शनिवार, 27 अगस्त 2016

सोशल साइट्स पर अपने नहीं सपने होते हैं...खुशदीप






सोशल नेटवर्किंग साइट्स को ही सब कुछ मान लेने वालों को एक फिल्म ज़रूर देखनी चाहिए- वेटिंग’…अनु मेनन की डायरेक्ट की ये फिल्म इस साल मई में रिलीज हुई थी...इस फिल्म में नसीरूद्दीन शाह और कल्कि केकला की मुख्य भूमिकाएं थीं...अधेड़ शिव (नसीर) और युवा तारा (कल्कि), दोनों के जीवनसाथी अस्पताल में कॉमा में हैं...शिव और तारा की अचानक अस्पताल के वेटिंग रूम में मुलाकात होती है...दोनों अकेले ही अपनी-अपनी जंग लड़ रहे है…

बड़े दुःख के साथ जीते हुए भी उम्मीद के साथ लड़ना फिल्म का संदेश हैं...आप को जो कहना चाह रहा हूं, उससे पहले फिल्म का ये ट्रेलर देख लीजिए...और इसके सबसे आख़िरी डॉयलॉग पर ख़ास ध्यान दें...



ट्रेलर आपने देख लिया...तारा (कल्कि) का डॉयलॉग आपने सुन लिया...तारा जो कहती है उससे यही लगता है कि वो सोशल साइट्स पर अति सक्रिय रही है...उसके ट्विटर पर 5800 फॉलोअर्स हैं…फेसबुक पर 1500 से ज़्यादा फ्रैंड्स हैं...लेकिन अस्पताल में उसका साथ देने के लिए कोई भी नहीं है....वो अकेले ही जंग लड़ रही है...तारा जब ट्विटर का नाम लेती है तो शिव (नसीर) बड़ी मासूमियत के साथ कहते हैं- ट्विटर क्या होता है?”

नसीर का ये एक वाक्य ही सोशल साइट्स की वास्तविकता बताने के लिए काफ़ी है...दरअसल, महानगरों में अब इनसान को न्यूक्लियर परिवार में रहना पड़ता है...पहले की तरह संयुक्त परिवार बहुत कम बचे हैं...ऐसे में काम के तनाव से उसे राहत देने वाले सिर्फ पत्नी और बच्चे ही होते हैं...अगर इनसान बिल्कुल अकेला है तो मुश्किल और बड़ी है...ऐसे में वो खुद के सुकून के लिए सोशल साइट्स का सहारा लेता है...आभासी रिश्ते ढूंढता है...रीयल लाइफ में अपनों और दोस्तों से कम ही मिलता जुलना होता है...इसलिए अपने हर सुख-दुःख, उपलब्धि को सोशल साइट्स पर ही बांटता रहता है...अस्पताल में भर्ती हो तो स्टेट्स डालता है कि ज़्यादा से ज़्यादा लोग उसका हाल पूछें...कुछ नित नई अपनी फोटो डालते हैं...लाइक्स और कॉमेंट्स पाकर ही वो खुश हो जाते हैं...देखा मुझे चाहने वाले कितने लोग हैं...

इन्हीं भ्रांतियों को तोड़ता है फिल्म वेटिंग के ट्रेलर का आख़िरी डॉयलॉग...बताता है कि सोशल साइट्स का एडिक्शन कैसी मृग मरीचिका है...ऐसा नहीं कि सोशल साइट्स के सब नुकसान ही नुकसान हैं...सोशल साइट्स पर 7 साल का मेरा अनुभव कहता है कि मुझे यहां कुछ नए बहुत अच्छे लोगों का साथ मिला...विशेष तौर पर ब्लॉगिंग से...हम वर्चुअल स्पेस से हटकर आपस में मिले...दोस्त बने...खुद के लेखन में धार आई...विचारों की अदला-बदली ने खुद के विकास में बहुत साथ दिया...पहचान बनाने में मदद की...कई बार एक-दूसरे के काम भी आए...लेकिन यहां तक तो सब ठीक है...दिक्कत वहां है जहां इनसान ये जन्मसिद्ध अधिकार मानने लग जाए कि सोशल साइट्स के सारे रिश्ते हमारी हां में ही हां मिलाएं....हमें कोई निजी दुःख हो तो सारे लाइन लगाकर हमारा हाल पूछने के लिए आ जाएं...अगर कोई ऐसा सोचने लगता है तो वो ग़लती करता है...भूल जाता है कि वर्चुअल स्पेस (सोशल साइट्स) पर सपने होते हैं, अपने नहीं...हर एक को समझना चाहिए कि हर व्यक्ति अपने-अपने तरीके से ज़िंदगी की जंग लड़ रहा है...वो अपनों के लिए वक्त नहीं निकाल पा रहा तो आभासी रिश्तों के लिए क्या निकालेगा...

