रविवार, 27 सितंबर 2009

...लो जी बम फट गया

मैंने 12 बजे रात को बम फोड़ने का वादा कर रखा था...लेकिन ब्लॉगवाणी वालों ने पहले ही बम फोड़ दिया...मेरा बम तो सुतली बम होता लेकिन ब्लॉगवाणी ने असल में ही धमाका कर दिया...मुझे पता चला कि किसी ने मेरे नाम के कंधे पर ही तोप रखकर पक्षपात के आरोप का गोला ब्लॉगवाणी पर दाग दिया...और ब्लॉगवाणी ने भी त्वरित प्रतिक्रिया में सेवाएं बंद कर दीं...भईया जब मुझे ही शिकायत नहीं थी, तो फिर मेरे लिए दूसरे किसी भाई को क्यों शिकायत हुई...ये पसंद बढ़ने न बढ़ने से दुनिया कोई चलती है...हां एक प्लेटफॉर्म जरूर बंद हो गया, जहां सभी ब्लॉगर्स आसानी से मिलते थे...

खैर अब आता हूं उस वादे पर जो कल आपसे किया था...मुझे पता नहीं आप इसे ठीक से पढ़ भी पाते हैं या नहीं, फिर भी पोस्ट कर रहा हूं...

सपने में देखा एक सपना...
वो जो है अमिताभ अपना...
मार्केट से आउट हुआ...
लोगों को डाउट हुआ...
मैं अमिताभ हो गया...हो गया...


