा उतना ही पाठकों को लाभ होगा। हिन्दी में सर्च करने पर लोगों को उन की आवश्यकता की सामग्री मिलनी चाहिए। जो उन्हें नहीं मिलती उस का सृजन करें। आप के पेज पर आने वालों की संख्या स्वतः ही बढ़ जाएगी। तीसरा खंबा पर, जहाँ कानूनी जानकारियाँ होती हैं, वहाँ जिस दिन कोई पोस्ट नहीं होती उस दिन भी पाठकों की संख्या में केवल 8 से 10 प्रतिशत की ही कमी आती है।

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  10. अपने साथ तो उल्टा है, जब सीरियस लिखते हैं, तो ५-७ पढने वाले मिल जाते हैं.
    हालांकि प्रोफाइल कुछ और ही बताता है.
    लेकिन आपने सही कहा की पाठकों के साथ ट्यूनिंग होना बहुत ज़रूरी है.
    तो आज से ट्यूनिंग की ट्रेनिंग शुरू.
    दिवाली मुबारक.

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  11. सही बात! ब्लॉग जैसे दोतरफा संवाद वाले माध्यम के द्वारा कोई भी जबरन अपना ज्ञान थोप कर लोकप्रिय नहीं हो सकता। पाठकों की रुचि, विचार, पसंद, नापसंद का ध्यान रख कर लिखने वाले ही लोकप्रिय हो सकते हैं।

    अब स्लॉग ओवर पढ़ कर अपने ही पोस्ट से की दो लाइन भी लिख दे रहे हैं

    पादे सो पुन्न करे, सूँघे सो धर्मात्मा।
    हाँसे सो नरक परे, छिन भर के वासना॥

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  12. पता नही किसको क्या पसंद आ जाये।अपुन तो बस दिल मे जो आये लिखो और पेलो खासकर जो अख़बार मे नही लिख सकते उसे यंहा ठेल दो।बाकि तो ताऊ जी कह ही गयें है कि यंहा सब ज्ञानी है,सब शबरी के शिष्य है।और हां स्लाग ओवर,ओ तेरा क्या कहना।

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  13. बात तो सही है ऐसा ही देखने में भी आ रहा है....बहुत बढिया विचार प्रेषित किए हैं......पाठक लाभ उठाएगें....आभार।

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  14. अब जब आपको मेरा कल का कहा सत्य लगा तो दो कदम आगे आ कर और कहता हूँ...

    यह तल्खी से कहना की "यहाँ सब ज्ञानी हैं " उचित नहीं हैं... मेरे जैसे कुछ लोग अज्ञानी है यह सत्य है...

    पर सभी अज्ञानी नहीं हैं यह भी उतना ही सत्य है... बात उठती है की आपका ज्ञान और अज्ञान नापने का स्केल क्या है ?

    अगर मैं अपनी बात करूँ तो मुझे साहित्यिक भूख है, समाचारों की भूख है... विवेचना की भूख है, कुछ सीखने की भूख है...
    ऐसे में मैं वोही तलाशूंगा... जो जैसे पसंद रखता है वहां खोज कर पहुँच ही जाता है...

    साथ ही यह भी गलत मानता हूँ की अच्छे लेख पढ़े नहीं जाते, जाते हैं... निर्भर करता है की वहां कितने उस टाइप की लोग पहुंचे हैं... यहाँ फिर स्केल काम करता है... कुछ ब्लॉग मैं आपको बताता हूँ

    अज़दक - प्रमोद सिंह
    सबद- अनुराग वत्स
    मल्तीदा और ... - शायदा
    फुरसतिया - अनूप शुक्ल (शुकर है इनकी लेखनी बोलचाल की है )

    और भी कई जो मैं नहीं जानता लेकिन बात जब रातों रात लेखक और कवि बानने की आती है को ब्लोग्गेर्स को धैर्य रखना ही होगा... पढने वाले और पसंद करने वाले दोनों वहां पहुंगे... ऐसे लोगों को कभी विज्ञापन नहीं करना पड़ता... इन्हें अपनी योग्यता पर भरोसा होता है... या फिर यह इसके बारे में भी नहीं सोचते...

    टारगेट साफ़ है आपको लिखना है या कमेन्ट पाना है... कमेन्ट से लेख का स्तर नहीं होता... मन की बात कहने से होता है... ऐसे कई स्तरहीन ब्लॉग में जानता हूँ (इनमें हो सकता है मेरा भी शामिल हो ) जो आलतू- फालतू और घटिया लेख लिखते है जो कहीं न कहीं पढ़े होते हैं... फिर भी वो अच्छे कहलाना चाहते हैं....

    मैंने पहले भी कहा था हिंदी वाले आकादमी हो या पत्रिका, या फिर ब्लॉग....हमेशा लड़ते और खुद को दिल ही दिल में बेहतर समझते हैंं... ऊपर से विनार्म्रता का लेबल चस्पा देते हैं... (यह सबकी बात नहीं है)

    असल मुद्दा आनंदित करने का है, विवेकपूर्ण होकर ब्लॉग जगत को कुछ देने का है... टुच्चे विज्ञापन से कुछ नहीं मिलेगा...

