सोमवार, 18 दिसंबर 2017

गुजरात नतीजे : दीवार पर लिखी इबारत को पढ़ें बीेजेपी और कांग्रेस ...खुशदीप




गुजरात-हिमाचल प्रदेश जीतने के लिए बीजेपी के वन मैन शो (मोदी मैजिक) और टू मैन आर्मी’ (नरेंद्र मोदी-अमित शाह जुगलबंदी) को सबसे बड़ा कारण माना जा सकता है. हिमाचल में बीजेपी के मुख्यमंत्री चेहरे प्रेम कुमार धूमल के चुनाव हार जाने के बावजूद पार्टी ने शानदार प्रदर्शन कर इस पर्वतीय राज्य में कांग्रेस से सत्ता झटकी है. लेकिन हिमाचल से कई बड़े मायने गुजरात से निकले जनादेश के हैं. ये तय है कि मोदी-शाह की जोड़ी केंद्र की पूरी सरकार के साथ गृह राज्य के चुनाव में खुद को नहीं झोंकती तो बाज़ी पलट भी सकती थी. गुजरात में बीजेपी छठी बार सत्ता संभालने जा रही है, लेकिन विपक्ष के तौर पर कांग्रेस इस बार जितनी मज़बूत है उतनी पिछले दो दशक में राज्य में कभी नहीं रही.

स्वस्थ लोकतंत्र के लिए विपक्ष का मजबूत होना अहम माना जाता है. ये इसलिए जरूरी है कि कहीं सत्ता पक्ष प्रचंड बहुमत की वजह से मनमानी पर ना उतर आए. गुजरात में इस बार ऐसा ही हुआ है.गुजरात से जो जनादेश निकला है, वो क्षेत्रवार ढंग से विभाजित है. सौराष्ट्र-कच्छ में कांग्रेस का हाथ बीजेपी के ऊपर रहा है तो अन्य क्षेत्रों में बीजेपी का कमल पूरी चमक के साथ खिला है, हां उत्तरी गुजरात में बीजेपी आगे जरूर रही लेकिन कांग्रेस और उसके बीच जीत का अंतर ज्यादा बड़ा नहीं रहा.  

गुजरात ने एक और संदेश दिया है. राज्य के युवा वर्ग, ग्रामीण और गरीब तबके ने कांग्रेस को पसंद किया है. 18 से 25 आयु वर्ग के युवाओं को छोड़ बाकी सभी आयु वर्गों के मतदाताओं ने बीजेपी पर ही भरोसा करना बेहतर समझा. गुजरात के किले को मोदी-शाह की जोड़ी राहुल गांधी-हार्दिक पटेल-अल्पेश ठाकोर-जिग्नेश मेवाणी के आक्रमण से बचा पाई तो इसकी सबसे बड़ी वजह है शहरी क्षेत्र के मतदाताओं का चट्टान की तरह कमल के साथ खड़े रहना. गुजरात कारोबारी बहुल राज्य माना जाता है. नोटबंदी और जीएसटी को अपने दोनों पैरों पर कुल्हाड़ी मानने वाले कारोबारियों ने आखिरकार बीजेपी के साथ चिपके रहना ही बेहतर समझा. आखिर फेविकोल का जोड़ जो है, इतनी आसानी से कोई छूट सकता था. दरअसल वो कारोबारी जिन्होंने अस्सी-नब्बे के दशक का दौर देखा है, वो अहमदाबाद के गैंगस्टर अब्दुल लतीफ का ख़ौफ़ अभी तक नहीं भूले हैं. कारोबारियों को लगा कि कहीं वहीं असुरक्षा का दौर वापस ना आ जाए, इसलिए वो जीएसटी-नोटबंदी का दंश झेलने के बावजूद मतदान के दिन कमल पर वोट दबाने गए. इस भावुक पैंतरे ने भी बड़ा काम किया कि दिल्ली की गद्दी पर बैठे गुजराती भाई की साख का सवाल है.

कारोबारियों के साथ अन्य शहरी मतदाता, उच्च शिक्षित वर्ग भी बीजेपी के साथ जुड़ा रहा. वहीं अशिक्षित वर्ग का कांग्रेस को समर्थन मिला. बीजेपी के लिए इस बार एक और प्लस-पाइंट रहा और वो ये कि जिस तरह आदिवासियों का पारम्परिक रूप से राज्य में कांग्रेस को जैसा एकजुट समर्थन मिलता रहा है, वैसा इस बार ग्रैंड ओल्ड पार्टी को नहीं मिला. संघ की ओर से आदिवासियों के कल्याण के लिए किए जाने वाले काम का बीजेपी को लाभ मिला है. माना जा सकता है कि गुजरात के कुछ क्षेत्रों में हार्दिक पटेल फैक्टर की वजह पाटीदार समुदाय के जो वोट बीजेपी ने खोए, उसकी कुछ भरपाई दूसरे क्षेत्रों में आदिवासियों के अतिरिक्त वोट हासिल करने से हुई.  

जहां तक कांग्रेस का सवाल है तो पार्टी ने पिछले चुनाव की तुलना में करीब 20 सीट अधिक हासिल की तो इसके पीछे सबसे बड़ा कारण पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी की खुद की कड़ी मेहनत रहा है. इसके अलावा हार्दिक पटेल (पाटीदार), अल्पेश ठाकोर (ओबीसी) और जिग्नेश मेवाणी (दलित) का मतदान से कुछ हफ्ते पहले ही कांग्रेस के साथ तालमेल करना रहा. अल्पेश तो खुद ही कांग्रेस में शामिल हो गए. इसके साथ ही अशोक गहलोत जैसे नेता के लोगों से समन्वय बनाने के हुनर ने भी कांग्रेस के ग्राफ को पहले की तुलना में ऊंचा करने में मदद की.

