खुशदीप सहगल
बंदा 1994 से कलम-कंप्यूटर तोड़ रहा है

पत्रकारिता और पेपाराज़्ज़ी का फ़र्क...खुशदीप

  • Sunday, May 19, 2013
  • by
  • Khushdeep Sehgal
  • 16 मई  को संजय दत्त के घर के बाहर सुरक्षा का कड़ा पहरा था...संजय दत्त को सरेंडर के लिए टाडा कोर्ट जाना था, इसलिए मीडियाकर्मियों की सुबह से ही भीड़ लगने लगी थी...संजय के फैन्स भी वहां पहुंचे थे, लेकिन उनकी संख्या कम ही थी...

    सुबह करीब साढ़े ग्यारह बजे संजय पत्नी मान्यता और फिल्मकार महेश भट्ट के साथ घर से निकले और कार से टाडा कोर्ट की ओर रवाना हुए...घर के बाहर से संजय की कार के साथ ही अनगिनत गाड़ियों ने चलना शुरू कर दिया...कैमरामैन और फोटोग्राफ़र संजय दत्त की हर झलक को कैद करने के लिए बेताब थे तो पत्रकार रिपोर्टिंग के लिए...

    कार में संजय दत्त के साथ बैठे महेश भट्ट के मुताबिक उस वक्त बड़ा खतरनाक नज़ारा था...कई कार और बाइक्स साथ-साथ दौड़ रही थीं...यही सब संजय के घर से लेकर कोर्ट पहुंचने तक लगातार चलता रहा...उस वक्त संजय दत्त और उनकी पत्नी मान्यता की तस्वीरें लेने कि कोशिश में कोई हादसा भी हो सकता था...संजय साढ़े तीन साल के लिए जेल जा रहे थे, इसलिए उनकी और मान्यता की उस वक्त क्या मनोदशा होगी, इसे कोई भी समझ सकता है...लेकिन कवरेज के नाम पर किसी भी हद तक जाना क्या किसी की निजता का उल्लंघन नहीं है...यही फर्क पत्रकारिता और पेपाराज़्जी को अलग करता है...

    कोर्ट रूम के बाहर संजय की कार पहुंची तो वहां भीड़ का ये आलम था कि कार का दरवाज़ा भी बहुत मुश्किल से खुल सकता था...पुलिस से रास्ता दिलाने के लिए कहा गया तो उसने असमर्थता जता दी...पुलिस का कहना था कि वहां भीड़ को हटाने के लिए लाठी चार्ज भी नहीं किया जा सकता...क्योंकि भीड़ में ज़्यादातर मीडियाकर्मी ही थे...महेश भट्ट और संजय दत्त की ओर से रास्ता देने की गुहार किए जाने पर भी कोई असर नहीं हुआ...उधर सरेंडर का टाइम भी नज़दीक आता जा रहा था...आखिर करीब ढाई बजे संजय को भीड़ को चीरते हुए ही कोर्ट तक बढ़ना पड़ा...




    संजय दत्त ने चार दिन पहले ही टाडा कोर्ट से गुहार लगाई थी कि उन्हें कोर्ट की जगह सीधे जेल में सरेंडर करने दिया जाए...उन्होंने हवाला भी दिया था कि उनके पिछली बार मुंबई से पुणे की यरवडा जेल जाते समय 120 किलोमीटर की रफ्तार से पुलिस वैन का पीछा किया गया था...हालांकि संजय ने जेल में सीधे सरेंडर की अपनी अर्ज़ी बाद में वापस ले ली थी...संजय ने 16 मई को टाडा कोर्ट में ही सरेंडर किया...

    संजय दत्त के घर से कोर्ट रूम तक जो हुआ, उसे टाडा जज ने सुरक्षा व्यवस्था की खामी मानते हुए मुंबई पुलिस को कड़ी फटकार भी लगाई...अब संजय दत्त 16 मई की रात से ही ऑर्थर रोड जेल में बंद है...अभी अधिकारी ये तय नहीं कर सके हैं कि उन्हें पुणे या नासिक में से कहां की जेल में शिफ्ट करना है...ज़ाहिर है उनके लिए संजय दत्त को शिफ्ट कराते वक्त वैन में बिना किसी असुविधा के ले जाना भी बड़ी चुनौती होगा...

