रविवार, 6 सितंबर 2009

बस अब अपने राम को पता रहे...

आपको पता ही क्या है...लेकिन हमें तो पता है...बस अब अपने राम को पता कराना है...हर आदमी के भीतर एक राम होता है, और एक रावण...विवेक राम के रूप में हमसे मर्यादा का पालन कराता है...लेकिन कभी-कभी हमारे अंदर का रावण विवेक को हर कर हमसे अमर्यादित आचरण करा देता है...अपने बड़े-बूढ़ों को ही हम कटु वचन सुना डालते हैं...अपने अंदर के राम को हम जगाए रखें तो ऐसी अप्रिय स्थिति से बचा जा सकता है...राम को मर्यादा पुरुषोत्तम कहा जाता है...यानि मर्यादा का पालन करने वाले पुरुषों में उत्तम राम...रिश्तों की मर्यादा को सबसे ज़्यादा मान देने वाले राम...राम का यही पक्ष इतना मज़बूत है कि उन्हें पुरुष से उठा कर भगवान बना देता है...हर रिश्ते की मर्यादा को राम ने खूब निभाया...कहने वाले कह सकते हैं कि एक धोबी के कहने पर राम ने सीता के साथ अन्याय किया...लेकिन जो ऐसा कहते हैं वो राम के व्यक्तित्व की विराटता को सही परिप्रेक्ष्य में नहीं समझते...राम ने सीता को कभी अपने अस्तित्व से अलग नहीं समझा...राम खुद हर दुख, हर कष्ट सह सकते थे लेकिन मर्यादा के पालन की राह में कोई आंच नहीं आते देख सकते थे...इसलिए सीता ने जब दुख सहा तो उससे कहीं ज़्यादा टीस राम ने सही...क्योंकि राम और सीता के शरीर भले दो थे लेकिन आत्मा एक ही थे...
बस राम के इसी आदर्श को पकड़ कर हम चाहें तो अपने घर को स्वर्ग बना सकते हैं...अन्यथा घर को नरक बनाने के लिए हमारे अंदर रावण तो है ही...यहां ये राम-कथा सुनाने का तात्पर्य यही है कि बड़ों के आगे झुक जाने से हम छोटे नहीं हो जाते...यकीन मानिए हम तरक्की करते हैं तो हमसे भी ज़्यादा खुशी हमारे बुज़ुर्गों को होती है...जैसा हम आज बोएंगे, वैसा ही कल हमें सूद समेत हमारे बच्चे लौटाने वाले हैं...इसलिए हमें अपने आने वाले कल को सुधारना है तो आज थोड़ा बहुत कष्ट भी सहना पड़े तो खुशी-खुशी सह लेना चाहिए...वैसे किसी ने बहुत सोच-समझ कर ही कहा है- बच्चा-बूढ़ा एक समान...जब हम अपने बच्चों की खुशी के लिए चांद-तारे तक तोड़ कर लाने को तैयार रहते हैं तो फिर बुज़ुर्गों के सांध्य-काल में उनके चेहरे पर मुस्कान लाने के लिए क्या अपने को थोड़ा बदल नहीं सकते...
मैं जानता हूं कि जड़त्व के नियम वाली इस दुनिया में किसी के लिए खुद को बदलना बड़ा मुश्किल होता है, लेकिन एक बार कोशिश कर के तो देखिए...आप के बस दो मीठे बोल ही बुज़ुर्गों के लिए ऐसी संजीवनी का काम करेंगे जो दुनिया का बड़े से बड़ा डॉक्टर भी नहीं कर सकता.
इस संदर्भ में, आज से 20-25 साल पहले एक फिल्म आई थी-संसार, उसका ज़िक्र ज़रूर करना चाहूंगा...अनुपम खेर, रेखा और राज बब्बर के मुख्य पात्रों वाली फिल्म संसार में दिए गए संदेश को हम पकड़े तो हमारे परिवारों में रिश्तों की तनातनी को खत्म नहीं तो कम ज़रूर किया जा सकता है...संसार में अनुपम खेर पिता बने हैं और राज बब्बर बेटे...रेखा ने राज की पत्नी का रोल किया...फिल्म में राज के और भाई-बहन भी हैं...