गुजरात चुनाव प्रचार के दौरान राहुल गांधी का बार-बार मंदिरों में जाना बहुत सुर्खियों में रहा. सॉफ्ट हिंदुत्व की लाइन पकड़ कांग्रेस की कोशिश यही थी कि बीजेपी को कहीं ध्रुवीकरण का मौका ना मिले. ऐसे में अल्पसंख्यकों से रणनीति के तहत कांग्रेस ने पूरे चुनाव प्रचार के दौरान दूरी बनाए रखी. ऐसे में इस संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता कि अल्पसंख्यकों ने खुद को अनदेखा महसूस किया हो और मतदान को लेकर उन्होंने वैसा जोश नहीं दिखाया जैसा कि वे पहले दिखाते रहे हैं.

ये ठीक है कि चुनावी राजनीति में अंत में जीत ही मायने रखती है. लेकिन बीजेपी को प्रधानमंत्री और पार्टी अध्यक्ष के गृह राज्य में बामुश्किल मिली जीत के बाद कई चीज़ों पर गौर करना होगा. क्यों युवा मतदाता जिन्हें बीजेपी चुम्बक की तरह खींचती थी, वो पार्टी से छिटक रहे हैं. क्यों गरीब-गुरबे पार्टी को अमीर-शहरियों-कारोबारियों की पार्टी मानते हुए उसके पास आऩे से हिचक रहे हैं.

वहीं, कांग्रेस के लिए भी दीवार पर लिखी इबारत साफ है. केंद्र में यूपीए 1 कार्यकाल में मनरेगा और किसानों के कर्ज माफी जैसी योजनाओं ने 2009 में कांग्रेस के केंद्र की सत्ता में दोबारा आने का रास्ता साफ किया था. कांग्रेस की कोर पहचान गरीब, मजदूर, किसानों, अल्पसंख्यकों, अनुसूचित जाति- जनजातियों की हितैषी की रही है. कांग्रेस को इस पहचान को मज़बूती से पकड़े रखना ज़रूरी है. सॉफ्ट हिंदुत्व की लाइन वहीं तक सही है जहां तक अल्पसंख्यकों में आशंकाएं और असुरक्षा बोध पैदा ना हो.

2014 लोकसभा चुनाव में लोगों ने जो मोदी सरकार से उम्मीदों का पहाड़ लगाया था, उस पर अब गंभीरता से काम करने का वक्त आ गया है. महज जुमलों से दाल नहीं गलने वाली. अगर एक करोड़ रोजगार देने का वादा किया था तो उसे पूरा करके भी दिखाएं. सी-प्लेन और बुलेट ट्रेन चलाने से कॉरपोरेट और अमीर तबका तो खुश हो सकता है लेकिन गरीब, किसान, मजदूरों के आंसू इससे नहीं पोंछे जा सकते. सत्ता पक्ष के लिए गुजरात के साथ साथ केंद्र में भी संदेश साफ है तो दूसरी तरफ विपक्ष को भी समझना चाहिए कि उसे जनहित के मुद्दे उठाने के लिए 24X7 काम करना होगा. ये देश युवा प्रधान देश है. देश का युवा तमाशा नहीं चाहता वो सच सुनना चाहता है. गंभीरता के साथ काम होते देखना चाहता है. देश के विकास का लाभ समाज के आखिरी पायदान पर खड़े व्यक्ति तक पहुंचे. भारत सही मायने में विकसित तभी बन सकता है जब यहां के युवा वर्ग को सम्मानजक रोजगार के साथ खुशहाल होने के अवसर मिलें और उस युवा का दिल गरीब-वंचितों के लिए दर्द महसूस करे. ये बात देश के राजनीतिक कर्णधार जितनी जल्दी समझ लेंगे उतना ही उनके लिए बेहतर होगा. अन्यथा ये युवा वर्ग खुद ही राजनीतिक विकल्प बन कर अपना रास्ता तलाश लेगा. 

बहरहाल, गुजरात से बात निकली है तो दूर तलक तक जाएगी.           

बुधवार, 4 अक्तूबर 2017

2014 चुनाव से पहले किताब तो 2019 से पहले फिल्म...खुशदीप



डॉ एम एस कोहली...ये नाम लिया जाए तो आप शायद ही पहचान पाएं कि ये शख्स कौन हैं. लेकिन अगर डॉ मनमोहन सिंह कहा जाए तो आप झट से पहचान जाएंगे कि ये देश के पूर्व प्रधानमंत्री हैं. जवाहरलाल नेहरू और इंदिरा गांधी के बाद देश में सबसे लंबे समय तक रहने वाले प्रधानमंत्री. डॉ सिंह के बारे में आप शायद एक बात और नहीं जानते होंगे कि ये कभी इनसान की ओर से चलाए जाने वाले रिक्शे में नहीं बैठे. इसी से पता चलता है कि उनकी शख्सियत कैसी है और उनके अंदर कैसा संवेदनशील इनसान है.

