रविवार, 6 सितंबर 2009

...लेकिन हमें तो पता है

"शर्मिंदा हूँ कि कुछ जुमलों का प्रयोग चंद बरस पहले मैंने भी किया था... पर अब ऐसा नहीं है... वो ज़मीन भी है... आसमान भी ...और उनके बीच का वायुमंडल भी..."
ये टिप्पणी मेरी पोस्ट पर सागर ने भेजी है...जिस दिन से मैंने अपना ब्लॉग शुरू किया है, 24 साल का सागर लगातार कमेंट्स भेजकर मेरा हौसला बढ़ा रहा है... सागर ये कबूल करता है कि उसके मुंह से कभी झल्लाहट में बुज़र्गों को तकलीफ़ देने वाले शब्द निकले हैं...साथ ही वो उसके लिए शर्मिंदगी भी महसूस करता है...ये अच्छी बात है कि अब वो सब कुछ अपने पास होने की बात कह रहा है...सागर की इस साफ़गोई से मुझे लगता है कि हमारी बहस सही दिशा में रही है... एक व्यक्ति की सोच भी बदलती है तो हमारा प्रयास सार्थक है...वैसे अगर गहराई से सोचा जाए और रिश्तों मे ज़रा सा बैलेंस बनाकर चला जाए तो ज़मीन भी आपके पास रह सकती है, आसमान भी आपका हो सकता है...और बीच की हवा भी...
सागर जैसा दृष्टिकोण ही हम सबको अपनाने की ज़रूरत है...हम भी इंसान है...और इंसान को गलतियों का पुतला यूहीं नहीं कहा जाता...उससे बड़ा कोई नहीं जो अपनी गलती मानता है और दोबारा उसे न दोहराने का प्रण करता है...अब आता हूं संगीता पुरी जी के ज्वलंत प्रश्न पर जो उन्होंने मेरी पोस्ट पर अपनी टिप्पणी के ज़रिेए उठाया...पहले उनकी बात जस की तस-
"क्‍या दोष सिर्फ बच्‍चों का ही है ?क्‍या दोष उन माता पिता का नहीं .. जो अपनी महत्‍वाकांक्षा के कारण बच्‍चों को अत्‍यधिक मेहनत का आदि बना देते हैं ?
क्‍या दोष आज के सामाजिक माहौल का नहीं .. जहां कोई भी व्‍यक्ति अपने स्‍वार्थ के कारण ही किसी से जुड़ना चाहता है ?क्‍या दोष आज के कैरियर का नहीं .. जो लोगों को महानगरों में रहने को मजबूर कर देता है ?क्‍या दोष आज के ऑफिशियल माहौल का नहीं .. जहां थोड़ी सी असावधानी से आपको नौकरी से हाथ धोना पड़ सकता है ?क्‍या दोष उस व्‍यवस्‍था का नहीं .. जहां कितना भी कमाओ पैसे कम पड़ जाते हैं ?सारा माहौल ही अस्‍त व्‍यस्‍त है .. और अभी तो वह पीढ़ी भी आनेवाली है .. जिसके माता पिता नौकरी में व्‍यस्‍त रहा करते हैं .. और वो नौकरों के भरोसे पले हैं..."
संगीता जी ने जो कहा वो सोलह आने सही है...माता पिता को भी ये समझना चाहिए कि आज के गलाकाट प्रतिस्पर्धात्मक माहौल में वजूद बनाए रखने की लड़ाई लड़ना कितना मुश्किल है...इसलिए कभी उन्हें भी ये सोचकर देखना चाहिए कि अगर वो खुद ऐसा जीवन जीते तो कितना मुश्किल होता...और आज की पीढ़ी को भी सोचना चाहिए कि वो पूरे दिन में सिर्फ दो-चार मिनट निकालकर बुज़ुर्गों का हाल पूछ ले, उनसे हंस-बोल ले तो मैं यकीन से कहता हूं बुज़ुर्गों का आधा दर्द तो यूहीं उडन-छू हो जाएगा. कल इस बहस को निचोड़ के साथ अंजाम तक पहुंचाने की कोशिश करुंगा...आप इस विषय पर अपने विचारों, राय, अनुभव से ज़रूर अवगत कराएं.. शायद उसी अमृत से किसी की समस्या का समाधान निकल आए...
(शुक्रगुज़ार हूं गुरुदेव, पाबलाजी, बबलीजी, अवधिया जी, दराल सर, पंकज मिश्रा जी, अल्पना वर्मा जी, फिरदौस ख़ान भाई, राज भाटिया जी, शरद कोकास जी, दिनेशराय द्विवेदी सर, विवेक रस्तोगी भाई, अनिल पुस्दकर जी, निशाचर भाई, दीप्ति जी, विवेक सिंह जी, निर्मला कपिला जी, आशा जोगलेकर जी और मेरी पोस्ट को पढ़ने वाले आप सभी का जिन्होंने बुज़ुर्गों की अनदेखी जैसे गंभीर विषय पर बहस को इतना जीवंत बनाया.)