अनुपम खेर रिटायर्ड हो चुके हैं और घर को चलाने में राज की कमाई पर दारोमदार टिका है...यही बात धीरे-धीरे राज में झल्लाहट भरती जाती है...रेखा के समझाने पर भी राज बब्बर अपने स्वभाव को नहीं बदल पाते...हालात इतने खराब हो जाते हैं कि घर में ही लकीर खिंच जाती है...यहां तक कि राज अपनी पत्नी (रेखा) और बच्चे को लेकर किराए के घर में रहने चले जाते हैं..लेकिन रेखा रिश्तों में तनाव कम करने की कोशिश नहीं छोड़तीं...और एक दिन ऐसा आता है सभी को अपनी गलतियों का अहसास होने लगता है...फिर सब साथ रहने को तैयार हो जाते हैं...लेकिन यहां रेखा एक और ही रास्ता निकालती हैं...रहेंगे अलग-अलग ही...लेकिन हफ्ते में एक दिन घर के सभी सदस्य मिलेंगे...उस दिन साथ हंसेंगे, साथ बोलेंगे, साथ खाएंगे, एक-दूसरे का सुख-दुख जानेंगे...ऐसा करेंगे तो फिर हफ्ते भर उस दिन का शिद्दत के साथ इंतज़ार रहेगा, जिस दिन सबको मिलना है... ये तो रही खैर फिल्म की बात...(वैसे जिन्होंने ये फिल्म न देखी हो वो कहीं से सीडी मंगाकर देखें जरूर, ऐसा मेरा निवेदन है)
अब आते हैं बड़े-बुज़ुर्गों के रोल पर...कहते हैं न...क्षमा बड़न को चाहिए, छोटन को उत्पात...बच्चे गलतियां करते हैं, बड़ों का बड़प्पन इसी में है कि उन्हें क्षमा करें...बुज़ुर्ग भी नए ज़माने की दिक्कतों को समझें...अपनी तरफ़ से कोई योगदान दे सकते हैं तो ज़रूर पहल करें..लेकिन यहां प्रश्न आएगा कि हमारी सलाह लेता कौन है...हमें पूछता ही कौन है...इसके लिए भी एक रास्ता मेरी समझ में आता है...ये रास्ता छोटे शहरों-कस्बों में आसानी से अपनाया जा सकता है...मान लीजिए एक कॉलोनी में दस बुज़ुर्ग रहते हैं...उसी कॉलोनी में कुछ ऐसे बच्चे भी अवश्य होंगे जो पढ़ाई कर रहे होंगे...ट्यूशन पढ़ना उनकी मजबूरी होगी...आस-पड़ोस में कुछ ऐसे बच्चे भी होंगे जो ट्यूशन का खर्च उठा ही नहीं सकते...ऐसे में कॉलोनी के बुज़ुर्ग एक जगह बैठकर उन बच्चों को पढ़ाएं...बच्चों को मुफ्त में पढ़ाई के साथ संस्कार मिलेंगे...बुज़ुर्गों का भी अच्छा टाइम पास हो जाएगा...उन्हें ये महसूस होगा कि उनकी रिटायरमेंट के बाद भी कुछ अहमियत है...ये स्थिति सभी के लिए विन-विन वाली होगी...महानगरों में ऐसे फॉर्मूले पर चलने में ज़रूर दिक्कत आ सकती है...क्योंकि यहां हर आदमी खुद को सबसे ज़्यादा समझदार मानता है...बुजुर्गों को लेकर ऐसी कोई पहल करेगा तो उसे दीवाना मान लिया जाएगा...लेकिन हर अच्छी पहल करने वाले को शुरू में ऐसे ही कड़वी बातों का सामना करना पड़ता है...मगर वो अपना रास्ता नहीं छोड़ता.. एक दिन ऐसा आता है, काफ़िला उसके पीछे जुड़ने लगता है...बस अब इस मुद्दे पर बहस खत्म...अब ज़रूरत है हम सबको कहने की....मुझे मिल गए अपने अंदर ही राम...
आखिर में इस बहस को सार्थक बनाने के लिए जिन्होंने भी नैतिक समर्थन दिया, उनका बहुत-बहुत आभार...आशा है समाज के मुंह-बाए खड़े मुद्दों पर ब्लॉगर्स फोरम में आगे भी ऐसे ही विचार होता रहेगा...खैर ये बहस तो यहीं खत्म हुई, उपदेश भी बहुत झाड़ लिए गए, आइए अब स्लॉग ओवर में मिलवाता हूं मक्खन से....