काम वहीं अपने आएंगे, जिनसे वो सोशल साइट्स में अपने ढूंढने की वजह से दूर होता जा रहा है...

आख़िर में मेरे प्रिय कलाकार धर्मेंद्र की फिल्म अपने का ये गाना सुनिए...

बाक़ी सब सपने होते हैं,

अपने तो अपने होते हैं...



(नोट- एक्ट्रेस कल्कि केकला का हिंदी में सही नाम आम लोग तो क्या मीडियाकर्मी भी नहीं लिखते, सब अंग्रेज़ी की स्पेलिंग देखकर कल्कि कोचलिन ही लिखते हैं...कल्कि ने अपने नाम का सही उच्चारण खुद बताया था, यक़ीन नहीं होता तो जब कभी आपको कहीं कल्कि मिले तो खुद ही पूछ लीजिएगा)

शुक्रवार, 26 अगस्त 2016

'भारत माता की जय' तो इस माता की क्यों नहीं...खुशदीप



वो सिर पर लाश ढो रहा था,
और पूरा भारत सो रहा था...



वो कौन?  किसकी लाश? वो दाना मांझी और लाश उसकी पत्नी अमांग की...

ओडिशा के भूख के लिए अभिशप्त कालाहांडी ज़िले के भवानीपटना गांव के रहने वाले दाना मांझी की ये तस्वीर...पत्नी की लाश सिर पर...साथ चलती बिलखती 12 साल की बिटिया चौला...ये तस्वीर तमाचा है भारत के विकास के तमाम दावों पर...गांव से करीब 60 किलोमीटर दूर अस्पताल में मंगलवार रात को टीबी से पीड़ित अमांग की मौत हुई...मौत होते ही अस्पताल वाले दाना मांझी पर दबाव डालने लगे कि लाश को अस्पताल से हटाओ...किसी तरह रात काटी...बुधवार सुबह दाना ने पत्नी की लाश कपड़े में बांधी और पैदल ही घर की ओर चल दिया...


 ये हालत तब है जब दाना मांझी ने अस्पताल को पहले से ही जानकारी दे दी थी कि वो बहुत निर्धन है और उसके पास शव को घर ले जाने के लिए वाहन की व्यवस्था के पैसे नहीं है...है तो दाना मांझी इनसान ही...रास्ते में थका तो लाश उसके हाथों से छूटी भी...किसी तरह सँभाला...मां की लाश और पिता की बेबसी देखकर नन्ही सी जान चौला का रोना तो निकलना ही था...

दाना इसी हाल में 12 किलोमीटर तक चलता रहा...तब कुछ लोगों के हाथ-पैर मारने के बाद एंबुलेंस की व्यवस्था हो सकी...बुधवार शाम को अमांग का अंतिम संस्कार हुआ...मामले ने तूल पकड़ा तो अस्पताल के अधिकारी अपनी खाल बचाने के लिए सफाई देने लगे कि दाना मांझी किसी को बिना बताए ही अस्पताल से पत्नी की लाश ले गया...वाह...इसे कहते हैं चोरी और सीनाजोरी...

कालाहांडी की कलेक्टर वृंदा डी ने बताया कि जब उन्हें इस घटना का पता चला तो उन्होंने अमांग की लाश को एंबुलेस से ले जाने की व्यवस्था की...कलेक्टर के मुताबिक उन्होंने एक योजना से दाना मांझी को दो हज़ार रुपए दिलवाए...रेडक्रॉस से भी दस हज़ार रुपए मिलेंगे...वाह कलेक्टर साहिबा बड़ा एहसान किया आपने...