    महेश भट्ट ने इस घटना का ज़िक्र किया तो साथ ही 31 अगस्त 1997 को पेरिस में कार हादसे में ब्रिटेन की राजकुमारी डायना की मौत का भी हवाला दिया...
    जुलाई 2008 में लंदन में क्रोनर जूरी ने फैसला भी दिया था कि डायना और उनके दोस्त डोडी फयाद की मौत इसलिए हुई क्योंकि उनकी कार के पीछे पेपाराज्ज़ी ( कुछ फोटोग्राफर) लगे हुए थे...ऐसे में डायना की कार का ड्राइवर तूफ़ानी रफ्तार से कार दौड़ा रहा था...ड्राइवर नशे में था, इसने और काम बिगाड़ दिया और एक अंडरपास से गुज़रते वक्त ये हादसा हो गया...




    ऐसे में महेश भट्ट का सवाल है कि क्या हम भारत में भी ऐसे ही किसी हादसे का इंतज़ार कर रहे हैं...क्या ऐसी नौबत आने से पहले ही कोई उपचारात्मक कदम नहीं उठाए जाने चाहिए...

    महेश भट्ट के सवाल में मुझे दम नज़र आता है...इससे पहले कि सरकार या कोर्ट कुछ निर्देश दे, या पुलिस सुरक्षा बंदोबस्त के दौरान सख्ती से पेश आए, क्या मीडिया को खुद ही कोई आत्मसंयमन या नियमन का रास्ता नही निकाल लेना चाहिए...

     

     
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    देश को पीएम की ज़रूरत ही कहां है...खुशदीप

  • Sunday, May 12, 2013
  • by
  • Khushdeep Sehgal

  • पीएम की दुविधा, सोनिया की सुविधा...

    मंत्रीमंडल में किसे शामिल करना है, किसे बाहर करना है, ये प्रधानमंत्री का विशेषाधिकार होता है...हमारे देश का संविधान यही कहता है...कम से कम बचपन से पढ़ते तो हम यही आए हैं...लेकिन क्या पवन कुमार बंसल और अश्वनी कुमार के इस्तीफों को लेकर भी यही बात कही जा सकती है...कम से कम अश्वनी कुमार का इस्तीफा तो प्रधानमंत्री नहीं लेना चाहते थे...सोनिया गांधी के राजनीतिक सलाहकार अहमद पटेल ने शुक्रवार को पीएम आवास पर जाकर जब तक सुनिश्चित नहीं कर लिया कि अश्वनी कुमार इस्तीफ़ा दे रहे हैं, तब तक वहीं डेरा डाले रखा...

    ख़बरें ऐसी भी छनकर आ रही हैं कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने अश्वनी कुमार के मसले पर सोनिया गांधी से अपनी नाराज़गी भी जता दी है...यहां तक कि प्रधानमंत्री ने अपना ही इस्तीफ़ा देने की पेशकश भी कर डाली थी...मनमोहन की नाराज़गी इस बात को लेकर है कि मीडिया के ज़रिए कांग्रेस के कुछ सिपहसालारों ने ये संदेश देने की कोशिश की कि सोनिया की नाराज़गी के बावजूद प्रधानमंत्री ने दोनों मंत्रियों का इस्तीफ़ा लेने में देर लगाई...लेकिन जब संसद चल रही थी और विपक्ष ने बंसल-अश्वनी के इस्तीफे को लेकर बवाल काट रखा था, तब सोनिया गांधी ने ही संदेश दिया था कि विपक्ष के दबाव के आगे नहीं झुका जाएगा...यानि दोनों मंत्रियों को इस्तीफ़ा देने की ज़रूरत नहीं है...

    इसी लाइन को बढ़ाते हुए सूचना और प्रसारण मंत्री मनीष तिवारी ने गुरुवार को बयान भी दिया था कि कोयला घोटाला मामले में सुप्रीम कोर्ट में 10 जुलाई को सरकार को जवाब देना है, इसलिए उससे पहले अश्वनी कुमार पर कोई बात करने का मतलब हीं नहीं है...पवन बंसल पर भी मनीष तिवारी ने कहा था कि सीबीआई जांच जारी है और जब तक जांच का कोई नतीजा नहीं आता तब तक किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता...फिर अचानक शुक्रवार को क्या हुआ कि सोनिया गांधी खुद ही दोनों मंत्रियों का इस्तीफ़ा कराने के लिए पीएम आवास जा पहुंचीं...अगर इस्तीफे लेने ही थे तो पहले ही ले लिए जाते...संसद तो दो दिन चल जाती...साथ ही ज़मीन अधिग्रहण और खाद्य सुरक्षा जैसे अहम बिल भी नहीं लटकते...