स्लॉग ओवर
मेरा एक दोस्त है मक्खन...पिता गैरेज चलाते हैं...अब मक्खन ठहरा मक्खन...रब का बंदा...पढ़ाई मे ढक्कन रहा...कह-कहवा कर नवीं तक तो गाड़ी निकल गई...दसवीं में बोर्ड था तो गाड़ी अटक गई...तीन चार साल झटके खाए...पिता ने भी मान लिया कि मक्खन की गा़ड़ी गैरेज में ही जाकर पार्क होगी...सो अब हमारा मक्खन गैरेज चलाता है...आज तो सिर्फ मक्खन का परिचय दे रहा हूं...उसके किस्से आपको आगे स्लॉग ओवर में सुनने को मिलते रहेंगे...मक्खन की अक्सर बड़ी मासूम सी समस्याएं होती हैं...जैसे कि कोई फॉर्म ओनली कैपिटल में भरना हो तो मक्खन पूछता है... फॉर्म क्या दिल्ली जाकर भरना होगा...मक्खन बेचारा दिल्ली का एसटीडी कोड (011) भी नहीं मिला पाता...क्यों नहीं मिला पाता...मक्खन जी को फोन पर 0 का बटन तो मिल जाता है 11 का बटन कहीं ढूंढे से भी नहीं मिलता...मक्खन को कहीं फैक्स करना हो तो कहता है कि इस पर पोस्टल स्टैम्प लगा दूं...रास्ते में कहीं खोने का रिस्क नहीं रहेगा...ऐसा है हमारा मक्खन...

10 टिप्‍पणियां:

  1. बेसब्री से आपके लेख व निष्कर्ष का इंतजार था।
    गंभीर बात पर बहस को सुंदरता से निचोड़ के साथ अंजाम तक पहुंचाने व विराम के देने के लिए बधाई हो। आगे भी समाज को प्रभावित करने वाली बातों / समस्याओं और उनके समाधान पर अपने नजरिये से लेख लिखते रहियेगा................
    शुभकामनाएं

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  2. लेकिन बाहर के राम लोगों पर भारी पड़ रहे हैं,
    अँतर का रावण हुँकार भर रहा है ।
    भारतदेश रामलीला का मैदान बना हुआ है ।
    राम भली करें अँतर्मन के राम की !

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  3. सही है निष्कर्ष पर पहुँचे.

    मख्खन का इन्तजार रहेगा.