स्लॉग ओवर
आज बस "टीचर्स" डे है...
(व्हिस्की के और सब ब्रांड्स आज के लिए बैन हैं)

6 टिप्‍पणियां:

  1. एक सार्थक विमर्श-साधुवाद!!


    ...आज फिर टीचर्स से ही काम चलायेंगे. :)

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  2. उठाया गया मुद्दा कामयाब रहा. बधाई
    हमने भी कल टीचर्स डे टीचर्स के साथ ही मनाया.

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  3. मैं भी पूछना चाहता हूँ किः

    क्या माता-पिता ने कभी भी अत्यधिक मेहनत नहीं किया? उनकी महत्वाकांक्षा क्या अपने स्वयं के स्वार्थ के लिए है और क्या उसके पीछे बच्चों की ही भलाई नहीं छुपी है? यह स्वाभाविक बात है कि सभी माता-पिता अपने बच्चों को आगे बढ़ते हुए देखना चाहते हैं। वो बच्चे भी जब माता‍-पिता बनेंगे तो उनकी भी यही महत्वाकांक्षा होगी। क्या महत्वाकांक्षी होना दोष है?

    क्या आज के सामाजिक माहौल, आज के कैरियर, आफिसियल माहौल, आज की व्यवस्था आदि के लिए बुजुर्ग जिम्मेदार और दोषी हैं?

    और क्या उपरोक्त दोष के लिए बुजर्गों की उपेक्षा होनी चाहिए?

    माफ कीजियेगा संगीता जी, मैं आपकी भावनाओं को आहत करने की कतइ कोशिश नहीं कर रहा हूँ, एक स्वस्थ चर्चा चल रही है इसलिए अपने विचार रख रहा हूँ, कृपया इसे अन्यथा नहीं लीजियेगा।

    मूल प्रश्न यह था कि बुजुर्गों की उपेक्षा होने के क्या कारण हैं?

    और मैं अभी भी अपने इस विचार पर अडिग हूँ कि वर्तमान शिक्षा ही इसका मुख्य कारण है। यदि आप लोगों के विचार से अन्य कारण हैं तो उन कारणों से हमें भी अवगत कराइये।

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  4. आपके विचारों से सहमति है.
    सशक्त लेख.. उत्तम विचार..

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  5. गंभीर विषय पर चर्चा उठाने के लिये साधुवाद।
    मेरे विचार में इस दोष का मूल कारण संयुक्त परिवारों की जगह एकल परिवार है। आजकल युवा पीढ़ी कोई रोक-टोक ना हो इसलिए संयुक्त परिवारों की जगह एकल परिवार में ही रहना पसंद करती है।
    आजकल जॊ शिक्षा प्रदान‌ की जा र‌ही है व‌ह‌ संस्कारों और नैतिक‌ मूल्यॊं की ओर‌ प्रॆरित‌ क‌र‌नॆ मॆं स‌क्ष्म‌ न‌हीं हैं। मां- बाप अपने बच्चों को आगे बढ़ते हुए देखना चाहते हैं और उनकी महत्वाकांक्षा अपने स्वयं के स्वार्थ के लिए न‌हीं है, उसके पीछे बच्चों की ही भलाई छुपी है। स्वाभाविक बात है कि आजकल की व्यस्त और भाग दौड़ वाली जिंदगी में अपने बच्चों को संस्कारित‌ करने का समय न‌हीं मिल पाता है। यह भूमिका हमेशा से घर के बड़े बुज़ुर्गों ने ही निभाई है जो संयुक्त परिवारों की जगह एकल परिवारों होने से संभव न‌हीं हो पा रहा यही कारण है अपने को सर्वज्ञानी समझने वाली हमारी भावी पीढ़ी मार्गदर्शन के अभाव में पीढ़ी दर पीढ़ी भटकती जा रही है।
    हमें संयुक्त परिवार प्रणाली की ओर लौटना ही होगा .....
    एक दिन बूढा हमें भी होना है....

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  6. बहुत गंभीर बात उठाई आपने। आभार।

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