शुक्रवार, 9 अक्तूबर 2009

ब्लॉगिंग में सब अच्छा हो रहा है...

हिंदी ब्लॉगिंग जगत में गंदगी घुस आई है...जो हो रहा है, वो अच्छा नहीं हो रहा...धर्म को लेकर क्रिया-प्रतिक्रिया में आस्तीनें चढ़ी ही रहती हैं...नाक के सवाल पर एक-दूसरे के मान-मर्दन तक की नौबत...ये क्या हो रहा है...भाई ये क्या हो रहा है...इसी स्थिति से खिन्न होकर कल्पतरू वाले विवेक रस्तोगी जी ने एक हफ्ते तक पोस्ट न लिखने का ऐलान कर दिया...
 
धर्म प्रचार पर हंगामा हो रहा है हमारी ब्लॉग दुनिया में, इसे दूर करें !!!!! विरोध में सात दिन ब्लॉग पर पोस्ट पब्लिश नहीं करुँगा…
 
उड़न तश्तरी वाले गुरुदेव समीर लाल जी समीर ने भी कहा-

ये क्या हो रहा है?
आज कल जो हालात हुए हैं, मजहब के नाम पर जो दंगल मचा है, उसे देख कुछ कहने को मन है:
किसको खुदा औ’ भगवान की जरुरत है, आज हमको यहाँ, इंसान की जरुरत है..
-समीर लाल ’समीर’


ये तो रही विवेक भाई और समीर जी की बात...लेकिन मैं इससे ठीक उलटा सोच रहा हूं...अपनी बात साफ करने के लिए आज मैं स्लॉग ओवर में कोई गुदगुदाने वाली बात नहीं कहने जा रहा...बल्कि एक महान हस्ती के साथ पेश आया वाकया सुनाने जा रहा हूं...महान हस्ती कौन थीं, जानकर उनका नाम नहीं बता रहा..क्योंकि हर बात को मज़हब के चश्मे से देखने वाले उनके नाम को लेकर ही कोई टंटा न खड़ा कर दें, ये मैं नहीं चाहता...एक बात और संत या सूफी किसी मज़हब या कौम के नहीं होते बल्कि पूरी इंसानियत के लिए होते हैं...
 
स्लॉग ओवर
कई सदियों पहले की बात है...एक सिद्ध पुरुष अपने चेले के साथ भ्रमण पर निकले हुए थे...घूमते-घूमते एक गांव में पहुंचे...वहां पूरा गांव सिद्ध पुरूष की सेवा में जुट गया...कोई एक से बढ़ कर एक पकवान ले आया...कोई हाथ से पंखा झलने लगा...कोई पैर दबाने लगा...किसी ने नरम और सुंदर बिस्तर तैयार कर दिया...सुबह उठे तो फिर वही सेवाभाव...सिद्ध पुरुष का गांव से विदाई लेने का वक्त आ गया...गांव का हर-छोटा बड़ा उन्हें विदा करने के लिए मौजूद था...सिद्ध पुरुष ने गांव वालों के लिए कहा...जाओ तुम सब उजड़ जाओ...यहां से तुम्हारा दाना-पानी उठ जाए...
सिद्ध पुरुष के मुंह से ये बोल सुनकर उनके चेले को बड़ा आश्चर्य हुआ...ये महाराज ने गांव वालों की सज्जनता का कैसा ईनाम दिया लेकिन चेला चुप रहा...गुरु और चेला, दोनों ने फिर चलना शुरू कर दिया...शाम होने से पहले वो एक और गांव में पहुंच गए...
ये गांव क्या था साक्षात नरक था...कोई शराब के नशे में पत्नी को पीट रहा है...कोई जुआ खेलने में लगा है...कोई गालियां बक रहा है...यानि बुराई के मामले में हर कोई सवा सेर...सिद्ध पुरुष को देखकर कुछ गांव वालों ने फब्तियां कसना शुरू कर दिया...ढोंगी महाराज आ गया...सेवा तो दूर किसी ने गांव में पानी तक नहीं पूछा...खैर गांव के पीपल के नीचे ही किसी तरह सिद्ध पुरुष और चेले ने रात बिताई...विदा लेते वक्त सिद्ध पुरुष ने गांव वालों को आशीर्वाद दिया...गांव में तुम सब फूलो-फलो...यहीं दिन दूनी, रात चौगुनी तरक्की करो...यहीं तुम्हे जीवन की सारी खुशियां मिलें...
चेला वहां तो चुप रहा लेकिन गांव की सीमा से बाहर आते-आते अपने को रोक नहीं पाया...बोला...महाराज ये कहां का इंसाफ है...जिन गांव वालो ने सेवा में दिन-रात
एक कर दिया, उन्हें तो आपने उजड़ने की बद-दुआ दी और जो गांव वाले दुष्टता की सारी हदें पार कर गए, उन्हें आपने वहीं फलने-फूलने और खुशहाल ढंग से बसे रहने का आशीर्वाद दे दिया...