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  4. कल रात बोकारों में लाइट नहीं होने से मैं टिप्‍पणी नहीं कर सकी। आज मैं अपने विचार को स्‍पष्‍ट कर रही हूं। सबसे पहले अवधिया जी से कहना चाहूंगी कि कल की टिप्‍प्‍णी में उनकी किसी बात का मुझे बिल्‍कुल भी बुरा नहीं लगा , क्‍यूंकि मुझे तकलीफ न हो यह सोंचकर आप सत्‍य ही न बोल सकें , तो विमर्श का क्‍या फायदा ?
    आप भी इसी निष्‍कर्ष पर पहुंच रहे हैं कि वर्तमान शिक्षा ही इसका मुख्‍य कारण है , मेरा पहला प्रश्‍नहै कि आनेवाली पीढी तक ये शिक्षा कौन पहुंचाता है ?
    कल सतीन्‍द्र जी ने भी टिप्‍पणी की है , वे सारा दोष एकल परिवार को दे रहे हैं , वे संयुक्‍त परिवार प्रणाली की ओर लौटने को कहते हें , मेरा दूसरा प्रश्‍नभी यही है कि इतनी तेजी से संयुक्‍त परिवार के टूटने और एकल परिवार के फलने फूलने की मुख्‍य वजह क्‍या आज के बच्‍चे ही हैं ?
    दो चार प्रतिशत लोगों की बात अलग है ,पर बीते दस बीस वर्षों में नैतिक मूल्‍यों में भारी कमी आयी है , बुजुर्ग भी इसमें पीछे नहीं रहे हैं । आज जिनके पास पैसा है , शक्ति है , उसका दुरूपयोग कर रहे हैं , और इसका प्रभाव आनेवाली पीढी पर पढना ही है। बुजुर्ग समझते हैं कि मैं बच्‍चों की भलाई के लिए 'कुछ भी' काम कर रहा हूं , तो बच्‍चे भी मेरे भलाई के लिए भी करेंगे , तो यह गलत है। नैतिक मूल्‍यों के पतन की सीख मिल गयी तो उसका दुरूपयोग वे कहीं भी कर देंगे।
    मेरा तीसरा प्रश्‍नहै कि बहू के साथ इतनी दहेज प्रताडना की रिपोर्टें दर्ज हो रही हैं , इसे बुजुर्ग नहीं , तो और कौन अंजाम दे रहे हैं ?
    बच्‍चों के पालन पोषण तक मां बाप कभी भेदभाव नहीं करते कि कौन काला है कौन गोरा , कौन लंबा है कौन नाटा और कौन तेज है और कौन सुस्‍त , पर जब उनके घर बस जाते हैं , भेदभाव शुरू कर देते हैं । सारा संबंध बच्‍चों और उनके ससुरालवालों के पैसों के इर्द गिर्द घूमने लगता है ,आर्थिक रूप से मजबूत मां बाप कमजोर बच्‍चों को बिल्‍कुल सहारा नहीं देना चाहते हैं ,बेटे बहू की किसी भी प्रकार की जरूरत में सामने नहीं आना चाहते । मेराचौथा प्रश्‍नयह है कि जब एक बहू को अपनी जरूरतों के लिए मायके पर निर्भर रहना पडे , तो बुजुर्गों की जरूरत को वे कैसे समझेगी ?
    बुजुर्गों की बेटियां आराम से हों , सास ससुर प्‍यार दे रहे हों , तो बदला जमाना उन्‍हें बहुत अच्‍छा लगता है , पर जैसे ही उनकी बारी आती है , वे फिर अपने जमाने में (20 वर्ष पीछे )लौट जाते हैं । मेरा चौथा प्रश्‍नबुजुर्गों से यह है कि बुजुर्ग जितनी अपेक्षा अपने बेटे बहू से रखते हैं , अपने बेटी दामादों को उतना कर्तब्‍य पालन नहीं सिखाते ?

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  5. अन्त भला सो भला!

    एक अच्छी और सार्थक चर्चा रही!!

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  6. पहले तो मुआफी, कल कमेन्ट नहीं कर सका... न्यूज़ रूम में पोस्ट तो सरसरी निगाह से पढ़ा था पर कमेन्ट नहीं कर सकता था...

    आज की पोस्ट भी प्रभावी है... आपने संसार की जिक्र किया... अभी कुछ बरस पहले बागबान भी आई थी... मेरे दादा जी भी दूर हो गए थे... दरअसल हम दूर चले गए थे.. उस वक़्त इतना दिमाग भी नहीं था... वो मुझे अब बहुत याद आते हैं... पर वो गाडी छूट चुकी है...

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  7. बहुत बढ़िया पोस्ट लिखी है।
    आप ने उस महान फिल्म संसार की याद दिला दी --मुझे भी यह बहुत पसंद है। इस फिल्म ने निःसंदेह बहुत बड़ा संदेश दिया है।
    बुज़ु्र्गों के टाइम-पास के बारे में बच्चों को पढ़ाने वाली बात अच्छी लगी ----समझ में नहीं आता कि आपने इसे बड़े शहरों के लिये क्यों इतना उर्पयुक्त नहीं समझा ---देखिये, कहने वालों की तो ऐसी की तैसी ---उन का तो काम ही कुछ न कुछ कहना है ----अगर बड़े शहरों, मैट्रो शहरों में भी बड़े बुज़ुर्ग कुछ ऐसा प्रयोग करने लगें तो बात ही क्या है !!

