बुधवार, 16 सितंबर 2009

वहां कौन है तेरा...मुसाफिर जाएगा कहां

ब्लॉग पर पहली पोस्ट को डाले मुझे आज पूरा एक महीना हो गया है...मेरा जिस शहर में जन्म हुआ, वहीं से 1857 में आज़ादी की लड़ाई का पहला बिगुल बजा था...मैं मेरठ की बात कर रहा हूं...इस शहर का मिजाज़ ठेठ और अक्खड़ है...लोगों का बात करने का अंदाज़ बेशक लट्ठमार है लेकिन कमोवेश अंदर से होते ज़्यादातर सीधे और दिल के सच्चे ही हैं...अपने शहर और वहां के बाशिंदों से मुझे बड़ी मुहब्बत है...लेकिन अफसोस 7-8 साल पहले शहर से मेरा आबो-दाना उठ गया...वजूद की जंग मुझे नोएडा ले आई...
शुरू-शुरू में ऐसा लगा कि मैंने ऊपर वाले का क्या बिगाड़ा था, जो मुझे अपनी ज़मीन से उखाड़ कर बेमुरव्वत, पत्थरदिल इंसानों की बस्ती में भेज दिया...पड़ोस वाले को पड़ोस का पता नहीं कि जी रहा है या मर रहा है...मेरठ की गलियां-कूचे, कंपनी बाग की ठंडी हवा, माल रोड की मटरगश्ती, आबू-लेन पर राधे की चाट, दोस्तों के साथ रोज़ शाम को बाज़ार का एक राउंड...सब एक गुम सपने की तरह पीछे छूट गया...मरता क्या न करता की तर्ज पर किसी तरह धीरे-धीरे नए शहर में एडजस्ट करना शुरू किया...
दिल्ली जैसे बड़े शहर से सटे होने की वजह से नोएडा में भी लोगों का जीने का अंदाज रोबोट सरीखा ही है...हर कोई भाग रहा है...बिना रूके...और, और, और...और की अंधी दौड़ में...कोई कहने वाला नहीं...वहां कौन है तेरा...मुसाफिर जाएगा कहां...दम ले ले घड़ी भर, ये आराम पाएगा कहां...शायद कभी नहीं...या फिर शायद तभी जब खुद के लिए और, और... करना कुछ मायने नहीं रखेगा...जिन अपनों के लिए जीवन होम कर दिया...एक दिन वो ही इंतज़ार करने लगेंगे कि हम कितने पल इस दुनिया में और...और...
इंसानों की शक्ल में खुदगर्ज पत्थरों के बीच-बीच रहते-रहते खुद भी पत्थर होता जा रहा था...लेकिन फिर आज़ादी के दिन ही चमत्कार हुआ...न जाने कौन सी शक्ति ने ब्लॉग पर पहली पोस्ट...कलाम से सीखो शाहरुख...लिखने को प्रेरित किया...सच बताऊं तो मेरे एक जूनियर साथी ने ब्लॉग स्पॉट पर मेरे लिए देशनामा नाम का ब्लॉग इस साल फरवरी में ही बना दिया था...लेकिन वक्त जैसे इंतज़ार करता रहा...मेरा कुछ लिखने का जी नहीं किया...देशनामा भी बेचारा मेंढक की हाइबरनेशन स्लीप की तरह चुपचाप पड़ा रहा...बिना मुझे तंग किए...फिर आज़ादी के दिन न जाने क्या हुआ...कंप्यूटर पर फोनेटिक फोंट न होने के बावजूद मैंने आनलाइन ही फोनेटिक टूल खोलकर लिखना शुरू किया...उसी दिन शाहरुख का अमेरिका के नेवार्क में माय नेम इज़ खान वाला पंगा हुआ था...मेरी उंगलिया खुद-ब-खुद चलती रही और पहली पोस्ट तैयार हो गई...पब्लिश कर दी..थोड़ा बहुत रिस्पांस मिला...लेकिन अच्छा लगा...फिर पहले दो दिन में एक पोस्ट और फिर लगातार रोज़ एक पोस्ट...न जाने कौन है जो मुझे ऐसा करने की शक्ति दिए जा रहा था...चाहे कितना भी थका क्यों न हूं लेकिन लैपटॉप सामने आते ही तरोताजा हो जाता...पोस्ट डालते रहने का सिलसिला आज पूरे एक महीने का हो गया ...इस दौरान मैंने जैसे फिर मेरठ में अपने खोए हुए जहां को दोबारा पा लिया...
इंसानों से जो भरोसा उठता जा रहा था, वो मेरे ब्लॉगर परिवार ने मुझे गलत साबित कर दिया...मेरे पास ऐसा कोई हिसाब नहीं कि मैंने एक महीने में कितनी पोस्ट लिखी, कितनी उन्हें पसंद मिलीं, कितनों ने उन्हें पढ़ा, कितने कमेंट्स आए...तराजू लेकर कभी मैं ऐसा गुणा-भाग करने नहीं बैठा...मैं बस इतना जानता हूं कि ब्लॉगिंग के ज़रिए मुझे बेशुमार प्यार मिला...शायद अपनों से भी ज़्यादा...अब यही मेरा सरमाया है...यही मेरी पहचान है..और क्या कहूं...शुक्रिया तो हर्गिज नहीं...क्योंकि ये शब्द परायों से बोला जाता है...क्या यहां है कोई मेरा पराया...

स्लॉग ओवर से आज भी छुट्टी नहीं मिलेगी क्या...नहीं...तो...(है...बाबा..नीचे है...)
 