करीब तीन दशक पहले ऋषिकेश दा ने फिल्म बनाई थी गोल-माल...उसी फिल्म में अमोल पालेकर सपना देखते हुए ये गाना गाते हैं और अमिताभ बच्चन स्टू़डियो के बाहर स्टूल पर चपरासी की तरह बैठे नज़र आते हैं...कुछ ऐसा ही सपना मैंने भी देखा है...लेकिन यहां दिक्कत ये है कि यहां शेखचिल्ली के हसीन सपने में मैं अकेला ही अमिताभ नहीं हुआ मेरे साथ बी एस पाबला जी भी हैं..."बीएसपी (बी एस पाबला) एंड केडीएस (खुशदीप सहगल) फ्री स्माइल्स कंपनी" के सीनियर पार्टनर...
सपना ये है कि बिज़नेस में हमारी कंपनी ने रिलायंस को भी पीछे छोड़ दिया है...क्या कहा...कौन सी रिलायंस...बड़े भाई वाली या छोटे भाई वाली...अजी हमारा कहना है दोनों भाइयों की कंपनियां भी मिला लीजिए, फिर भी हमारी "बीएसपी एंड के़डीएस फ्री स्माइल्स कंपनी" पर लोगों को ज़्यादा रिलायंस होगा...वो क्यों...एक तो हर ची़ज़ को हम मुनाफे की तराजू पर नहीं तौलते..दूसरी बात मुस्कुराहटें बांटने का जो धंधा हमने सोचा है वो... आई मौज फ़कीर की, दिया झोंप़ड़ा फूंक... की तर्ज पर होगा...ग्राहक को हमारी कंपनी की सेवाएं लेने के बदले धेला नहीं खर्च करना होगा...बल्कि उसका चाय-पानी से स्वागत और किया जाएगा...मेरी हैसियत तो कंपनी में कंपाऊडर जैसी होगी लेकिन ये मैं यकीन के साथ कहता हूं कि लाफ्टर के डॉक्टर बीएस पाबला गुदगुदी का ऐसा इंजेक्शन लगाएंगे कि ग्राहक सोते हुए भी उठ-उठ कर ठहाके मारेगा...अब आप कहेंगे कि ये कौन सा धंधा हुआ जिसमें दुकानदार का अपना कोई फायदा ही न हो...है भईया है... फायदा है...बस जो हमारी कंपनी में आएगा, उसे हम दोनों की सिर्फ 100-100 पोस्ट को पढ़ना होगा...है न, एक हाथ दे, दूसरे हाथ ले, वाली तर्ज का धंधा...ऐसा हुआ तो बकौल अवधिया जी हमें दूसरों को लेकर शिकायत भी नहीं रहेगी कि अपनी पोस्ट तो पढ़वा ली और जब हमारी पोस्ट पढ़ने की बारी आई तो खुद भाग गये...
देखी, हमारी अर्थशास्त्र की समझ...खैर हमारी दुकान का मुहूर्त भी हो गया...पाबलाजी और मैं दोनों अपनी-अपनी सीटों पर जम गए...इंतज़ार होने लगा ग्राहक का...दो घंटे बाद एक खाकी वर्दीधारी दुकान की तरफ बढ़ता दिखाई दिया...हमने सोचा बेचारा पुलिसवाला हर वक्त चोर-चोरियों, अपराध-अपराधियों और अंडर द टेबल डीलिंग का हिसाब लगाते-लगाते चकराया रहता है, इसलिए शायद मानसिक तनाव से राहत पाने और खुद को तरोताजा करनेItalic के लिए हमारी सेवाएं लेना चाहता है...पाबलाजी ने दूर से ही ताड़ लिया और मुझे आदेश दिया...पुलिस रिलेटे़ड जितना जितना भी लाफ्टर मैटीरियल है, सब की फाइल्स खोल लो...जो हुक्म मेरे आका वाले अंदाज़ में मैंने आदेश का तत्काल प्रभाव से पालन करना शुरू कर दिया...
कांस्टेबल के चरण-कमल दुकान में पड़ते ही पाबलाजी ने कहा...आइए दारोगा जी, क्या पसंद करेंगे...कांस्टेबल खुद के लिए दारोगा का संबोधन सुन कर वैसे ही चौड़ा हो गया...मूंछ पर ताव देकर बोला...पसंद-वसंद कुछ नहीं, इंस्पेक्टर साब ने तुम दोनों को थाने पर बुलाया है...हम दोनों ने एक दूसरे को देखा, आखिर माजरा क्या है...सर्वजन सुखाय, सर्वजन हिताय के मंत्र के साथ हम दोनों ने सोचा कि कांस्टेबल नहीं इंस्पेक्टर साब फ्री स्माइल्स सेवाएं लेना चाहते हैं...आखिर इंस्पेक्टर हैं...पूरे एरिया में लॉ एंड ऑर्डर संभालना पड़ता है, मुंशी की तरह हिसाब रखो अलग कहां कहां से हफ्ता आया और कहां कहां रह गया...ऊपर से ऊपर वाले अफसरान को हर वक्त खुश रखने की जेहमत और...पाबलाजी और मैंने अपने-अपने लैपटॉप लिए और कांस्टेबल के पीछे हो लिए...
थाने में जैसे इस्पेक्टर साब हमारे ही इंतज़ार में पलक-पावड़े बिछाए बैठे थे...हमें देखते ही गब्बर सिंह के अंदाज़ में बोले....आओ, आओ महारथी...आज आए हैं दो-दो ऊंट पहाड़ के नीचे...हमने सोचा इंस्पेक्टर साहब हमसे भी बड़े लाफ्टर चैंपियन हैं...हम भी खीं..खीं..खीं. खीं कर हंस दिए...ऐसी बेबस हंसी हमने शायद ज़िंदगी में पहली बार हंसी थी...तभी इंस्पेक्टर की कड़कदार आवाज गूंजी....खामोश...अबे हम तो अच्छे अच्छे फन्ने खानों को रूला-रूला कर उनकी जेब ढीली कर लेते हैं...और तुम दोनों लोगों को फ्री में गुदगुदा कर खुद को बड़ा तीसमारखां समझ बैठे हो...क्या समझ कर ये धंधा शुरू किया था...सरदार बहुत खुश होगा...शाबाशी देगा...क्यों ....अबे तुम दोनों के चक्कर में ऊपर मैडम तक मेरे इलाके की रिपोर्ट चली गई...मेरी जान को टंटा करा दिया...बहनजी का आदेश आया है कि ये तुम दोनों ने अपनी कंपनी में बीएसपी कैसे जोड़ लिया...क्या बीएसपी का नाम लेकर भवसागर तरना चाहते हो...सच-सच बताओ कौन सी पार्टी ने तुम्हें प्लांट किया है बहनजी के खिलाफ...इस धोखे में मत रहना कि सेंटर या सीबीआई तुम्हें बचा लेगी...ऐसे-ऐसे एक्ट लगाएंगे जाएंगे तुम्हारे खिलाफ कि लोगों को हंसाना तो क्या खुद भी आधी इंच मुस्कान के लिए तरस जाओगे....
इंस्पेक्टर के सदवचन सुनकर मामला थोड़ा-थोड़ा समझ में आने लगा था...ये नाम के चक्कर में किस फट्टे में जान फंसा ली...पाबला जी ने सफाई देनी चाहिए...हुजूर, बीएसपी पार्टी का जब जन्म हुआ था उससे तो कई साल पहले मेरा नाम बीएस पाबला यानि बीएसपी रख दिया गया था...इस नाते तो मेरा इस नाम पर पहले हक बनता है...और हमें पार्टी पर केस कर देना चाहिए कि ये नाम कैसे रख लिया...इसके बाद इंस्पेक्टर का कहा सिर्फ एक ही वाक्य याद रह गया...हमें कानून सिखाते हो, हमें...जो हाथी को चूहा बना दे और चूहे को हाथी...गजोधर ज़रा ले चल तो इन्हें लॉक-अप के अंदर...इसके बाद धूम-धड़ाके की आवाजें बढ़ती ही गईं...और अचानक मेरी नींद खुल गई...
मैंने पहला काम बीएस पाबला जी को ई-मेल करने का किया...अगर अपनी खुद की स्माइल्स बरकरार रखनी है तो "बीएसपी एंड केडीएस फ्री स्माइल्स कंपनी" खोलने का इरादा कैंसिल...

