शुक्रवार, 4 सितंबर 2009

सांझ का अंधेरा

ब्लॉग का इस्तेमाल फोरम की तरह भी किया जाना चाहिए...बीबीसी की तरह ऐसे मुद्दों पर सार्थक बहस होनी चाहिए जो हमारे समाज को उद्वेलित करे रखते हैं...ऐसा ही एक मुद्दा मैं रखता हूं...घरों में बुज़ुर्गों की उपेक्षा...बीबीसी की सलमा जैदी जी ने ताजा ब्लॉग में दिल्ली जैसे महानगरों में अकेले रहने वाले बुज़ुर्गों की हत्याओं की बढ़ती घटनाओं पर चिंता जताई है...सलमाजी के ब्लॉग पर भेजी अपनी राय को यहां जस की तस पेश कर रहा हूं...जानता हूं इस विषय में चटकारे नहीं मिल पाएंगे..लेकिन कभी-कभी खुद को आइना दिखाने के लिए कुनैन का कड़वा घूंट भी पीना चाहिए...शायद इसी तरह मंथन करते रहने से ही थोड़ा अमृत निकल आए..

बीबीसी को भेजी मेरी राय
सलमाजी, बुज़ुर्गों की इस हालत के लिए कहीं ना कहीं हम खुद ही ज़िम्मेदार हैं. आज भौतिक सुख-सुविधाएं जुटाने की खातिर हम रोबोट बने घूमते हैं और अपनी जड़ों को ही भूल जाते हैं. पश्चिम की तरह ज्यादा से ज़्यादा फादर्स डे और मदर्स डे पर बुज़ुर्गों को कोई उपहार देकर ही अपने कर्तव्य की इतिश्री समझ लेते हैं. बड़े-बूढ़ों की भूमिका बस घर की रखवाली तक ही सीमित रह गई है. आजकल युवा पीढ़ी कोई रोक-टोक ना हो इसलिए संयुक्त परिवारों की जगह एकल परिवार में ही रहना पसंद करती है.
हमें ये भी सोचना होगा कि बुज़ुर्ग ज़्यादातर महानगरों या बड़े शहरों में अपराधियों के हाथों निशाना क्यों बनते हैं. दरअसल छोटे शहरों-कस्बों में आज भी सामुदायिक भावना दिखती है. अगर कोई बु्ज़ुर्ग किसी घर में अकेला होता है तो पास-पड़ोस से कोई न कोई उसे पूछने आ जाता है. नोएडा जैसे आधुनिकता की पहचान वाले शहर में, जहां देश के अलग-अलग हिस्सों से लोग आकर बसे हुए हैं, कोई ये भी नहीं जानता कि साथ वाले घर में कौन रहता है. पीछे एक ऐसी ही घटना हुई, मेरे घर के पड़ोस में किसी घर में बुज़ुर्ग की मौत हो गई. पूरी कॉलोनी में किसी को ख़बर तक नहीं हुई. अस्पताल की एम्बुलेंस आई और शव को ले गई. कोई बड़ी बात नहीं कि आने वाले वक्त में ऐसे दिन भी आ जाएं कि आपको किसी शव को कंधा देने के लिए चार आदमियों की ज़रूरत है, तो उसके लिए किराए पर आदमी देने वाली एजेंसियां खुल जाएंगी. ठीक वैसे ही जैसे राजनीतिक दलों की सभाओं के लिेए भाड़े पर आदमियों का इंतज़ाम किया जाता है.

आशा है सुधी ब्लॉगर्स इस बहस को सार्थक ऊंचाई तक ले जाएंगे.
 
क्या कहा....कुछ ज़्यादा ही गंभीर विषय हो गया तो आइए जनाब...अपने स्लॉग ओवर पर...
 
स्लॉग ओवर
क्या आपके पास ये सब है-
टूटता जिस्म...
नशीली आखें...
कपकपाते होंठ...
सिमटी हुई आवाज़...
इंतजार किस बात का कर रहे हैं, जनाब....डॉक्टर के पास जाइए, आपको स्वाइन फ्लू है...

11 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत गंभीर एवं विचारणीय मुद्दा है. मैने कुछ पन्ने एक बुजुर्ग की डायरी के नाम से इसी विषय पर लिखे थे, देखियेगा.

    http://udantashtari.blogspot.com/2009/03/blog-post_20.html


    http://udantashtari.blogspot.com/2009/01/blog-post_20.html

    निहित संदेश बुजुर्गों की स्थिति दर्शाना ही था.

    स्लॉग ओवर मस्त रहा.