    अब ये तो तय है कि मनमोहन सिंह अगले लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की ओर से पीएम पद के उम्मीदवार नहीं होंगे...राहुल गांधी तैयार हुए तो ठीक नहीं तो चिदम्बरम या एंटनी में से किसी को आगे किया जा सकता है...दलित सुशील कुमार शिंदे पर भी दांव लग सकता था लेकिन गृह मंत्री के तौर पर उनके प्रदर्शन को देखते हुए शायद ही उनका नंबर लगे...फिलहाल कांग्रेस के लिए मजबूरी है कम से कम अगले लोकसभा चुनाव तक मनमोहन ही प्रधानमंत्री की कुर्सी संभाले रखें...अब ये मनमोहन पर निर्भर करता है कि वो ईमानदारी के मोर्चे पर अपने दामन को बेदाग़ रखने के लिए क्या करते हैं...कड़वा घूंट पीकर 10 जनपथ से वफ़ादारी निभाते रहते हैं या कोई ठोस फैसला लेकर अपने माथे से 'कमज़ोर प्रधानमंत्री' का टैग हटाने की कोशिश करते हैं...अब ये मनमोहन सिंह पर है कि वो इतिहास में खुद को किस रूप में दर्ज़ कराना चाहते हैं....

    वैसे पीएम की दुविधा, सोनिया की सुविधा और कांग्रेस का अंर्तद्वंद्व सब का जवाब क्या इस सटीक कॉर्टून में नहीं छुपा है....

    (साभार  मेल टुडे )


    स्लॉग ओवर

    नेहरू ने साबित किया कि एक अमीर आदमी देश का प्रधानमंत्री बन सकता है....

    शास्त्री ने साबित किया कि एक गरीब आदमी देश का प्रधानमंत्री बन सकता है...

    इंदिरा गांधी ने साबित किया कि एक महिला देश की प्रधानमंत्री बन सकती है...

    मोरारजी देसाई ने साबित किया कि स्वमूत्रपान  करने वाला शख्स देश का प्रधानमंत्री बन सकता है...

    राजीव गांधी ने साबित किया कि प्रधानमंत्री बनना वंशागत खामी है...

    वी पी सिंह ने साबित किया कि एक राजा देश का प्रधानमंत्री बन सकता है...

    नरसिम्हा राव ने साबित किया कि एक चूका हुआ नेता भी देश का प्रधानमंत्री बन सकता है...

    देवेगौड़ा ने साबित किया कि कोई भी देश का प्रधानमंत्री बन सकता है...

    वाजपेयी ने साबित किया कि प्रधानमंत्री  के पास करने के लिए कुछ नहीं होता...

    और...

    मनमोहन सिंह ने साबित किया कि इस देश को प्रधानमंत्री की ज़रूरत ही नहीं है...

    अत: इस देश का अगला प्रधानमंत्री कौन होगा...इस पर इतनी हाय-तौबा क्यों....


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    नुज़हत तुम पहले 'पाकिस्तानी' हो...खुशदीप

  • Wednesday, May 8, 2013
  • by
  • Khushdeep Sehgal


  • एक है गुलफ़ाम...एक है नुज़हत जहां...दोनों का आपस में पहले 'फर्स्ट कज़न्स'  का रिश्ता था लेकिन पिछले 30 साल से पति-पत्नी है...दिल्ली के तुर्कमान गेट इलाके में रहने वाले इस जोड़े की तीन संतान हैं, जिनमें से दो की शादी हो चुकी है...गुलफ़ाम और नुज़हत दादा-दादी और नाना-नानी भी बन चुके हैं...

