शुक्रवार, 25 सितंबर 2009

इक दिन चलणा...

जिंद मेरिए मिट्टी दी ए ढेरिए, इक दिन चलणा...(जीवन माटी की एक ढेरी है, एक दिन चलना है)....ये शबद मेरे कानों में गूंज रहा है...साथ ही ये सवाल मेरे ज़ेहन में, कि हम है क्या...हमारा दुनिया में आने का मकसद क्या..
सब कुछ अपनी रफ्तार से चल रहा था...बुधवार की सुबह मुझे फोन पर ख़बर मिली कि लखनऊ में कोई अपना बेहद करीबी हमेशा के लिए चला गया...थोड़ी देर के लिए जहां था, वहीं जड़ हो गया...दिमाग ने जैसे शरीर का साथ देना छोड़ दिया...थोड़ा संभला..अब बस एक ही सोच...कैसे आंख बंद करूं और लखनऊ अपनों के बीच पहुंच जाऊं..उन अपनों के बीच जिनमें से एक अपने को अब रब ने अपना बना लिया...लेकिन इंसान के सोचने से ही सब कुछ नहीं हो जाता...शाम से पहले किसी ट्रेन में "तत्काल" से भी रिज़़र्वेशन नहीं था...बड़ी मशक्कत के बाद रात की ट्रेन मिली...बृहस्पंतिवार पौ फटते ही लखनऊ पहुंच गया...अब ये अंतर्द्वंद कि अपनों का सामना कैसे कर पाऊंगा...लेकिन सामना हुआ...कुछ बोले बिना ही सब कुछ कहा गया...मौन भी कितना बोल सकता है...शायद पहली बार इतनी शिद्दत के साथ महसूस कर रहा था...
दोपहर को वो घ़ड़ी भी आ गई जब वो अपना भी देखने को मिल गया जो अब दूसरी दुनिया का अपना हो गया था...शांत...एक लाल गठरी में...फूलों के बीच अस्थियों की शक्ल में...फूल प्रवाह करने की रस्म पूरी करनी थी...लखनऊ में तो गोमती ही मोक्षदायिनी है...दो गाड़ियों में मेरे समेत कुछ अपने, जुदा हुए एक अपने को, हमेशा हमेशा के विदाई देने गोमती के तट पर पहुंच गए...वहां जाकर देखा...कुछ चिताएं जलती हुईं...कुछ जलने के लिए तैयार...इसी माहौल के बीच सीढ़ियों से गोमती के पानी तक उतरे...किनारों पर काई इतनी कि पानी और ज़मीन का भेद मिटाती हुई...ऐसे छिछले पानी में कैसे उस अपने को मोक्ष मिलेगा...पानी के नज़दीक सबसे आखिरी सीढ़ी पर खड़ा मैं यही सोच रहा था...

क्या सोच रहे बाबू...अस्थियां बहानी है का...अचानक इस सवाल ने मेरी तंद्रा तोड़ी...सामने एक अधेड़ और एक युवक मैले-कुचैले कुर्ता-पाजामा पहने खड़े थे...चार कदम के फासले पर 7-8 बच्चे भी एकटक हमारी ओर देखे जा रहे थे...हमारे में से किसी ने पूछा...भईया ये अस्थियां क्या यहीं प्रवाह की जाती है...यहां तो साफ पानी है नहीं...अस्थियां आगे बहेंगी कैसे...
अधेड़ से जवाब मिला...हमारे होत आप चिंता काहे करत...रे गणेसी...उतर तो ज़रा पानी में...ये सुनते ही गणेसी काई पर ऐसे चलने लगा जैसे तेज़ चाल कंपीटिशन में हिस्सा ले रहा हो...गणेशी वहीं से लाल गठरी को गोमती में डालने के लिेए ऐसी मुद्रा में आ गया जैसे मछुआरा नदी में मछलियों को फांसने के लिए जाल फेंकते वक्त आता है...हमारे बीच से फिर किसी ने टोका...लाल गठरी खोल कर फूल और अस्थियां प्रवाहित करो...अब गणेसी ने ऐसा ही किया...तब तक हमारे साथ गईं एक बुज़ुर्ग महिला ने 21 रुपये मुझे पकड़ाए...क्योंकि मैं ही आखिरी सीढ़ी पर खड़ा था...मैंने वो 21 रुपये गणेसी के अधेड़ साथी को पकड़ाने चाहे...उसने 21 रुपये देखते ही मुझे ऐसे घूरा कि मैंने हत्या जैसा कोई अपराध कर दिया हो...21 रुपये मेरे हाथ में ही रह गए...तब तक मेरे साथ खड़े सज्जन माजरा समझ गए ....उन्होंने कहा कि ले लो, अभी दक्षिणा अलग से मिलेगी...ये सुनते ही अधेड़ और गणेसी के चेहरे ऐसे खिल गए जैसे काई में कमल...मनमुताबिक दक्षिणा मिलते ही अधेड़ और गणेसी दिवंगत की आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना करने लगे...तब तक अस्थियां आधी बह गईं थीं और आधी अब भी वहीं टिकी हुई थीं जहां गणेसी ने उन्हें डाला था...थके कदमों से हम सब मुड़े तो वहां खड़े सातों-आठों बच्चे भी हमारे पीछे हो लिए...उन बच्चों ने नोटों की वो गड्डी अच्छी तरह देखी थी जिसमें निकाल कर कुछ नोट दक्षिणा के तौर पर अधेड़ और गणेसी को दिेए गए थे...
बच्चों को पीछा करते हमारे बीच से ही एक कड़कदार आवाज़ गूंजी...शर्म नहीं आती ये काम करते...इस उम्र में ही ये सब सीख लिया...ज़िंदगी भर कुछ काम नहीं कर सकोगे...ये सुनकर बच्चों के कदम ठिठक गए...
अब घर आ चुके हैं...शब्द चल रहा है...जिंद मेरिये, मिट्टी दी ए ढेरिए...इक दिन चलणा...मैं सिर झुकाए बैठा हूं...यही सोचता...इक दिन सभी को चलना है, तो फिर जीते-जी ये आपाधापी क्यों...क्या हमारी इस अंधी दौड़ की भी आखिरी मंज़िल वही नहीं, जहां इक दिन सभी को पहुंचना है....