इन दिनों पॉलिटिकल फिल्में बनाने का सिलसिला चल निकला है. ऐसे में डॉ सिंह पर भी एक फिल्म बनने जा रही है. ये फिल्म डॉ सिंह पर उनके पूर्व मीडिया सलाहकार संजय बारू की किताब द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर’  पर आधारित होगी. फिल्म का नाम भी किताब के शीर्षक वाला ही होगा. ये फिल्म 21 दिसंबर 2018 को रिलीज होगी यानि 2019 लोकसभा चुनाव से ठीक पहले.  

बता दें कि संजय बारू की उपरोक्त किताब भी 2014 लोकसभा चुनाव से ठीक पहले लॉन्च हुई थी. फिल्म के निर्माता सुनील बोहरा के मुताबिक फिल्म की टाइमिंग को लेकर अधिक कयास नहीं लगाए जाने चाहिएं और फिल्म की निर्धारित रिलीज डेट का राजनीति से कोई लेना-देना नहीं है. बोहरा का कहना है कि इस तरह की बात करना गलत है. राजनीति तो दूर ऐसा कहना भी गलत है कि रिलीज डेट को लेकर कोई एजेंडा है. बोहरा का कहना है कि कॉन्ट्रेक्ट के मुताबिक मुझे अगले साल दिसंबर तक फिल्म रिलीज करनी है. बोहरा इससे पहले गैंग ऑफ वसेपुर, साहेब, बीवी और गैंगस्टर और तनु वेड्स मनु जैसी फिल्मों का निर्माण कर चुके हैं.   

संजय बारू 2004 से 2008 तक डॉ सिंह के मीडिया सलाहकार रहे थे. फिल्म में डॉ सिंह की भूमिका कोई भारतीय कलाकार निभाएगा. इसके अलावा पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी, पूर्व राष्ट्रपति डॉ एपीजे अब्दुल कलाम और कांग्रेस सांसद अहमद पटेल की भूमिका भी भारतीय कलाकार ही निभाते नज़र आएंगे.      

कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के अहम रोल की जिम्मेदारी इतालवी एक्ट्रेस को सौंपी जाएगी. वहीं कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी के रोल में इंडो-आयरिश एक्टर नज़र आएंगे. फिल्म निर्माताओं की ओर से भारतीय या विदेशी कलाकारों के बारे में और कोई खुलासा नहीं किया गया है. फिल्म के निर्माता सुनील बोहरा के मुताबिक स्क्रिप्ट तैयार कर ली गई है और दर्शकों को फिल्म में कई चौंकाने वाली बातें भी होंगी.

The Indian Blogger Awards 2017

इकोनॉमिक टाइम्स में इस साल 6 जून को प्रकाशित एक रिपोर्ट में कहा गया था कि अभिनेता अनुपम खेर फिल्म में डॉ मनमोहन सिंह की भूमिका निभाते नज़र आएंगे. उस रिपोर्ट में ये भी कहा गया था कि फिल्म की शूटिंग अधिकतर लंदन में होगी. फिल्म निर्माता शूटिंग भारत से बाहर इसलिए करना चाहते हैं कि कोई रूकावट फिल्म के शेड्यूल को प्रभावित नहीं करे. उस रिपोर्ट में फिल्म के डायरेक्टर के तौर पर हंसल मेहता का नाम बताया गया था.  

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मंगलवार, 3 अक्तूबर 2017

हिन्दू-मुस्लिम शादी का सुप्रीम कोर्ट में अहम केस...खुशदीप




केरल में एक हिन्दू युवती के कथित धर्मान्तरण और मुस्लिम से शादी के मामले में राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) से जांच के आदेश के बाद अब सुप्रीम कोर्ट ने दो अलग धर्मों में होने वाली शादी को केरल हाईकोर्ट की ओर से अमान्य करार दिए जाने पर सवाल उठाया है. इसके अलावा सुप्रीम कोर्ट ने युवती के पिता की ओर से उसे बीते कई महीनों से अपनी हिरासत में रखने की वैधता पर भी सवाल किया है.  

सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा, जस्टिस ए एम खानविलकर और जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़ की खंडपीठ ने सवाल किया कि कैसे 24 मई को केरल हाईकोर्ट नेएक बालिग महिला की शादी को अमान्य घोषित किया, वो भी अनुच्छेद 226 के न्याय अधिकार क्षेत्र के तहत, जिसका इस्तेमाल बुनियादी अधिकारों, वैधिक अधिकारों और अन्य मूल अधिकारों के उल्लंघन को चुनौती देने के लिए होता है.  

मुख्य न्यायाधीश ने इस मुद्दे पर अगली सुनवाई 9 अक्टूबर को तय की. मुख्य न्यायाधीश मिश्रा ने कहा- हम दो मुद्दों पर तार्किक और वैधिक तर्कों को सुनेंगे. क्या हाई कोर्ट अनुच्छेद 226 के तहत प्रदत्त अधिकार क्षेत्र में शादी को अमान्य करार दे सकता है? ओर क्या NIA  जांच जरूरी है?’

मुख्य न्यायाधीश मिश्रा ने फिर युवती के पिता के वकील को देख कर कहा- वो 24 साल की महिला है. आप उस पर नियंत्रण नहीं रख सकते. सुप्रीम कोर्ट के मुताबिक वो या तो माता-पिता के स्थान पर युवती का कोई संरक्षक नियुक्त कर सकता है या उसे किसी सुरक्षित जगह पर भेज सकता है. मुख्य न्यायाधीश ने व्यवस्था दी कि पिता ऐसा नहीं कह सकता कि उसे युवती की 24 घंटे निगरानी मिलनी चाहिए.