    गुलफ़ाम अपनी पोतियों के साथ 

    तीन दशक एक साथ रहने के बाद गुलफ़ाम और नुज़हत अलग हो चुके हैं...तलाक जैसी कोई बात नहीं है...उम्र  के इस पड़ाव पर दोनों एक दूसरे से अलग नहीं होना चाहते...लेकिन दोनों को जुदा होना पड़ रहा है...30 साल में ये दूसरा मौका है जब गुलफ़ाम को नुज़हत से अलग होना पड़ रहा है...दिल्ली की एक अदालत ने बीती 2 मई को नुज़हत को तिहाड़ जेल भेज दिया...साथ ही ये आदेश भी दिया कि छह दिन के अंदर नुज़हत को पाकिस्तान भेज दिया जाए...इस हिसाब से आठ मई को नुज़हत का भारत में आखिरी दिन है...

    इससे पहले 2 जून 2002 को भी नुज़हत और गुलफ़ाम को एक दिन के लिए अलग होना पड़ा था...तब नुज़हत को वीज़ा और वैध पासपोर्ट के बिना भारत में ज़्यादा दिन तक रहने के अपराध में एक रात के लिए जेल में रहना पड़ा था...

    वीर-ज़ारा की फिल्मी कहानी की तरह गुलफ़ाम-नुज़हत की इस रियल स्टोरी में भी जज़्बात की कमी नहीं है...

    ये कहानी शुरू होती है...देश के बंटवारे के वक्त से...गुलफ़ाम के पिता जहां भारत में ही रहने का फैसला करते है, वहीं नुज़हत का परिवार पाकिस्तान चला जाता है...1961 में गुलफ़ाम का भारत में जन्म होता है...चार साल साल बाद यानि 1965 में पाकिस्तान में नुज़हत का जन्म...अस्सी के दशक के शुरू में 20-21 साल का जवान गुलफ़ाम अपने रिश्तेदारों से मिलने के लिए पाकिस्तान जाता है...वहां नुज़हत को वो पहली बार देखता है और उस पर फिदा हो जाता है...नुज़हत भी गुलफ़ाम को पसंद करने लगती है...नुज़हत का परिवार भी इस रिश्ते पर मंज़ूरी की मुहर लगा देता है...सगाई के बाद गुलफ़ाम भारत लौट आता है...

    2 अगस्त 1983 को गुलफ़ाम अपने परिवार के साथ पाकिस्तान जाता है और नुज़हत को निकाह के बाद भारत ले आता है...तभी से ये जोड़ा तुर्कमान गेट इलाके के अपने पुश्तैनी मकान में रह रहा है...भारत आने के बाद पहले नुज़हत का वीज़ा कुछ-कुछ महीनों के आधार पर बढ़ता रहा...नुज़हत को भारत आने के बाद पहली बार 1985 में लॉन्ग टर्म वीज़ा मिला...इसके बाद भी कई बार नुज़हत का वीज़ा बढ़ाने के लिए आवेदन दिए गए...1988 में नुज़हत के पाकिस्तानी पासपोर्ट की मियाद ख़त्म हो गई...पाकिस्तानी उच्चायोग में नये पासपोर्ट के लिए अप्लाई किया गया..नुज़हत को नया पासपोर्ट पांच साल के लिए और मिल गया...लेकिन इसकी मियाद भी 1993 में ख़त्म हो गई...नुज़हत के लिए फिर नये पासपोर्ट के लिए दरख्वास्त दी गई तो पाकिस्तानी उच्चायोग ने इसे नामंज़ूर कर दिया...पाकिस्तानी उच्चायोग का कहना था कि पांच-पांच साल के दो एक्सटेंशन दिए जा चुके हैं, अब नुज़हत को भारतीय नागरिकता के लिए भारत सरकार से आवेदन करना चाहिए...

    1994 में नुज़हत का वीज़ा भी ख़त्म हो गया...1996 में नुज़हत के लिए भारत के गृह मंत्रालय को भारतीय नागरिकता देने के लिए अर्ज़ी दी गई...नुज़हत के पति गुलफ़ाम का दावा है कि नुज़हत की नागरिकता की फ़ाइल गृह मंत्रालय से खो गई...बार बार आग्रह किए जाने पर भी इस संबंध में गृह मंत्रालय से लिखित में कोई जवाब नहीं मिला...ओवर स्टे पर गुलफ़ाम ने नुज़हत के लिए 1800 रुपये का जुर्माना भी भरा था...गुलफ़ाम ने ये सारे रिकार्ड्स भी उपलब्ध कराए...