ये सुनने के बाद सिद्ध-पुरुष मुस्कुरा कर बोले...सज्जनों में से हर कोई जहां भी उज़ड़ कर जाएगा, वो उसी जगह को चमन बना देगा...और इन दुर्जनों में से कोई भी स्वर्ग जैसी जगह भी पहुंचेगा तो उसे नरक बना देगा...इसलिए अच्छा यही है कि वो जहां है, वहीं बसे रहे...इससे और दूसरी जगह तो बर्बाद होने से बची रहेंगी...

26 टिप्‍पणियां:

  1. खुशदीप जी..आप सही कहा कि इस समय हिन्दी ब्लॉगजत में जैसे एक दंगल चल रहा है कि देखें कौन?...कैसे? ...किसको? ....कहाँ पटखनी देता है?...

    आज सुबह एक जगह पर अपनी समझ के मुताबिक कमैंट भी कर दिया था लेकिन कुछ ब्लॉगरज़ को मेरा लिखा पसन्द नहीं आया और उन्होंने इसे जाहिर भी किया।...सबके अपने-अपने विचार हैँ...क्या कहा जा सकता है?...मेरे हिसाब से तो दुनिया के सभी धर्म श्रेष्ठ हैँ...उनमें कोई भी...किसी से भी... किसी भी तरह से कमतर नहीं है।...

    देखा जाए तो किसी भी धर्म को अपनाना या ना अपनाना हर व्यक्ति विशेष के अपने विवेक पर निर्भर करता है...इसे किसी भी तरह से जबरन दूसरे पर थोपना या अपने धर्म को दूसरे से बेहतर बताना गल्त है।

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  2. भाई खुशदीप सहगल ,आज इतनी महत्वपूर्ण बात आपने स्लॉग ओवर मे कह्दी है कि अब इससे आगे कुछ कहना बाक़ी नही है । जो लोग इसका मर्म समझते हैं वे अब इस स्थिति को यहीं विराम दे देंगे । संयम सभी के लिये ज़रूरी है ।

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  3. khushdeep ji,
    bahut hi pate baat kahi hai aapne....samajhne waale samajh jaayege aur jo na samjhe wo to anadi hain hi.....unki chinta bhi kyun karna...!!

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  4. स्लॉग ओवर में पूर्ण सार है. काश!! लोग ग्रहण करें.

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  5. समझने वाली समझ गए, जो ना समझे वो 'अनाड़ी' है।
    भाई आपकी पोस्‍ट और स्‍लॉग ओवर को पढ़ कर तो यही गीत याद आ रहा है...
    वैसे कुछ लोगों को आपकी बात समझ नहीं आएगी

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  6. स्लाग ओवर सारगर्भित है.

    रामराम.

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  7. सुंदर उद्धरण! समझदारों को इशारा काफी है।

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  8. बात काफ़ी गंभीर है, और आपसे सहमत हैं।

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  9. आज स्लोग ओवर चिंतन मनन करने वाला है..काश कि लोग समझ पायें

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  10. बेहतरीन

    बरसों पहले जब मन बहुत खिन्न था तो मेरे दादाजी ने स्लॉग ओवर वाला किस्सा सुना कर मुझे शांत किया था। अब तक यह अवचेतन मस्तिष्क में हमेशा मौज़ूद रहा है।

    बी एस पाबला

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  11. हर एक के अपने पूर्वाग्रह हैं तो लोग कैसे समझेंगे!!
    यह सब प्रचार करने आये हैं ? सो यह अपनी विज्ञापन को चिपका कर ही जायेंगे?

    फुरसतिया जी ने सही कहा यह चिट्ठाकारी तो निन्यानवे का फेर है.......और हम पड़े 99 के चक्कर में

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  12. सहमत तो हूं मगर क्या करूं,लोगो को यूंही गुमराह होने दूं?फ़िर काहे को हम नीम-हकीमो के पीछे पड़े रहते हैं?क्या हमारे ही देश मे हमारे ही नौनिहालो के हाथ मे हमारे ही खिलाफ़ थमाये गये हथियार ऐसे ही गलत-सलत प्रचार-प्रसार का दुष्परिणाम नही है?कहने को बहुत कुछ है,मगर मैं इसके बावज़ूद आप लोगो से सहमत हूं और सिर्फ़ एक बार उन विद्वानो से अपने सवालो का जवाब नही देने का कारण पूछूंगा और फ़िर जैसे पंचो की राय है।पैंट मे घुसी चींटी को या तो निकाल देना चाहिये या पैंट ही उतार देना चाहिये वर्ना परेशानी तो होनी ही है।

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  13. बहुत ही बढ़िया विचार इस सूफी कथा के माध्यम से आपने यहाँ प्रस्तुत किये हैं
    लेकिन कभी कभी ब्लॉग जगत ऐसी फिजूल की बातों में उलझ जाता है जहाँ किसी निष्कर्ष तक पहुंचना संभव नहीं होता केवल एक दुसरे को पटकनी खिलाना और व्यर्थ की छीटाकशी करना ही एक मात्र उद्देश्य होता है.
    यह सब, दुसरे के धर्म को निकृष्ट एवं अपने धर्म को श्रेष्ठ बता कर अपने ही धर्म की विद्रूपताओं पर पर्दा डालने जैसा है.....