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  2. नि:संदेह, उद्देलित करने वाला मुद्दा

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  3. वाह बहुत बढ़िया लगा! सही मुद्दे को लेकर आपने बहुत ही सुंदर रूप से प्रस्तुत किया है!
    मेरे नए ब्लॉग पर आपका स्वागत है-
    http://ek-jhalak-urmi-ki-kavitayen.blogspot.com

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  4. किसी भी कृत्य के पीछे विचार होता है। हम अपने विचार के अनुसार ही कार्य करते हैं। विचार संस्कार से बनते हैं और संस्कार शिक्षा से। बुजर्गों की अवहेलना करना भी हमारा एक कृत्य है जिसके मूल में हमारी शिक्षा ही है। अपने बड़े बुजर्गों के सम्मान करने की हमें शिक्षा ही नहीं दी जाती। हमारे पास हमारी अपनी कोई शिक्षानीति नहीं है, हम तो विदेशियों के बनाये शिक्षनीति के अनुसार चलते हैं। एक शिशु को उसके युवा होते तक केवल वही शिक्षा दी जाती है जो उसे पश्चिम की ओर ढकेले, भारतीयता को विस्मृत कर दे और परिणामस्वरूप वह भौतिकता में लिप्त हो जाए।

    एक समय था कि पुरु ने अपने पिता ययाति को सहर्ष अपना यौवन तक दे दिया था और आज एक समय है कि एक पुत्र अपने माता-पिता को दो रोटी देना तो दूर जरा सा सम्मान भी नहीं दे सकता। उनके चरणस्पर्श करते उसे शर्म आती है।

    जरूरत है तो अपनी स्वयं की शिक्षानीति बनाने की जो हमें विज्ञान की शिक्षा के साथ ही साथ भारतीयता की भी शिक्षा दे। हमें दूसरों के पीछे दौड़ना न सिखा कर ऐसी शिक्षा दे कि दूसरे हमारे पीछे दौड़ने के लिए बाध्य हो जायें।

    यदि हमारी शिक्षानीति सही हो जायेगी तो बुजर्गों की हालत स्वयमेव ही सुधर जायेगी।

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  5. आपकी राय वहां देखी, पढ़ कर अच्छा भी लगा, उसके फ्रंट पेज पर फोरम column में जजों के संपत्ति के मुआमलों में आपकी राय को quote कर लिखा गया है मेरी समझ से वो आपका वक्तव्य ज्यादा मुखर है...

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  6. बुजुर्गों का एकाकीपन, समाज की बदलती हुई तस्वीर का ही परिणाम है. आजकल की भाग दौड़ की जिंदगी में हम बुजुर्गों के प्रति अपना फ़र्ज़ भूल जाते हैं. हम यह भी भूल जाते हैं की एक दिन हमें भी बूढा होना है. माता- पिता की सेवा करना हमारी संस्कृति का अभिन्न अंग है. हालाँकि इसके लिए कुछ त्याग और सहनशीलता की भी आवश्यकता होती है जो आज की युवा पीड़ी में लुप्त होती जा रही है.
    अच्छे विषय पर बहस छेड़ी है.

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  7. सही बात ध्यान देना चहिये इस पर

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  8. विषय गंभीर है..
    भविष्य में स्थिति कैसी होगी..आप ने सही अंदाजा lagaaya है, अगर सही समय से नहीं चेते तो अर्थी को कंधा देने के लिए भी किराये पर आदमी ढूँढने होंगे..

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  9. क्‍या दोष सिर्फ बच्‍चों का ही है ?
    क्‍या दोष उन माता पिता का नहीं .. जो अपनी महत्‍वाकांक्षा के कारण बच्‍चों को अत्‍यधिक मेहनत का आदि बना देते हैं ?
    क्‍या दोष आज के सामाजिक माहौल का नहीं .. जहां कोई भी व्‍यक्ति अपने स्‍वार्थ के कारण ही किसी से जुडना चाहता है ?
    क्‍या दोष आज के कैरियर का नहीं .. जो लोगों को महानगरों में रहने को मजबूर कर देता है ?
    क्‍या दोष आज के आफिसियल माहौल का नहीं .. जहां थोडी सी असावधानी से आपको नौकरी से हाथ धोना पड सकता है ?
    क्‍या दोष उस व्‍यवस्‍था का नहीं .. जहां कितना भी कमाओ पैसे कम पड जाते हैं ?
    सारा माहौल ही अस्‍त व्‍यस्‍त है .. और अभी तो वह पीढी भी आनेवाली है .. जिसके माता पिता नौकरी में व्‍यस्‍त रहा करते हैं .. और वो नौकरों के भरोसे पले हैं !!

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  10. क्या लिखू ओर क्या बोलू ?? दोष किस का होगा, किस का नही... कोई उन भुगत भोगियो से जा कर तो पुछे जो इन कमीनो को आज तक अपना पेट काट कर खिलाते आ रहे थे, अपनी पेंशन से इन का पेट भरते आ रहे थे......

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