इस साल के शुरू में भी झारखंड-ओडिशा की सीमा के पास जैतगढ़ के गोधूलि गांव से भी एक ऐसी ही घटना सामने आई थी...वहां सावित्री नाम की महिला को अपने पति के अंतिम संस्कार के लिए पैसे जुटाने को अपने दो बेटों को गिरवी रखना पड़ा था...
 
कालाहांडी से बहुत दूर हम दिल्ली में बैठे सारी सुख सुविधाएं भोगते हुए दाना मांझी के दर्द का रोना रो रहे हैं...सोशल मीडिया पर तस्वीर पर डालकर अपने फ़र्ज़ की रस्म अदायगी कर रहे हैं...यहां सवाल ये भी है कि जो मीडियाकर्मी दाना मांझी की तस्वीरें खींच रहे थे, वीडियो बना रहे थे, उन्होंने क्या किया...बेशक उन्होंने अपनी ड्यूटी पूरी की और इस घटना को दुनिया के सामने लाए...लेकिन वो साथ ही ये भी तो कर सकते थे कि वाहन की व्यवस्था कर अंपाग की लाश को गांव तक छोड़ आते...ये ठीक वैसा ही है जैसे कि आत्मदाह कर रहे किसी इनसान की तस्वीरें खीची जाती रहें, वीडियो बनाए जाते रहें...हालांकि चंद पत्रकारों को साधुवाद भी है जिन्होंने तत्काल हल्ला मचा कर प्रशासन को जगाया और दाना मांझी के लिए 12 किलोमीटर चलने के बाद एंबुलेंस की व्यवस्था हो सकी...सवाल यहां सिस्टम से कि 12 किलोमीटर लाश सिर पर उठा कर चलना भक्या कम बड़ी त्रासदी है...

दाना मांझी और अमांग को लेकर एक सवाल उनसे, जो भारत माता की जय कहते नहीं थकते...जितने खाए-अघाए होते हैं, नारा भी उतनी हो ज़ोर से निकलता है...आख़िर भारत माता है कौनमहज़ ज़मीन का बड़ा टुकड़ा...या इस पर रहने वाले लोग...क्या इन्हीं लोगों में भारत माता की आत्मा नहीं बसती...क्या अमांग एक मां नहीं थी?  क्या वो भारत का हिस्सा नहीं थी? 

भारत का संविधान भी हम भारत के लोग से शुरू होता है...संविधान को सारी शक्ति भी देश के लोगों से ही प्राप्त है...क्या सच में ऐसा हैअगर ऐसा है तो अमांग जैसी माता की जय क्यों नहींजब तक अमांग जैसी एक भी मां को इस हाल में दुनिया से अलविदा कहना पड़ता है, भारत माता की जय सच्चे अर्थों में नहीं हो सकती...

हम को मन की शक्ति देना, मन विजय करे,
दूसरों की जय से पहले, खुद को जय करे...

बुधवार, 24 अगस्त 2016

मोदी सरकार की आलोचना पर मुझे सुनाने वालों ये डिबेट भी देख लो...खुशदीप

दोस्तों, एक सज्जन मेरे पीछे हाथ धोकर पड़ गए थे कि मैं केंद्र की मौजूदा सरकार की बहुत आलोचना करता हूं...इसके लिए उन्होंने और उनके चेले चपाटों ने मुझे बहुत अपशब्द भी कहे...यहां तक कि मेरी पोस्ट पर कॉमेंट करने वाले मेरे कुछ सम्मानित मित्रों को भी नहीं बख्शा गया..आज ऐसे ही लोगों की आंखें खोलने के लिए मैं अपनी दो साल पुरानी एक डिबेट का लिंक दे रहा हूं...डिबेट 1984 के सिख विरोधी दंगों के 30 साल पूरे होने पर 1 नवंबर 2014 को हुई थी...तब तक मोदी सरकार को सत्ता में आए 6 महीने हो चुके थे...