स्लॉग ओवर
ढक्कन...मेरे दादाजी की उम्र 98 साल की है...और उनकी आंखे बेहद तेज़ हैं...कभी उन्होंने ग्लासेस का इस्तेमाल नहीं किया..
Italicमक्खन...यार ढक्कन, ये तो मैंने सुना था कि कई लोग बिना ग्लास का इस्तेमाल किए सीधे बॉटल से ही खींच जाते हैं...लेकिन इस तरह दारू पीने से आंखे तेज़ हो जाती हैं, ये मैंने पहली बार आज तुझसे सुना...

31 टिप्‍पणियां:

  1. खुशदीप जी, ब्लौगवाणी पर विराम (या शायद अल्प-विराम) लगने की खबर इतनी बुरी लगी है की आपकी पोस्ट की बाकी बात पर ध्यान ही नहीं जा रहा.

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  2. अपने पाबला जी का नाम तो मैने भिलाई स्टील पाबला रखा है । ये वैसे काफी सीरियस किस्म के है मगर सीरियेस्ली सीरियस नही है । अच्छा व्यंग्य है बधाई

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  3. ऐसा इन्क़लाबी सपना !!

    भाई वाह क्या खूब लपेटे हैं पाबला जी को !!!

    आपका कल्याण हो !!!!

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  4. खुशदीप जी,
    ब्लागवाणी का विराम दुखःद है। निशान्त जी ने सही कहा आज इस वक्त में आप की पोस्ट का आनंद चला गया। ब्लागवाणी का हिन्दी ब्लागजगत को योगदान को नकारा नहीं जा सकता। वह उस के इतिहास में दर्ज रहेगा। लेकिन डॉक्टर अमर कुमार जी का यह कथन भी अक्षरश सही है कि "पसँद पर चटका लगवाने में ब्लागवाणी स्वयँ ही चटक गया"।

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  5. मैंनें कल ही कहा न था कि,
    " तो आप खुश-पाबला रहस्यकम रच चुके हैं ?
    लेकिन रावण के जीते जी इसे प्रकाशित नहीं कर सकते ?
    क्योंकि पाबला के हनुमान होने का पता चल जायेगा,
    ’ जोरू किसी की हलाकान पाबला ’
    अपनों को तो बख़्श देते, दो लाइनें मँथरा पर लिख देते तो क्या चला जाता ? "