    दूसरी ओर पासपोर्ट अधिकारियों का कहना है कि नुज़हत का वीज़ा 1993 में कालातीत (एक्सपायर) होने  के बाद कई बार रिमाइंडर भेजे गए, लेकिन नुज़हत की ओर से कोई जवाब नहीं मिला...उसके कई बार अवसर मिलने के बाद भी नुज़हत का ना तो वीज़ा बढ़वाया गया और ना ही उसके लिए नये पासपोर्ट का इंतज़ाम किया गया...

    गुलफ़ाम और नुज़हत की 22 साल की बेटी गुलज़ात का कहना है कि जब भी दोनों देशों के बीच किसी भी बात पर तनाव बढ़ा, उन्हें मां के केस पर प्रतिकूल असर पड़ने की चिंता सताने लगती थी...गुलफ़ाम का कहना है कि उनकी बहन का निकाह पाकिस्तान में 1995 में हुआ, और वो एक साल बाद भारत हमसे मिलने आई तो वो पाकिस्तानी पासपोर्ट पर आई थी...लेकिन नुज़हत 30 साल भारत रहने के बाद भी भारतीय नागरिक नहीं बन सकी...

    गुलफ़ाम के मुताबिक नुज़हत के भाई ज़रूर पाकिस्तान में रहते हैं...लेकिन उसने उन्हें पिछले 21 साल से नहीं देखा है...अब इतने साल बाद नुज़हत के वहां पहुंचने पर उनका क्या बर्ताव रहेगा, कुछ कहा नहीं जा सकता...ऐसे में नुज़हत का पाकिस्तान में क्या होगा...नुज़हत के बिना गुलफ़ाम और परिवार के बाक़ी सदस्यों का भारत में क्या होगा...सवाल वाकई बडे पेचीदा है...

    कहानी आपने पढ़ ली...आपकी क्या राय है...

    क्या नुज़हत को पाकिस्तान भेजने के अलावा कोई और विकल्प नहीं...

    क़ानूनन तौर पर नुज़हत के साथ जो किया जा रहा है, वो बिल्कुल सही हो सकता है...लेकिन एक 18 साल की लड़की जो निकाह के बाद अपना सब कुछ छोड़-छाड़ कर भारत आती है...यहां गृहस्थी सजाने के लिए पूरी मेहनत करती है...पहले बच्चों को पालने-पोसने में दिन रात एक करती है...फिर बच्चों के भी बच्चों का मुंह देख-देख कर रोज़ जीती है...फिर उसे एक दिन इस सबसे अलग कर उसके हाल पर छोड़कर पाकिस्तान भेज दिया जाता है...मुझे नहीं लगता कि नुज़हत इतनी पढ़ी लिखी होगी कि पासपोर्ट-वीज़ा, भारतीय नागरिकता की पेचीदिगियों को खुद ही समझ पाती...ऐसे में गुलफ़ाम को भी दोषी ठहराया जा सकता है कि वक्त रहते क़ानूनी शर्तों को पूरा करने के लिए क्यों ज़्यादा संजीदगी नहीं दिखाई...

    नुज़हत को सरहद पार पहुंचा कर क़ानून का बेशक हम मान रखेंगे...लेकिन अगर वो कसूरवार है तो उसे इस हाल में उसे पहुंचाने वाले क्या कम गुनहगार नहीं...क्या सिस्टम का इसमें कोई दोष नहीं...शायद नहीं...क्योंकि नुज़हत एक पत्नी, एक बहू, एक मां, एक सास,  एक दादी, एक नानी बेशक भारत में 30 साल रहने के दौरान बनी लेकिन वो इन सबसे पहले एक 'पाकिस्तानी' है....
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    नशे में सीमा लांघना 'राष्ट्रीय बहादुरी' है !...खुशदीप

  • Saturday, May 4, 2013
  • by
  • Khushdeep Sehgal



  • सरबजीत का उसके गांव भिखिविंड में शुक्रवार को राजकीय सम्मान के साथ अंतिम संस्कार हो गया...सरबजीत को पाकिस्तान की जेल में 22-23 साल नारकीय परिस्थितियों में गुज़ारने पड़े होंगे, ये वाकई बेहद दुखद था...उसके परिवार के लिए भी ये पूरा दौर बहुत कष्टकारी रहा...सरबजीत की बहन दलबीर कौर पिछले सात-आठ साल से उसकी रिहाई के लिए बहुत मुखर रहीं...ये दलबीर कौर की वाकपटुता ही है कि उन्होंने सरबजीत की व्यथा को देश में घर-घर तक पहुंचा दिया...पाकिस्तान की जेलों में करीब पांच सौ और भारतीय कैदी भी बंद है...लेकिन उनके घर वाले बेचारे दुर्भाग्य से ये काम नहीं कर सके...इसलिए सरबजीत जैसी परिस्थिति में होने के बावजूद और किसी भारतीय कैदी पर ऐसा फ़ोकस नहीं गया...