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  15. सही बात!

    आपको और आपके परिवार को दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं !

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  16. किसी की टीआरपी बढे न बढे, इसी बहाने आपकी तो बढ ही गयी।
    धनतेरस की हार्दिक शुभकामनाएँ।
    ----------
    डिस्कस लगाएं, सुरक्षित कमेंट पाएँ

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  17. सागर भाई,

    सबसे पहले दीवाली की बहुत-बहुत शुभकामनाएं...आपकी तर्क करती समालोचना मुझे बेहद पसंद आई...मैं समझता हूं मेरे लेख ने आपको पूरी पोस्ट जितनी टिप्पणी लिखने के लिए उद्वेलित किया, उससे जो मेरा उद्देश्य था उसकी आधी जीत तो वहीं हो गई...बाकी दिन में व्यस्तता की वजह से आपके यक्ष प्रश्नों का उत्तर देने की स्थिति में नहीं हूं...हां, रात को अपनी पोस्ट के ज़रिए ज़रूर जिज्ञासाएं जो आपने ज़ाहिर की हैं, उन्हें यथाशक्ति ज़रूर शांत करने की कोशिश करूंगा...तब तक एक प्रश्न का उत्तर ढूंढने की कृपा करना, गुरुदत्त को मरने के बाद ही लोगों ने क्यों जाना कि गुरुदत्त वास्तव में थे क्या...

    जय हिंद...

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  18. आप जो सवाल कर रहे हैं अपनी बात करूँ तो जायज़ नहीं है... और जहाँ से यह सन्दर्भ लिया है वहां यह कहने का मतलब था की की प्यासा फिल्म में गुरुदत्त के खास शायर का किरदार.... पर इतना खोल कर नहीं लिखा सोचा लोग समझ जायेंगे... मैं और भी लिखने वाला था की पुराणी दिल्ली की गलियों में दारु पी के डोलता रहता...

    हाँ इससे सहमत हूँ की कुछ आर्टिस्ट अंतर्मुखी होने के कारण गलत समझे जाते हैं या फिर देर से समझे जाते हैं... आर्टिस्टों से साथ ऐसा ज्यादा होता है उनकी सबसे बड़ी शिकायत यही होती है की मुझे या मेरे विचार कोई समझ नही रहा... अगर मैं उनका समकालीन होता तो कभी गलत नहीं समझता... क्यों की फिर वोही स्केल काम करता है...

    अभी अनुराग कश्यप अच्छी फिल्म बना रहे हैं तारीफ़ मिल रही है पर पैसा नहीं ... फिर भी मैं उनका कायल हूँ... सिर्फ उनका ही नहीं, मैंने गाँधी को नहीं मारा, या फिर एक लड़का जो लोयला से टॉप करता है और पारिवारिक तनाव में पागल हो जाता है, दिन में तम्बाकू बेचता है, गन्दी गालियाँ देता है, और लंच में पुस्तकालय आकर रोज़ हिन्दू का सम्पादकीय पढता है.... उसे धमकाकर पूछो, कलाई तोड़ कर पूछो तो पढाई छोड़ने के १४ साल बाद भी ग्लूकोज़ का अणुसूत्र याद रहता है... मैं उसका कायल हूँ...

    अपने दफ्तर में पोछा लगाने वाले कुमार भैया का भी हूँ जो रोज़ की परेशानियों से बाहर निकलना जानते हैं...

    हाशिये पर के लोगों को पहले रखें मैं उनके साथ मिलूँगा... यह अपनी तारीफ नहीं है यह मजबूरी है, कमजोरी भी खुदा जाने ताकत भी...

    हाँ, सागर कहिये सिर्फ... कुछ हक़ आप अपने ब्लॉग के शुरूआती दिनों से ही दे चुके हैं..

    दिवाली की शुभकामनाएं आपको भी...
    आप अगर आधी जीत कह रहे है में आपकी पूरी जीत की दुआ करता हूँ इसमें शामिल रहने की भी कोशिश करता हूँ जीत मिले हमें "आमीन"

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  19. बहुत शानदार चिंतन. लगता है मक्खन और मक्खनी की कुछ खटर पटर ज्यादा चल रहि है?:)

    आपको दीपावली पर्व की हार्दिक शुभकामनाएं.

    रामराम.

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  20. लगता है असली रग पकड़ ली आपने .......... मून भी ऐसा कर के देखते हैं .........
    आपको और आपके परिवार को दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएँ

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  21. achcha laga yeh lekh............ aur slog over ki to kya kahne..........hahahahahaha........

    "आरती ओम् जय जगदीश हरे का सच..... आईये जानें इसको और इस आरती के जनक को......" isey dekhiyega mere blog par............

    aur apko deepawali ki haardik shubhkaamnayen...........