    अब आज की टिप्पणी :

    पँगा किसी का , नामज़द पाबला
    जिन्हें ब्लागवाणी टीम से देना पावना बराबर करना था, उनका रावण तो जाता रहा,
    पाबला जी को मुफ़्त का हनुमान साबित करने के प्रयास जारी हैं, परिणाम की प्रतीक्षा है
    सत्ता के सन्निकट रह कर सलाहकारी पत्रकारिता करने का प्रथम श्रेय आज भी मँथरा जी के पास सुरक्षित है,
    इसलिये मँथरा जी पर आज भी कुछ न लिखा ?

    अब आज का स्लोगन : खुशदीप तुम कलम घिसो, हम तुम्हारे साथ हैं !

    ज़रूरत के हिसाब से कुछ स्माइली-वाईली यहाँ टाँक दीजियेगा !

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  6. मैथिली जी और सिरिल जी अब यह आपके विवेक और इच्छा पर ही है की आप ब्लागवाणी फिर से शुरू करे या न करें ! आप खुद निर्णय लेने में समर्थ और परिपक्व हैं -हिन्दी ब्लॉग लेखक जब तक परिपक्व नहीं हो जाते ,शायद इसे बंद ही रखना ज्यादा समीचीन है !

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  7. अपना नाम बीच में आने से वैसे ही असहज हूँ ऊपर से आपका खुलासा!
    इस खुलासे से तो मैं हतप्रभ हूँ। ये तो आपने भविष्यवाणी जैसा लिख दिया था घटों पहले, औघड़ बाबा जैसों की भाषा में।

    अफसोसजनक हादसा।

    ब्लॉगिंग को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता कहा जाता है तो यह स्वतंत्रता हर क्षेत्र में होती है, फिर चाहे वह समाज सेवा हो या व्यवसाय।

    यह ब्लॉगवाणी का अपना निर्णय था, शायद कुछ और बेहतर कर गुजरने के लिए।

    अब तक ब्लॉगवाणी से मिला दुलार याद आता रहेगा। भविष्य की योजनाओं हेतु शुभकामनाएँ

    बी एस पाबला

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  8. ब्लागवाणी से पुनर्विचार की अपील करते हैं.

    इष्ट मित्रो व कुटुंब जनों सहित आपको दशहरे की घणी रामराम.

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  9. यानि कि बहुत कुछ ऐसा छुपा हुआ है जो हम जैसों को पता नहीं है...जो भी हो हिंदी ब्लोग्गिंग के लिये ये किसी हादसे से कम नहीं है.....अभी कुछ कहने का मन नहीं है इस विषय पर..

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  10. मुझे थोडा सा आभास हो रहा था की आप किस तरह लिखने वाले हैं. लेकिन किस विषय पर , ये अंदाजा नहीं था .
    ये तो वास्तव में ही बड़ा ही दुर्भाग्यपूर्ण वाकया है.
    पिछले कुछ दिनों से जब भी में आपका ब्लॉग खोलता था, तुंरत ब्लोग्वानी का पेज खुल जाता था. इसका कारण और निवारण, दोनों हो समझ नहीं आ रहे थे. मैं तो आपसे पूछने ही वाला था की ये क्या माजरा है.
    वैसे ये सब क्या हो रहा है, कुछ समझ में नहीं आ रहा.

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  11. चाय पानी से स्वागत् के लालच में आप दोनों के 100-100 पोस्ट पढ़ लेने वाले को आगरा या रांची पहुँचाने का खर्चा कौन उठायेगा?