(अभी नियमित पोस्ट लिखने की मानसिक स्थिति में आने में मुझे तीन-चार दिन लगेंगे...आशा है आप सभी मेरी व्यथा को समझेंगे)

15 टिप्‍पणियां:

  1. इस शरीर को एक दिन पंचतत्व में विलीन ही हो जाना है यहीं सत्य है..बेहद संवेदना भरी प्रस्तुति....पर यही सच्चाई है..

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  2. संसार असार और शरीर नश्वर है।

    आया है सो जायगा राजा रंक फकीर।
    इक सिंहासन चढ़ चले इक बंध जाय जंजीर॥

    परमपिता परमात्मा मृतात्मा को शान्ति और उनके परिजनों को सहनशक्ति प्रदान करे!

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  3. अपना मन भी उदास हो गया मगर भगवान के आगे किसका जोर चलता है कठपुतली की तरह खेलते रहो जाने वाले को विनम्र श्रद्धांम्जली आपके लिये शुभकामनायें इस दुख को सहन करने के लिये

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  4. जीवन की यही सच्चाई है. अक्सर रोजमर्रा की जिंदगी में हम इस सच्चाई को भूले रहते हैं, और अहसास तभी होता है, जब अपना कोई प्यारा विदा होता है.
    इस दुःख की घडी में हम आपके साथ हैं.

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  5. यही जीवन का यथार्थ है और हम सब इसे भूले बैठे ऐसे मगन हैं न जाने कैसे कैसे कृत्यों में, जैसे कभी जाना ही न हो!

    इन दुखद क्षणों में आपको संबल मिले, यही प्रार्थना है ईश्वर से.

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  6. आप माटी को माटी में छोड़ आए। आप लोगों की इच्छा कि माटी गहरे पानी में जाए। आप में से कोई वहाँ जा नहीं सकता। इस बात को किसी ने अपनी रोजी का जरिया बनाया तो क्या गलत किया? समाज में बहुत से प्रतिष्टित व्यवसाय इसी अवधारणा पर चल रहे हैं।

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  7. हम परिन्दे है, बाग में बस चँद मौसमों के मेहमान हैं
    अपनी बोलियाँ सब बोल कर आख़िर को उड़ ही जायेंगे

    पर कुछ बोल बहुत दिनों तक कानों की गूँज में जिन्दा रहती हैं
    कुछ तो कभी भुलायी ही नहीं जा सकती हैं, चाह कर भी..

    उन बिछड़ों के अरमानों को अँज़ाम देते रहें,
    तन्हाईयों में वह ज़रूर दुलरा जाया करेंगे

    गणेशी का सच, गणेशी ही जाने

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  8. “माँ सी तेरी कमली जिस जीवन रखया नाम,
    जद दिन आए मौत दे ते न जीवन न नाम”


    संसार में - केवल मृत्यु ही एकमात्र शाश्वत सत्य है…
    बाकी सब झूठ है….

    परन्तु हम सभी इस सच्चाई को भूले रहना चाहते हैं !

    ईश्वर से प्रार्थना है कि वह दिवंगत आत्मा को शांति
    प्रदान करें और अपने चरणों में स्थान दें !

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  9. एक दिन हम सभी ने चले जाना है...हमारा प्रयास तो बस यही होना चाहिए कि हमारे जाने के बाद कोई पीठ पीछे ये ना कह सके कि ..
    अच्छा हुआ...जो चला गया

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  10. कल शहर से बाहर था, आज पढ़ पाया यह पोस्ट

    अन्जान रिश्तों से जुड़ी भावनाएँ बेहद व्यथित करती हैं उसके चले जाने के बाद।

    दुखद क्षणों में आपको संबल मिले, प्रार्थना ईश्वर से

    बी एस पाबला

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  11. होता है खुशदीप भाई।मै किसी के शादी ब्याह मे जाऊं न जाऊं,अंतिम यात्रा मे ज़रूर शामिल होता हूं।कल भी गया था और इसी विषय पर लिखने की सोचा भी था,लेकिन नहा कर प्रेस क्लब जाना पडा,वंहा अलबेला खत्री आय्र हुय्र थे।कल पहली बार ऐसा हुआ कि शम्शान से लौट कर मै घण्टे-दो घण्टे मौन नही रहा।बहुत तक़्लीफ़ होती है चाहे अपना सगा हो या दोस्तो का सगा,श्मशान बैराग्य के साथ जो कर्मकाण्ड होते है वो और रूला जाते है।

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  12. अभी जख्‍म ताजा हैं
    जब पास्‍ट हो जाएंगे
    खुश पोस्‍ट तब ही
    लिखी जाएगी
    तब ही
    भरपूर
    हिम्‍मत आएगी।

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  13. yaksh prashn yaad hain mujhe abhi...
    aur uske uttar main ek katu satya bhi...

    "mrity satya hai par koi sweekar nahi karta."

    poore sansmaran main Aadhyatm, Paryavaran, Samajik, darshan aur kai any vidhaoon ka bakhoobi chitran.

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  14. हमारी सहानुभूति और संवेदना।

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