NIA की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि मौजूदा मुख्य न्यायाधीश के पूर्ववर्ती जस्टिस (अब रिटायर्ज) जे एस खेहड़ ने बीती 16 अगस्त को इस केस को केरल पुलिस से NIA को ट्रांसफर कर दिया था. केरल में ऐसे धर्मान्तरणों और शादियों में एक तरह का पैटर्न पाए जाने के बाद ऐसा किया गया था.

मुस्लिम शख्स शफीन जहान की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता दुष्यंत दवे ने NIA जांच संबंधी सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर सख्त आपत्ति दर्ज कराई. दवे ने ये भी कहा कि शफीन जहान की ओर से दाखिल याचिका में इस आदेश को वापस लिए जाने की मांग की गई है.  

दवे ने कहा- ‘NIA जांच का आदेश बहु धार्मिक समाज की बुनियाद पर ही चोट करता है... युवती को यहां बुलाया जाए, उससे पूछा जाए.

केरल सरकार इस मामले में हलफनामा दाखिल करने के लिए इच्छा जताई है. बता दें कि केरल सरकार पहले जांच पुलिस से NIA को ट्रांसफर करने पर सहमति जता चुकी है.   

शफीन जहान की याचिका में सुप्रीम कोर्ट से संबंधित घटनाक्रम की रोशनी में NIA जांच वापस लेने की गुहार लगाई गई है. याचिका मे साथ ही युवती की ओर से खुद अपनी इच्छा से धर्मान्तरण करना और उसे अभिभावकों की ओर से बंधक बनाकर रखने और प्रताड़ित करने जैसे हवाले दिए गए हैं.  

याचिका में शफीन जहान ने ये मांग भी की है कि केरल के पुलिस महानिदेशक (कानून और व्यवस्था) को युवती को सुप्रीम कोर्ट में पेश करने का निर्देश दिया जाए. वकील हैरिस बीरान के जरिए दाखिल याचिका मे शफीन जहान ने कार्यकर्ता राहुल ईश्वर के बनाए वीडियो का हवाला भी दिया जिसमें युवती अपनी हाउस-अरेस्टका विरोध करते देखी जा सकती है.  

याचिका में दावा किया गया है कि केरल मानवाधिकार आयोग के कार्यवाहक अध्यक्ष पी मोहनदास ने बयान दिया है कि युवती अपने घर में मानवाधिकारों के भारी उल्लंघन का सामना कर रही है. याचिका में केरल महिला आयोग की अध्यक्ष एम सी जोसेफिन को भी ये कहते उद्धृत किया है कि युवती के मामले में मानवाधिकारों का भारी उल्लंघन हो रहा है और महिला आयोग शिकायत पर कार्रवाई करने को तैयार है.

याचिका में कहा गया है कि रिटायर्ड जज जस्टिस आर वी रविंद्रन. जिन्हें सुप्रीम कोर्ट ने एनआईए की जांच पर नजर रखने के लिए कहा था, ने ये जिम्मेदारी संभालने से इनकार कर दिया है. याचिका में कहा गया है कि जस्टिस रविंद्रन के इनकार करने के बाद NIA जांच रोक देनी चाहिए क्योंकि ऐसा करना उचित नहीं होगा.  

याचिका मे कहा गया है, ‘NIA पहले से ही जांच शुरू कर चुकी है और उसने संपर्क भी ढूंढ लिया है, ये जस्टिस रविन्द्रन के निर्देशों के बिना किया गया. ये घटनाक्रम याचिकाकर्ता के बुरे ख्वाब का हक़ीक़त बनने जैसा है. ऐसी जांच निश्चित रूप से उचित नहीं होगी और ये सुप्रीम कोर्ट के आदेश के खिलाफ है.

याचिका में कहा गया है कि लड़की को उसकी इच्छा के विपरीत हिरासत में रखना, जहां वो अपनी मुक्त इच्छा से चुने गए धर्म को अभ्यास में नहीं ला सकती, स्पष्ट तौर पर उसके बुनियादी अधिकारों का उल्लंघन है. याचिका में कहा गया है कि NIA  जांच की जरूरत नहीं है और ये रिस्पॉन्डेंट नंबर 1 (युवती के पिता) की ओर से युवती की स्वतंत्रता और सही दिमाग वाले बालिग की सोचने की आजादी में खुल्लमखुल्ला दखल है.

The Indian Blogger Awards 2017

क्या है पूरा मामला?

ये मामला मुस्लिम युवक की ओर से हिन्दू युवती के साथ शादी जुड़ा है जो युवती की ओर से इस्लाम धर्म अपनाने के बाद हुई. केरल हाईकोर्ट ने बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर 24 मई 2017 को दिए अपने आदेश में अमान्य करार दिया था. ये शादी 19 दिसंबर 2016 को केरल के कोल्लम के पास पुथुर जुमा मस्जिद में हुई थी. युवती होम्योपैथी की छात्रा थी जिसने इस्लाम धर्म अपना कर नाम बदल लिया था. शफीन जहान अपने परिवार के साथ युवती से अगस्त 2016 में मिला था. ऐसा युवती की ओर से मैरिज वेबसाइट पर दिए विज्ञापन के जवाब में किया गया था.  

उसके बाद क्या हुआ?