    सरबजीत के लिए तीन दिन का राजकीय शोक मनाने के साथ पंजाब सरकार ने उसके परिवार को राजकीय ख़जाने से एक करोड़ रुपये दिए...दोनों बेटियों को सरकारी नौकरी भी मिल जाएगी...पंजाब सरकार ने सरबजीत को शहीद का दर्जा देने के लिए राज्य विधानसभा में प्रस्ताव लाने का भी इंतज़ाम किया...केंद्र सरकार भी 25 लाख रुपये देने के साथ पेट्रोल पंप या गैस एंजेसी देने के लिए भी प्राथमिकता के आधार पर काम कर रही है...प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने सरबजीत को 'देश का बहादुर बेटा' बताया है...काश इसी साल 15 जनवरी को लाहौर की कोट लखपत जेल में ही सरबजीत जैसे हालात में ही मारे गए चमेल सिंह के परिवार को भी ये सब कुछ मिला होता...शायद चमेल सिंह की कोई दलबीर कौर जैसी बहन नहीं रही होगी...

    चमेल सिंह

    सरबजीत को लेकर जो उन्माद जैसे हालात रहे वो अब हफ्ते दस दिन में शांत हो जाएंगे...हो सकता है दलबीर कौर को कोई सियासी पार्टी अगले लोकसभा चुनाव के लिए टिकट भी थमा दे...इस पूरे प्रकरण पर कुछ सवाल कौंध रहे हैं...हो सकता है आपके पास उनके सवालों का जवाब हो...

    सरबजीत के घर वाले उसके बचाव में हमेशा यही तर्क देते रहे हैं कि वो नशे में सरहद लांघ गया था...और पाकिस्तान ने उसे मनजीत सिंह की गलत पहचान देकर बम ब्लास्ट के केस में झूठा फंसा दिया...पाकिस्तान ने ये भी कहा कि सरबजीत भारतीय जासूस था...लेकिन भांरत सरकार ने कभी नही माना कि सरबजीत भारतीय जासूस था...सरबजीत के परिवार और भारत सरकार के दिए तथ्यों पर शक करने के लिए हमारे पास कोई गुंजाइश नहीं हो सकती...ऐसे में सरबजीत के नशे में सरहद पार करने और वहां पाकिस्तान के चंगुल में फंस जाने से ही क्या वो शहीद का दर्जा पाने और राष्ट्रीय हीरो कहलाने  के लिए फिट हो जाता है...सरबजीत मातृभूमि के किसी मिशन पर पाकिस्तान  नहीं गया था...फिर कैसे उसे राजकीय सम्मान दिया जा सकता है या तीन दिन का राजकीय शोक किया जा सकता है...क्या पंजाब के मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल बता सकते हैं कि किसी भारतीय सैनिक को भी राज्य या देश के लिए ड्यूटी पर शहादत के बाद उसके परिवार को उन्होंने राजकीय ख़जाने से एक करोड़ रुपये दिए...

    प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को भी साफ़ करना चाहिए कि 'भारत का बहादुर बेटा' कहलाने के लिए सरबजीत ने बहादुरी के कौन-कौन से मापदंडों को पूरा किया...क्या नशे में सरहद पार करना ही बहादुरी होती है...ऐसे में सरबजीत के लिए पंजाब और केंद्र सरकार की ओर से इतना कुछ किए जाने से ये सवाल नहीं उठता कि क्या सरबजीत वाकई  भेजा गया 'स्टेट स्पांसर्ड एक्टर' था...


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    बताओ भला देश में भागदौड़ कहां कम है...खुशदीप

  • Sunday, April 28, 2013
  • by
  • Khushdeep Sehgal

  • CWG, 2G, COAL, CHITFUND, HELICOPTER DEAL….