स्लॉग ओवर
मैं घर में बैठा था कि मक्खन बड़े उखड़े अंदाज़ में मेरे पास आया...चेहरे से दुनिया-जहां का दर्द टपक रहा था...आते ही बोला...ओफ्फो...सात साल में कितनी दुनिया बदल गई...
मक्खन को दार्शनिक की तरह बात करते देख मेरा माथा ठनका...मैंने पूछा...ऐसा क्या हो गया मक्खन प्यारे...
मक्खन...क्या हो गया....ये पूछो कि क्या नहीं हो गया...
मैंने कहा...जब बताओगे, तब तो मुझे पता चलेगा कि कौन सा आसमान टूट पड़ा...
मक्खन... अब क्या बताऊं दोस्त...सात साल पहले मैं घर आता था तो मेरी मक्खनी दरवाजे से घुसते ही किस से मेरा वेलकम करती थी और मेरा पपी मुझ पर गुर्राता था...
इसके बाद मक्खन ने ठंडी सांस ली चुप हो कर बैठ गया..

तब तक मेरी जिज्ञासा भी बढ़ गई, मैंने कहा...तो अब ऐसा क्या हो गया...
मक्खन ...अब उन दोनों ने रोल बदल लिए हैं...

13 टिप्‍पणियां:

  1. ब्लॉगिंग की ये दुनिया नए रिश्तों को जन्म देती हैँ...

    कभी सोचा भी न था कि ज़िन्दगी के किसी मोड़ पे आपसे मुलाकात होगी...

    आपका स्लाग ओवर इस बार भी मज़ेदार रहा

    उत्तर देंहटाएं
  2. ब्‍लागिंग की दुनिया में एक महीने पूरे कर लेने की बधाई .. स्‍लाग ओवर मजेदार है !!

    उत्तर देंहटाएं
  3. शुक्रिया कहने का तो अपनों में प्रश्न ही नहीं..ब्लॉग यात्रा का अब तक का विवरण सही रहा.

    स्लॉग ओवर-हमेशा की तरह मस्त!!

    उत्तर देंहटाएं
  4. सच कहा आपने, ये प्यार ही तो है जो हमें कर्मवीर बनाता है!

    आपके ब्लोगिंग के 'माहगिरह' की बधाई!

    उत्तर देंहटाएं
  5. कारवां और बढेगा... आप लिखते जाओ...

    उत्तर देंहटाएं
  6. मेरठ की गलियां-कूचे, कंपनी बाग की ठंडी हवा, माल रोड की मटरगश्ती, आबू-लेन पर राधे की चाट, दोस्तों के साथ रोज़ शाम को बाज़ार का एक राउंड...
    अरे भैया, एल एल आर ऍम मेडिकल कॉलिज के बाहर ढल्लू के ढाबे की चाय भूल गए क्या. मियां, जाने क्या चीज़ मिला देता था चाय में की सारे डॉक्टर उसकी चाय के दीवाने हुआ करते थे.
    खैर दिल्ली के बारे में तो बिलकुल ठीक कहा, ये तो पत्थरों का शहर है, यहाँ किसको अपना बनाइये. ( और नोयडा भी ).
    ब्लॉग का यही तो फायदा है की, धीरे धीरे सामान विचारों वाले लोग पास आ जाते हैं.
    एक महीने में जो मुकाम आपने हासिल किया है, वो वास्तव में काबिले- तारीफ है.
    और हाँ, सुबह सुबह, खबर की खबर देने के लिए धन्यवाद.

    उत्तर देंहटाएं
  7. हा हा हा --- स्लोग ओवर तो कमाल का रहा.

    उत्तर देंहटाएं
  8. सच कहा है ये ब्लाग परिवार जैसे अब अपने परिवार से भी अधिकिअपना सा हो गया है।खास कर हम जैसे बज़ुरगों के लिये जो अकेले रहते हैं। लगता ही नहीं अब कि हम अकेले हैं ।अपका सफर एक माह me म्ही बहुत बडिया चला गया है ऐसे ही आगे बढते रहो बहुत बहुत आशीर्वाद स्लाग ओवर तो पोस्ट पढने से पहले ही पढने को मन करता है बधाई

    उत्तर देंहटाएं
  9. भाई यह तो दुनिया है लेकिन यहाँ न जल्दी खुश होना चाहिये न ही उदास । एक माह कोई ज़्यादा समय नही होता । आपको इस कालावधि मे अच्छे अनुभव मिले यह अच्छा है । लेकिन यदि खराब अनुभव भी मिलें ( दुआ तो यह है कि ऐसा न हो) तो भी आप अपना धैर्य बनाये रखें यह कामना है । आप मेरठ से हैं इसलिये इस सम्वेदंशीलता को जी रहे है । महानगर मे तो यह गुम हो गई है । मेरठ आपके भीतर हमेशा जीवित रहे यह दुआ । स्नेह और बधाई -शरद कोकास

    उत्तर देंहटाएं
  10. बधाई जी,
    और क्या कहूँ?
    हम कोई पराये थोड़े ही हैं!

    बी एस पाबला

    उत्तर देंहटाएं
  11. राहों की हद जहां... नई शुरुआत वहाँ...

    कई हद पे रुक जाते हैं और कुछ जो अपने रास्ते खुद बनाते हैं वह आगे निकल कर मंज़िल पाते हैं!

    और आप को तो रास्ते बनाने वालों में से होना है........

    ब्लॉग मानो आपसे कह रहा है:
    तेरे मेरे मिलन की ये रैना, नया कोई गुल खिलायेगी

    स्लोग ओवर ------------कमाल...........

    उत्तर देंहटाएं
  12. आपको हार्दिक बधाइयाँ और शुभकामनायें ब्लोगिंग के एक महीने पूरे होने पर!

    उत्तर देंहटाएं