शफीन जहान ने हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी. साथ ही युवती के पिता को उसे कोर्ट में पेश करने का आदेश देने के लिए सुप्रीम कोर्ट से आग्रह किया. शफीन जहान ने दावा किया कि युवती के पिता ने केरल हाईकोर्ट की ओर से मनमानेतौर पर शादी को अमान्य करार दिए जाने और लव जिहाद के तौर पर आलोचना किए जाने के बाद से युवती को अवैध तौर पर बंधक बना कर रखा गया है. शफीन जहान ने सुप्रीम कोर्ट से कहा, अगर बालिग हिंदू महिला, अपनी इच्छा से इस्लाम अपनाने के बाद मुस्लिम शख्स से इस्लामी रिवाज से शादी करती है तो ये लव जिहाद नहीं होता.  

युवती के पिता का क्या कहना है?

युवती के पिता का कहना है कि युवती असहाय पीड़ित है जो सुगठित रैकेट की ओर से जाल में फांसी गई, ये रैकेट लोगों को मनोवैज्ञानिक तरीकों से दीक्षा देकर इस्लाम धर्म अपनवा देता है. युवती के पिता का कहना है कि शफीन जहान अपराधी है और उसकी बेटी को एक नेटवर्क की ओर से फांसा गया है जिसका संपर्क पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया और यहां तक कि इस्लामिक स्टेट से है. युवती के पिता ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि एक बार मेरी बेटी ने मुझे बताया था कि वो सीरिया में जाकर भेड़े चराना चाहती....उदार से उदार पिता को भी ये सुनकर झटका लगेगा. लड़की के पिता ने ये भी कहा कि केरल में इस तरह के धर्मान्तरण और शादियां दुर्लभ नहीं है.   

सुप्रीम कोर्ट का क्या कहना है?

सुप्रीम कोर्ट ने पहले NIA  से इस मामले की जांच का आदेश दिया, फिर केरल हाईकोर्ट की ओर से शादी को अमान्य करार दिए जाने और युवती के पिता की ओर से उसे पिछले कई महीनों से अपनी हिरासत में रखने की वैधता पर ही सवाल उठा दिए.

NIA  का क्या कहना है?

NIA  ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि शादी कोई अलग-थलग घटना नहीं है और उसने केरल में इस तरह के पैटर्न की पहचान की है. NIA के मुताबिक उसने ऐसे ही लोगों को इस युवती के धर्मान्तरण और शादी के पीछे भी पाया. एक ही तौर-तरीके हैं. लड़की धर्मान्तरण करती है और अपने रिश्तेदारों के साथ रहने से इनकार कर देती है. ये लोग ऐसे वक्त में उसे साथ ले जाते हैं और उसी दौरान शादी करा देते हैं. इस मामले में आगे जांच की जरूरत है.  


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शुक्रवार, 29 सितंबर 2017

बोले तो 'लव जिहाद'...खुशदीप


एक बालिग़ लड़का, एक बालिग़ लड़की. दोनों अगर साथ रहना चाहें, शादी करना चाहें तो... 

बिल्कुल कर सकते हैं. मियां बीवी राजी तो क्या करेगा काजी.

देश का क़ानून तो यही कहता है कि उन्हें ऐसा करने से कोई रोक नहीं सकता. उनके घर वाले भी नहीं. क़ानून ये भी कहता है कि अगर दो बालिग मर्जी से शादी करना चाहते हैं और उनके रास्ते में कोई रुकावटें खड़ी करता है तो ऐसा करने वाला दंडात्मक कार्रवाई का हक़दार होगा. साथ ही अगर जोड़े को किसी तरह का कोई ख़तरा हो तो उसे सुरक्षा प्रदान करना भी पुलिस की ज़िम्मेदारी है.

देश में कोई ऐसा भी क़ानून नहीं जो दो बालिग़ लोगों को अलग धर्म, अलग जाति, अलग प्रांतीयता, अलग भाषा की वजह से शादी से रोकता हो. साथ रहने से रोकता हो.

ये तो रही क़ानून की बातें. क़ानून की किताबों, क़ानून की धाराओं से कहीं अहम होता है क़ानून का अमल. अब ये अमल कराने की पहली कड़ी तो हमारे देश में पुलिस ही है.

चलिए क़ानून की थ्योरी से निकल एक प्रैक्टीकल किस्से पर आते हैं. मामला ताज़ा यानि 27 सितंबर का ही है. दो अलग-अलग समुदायों के युवक और युवती मेरठ कचहरी में कोर्ट मैरिज के लिए पहुंचते हैं. अब यहां अलग-अलग समुदाय की जगह सीधे सीधे लिख देते हैं हिन्दू युवती और मुस्लिम युवक.

युवक यूपी के शामली का रहने वाला और युवती गौतमबुद्धनगर जिले की. दोनों के मेऱठ कचहरी में कोर्ट मैरिज के लिए पहुंचने की भनक बजरंग दल के कार्यकर्ताओं तक पहुंची तो वे दनादन मौके पर पहुंच गए. अब यहां ये जानना भी दिलचस्प है कि बजरंग दल तक ये जानकारी कोर्ट परिसर से किसने पहुंचाई. 

बजरंग दल पदाधिकारी और उनकी टीम ने मौके पर पहुंचते ही एलान कर दिया कि लड़की नाबालिग लगती है और उसे बहला फुसला कर शादी की जा रही है यानि 'लव जिहाद' का मामला. पुलिस को भी बुला लिया गया. हंगामा बढ़ता गया, युवक के ख़िलाफ़ कार्रवाई और युवती के घरवालों को बुलाने के लिए पुलिस पर दबाव दिया जाने लगा.