    सब जगह घोटाला...देश में उबाल...विपक्ष का बवाल...संसद में भूचाल...सरकार फिर भी कमाल...कह रही है, हम जितने ज़रूरी कदम हैं, सभी उठा रहे हैं...भ्रष्टाचारियों को बख्शा नहीं जाएगा....लेकिन किसी मंत्री-संतरी के इस्तीफ़ा देने का सवाल ही नहीं उठता...

    आज जो विपक्ष है वो शायद कल सरकार में होगा...आज जो सत्ता पक्ष है वो शायद कल विपक्ष होगा...बाकी कुछ नहीं बदलेगा...भ्रष्टाचार वैसा ही रहेगा...घोटाले होते रहेंगे...बस रोल बदल जाएंगे...आज जो सरकार में है, कल वही संसद ठप करा रहे होंगे...आज जो विपक्ष में हैं, कल वो कह रहे होंगे, इस्तीफ़ा देने का सवाल ही नहीं होता....

    खैर ये तो रही राजनीति...अब एक दूसरी बात...दिल्ली में कोई दिन ऐसा नहीं जा रहा जब किसी दामिनी, निर्भया, गुड़िया, लाडो या मुनिया को वहशी दरिंदे अपना शिकार ना बना रहे हों...लेकिन पुलिस कमिश्नर साहब कहते हैं, सुरक्षा के लिए जो ज़रूरी है वो सब कर तो रहे हैं...साथ ही ये तर्क भी दे डाला ज़्यादातर दुष्कर्म की वारदात घरवाले या जानने वाले ही करते हैं...इसलिए हर घर में तो पुलिस नहीं बिठायी जा सकती....कमिश्नर साहब कहते हैं पुलिस इतनी भागदौड़ कर रही है तो फिर मेरा इस्तीफ़ा देने का सवाल ही कहा होता है...

     ये सारे बयानात देख एक कहानी याद आ गई...आप भी पढ़िए, शायद इसमें आपको देश का सच नज़र आए...

     "एक जंगल था...उसमें हर तरह के जानवर रहते थे...एक दिन जंगल के राजा का चुनाव हुआ...जानवरों ने शेर को छोड़कर एक बन्दर को राजा बना दिया...एक दिन शेर बकरी के बच्चे को उठा के ले गया...बकरी बन्दर राजा के पास गई और अपने बच्चे को छुड़ाने के लिए मदद मांगी...

    बन्दर शेर की गुफ़ा के पास गया और गुफ़ा में बच्चे को देखा...पर अन्दर जाने की हिम्मत नहीं हुई...बन्दर राजा गुफ़ा के आसपास पेड़ों पर उछाल लगाता रहा...कई दिन ऐसे ही उछल कूद में गुजर गए...
     
    तब एक दिन बकरी ने जाके पूछा- "राजा जी मेरा बच्चा आख़िर कब लाओगे?".

    बन्दर राजा तिलमिलाते हुए बोला " हमारी भागदौड़ में कोई कमी हो तो बताओ"...





    तो अब बताइए भला, देश में भागदौड़ की कहां कमी है...

    बात करते हैं...
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    ओ लैला तुम्हे कुटवा देगी, लिख के ले लो...खुशदीप

  • Thursday, April 25, 2013
  • by
  • Khushdeep Sehgal



  • एकता कपूर-संजय गुप्ता की प्रोड्यूस की गई नई फिल्म 'शूटआउट एट वडाला' के प्रमोशन के लिए इसकी स्टारकास्ट पिछले दिनों दिल्ली-नोएडा में थी...इसी दौरान दिल्ली समेत पूरे देश को पांच साल की बच्ची के साथ हैवानियत की वारदात ने उद्वेलित कर रखा था...

    'शूट आउट एट वडाला' में पुलिस ऑफिसर बने अनिल कपूर ने इस वारदात पर कहा-

    "मैं समझता हूं, देश में ऐसा कोई नहीं होगा जो इसकी भर्त्सना नहीं करेगा...मैं समझता हूं ये पूरी तरह शर्मनाक और अस्वीकार्य है...पुलिस को इसके लिए जवाबदेह होना चाहिए...सरकार जिस पर लोगों की सुरक्षा की ज़िम्मेदारी है, उसे जवाबदेह होना चाहिए.."