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  12. हा हा!
    अवधिया जी, अभी से खर्च की चिंता होने लगी? :-)

    बी एस पाबला

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  13. अवधिया जी, ब्लॉगवाणी बैठ जाने की वजह से आपने भी शायद पोस्ट को जल्दबाज़ी में पढ़ा है...पोस्ट में साफ है पाबलाजी डॉक्टर हैं और मैं कंपाउडर...हम दोनों ने इतनी कच्ची गोलियां नहीं खेली हैं कि 100-100 पोस्ट पढ़ने के बाद किसी को रांची या आगरा भागने का मौका देंगे...जब तक 100-100 पोस्ट पढ़ने के बाद कोई बेचारा होश में आएगा, पाबला जी उसके लिए इंजेक्शन तैयार रखेंगे...होश में आया नहीं कि फिर हमारी 100-100 पोस्ट हाज़िर...कम से कम जब तक ब्लॉगवाणी कोपभवन से बाहर नहीं आती, तब तक तो ये सिलसिला जारी रहेगा...नहीं तो हम भी इंसान है...आखिर कब तक मैं और पाबला जी खुद ही अपनी पोस्ट पढ़-पढ़ कर कहते रहेंगे...मैं तुझे पंत कहूं और तू मुझे निराला..

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  14. खुशदीप जी, पोस्ट में आपने लिखा है कि पाबला जी डॉक्टर हैं, भई, डॉक्टर तो बहुत से होते हैं, बहुत से लोग तो कंपाउंडरगिरी करते करत डॉक्टर बन जाते हैं। :-)

    क्लीयर कीजिए कि पाबला जी किस बीमारी के डॉक्टर हैं!

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  15. पाबला सर, आप अवधिया जी को जवाब देंगे या मैं दूं...

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  16. @ जी के अवधिया
    आपकी जी के हम बढ़ा देते हैं
    आपको जो बीमारी चाहिये
    पाबला जी उसी बीमारी को
    पैदा कर देते हैं
    ये ही तो डॉक्‍टरों के
    तारणहार हैं
    बीमारी नहीं होगी तो
    डॉक्‍टर का धंधा कैसे चलेगा
    बंदा खुश रहेगा तब भी
    बीमारी से बचेगा
    पोस्‍ट पढ़ेगा तो कैसे बचेगा
    इनके इंजेक्‍शन धरे के धरे रह जायेंगे
    बाद में ये बतलायेंगे कि
    हमारे पास नहीं है कोई इंजेक्‍शन
    विन जंक्‍शन , हम तो जो जो
    100 - 100 पोस्‍ट पढ़ता रहेगा
    उसके पास से खिसकते जायेंगे

    ब्‍लॉगवाणी का जाना जितना दुखद है
    उससे ज्‍यादा दुखद इस पर अशोक होना।

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  17. तो खुशदीप और पाबला जी
    हैड टेल कर रहे थे
    मुझे तो मालूम ही नहीं था
    पर जवाब मैंने दे दिया है।

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  18. अवधिया जी, अभी एक केस चल ही रहा है, आप पाबला जी को बिना डिग्री नीम हकीम बता कर बहनजी को हमारे खिलाफ एक क्लू और दे दो...और मेरा कंपाउडर से अपने दम पर डॉक्टर बनने का रास्ता और बंद कर दो...अवधिया जी, पाबला नाम में ही वो तासीर है जो चंगों को बावला कर दे और बावलों को चंगा...खैर, ब्लॉगवाणी भी बंद हो गई, क्यों अवधिया जी कर्मचंद जासूस की तरह हमारे धंधे की बखिया उधेड़ने में लग गए हैं...कुछ ले दे के मामला निपटाना है तो बताओ...

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  19. अविनाश वाचस्पति जी,

    ब्लॉगवाणी को शोक तो मुझे बहुत अधिक है इसीलिए स्थान स्थान पर टिप्पणी करते फिर रहा हूँ:

    सुबह चाय पीते समय अखबार की आदत जैसे ही कम्प्यूटर खोलते ही ब्लॉगवाणी ओपन करने की आदत सी हो गई है। अब क्या करें?

    हमने तो सोचा था कि भविष्य में ब्लॉगवाणी पसंद अंग्रेजी डिग जैसे ही हिन्दी ब्लोग की लोकप्रियता का मानदंड बन जाएगी परः

    मेरे मन कछु और है कर्ता के कछु और ....

    Man supposes God disposes .....