    JAI HIND

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  22. sahi kaha aapne yahan Sameer ji aur ekaadh aur bade naamon ko chhod den to baki ke bade naam sirf satahi baton aur bakwas ke alawa kuchh nahin karte....
    kitne log kisi samajik mudde ko uthate hain... ya kisi samasya ki taraf dhyaan dilate hain..
    jise dekho bas comment ke liye mara ja raha hai.. ab to comment milne na milne pe bhi aalekh aane lage hain.. satsang ki bajay chaurahe ke thaluon ka akhada lagne laga hai blogging. ye comment un logon ke liye nahin hai jo apni lekhni ke kamaal se lekhan, hindi aur samaaj ko ek nai disha de rahe hain, lekin mujhe pata hai jin logon ke liye ye baat kah raha hoon unhe koi fark nahin padega aur ho sakta hai koi kal ko mere blog ko band karne ki apeel kar de 'gyaan baghaarne ke aarop me'
    khair main bhi par updesh kushal bahutere' ki jamaat me shamil ho gaya. baat kadwi kah di kuchh gussa aa gaya aakhir insaan hoon na. maaf karen. asal me maine kai blog aise paye jahan vastav me logon ko jana chahiye, main bhi waise har roz nahin ja pata wahan lekin iska ek karan vyastata bhi hai.

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  23. पूरी रामायण लिख डाली, पर यह तो बताया ही ना कि,
    सीता किसके पिता थे ! ये मुई टीआरपी क्या होवै है ?
    एच-वन एन-वन वाइरस जैसा तो कुछ नहीं है, यह ?

    या यह ब्लॉगर फ़्लू का कोई नया वाइरस आया है !
    पहले अपनी घरैतिन से ट्यूनिंग भिड़ाय लेंय, बाबू
    पाठक को तो एक फटका मार कर ट्यून कर लेंगे

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  24. जय हो ज्ञान दीप जला ही दिया सो
    हैप्पी दिवाली

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  25. डॉक्टर अमर कुमार जी
    टारगेट रेटिंग प्वाईंट (टीआरपी) वैसे तो किसी टेलीविजन चैनल के प्रोग्राम की लोकप्रियता मापने का पैमाना होता है, लेकिन अब ये इतना पॉपुलर हो गया है कि किसी व्यक्ति को कितने ज़्यादा लोगों से भाव मिलता है, उसकी टीआरपी उतनी ही ज्यादा मानी जाती है...लेकिन डॉक्टर साहब, रही आपकी टीआरपी, इतनी ऊंची निकली कि पैमाना ही टूट गया...और हमारे लिए तो आपकी टिप्पणी जिस किसी पोस्ट को मिल जाती है, वही उसी पोस्ट की टीआरपी तय करने का पैमाना हो जाता है...

    जय हिंद...

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  26. टिप्पणियों में इतना कुछ और इतना बढ़िया लिखा जा चुका है कि और कुछ भी लिखने का मतलब होगा दिये को रोशनी दिखाना इसलिये केवल इतना ही कहूंगा ..
    आप सभी को दीपावली पर्व की हार्दिक शुभकामनाएं.....
    रहने दो...रहने दो...आदमी होठों से ही झूठ बोल सकता है और कहीं से नहीं... भई वाह क्या पकड़ा है मक्खन को, बेचारा मक्खन !!

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  27. हमारे प्रधानमन्त्री मनमोहन सिंह जी ने भी कहा है......

    "किसी भी देश की आर्थिक प्रगती उसकी भाषा के विकास पर निर्भर करती है.... हिंदी फ़ले फ़ूले यह देश के हित में है !"

    हिंदी हैं हम वतन है हिन्दुस्तान हमारा .......

    जय हिंद..

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  28. अरे बाप रे अब मेरे लिये तो कुछ बचा ही नही लिखने को ? भाई हम तो मन मोजी है, इस लिये जो मन मै आया लिख दिया, जो देखा वो भी लिख दिया, कोई विदियो पसंद आया वो भी आप को दिखा दिया, अब हम कोई लेखक तो है नही, ना ही कवि, ओर भईया गलतियां भी खुब करते है.... बस आप लोगो के प्यार ने ही बांध रखा है. लिखो भाई गम्भीर भी लिखो सब पढते है, लेकिन समय लगता है, हर बात को समय चाहिये धोर्य चाहिये,

    आप को ओर आप के परिवार को दिपावली की शुभकामनाये

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  29. खुशदीप जी,
    आपकी बातों पर ध्यान देंगे हम..
    दीपावली की आपको और आपके समस्त प्रियजनों को शुभकामना...
    जय हिंद !!!

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  30. यहाँ की अंतिम टिप्पणी - खामोश अदालत जारी है । चलते है अगली पोस्ट पर - अभी रात बाक़ी है - वो सुबह कभी तो आयेगी - लेकिन ऐसा नही है कि ये दुनिया अगर मिल भी जाये तो क्या है ..?

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