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  14. सभी दुसरों के समझ आ जाए यही कामना कर रहे हैं :)

    मैं कहूँगा, मुझे समझ आ गया है.

    व्यक्ति समझे तो समाज समझदार होगा और उससे देश.

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  15. बड़ी पते की बात कही है.
    एक पते की बात हम से भी सुन ( पढ़ )लेना.

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  16. वाह ! गज़ब अच्छी पोस्ट,

    वैसे राजीव तनेजा जी ने लिखा है ब्लॉग्गिंग 'इस समय' .... लेकिन मुझे लगता है हिंदी वाले हर जगह लड़ते रहते हैं, अकादमी हो या न्यूज़ रूम, (यह लडाई दूसरी तरेह की है- बौधिक टाइप) या फिर ब्लॉग्गिंग...

    वैसे अगर हम सादगी रहने दें तो ब्लॉग जगत बहुत अच्छा है... साहित्यिक पोस्ट लिखी जा रही है, उससे अच्छी बात तो यह है की जिस दिन आप कोई उदास पोस्ट डालें आपको हिम्मत देने कई लोग सामने आते है... यकीं ना हो तो कभी आजमा लीजिये...

    ऐसे कई नाम है जो लीड करते हैं फिर भी अपने से छोटों को या फिर सिर्फ कोशिश करने वालों को सराहते हैं... एक - दो उदाहरण में समीर अंकल, अनूप शुक्ल, कुश, अनुराग, सुशीला जी और भी कई नाम...
    यह जानते हैं की इनके नाम के साथ अगर 'जी' ना लगाये जाएँ तो फर्क नहीं पड़ेगा क्यों की यह मुद्दा और नजरिया समझकर (कंटेंट) लिखते हैं...

    यह सिर्फ धर्म पर नहीं सभी मुद्दों पर लिख रहा हूँ...

    एक ख्याल यह भी है की खुद के नज़रिए को 'सुपर' रखना और ऐसे वाहियात प्रयोग करने से बचे तो बेहतर हो...

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  17. और यह क्या जी, ! फेर से अप्रोवल के बाद कमेन्ट जा रहा है कौनो ने लोचा किया क्या ?

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  18. डॉक्टर दराल, ये आपकी टिप्पणी ने मुझे उलझा दिया है...सोच रहा हूं न मेरा टीचर्स का टाइम हुआ है, न आपका...इसलिए न मुझसे पढ़ने में गलती हो रही है और न ही आपसे लिखने या टिप्पणी भेजने में हुई होगी...आपकी पते की बात सुनने (पढ़ने)की जिज्ञासा बढ़ गई है...आपके अन्तर्मन को जानने के लिए आपके ब्लॉग पर भी हो आया...वहां भी नई पोस्ट नहीं दिखी...होगी तो आपकी बात गहरी ही...जानने के लिए बेताब हूं...

    जय हिंद...

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  19. धर्म के नाम पर ब्लॉगिंग में भी रोटी सेकी जाने लगी ।
    यह सब वैसा ही है जैसा राजनीति में हो रहा है ।

    धार्मिक क्रिया -प्रतिक्रिया वादियों का बहिष्कार करना चाहिये ।

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  20. भैया, आपकी टिपण्णी से ठीक एक मिनट पहले छपी है. क्या इत्तेफाक है.
    ज्ञान की बातें भी एक साथ.

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  21. ये हुई ना सही बात चंद शब्दों मे सब को मात दे दी। और बात का मर्म भी समझा दिया। बधाई

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  22. गन्दा है पर धंधा है यह !!

    जय हिंद !

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  23. हमेशा से सुनते आ रहे हैं मजहब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना ! पर मजेदार बात देखिये इंसान इसका उलटा ही कर रहा है और धर्म के नाम पर ही कट मर रहा है !

    संसार रूपी सागर में जो धर्म को लेकर क्रिया-प्रतिक्रिया में आस्तीनें चढ़ाने का रोग लग गया है, वह बहुत गंभीर है, असाध्य है ! जब तक ज्ञान का सहारा न लिया जाए, इस रोग का निदान संभव नहीं !

    विश्व के सभी धर्मो का सारांश भी मन की निर्मलता पर और नैतिक आचरण पर ही बल देता है ! किंतु आज धर्म वैयक्तिक स्वार्थो की पूर्ति हेतु इसतेमाल हो रहा है ! धर्म की जितनी चर्चा हो रही है, कर्म से वह उतना ही बाहर तथा दूर होता जा रहा है! धर्म का प्रचार बढ रहा हैं, व्यवहार नहीं ! यही सब से बडी विडंबना है !

    हमको यह समझना चाहिये कि धर्म से कर्म को पृथक कर के नहीं देखा जा सकता, बल्कि धर्म ही कर्म को नैतिक आचरण से जोड कर सत्कर्म बनाता है ! यही धर्म की कसौटी है !

    जय हिंद !

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