पुलिस युवक-युवती को जांच की बात कह कर साथ ले जाने लगी तो खींचातानी कर उन्हें जीप से उतारने की कोशिश की गई. इस पूरे घटनाक्रम को देखने वाले वकील भी दो खेमों में बंटे नजर आए.   

अब इस कहानी का पेंच भी सुनिए. गौतमबुद्धनगर की रहने वाली युवती फरीदाबाद में अपने चाचा के पास बीते दो साल से रह कर पढ़ाई कर रही थी. युवती के चाचा दिल्ली पुलिस में हवलदार हैं. युवती बीए सेकेंड इयर की छात्रा है. 26 सितंबर को युवती के घरवालों की ओर से फरीदाबाद में उसके लापता होने की शिकायत पुलिस में दर्ज कराई गई. पुलिस ने गुमशुदगी का केस दर्ज कर लिया. 27 सितंबर को फरीदाबाद पुलिस को मेरठ पुलिस से युवती के मेरठ में होने की जानकारी मिली. फरीदाबाद पुलिस मेऱठ जाकर उसे फरीदाबाद ले आई.

क़ानून के मुताबिक पुलिस ने युवती का 28 दिसंबर को मजिस्ट्रेट के सामने धारा 164 CRPC  के तहत बयान दर्ज कराया. इस बयान में युवती ने कहा कि वो बालिग़ है और अपनी मर्ज़ी से युवक के साथ गई थी. साथ ही उस पर किसी तरह का कोई दबाव नहीं था.

फरीदाबाद पुलिस का कहना है कि जो भी कार्रवाई होगी वो युवती के इस बयान के आधार पर ही होगी. फरीदाबाद पुलिस के मुताबिक उसे युवती की गुमशुदगी की शिकायत मिली थी. युवती को मेरठ से ले आया गया. युवती के बयान से गुमशुदगी वाला एंगल अपने आप ही खत्म हो गया. मेरठ में हुए हंगामे को फरीदाबाद पुलिस ने मेरठ पुलिस के अधिकार क्षेत्र में बता कर कुछ भी कहने से इनकार किया. 

मैं ये नहीं जानता कि इस केस मेें आगे क्या होगा. इस संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता कि युवती आगे चल कर अपना बयान ही ना पलट दे. लेकिन फिलहाल जो स्थिति है उसमें युवती के मजिस्ट्रेट के सामने 28 सितंबर को दिए बयान के मुताबिक ही पुलिस को चलना होगा और उसकी इच्छा का पालन सुनिश्चित कराना होगा. क़ानून यही कहता है.

एंगल ढूंढने को आए तो इस कहानी में भी कई एंगल ढूंढे जा सकते है. जिसे जो अपने हिसाब से सुविधाजनक लगे वो वैसा ही इसे मोड़ दे देगा. क़ानून जो कहता है, उसका मेरठ में हंगामे से उल्लंघन हुआ. उल्लंघन करने वालों पर, क़ानून हाथ में लेने वालों पर क्या कार्रवाई होगी, होगी भी या नहीं, देखना दिलचस्प होगा.

The Indian Blogger Awards 2017

मैं इन प्रसिद्ध लोगों को खुशकिस्मत मानता हूं जिन्होंने दूसरे समुदाय से जीवनसाथी चुना और शादी कर घर बसाने में भी कामयाबी पाई. 

सोचिए अगर इन्हें भी 'लव जिहाद' के कटघरे में खड़ा कर दिया जाता तो...

शाहनवाज़ हुसैन (बीजेपी नेता)- रेणु शर्मा
मुख्तार अब्बास नक़वी (बीजेपी नेता)- सीमा   
दिवंगत सिकंदर बख़्त (बीजेपी नेता)- राज शर्मा
शाहरुख ख़ान (एक्टर)-गौरी छिब्बर
इरफ़ान ख़ान (एक्टर)- सुतापा सिकदर
अनु (अनवर) मलिक (संगीतकार)- अंजू
कबीर ख़ान (फिल्म निर्देशक)-मिनी माथुर (वीजे-एंकर)
दिवंगत फ़ारूक शेख़ (एक्टर)- रूपा
अमजद अली ख़ान (सरोद वादक)-सुब्बालक्ष्मी
मुज़फ्फर अली (फिल्म निर्देशक)-सुभाषिनी सहगल (अब तलाक)
इम्तियाज़ अली (फिल्म निर्देशक)- प्रीति
ज़ाएद ख़ान (एक्टर)- मलाएका पारेख
मीरा नायर (फिल्म निर्देशक)- प्रोफेसर महमूद ममदानी
 नसीरूद्दीन शाह (एक्टर)- रत्ना पाठक
 सैफ़ अली ख़ान (एक्टर)- करीना कपूर
सलीम ख़ान (लेखक)- सुशीला (पहली पत्नी)
इस्माइल दरबार (संगीत निर्देशक)- प्रीति सिन्हा
हुसैन कुवाजेरवाला (टीवी एक्टर)- टीना
आमिर ख़ान (एक्टर)- किरण राव
दिवंगत मंसूर अली ख़ान पटौदी (क्रिकेटर)- शर्मिला टैगोर

सुहासिनी हैदर (बीजेपी नेता सुब्रामण्यम स्वामी की बेटी, टीवी एंकर)- नदीम (पूर्व नौकरशाह सलमान हैदर के बेटे)

अमीन सयानी (रेडियो एनाउंसर)- रमा
तलत अज़ीज़ (गज़ल गायक)- बीना अडवाणी 
दिवंगत फिरोज़ ख़ान (एक्टर)- सुंदरी
सबा करीम (क्रिकेटर)- रश्मि रॉय
मोहम्मद कैफ़ (क्रिकेटर)- पूजा यादव
दिवंगत मोहम्मद हिदायतुल्ला (पूर्व उपराष्ट्रपति)- पुष्पा शाह

और इन्हें 'रिवर्स लव जिहाद' के कटघरे में तो...