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  20. चलिये आप को बधाई हो, आप की वजह से हिन्दी एक मुख्य वेबसाईट बन्द हो गई। लोग खुद ब्लाग बन्द करते हैं, जबकि ब्लागजगत में आपके चरण-कमल पड़ते ही यह हादसा हो गया। अब इसके पीछे क्या कारण है, यह तो वक्त आने पर पता चल ही जायेगा, चटके न लगने से किसके पेट में दर्द हो रहा था, किस "खास विचारधारा" को लक्ष्य बनाकर किस दूसरी "खास विचारधारा" ने पीठ में छुरा घोंपा है, सब पता चलेगा… फ़िलहाल तो किसी पोस्ट को पढ़ने का मन नहीं हो रहा… दूसरी पोस्ट पर काम करते-करते यह खबर मिली की ब्लागवाणी बन्द हो गई, निश्चित रूप से यह एक बड़ा षडयन्त्र है… जिसकी सच्चाई जल्द ही सामने होगी… तब तक मुस्कराते रहिए…

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  21. भैय्या सब समयचक्र का फेरा
    दशहरा पर की हार्दिक शुभकामनाये .

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  22. सुरेश जी, आप मेरे ब्लॉग पर आकर ये कमेंट कर रहे हैं...ज़रा खुलकर बताइए कि आप ब्लॉगवाणी के बंद होने के लिए किसको ज़िम्मेदार ठहराना चाह रहे हैं...अगर आपका इशारा मेरी तरफ है तो लगता है कि आपने मेरी इस पोस्ट को बगैर पढ़े ही कमेंट के ज़रिए सिर्फ अपने मन की कह डाली...आपके ज्ञान के लिए ही मैं अपनी इस पोस्ट का पहला पहरा फिर रिपीट कर रहा हूं...
    "मैंने 12 बजे रात को बम फोड़ने का वादा कर रखा था...लेकिन ब्लॉगवाणी वालों ने पहले ही बम फोड़ दिया...मेरा बम तो सुतली बम होता लेकिन ब्लॉगवाणी ने असल में ही धमाका कर दिया...मुझे पता चला कि किसी ने मेरे नाम के कंधे पर ही तोप रखकर पक्षपात के आरोप का गोला ब्लॉगवाणी पर दाग दिया...और ब्लॉगवाणी ने भी त्वरित प्रतिक्रिया में सेवाएं बंद कर दीं...भईया जब मुझे ही शिकायत नहीं थी, तो फिर मेरे लिए दूसरे किसी भाई को क्यों शिकायत हुई...ये पसंद बढ़ने न बढ़ने से दुनिया कोई चलती है...हां एक प्लेटफॉर्म जरूर बंद हो गया, जहां सभी ब्लॉगर्स आसानी से मिलते थे..."
    इसके बाद भी अगर आपके मन में कोई शंका रहती है तो मुझे आपकी विद्वता पर और कुछ नहीं कहना है...वैसे मोडरेशन होते हुए भी इस्तेमाल न करने का यही नुकसान रहता है...

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  23. दशहरे की बधाई हो।मै तो चला आंख तेज़ करने के लिये।

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  24. .
    .
    .
    खुशदीप जी,
    इस पोस्ट,जो आपके समर्थन में ही लिखी गई है को ध्यान से पढ़ें तब आप सुरेश जी की टिप्पणी को सही अर्थों में समझेंगे।


    ब्लॉग वाणी ने अपनी सफाई में यह भी लिखा है:-

    "इन पसंदो का अध्ययन कर पाया गया कि नकली पसंद की IP में पैटर्न थे (जैसे सिर्फ आखिरी अंको का बदलना, आदि). एक सुरक्षा प्रोग्राम बनाया गया जो समय-समय पर चलकर इस पैटर्न को डिटेक्ट करके नकली पसंद निकालता है. अगर किसी ब्लाग पर निश्चित प्रतिशत से अधिक नकली पसंदे आयीं हों तो वह प्रोग्राम उस ब्लाग पर आने वाली पसंदे कुछ समय के लिये रोक देता है."

    कुछ कहेंगे आप ?