इस डिबेट से पहले गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने दंगा पीड़ित सिखों के लिए 5-5 लाख रुपए मुआवज़े का एलान किया था जिसे उस वक्त मॉडल कोड ऑफ कंडक्ट की वजह से रोक लिया गया था ...इस डिबेट का मुद्दा था कि क्या 30 साल में पीडित सिखों को इनसाफ़ मिला...या सिर्फ़ राजनीति ही होती रही... 

पंजाब विधानसभा चुनाव जल्दी होने वाले हैं...आप देखेंगे कि हर चुनाव की तरह इस बार भी इन चुनाव में 1984 के दंगे मुद्दा बनेंगे...पीड़ितों के जो हमदर्द बनते हैं, उनका मकसद पीड़ितों को इनसाफ़ दिलाना नहीं बल्कि इस मुद्दे को ज़्यादा से ज़्यादा देर तक ज़िंदा किए रखना है...आपसे अनुरोध है कि इस डिबेट को पूरा देखिएगा...

एक बात मीडियाकर्मियों के लिए भी, क्या टीवी पर शालीन चर्चा नहीं हो सकती जिसमें हर किसी की बात सुनी जाए और वो साफ़ साफ़ समझ भी आए...साथ ही बहस में आम लोगों को भी हिस्सा लेने का मौका दिया जाए...

देखिए-सुनिए और फिर अपनी राय से मुझे जरूर अवगत कराइएगा, जिससे कि मैं खुद को बेहतर बना सकूं...


मंगलवार, 23 अगस्त 2016

अमर ब्लॉगर डॉक्टर अमर कुमार के बिना 5 साल...खुशदीप


आज जिस तरह का दौर है, उसमें कोई दूसरे की सुनने को तैयार नहीं है...राजनीति, धर्म, जाति से बंधी अपनी विचारधाराएं हैं, जिनमें आलोचना सुनने का किसी के पास संयम नहीं है...सब अपने मठाधीशों के पीछे हैं...मठाधीशों के अपने हित हैं, स्वार्थ है...ऐसे में इनसानियत, मेल-मोहब्बत की बातों के लिए किसी के पास फुर्सत ही कहां हैं...करीब 6 साल पहले मैंने 'न हिंदू, न मुसलमान...वो बस इनसान' नाम से एक  कहानी लिखी थी...उसी कहानी पर डॉक्टर अमर कुमार की ये टिप्पणी मिली थी...डॉ अमर कुमार कौन? 2011 से पहले के सारे हिंदी ब्लॉगर उन्हें जानते हैं...आज डॉक्टर साहब की 5वीं पुण्यतिथि है...उनके बारे में और जानने से पहले उनकी टिप्पणी पढ़ लीजिए...

यदि यह कहानी ही है, तो यह एक ठँडे मन और शान्त चरित्र की कहानी है,
किसी भी तरह का उन्माद विवेक के सारे रास्तों पर नाकेबन्दी कर देता है ।
जब विवेकहीन या कहिये कि कुटिल पथप्रदर्शक जान बूझ कर अनपढ़ बना कर रखे गये जनसमूह को यह नारा दें कि, तर्क मत करो.. अपने समर्पण को सिद्ध करो, तो कोई क्या उम्मीद करे ?
खुशदीप, यहाँ अनपढ़ का अर्थ साक्षरता से कुछ अलग भी है !
लगता है, हम सब एक बड़े षड़यन्त्र के मध्य जी रहे हैं, अपने स्वार्थों और अहमन्यता के चलते बुद्धिजीवी वर्ग तटस्थता में ही अपना परिष्कार देखता है । फिर भी तुम बस लगे रहो, लगे रहो खुशदीप भाई ! तुम्हारे सँग सरकिट की भूमिका मैं निभा लूँगा ।

डॉक्टर साहब की ये टिप्पणी मुझे 11 अप्रैल 2010 को अपनी इस पोस्ट पर मिली थी...डॉक्टर साहब का एक-एक शब्द मायने रखता था...जीवन का सार लिए होता था...जिस किसी ब्लॉगर को भी पोस्ट पर डॉक्टर साहब की ट्रेडमार्क इटैलिक टिप्पणी मिल जाती थी वो धन्य हो जाता था...