दिवंगत सुनील दत्त- नर्गिस 
राज बब्बर- नादिरा बब्बर
दिया मिर्ज़ा (एक्ट्रेस)- साहिल सांगा
कुणाल खेमू-सोहा अली ख़ान
रंजीत (विलेन)-नाज़नीन
पंकज उधास (गायक)- फ़रीदा
फराह ख़ान- शिरीष कुंदर
दिवंगत किशोर कुमार (गायक)-मधुबाला (असली नाम मुमताज बेगम)
मनोज वाजपेयी-शबाना रज़ा
सचिन पायलट (कांग्रेस नेता)- साराह अब्दुल्ला
अजित अगरकर (क्रिकेटर)- फातिमा घाडियाली
आदित्य पंचोली- ज़रीना वहाब
अतुल अग्निहोत्री- अलवीरा ख़ान
सुनील शेट्टी-माना कादरी
ऋतिक रोशन- सुजैन ख़ान (तलाक हो चुका है)
संजय दत्त- मान्यता (असली नाम दिलनवाज़ शेख़)

बुधवार, 27 सितंबर 2017

रोहिंग्या पर फ़र्जी ट्वीट्स की खुली पोल…खुशदीप


रोहिंग्या को लेकर वैसे तो पूरी दुनिया भर में बात हो रही है लेकिन भारत में इनके बारे में ज्यादा ही चर्चा है. रोहिंग्या म्यामांर के राखिन प्रांत में रहने वाले वो लोग हैं जिन्हें म्यांमार ने ही नागरिकता के अधिकार से वंचित रखा हुआ है. रोहिंग्या में नाममात्र के हिंदुओं को छोड़ बाकी सभी मुसलमान हैं. करीब दस लाख रोहिंग्या म्यामांर में रहते हैं तो करीब इतने ही रोहिंग्या पलायन के बाद दूसरे देशों में रह रहे हैं. सबसे अधिक 5-6 लाख रोहिंग्या शरणार्थी के तौर पर बांग्लादेश में शिविरों में रह रहे हैं. 

40,000 रोहिंग्या भारत में भी है. ये बीते 5-6 साल में भारत आए हैं. ये रोहिंग्या गुहार लगा रहे हैं कि उन्हें भारत से डिपोर्ट कर म्यांमार ना भेजा जाए क्योंकि म्यांमार में उन्हें जान का खतरा है. भारत सरकार का रोहिंग्या को लेकर कड़ा रुख है. दो रोहिंग्या लोगों ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर कहा है कि उन्हें शरणार्थी के रूप में भारत में ही रहने दिया जाए. वहीं सरकार की ओर से सुप्रीम कोर्ट मे हलफनामा दाखिल कर कहा है कि रोहिंग्या अवैध प्रवासी हैं और उनका देश में रहना राष्ट्रीय सुरक्षा के हित में नहीं है. ये भी कहा जा रहा है कि रोहिंग्या के जेहादी आतंकियों से करीबी संबंध हैं. अभी इस मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला आना बाकी है.

संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार प्रमुख जाएद राद अल हुसैन रोहिंग्या शरणार्थियों को लेकर भारत सरकार के रुख से सहमत नहीं है. उनका कहना है कि वे रोहिंग्या को भारत से निकालने के लिए उठाए जा रहे कदमों की निंदा करते हैं, वो भी ऐसे वक्त में जब उन्हें अपने देश में भीषण हिंसा का सामना करना पड़ रहा है. इसी बीच म्यामांर फौज की ओर से ऐसा दावा भी सामने आया कि रखाइन में 28 हिंदुओं की सामूहिक कब्र मिली है जिनकी हत्या ARSA (अराकान रोहिंग्या साल्वेशन आर्मी) के अतिवादियों ने की. म्यांमार स्टेट काउंसलर इंफॉर्मेशन ऑफिस की ओर से ये भी दावा किया गया कि 25 अगस्त को रखाइन प्रांत में रोहिंग्या ने करीब 100 हिंदुओं का अपहरण कर लिया था, जिनमें से 92 को मार दिया गया. जो 8 औरतें बचीं उनका धर्मांतरण कर मुस्लिम बना दिया गया और बांग्लादेश शरणार्थी शिविर में ले जाया गया.

म्यांमार का रखाइन प्रांत बीते काफी समय से घरेलू हिंसा की चपेट में है. जहां रोहिंग्याओं का आरोप है कि उन्हें म्यांमार की फौज के साथ बहुसंख्यक बौद्धों के अतिवादी वर्ग के जुल्मों का सामना करना पड़ता है. रोहिंग्याओं का ये भी कहना है कि म्यांमार की फौज उनके जातीय सफायेमें लगी है. वहीं म्यांमार की फौज ARSA के तार जिहादी नेटवर्क से जुड़े बता कर रोहिंग्याओं के सारे आरोपों को खारिज करती है. दावे-प्रतिदावे हर तरफ से आ रहे हैं. म्यांमार से आ रहे दावों की सच्चाई का यहां बैठ कर पता लगाना मुश्किल है.