    मै अकसर बैंकों में ही देखता हूं कि रिटायर लोग जा कर कम पढ़े-लिखे लोगों की फार्म आदि भरने में मदद करते हैं, साथ में गपशप भी चलती रहती है, कुछ बुजुर्ग अपने साथियों की सरकारी चिट्ठियां लिखने में समय अच्छा बिता लेते हैं ----बात वही है कि अगर कुछ करना हो तो काम बहुत हैं, लेकिन इस सब के लिये वही बात है कि उस बुज़ुर्ग का मन भी तो ठीक होना चाहिये ----उसे किसी ने हंसी-खुशी सुबह नाश्ता खिला कर घर से विदा किया हो तो ही वह यह सब काम कर पायेगा ----वरना, वह बेचारा अपनी भड़ास दूसरों पर निकालेगा, और क्या करेगा।

    और आपने लिखा है जैसा कोई बोयेगा वैसा ही तो काटेगा --- इस में तो कोई शक है ही नहीं। कल मेरे पास एक राजमिस्तरी आया ---उस ने हमारे यहां काम किया था --बातो बातों में पता चला कि आजकल वह किसी गुरद्वारे में अपनी बिलकुल कमजो़र, बुज़ुर्ग बीवी के साथ रहने की सोच रहा है, कह रहा था अब काम नहीं होता, लड़के ने तो जवाब दे दिया है, इसलिये कह रहा था गुरूद्वारे में चैन से रहेंगे, सेवा कर दिया करेंगे, परशादा ( लंगर) मिल जाया करेगा।
    मुझे उस की यह बात सुन कर तो और भी दुःख हुआ कि लड़का खुद उस को कुछ नहीं कहता ---उस सरदारजी ने मुझे बताया कि उस का पोता उस को कहता है कि पापा कहते हैं कि अगर तुम लोगों ने इन दोनों को ( दादा-दादी को ) इस घर में रखना है तो मैं कहीं और चला जाऊंगा। यह सुन कर मन बहुत दुःखी हुआ। यही लोग कि क्यों जमाने को इतनी आग लग गई है।

    एक बात और भी है ना कि हम सब लोग शायद बहुत पाखंड़ी से हैं ---जीते जी तो चाहे किसी को कोई पानी न पूछे लेकिन इन श्राद्ध के दिनों में तौबा-तौबा कितने बड़े बड़े दिखावे होते हैं ---- इस से क्या हो जायेगा, बीता वक्त थोडे़ ही वापिस लौट आयेगा।

    और हां, आप के मक्खन की बातें सुनने का इंतज़ार है।

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  8. वैसे देशनामा है तो चीन का सीमा उल्लंघन का मुआमला भी जायज़ होगा... है ना? वो बस गाल बजा रहा रहा है की ऐसा नही हुआ... शुक्र है मुंह तो खोला... बहुत पहले एक कवि कह गए हैं... की चीन की बाप पर और पाकिस्तान के बात पर भरोसा मत करना...!!!

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  9. ab mai to confused hoon ki cheen ke atikraman kee bat karoon ya bujurgon kee avhelana kee. yabechare mkhkhan ke bholepan par taras khaoon. aapka lekh badhiya hai. Ram aur Rawan dono humare hee ander hain Ram ko aage lane kee jaroorat hai aur sabko hai kya boodhe aur kya jawan.

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  10. जब हम अपने बच्चों की खुशी के लिए चांद-तारे तक तोड़ कर लाने को तैयार रहते हैं तो फिर बुज़ुर्गों के सांध्य-काल में उनके चेहरे पर मुस्कान लाने के लिए क्या अपने को थोड़ा बदल नहीं सकते...

    bahut achhe...

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