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  25. @ प्रवीण शाह
    मैंने खुशदीप जी के समर्थन या विरोध में कोई पोस्ट नहीं लिखा। खुशदीप जी की पोस्ट तो एक बहाना है क्योंकि वह ताजा शिकार थी। आप इस विवाद में चल रही टिप्पणियों को ध्यान से देखें और इससे पहले के विवाद देखें तो आपकी आंखे खुल जायेंगी। अनेकों भुक्तभोगी हैं इस तरह की हरकतों से।
    ब्लॉगवाणी ने सफाई दी है मतलब कुछ किया है!

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  26. खुशदीप जी, ज्ञान जी के उत्तर से आपको मेरी टिप्पणी का अर्थ मालूम हो गया होगा… कि कंधा आपका है। वैसे यह मामला "पसन्द" के लालच से कहीं बढ़कर है, धीरे-धीरे पता चल ही जायेगा कि असल में कौन चाहता था कि ब्लागवाणी बन्द हो जाये… जरा मामला पूरा खुले तब जो भी दोषी होगा उससे निपटा जायेगा… (ज़ाहिर है कि एक ब्लॉग लिखकर), फ़िलहाल तो मेरी ब्लागवाणी से गुज़ारिश है कि हिन्दी के भले के लिये आलोचकों की तरफ़ ध्यान न दें जो खुद तो कुछ पॉजिटिव करते नहीं, कोई दूसरा अपनी जेब से खर्चा करके फ़ोकट में एक मंच उपलब्ध करवा रहा है तो उसका परदा भी खींचने में लगे रहते हैं…

    @ ज्ञान जी - यदि ब्लागवाणी कोई सफ़ाई न दे तब भी दोषी और लगातार आलोचना? और अब सफ़ाई दी है तब भी आप कह रहे हैं कि जरूर कुछ किया है? यह क्या बात हुई?

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  27. @ चिपलूनकर जी
    ब्लॉगवाणी अगर अपने जीवनकाल में यह सफाई देता तो प्रशंसा का पात्र होता।अगर आप भी कहेंगे कि धिरे धीरे पता चल ही जायेगा तो क्या कहें।लोगों ने तो तोपें चलाई हैं दूसरों के कंधे का सहारा लेकर।ये तो मामूली सा मामला था।

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  28. मस्त आलेख.

    बस, ब्लॉगवाणी के जाने से क्षुब्ध हूँ.

    बेहद अफसोसजनक.

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  29. @ प्रवीण शाह
    आपका सोचना बिल्कुल सही है कि मैं अपना और सब काम छोड़कर बस एक ही काम में लगा रहता था कि नेट कनेक्शन बार-बार डिसकनेक्ट कर दोबारा लॉग ऑन किया और अपनी पसंद पर एक नया चटका और लगा दिया...यही नहीं अपने सब शुभेच्छुओं से भी मौका मिलने पर पसंद पर हाथ साफ़ करने के लिेए कह रखा था...और एक बात बताऊं मेरी पोस्ट को पढ़ने वाला भी एक बंदा नहीं है...वो तो मैं ही क्लिक-क्लिक कर सबसे ज़्यादा पढ़े जाने वाला आकंड़ा ज़्यादातर 100 से ऊपर पहुंचा देता था...और अपने समेत जो कमेंट्स आप मेरी पोस्ट पर देख रहे हैं वो भी सब फ़र्जी हैं...ये भी मेरे पास मौजूद एक ऐसे सॉफ्टवेयर का कमाल है कि मैं किसी का भी माइंडवाश कर अपने पोस्ट पर कमेंट लिखने के लिए मजबूर कर देता हूं...प्रवीण जी इसके अलावा और क्या-क्या पढ़ना आपको नैन-सुख दे सकता है, सुनने में आपको कर्णप्रिय लग सकता है, वो मैं सभी लिखने और कहने के लिए तैयार हूं..

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  30. यह सभ्य-संस्कृति की कोई सही मिसाल नहीं है "कोई" भी किसी के अवदान का इतना अपमान करने का अधिकारी नहीं हो सकता जिनने ऐसा किया है कि ब्लागवाणी-टीम हताश हुई दु:खद

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  31. ब्लॉगवाणी से निवेदन है कि वो अपने फैसले पे पुनर्विचार करे ...


    स्लॉगओवर बढिया है

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