लेकिन हां यहां भारत में सोशल मीडिया पर कुछ तत्वों की ओर से जरूर फर्जी तस्वीरों के जरिए कुछ का कुछ बता कर पेश करने की कोशिश की जा रही है. फैक्ट फाइंड करने वाली कुछ वेबसाइट्स जैसे कि आल्ट न्यूज, बूम न्यूज ने ऐसे तत्वों के झूठ का पर्दाफाश किया है.      

बीते दो-तीन दिन मे कुछ बच्चों की तस्वीरों के जरिए रोहिंग्या के संबंध में फर्जी कहानियां पेश करने की कोशिश की गईं. रविंद्र सांगवान का @Shanknaad से ट्विटर हैंडल है. इसे रेल मंत्री पीयूष गोयल भी फॉलो करते हैं. इस ट्विटर हैंडल पर एक छोटी बच्ची का फोटो अपलोड किया गया जिसके हाथ में एक नवजात है. असल में ये फोटो बीबीसी न्यूज़ वीडियो का एक स्क्रीनशॉट है. सांगवान ने फोटो के साथ ट्वीट किया-

उसकी मासूमियत को देखिए!!

रोहिंग्या लड़की, 14 साल की उम्र में दो बच्चे हैं, इसका पति 56 साल का है. उसकी 6 पत्नियां और 18 बच्चे हैं.

सांगवान ने जो लड़की के साथ कहानी लिखी है वो महज उनके दिमाग की उपज है. ये स्क्रीनशॉट बीबीसी न्यूज़वीडियो – ‘In the jungle with Rohingya refugees feeling Myanmar ‘ से लिया गया है जो यू ट्यूब पर अपलोड किया गया था. वीडियो में बीबीसी संवाददाता संजॉय मजूमदार म्यांमार से बांग्लादेश पलायन कर रहे रोहिंग्या के साथ ट्रैक कर रहे हैं. इस लड़की को वीडियो में 2 मिनट 6 सेकेंड पर देखा जा सकता है. 



हद तो ये है कि फिर ऐसे फर्जी ट्वीट्स को रीट्वीट भी धड़ल्ले से किया जाता है. 


   



सांगवान जैसा ही कारनामा पेशे से वकील प्रशांत उमराव पटेल नाम के वकील ने भी किया. इन जनाब ने अपने ट्वीटर हैंडल पर एक बच्ची का फोटो शेयर किया. साथ ही लिखा

ये 9-12 साल की प्रेग्नेंट लड़की म्यांमार के राखिन प्रांत के शरणार्थी शिविर से है. ये संयुक्त राष्ट्र क्लीनिक में है और जल्द ही शिशु को जन्म देने वाली है.



अब ये जान लीजिए कि इस तस्वीर और इस लड़की की सच्चाई क्या है.

इस लड़की से जुड़ी नवंबर 2016 की एक फेसबुक पोस्ट है. जिसमें इस लड़की की कई फोटो हैं.साथ ही पुर्तगाली में लिखा हुआ है कि सैंडी ब्रांडो (12 वर्षीय) गैराफो डो नोर्टे, पारा (ब्राजील)  की रहने वाली है और बीलेम के बरोस बारेटो अस्पताल में भर्ती है. गैराफाओ डो नोर्टे जहां सैंडी रहती है, उस जगह के फेसबुक पेज पर सैंडी की मजबूती और इच्छाशक्ति के बारे में लिखा गया है और मदद की अपील की गई है. साथ ही उसकी लिवर की बीमारी जैसी कई स्वास्थ्य समस्याओं के बारे में बताया गया है. फेसबुक पर अपलोड हुए वीडियो में सैंडी अपने अस्पताल के बैड से बात कर रही दिखती है बीमारी की वजह से सैंडी के फूले हुए पेट को भी देखा जा सकता है.  सैंडी पुर्तगाली में बात करते हुए ब्राजील के एंटरटेनर रोड्रिगो फारो से मिलने की इच्छा भी जाहिर करती है. म्यामांर या रोहिंग्या से उसका दूर दूर का कोई नाता नजर नहीं आता. हैरानी है कि ऐसी बच्ची के बारे में भी कोई फर्जी कहानी गढ़ने की सोच भी कैसे सकता है और उसे प्रेग्नेंट रोहिंग्या लड़की बता सकता है.



पटेल की फर्जी कहानी पकड़ी गई तो झट से ट्वीट को डिलीट कर दिया. लेकिन ऐसा करते हुए अपने किए के लिए कोई माफ़ी नहीं मांगी. पटेल की ओर से पहले भी इस तरह के कई कारनामे किए जा चुके हैं.

The Indian Blogger Awards 2017

कौन क्या है, क्या नहीं, इस पर बहस से बड़ा सवाल सच का है. सोशल मीडिया पर ऐसा कुछ भी देख कर कोई राय बनाने से पहले सच की परख करना भी जरूरी है. पहले कहा जाता था कानों सुनी बात गलत भी हो सकती है. सोशल मीडिया के इस दौर में आंखों देखीकी भी स्क्रीनिंग करना ज़रूरी है. कुछ समय पहले आने वाला एक विज्ञापन याद आ गया...'दावों पर ना जाएं, अपनी अक्ल भी लड़ाएं.'  


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