डॉ. अमर कुमार को हमसे बिछुड़े आज पूरे 5 साल हो गए...डॉक्टर साहब ने 23 अगस्त 2011 को दुनिया को अलविदा कहा...ये वो वक्त था जब हिंदी ब्लॉगिंग पूरे उफ़ान पर थी...फेसबुक तब आ तो गया था लेकिन ऐसा दैत्याकार नहीं था, जैसा कि अब है. ...जिसकी डॉयनासोर रूपी छाया में ब्लॉगिंग भी दब कर रह गई...

ये मेरा दुर्भाग्य था कि दीवाली वाले दिन 5 नवंबर 2010 को मेरे पिता का साथ छूटा था...और साढ़े नौ महीने बाद डॉ अमर कुमार पंचतत्व में विलीन हो गए...मैं जीवन में कभी डॉक्टर साहब को साक्षात नहीं देख सका...जनवरी 2011 की बात है, मैं भतीजी की शादी में हिस्सा लेने लखनऊ गया था...वहीं डॉक्टर साहब का रायबरेली से फोन आया था कि गाड़ी भेज देता हूं, आकर मिल जाओ...लेकिन लखनऊ में शादी के समारोहों में व्यस्तता के चलते बहुत इच्छा होने के बाद भी डॉक्टर साहब से मिलने नहीं जा पाया...तब डॉक्टर साहब से फोन पर मैंने माफ़ी मांगते हुए कहा था कि अगली बार जब लखनऊ आऊंगा, आपसे मिलने ज़रूर आऊंगा...लेकिन मुझे क्या पता था कि वो दिन कभी नहीं आ पाएगा...

डॉक्टर साहब के जाने के बाद मैंने अपनी एक पोस्ट में लिखा था-   

मौत को भी ज़िंदादिली सिखा देने वाले शख्स को आखिर मौत कैसे हरा सकती है...कैसे ले जा सकती है ब्लॉग जगत के सरपरस्त को हम सबसे दूर...दर्द को भी कहकहे लगाना सिखा देने वाले डॉ अमर कुमार का शरीर बेशक दुनिया से विदा हो गया लेकिन जब तक ये ब्लॉगिंग रहेगी उनकी रूह, उनकी खुशबू हमेशा इसमें रची-बसी रहेगी...टिप्पणियों में छोड़ी गई उनकी अमर आशीषों के रूप में...कहते हैं इंटरनेट पर छोड़ा गया एक एक शब्द अमर हो जाता है...और उनका तो नाम ही अमर था...अमर मरे नहीं, अमर कभी मरते नहीं....डॉक्टर साहब अब ऊपर वाले की दुनिया को ब्लॉगिंग सिखाते हुए हम सबकी पोस्टों को भी देखते रहेंगे...

मुझे तो आज भी हमेशा यही लगता है कि मेरी पोस्ट पर डॉक्टर साहब की टिप्पणी आएगी...ओए खुशदीपे या खुशदीप पुत्तर...


एक बात और, मैं पिछले 5 साल से डॉक्टर साहब के सुपुत्र डॉक्टर शांतनु के संपर्क में हूं...इस वक्त वो दिल्ली में जिस हॉस्पिटल में कार्यरत है, वो मेरे घर के पास ही स्थित है...शांतनु बेटा पर डॉक्टर साहब के संस्कारों की पूरी छाप है...दूसरों के काम आने का जज़्बा उसमें भी कूट कूट कर भरा है...हो भी क्यों ना...इंसानियत का पाठ उसे विरासत में जो मिला है...


(इस लिंक पर जाकर आप डॉक्टर साहब को उनकी टिप्पणियों से ही दी गई इन ब्ल़ॉगर्स की श्रद्धांजलियों को पढ़ सकते हैं-  अनूप शुक्ल, सतीश सक्सेना, बीएस पाबला, डॉ अनुराग आर्य, शिखा वार्ष्णेय, राजीव तनेजा, रचना, रश्मि रवीजा, ZEAL-डॉ दिव्या)