    फिल्म में डॉन बने जॉन अब्राहम ने कहा कि बलात्कारियों को फांसी से कम सज़ा नहीं मिलनी चाहिए...जॉन ने ऐसी घटनाओं के लिए परवरिश और शिक्षा की ख़ामियों को भी दोष दिया...

    फिल्म के ही एक और पात्र और प्रोड्यूसर एकता कपूर के छोटे भाई तुषार कपूर ने भी घटना को शर्मनाक बताते हुए दोषियों को कड़ी से कड़ी सज़ा देने की मांग की...

    ये तो रहा हमारी फिल्म इंडस्ट्री का देश के हालात और समाज के नैतिक पतन पर चिंतित होने का चेहरा...
    लेकिन इसी इंडस्ट्री से इस बात का कोई जवाब नहीं देता कि इनकी खुद की कारगुज़ारियों का समाज पर कितना बुरा असर पड़ता है...

    अब जिस फिल्म की स्टारकास्ट की बात की गई है,...उसकी असलियत भी सुन लीजिए...गैंगस्टर्स की पृष्ठभूमि पर बनी इस फिल्म में तीन-तीन आइटम सॉन्ग्स रखे गए...इन्हें प्रियंका चोपड़ा, सोफी चौधरी और सनी लिओन पर फिल्माया गया है...पोर्न स्टार रही सनी लिओन पर इस फिल्म में जो आइटम सॉन्ग फिल्माया गया है, ज़रा उसके मुखड़े पर गौर फ़रमा लीजिए...

    दिल! तेरा ले लेगी,
    जान! तेरी ले लेगी,
    ईमान तेरा ले लेगी,
    लैला तेरी... लैला तेरी...
    लैला तेरी ले लेगी...
    तू लिख के ले ले ...

    इस गाने का प्रोमो बना कर टीवी चैनल्स पर भी रिलीज़ कर दिया गया....यू ट्यूब पर इस गाने को लाखों लोग देख चुके हैं...लेकिन गाने के इन अश्लील बोलों पर सेंसर बोर्ड का ध्यान दिलाया गया तो उसने गाने के प्रोमो को टीवी पर प्राइम टाइम में दिखाने पर बैन लगा दिया...साथ ही फिल्म बनाने वालों से कहा कि अगर उन्हें फिल्म में गाने को इन्हीं बोलों के साथ रखना है तो फिल्म को 'ओनली फॉर एडल्ट्स' सर्टिफिकेट मिलेगा...लेकिन टीवी पर प्रोमो दिखाना है तो इसके बोलों को बदलना होगा...फिल्म निर्माता ने सिर्फ़ टीवी के लिए गाने के बोलों को बदल कर अब कर दिया है...

    ओ लैला तुझे लुट लेगी,
    तू लिख के ले ले...

    लेकिन सेंसर बोर्ड की भी ये कैसी सख्ती...टीवी पर जितना गाने का प्रमोशन किया जाना था किया जा चुका...यू ट्यूब पर इसे कोई भी अब भी देख सकता है...फिल्म 26 अप्रैल को रिलीज़ होगी तो उसमें भी विवादित बोलों वाला गाना ही होगा...यानि सेंसर बोर्ड ने जो भी कार्रवाई की वो सिर्फ दिखावे की ही की...

    अब ज़रा सोचिए...फिल्म रिलीज़ होगी...इसके बेहूदा गाने को शोहदे किस्म के लोग गली-सड़कों पर गाते घूमेंगे...इससे समाज पर कितना अच्छा असर पड़ेगा?...अनिल कपूर साहब आप पुलिस और सरकार की जवाबदेही तय करने की बात कर रहे हैं...ज़रा अपनी बिरादरी की जवाबदेही पर भी कुछ बोल दीजिए... उसी ब़ॉलीवुड की जवाबदेही पर, जो खुद को आईना दिखाने पर एकसुर में अभिव्यक्ति की आज़ादी की दुहाई देने लगता है...ये भी दलील दी जाती है फिल्में समाज का ही आईना होती है...लेकिन कभी ये भी सोच लीजिए कि लौंडिया पटाएंगे मिसकॉल से, बबली बदमाश है, लैला तेरी ले लेगी...जैसे गानों से आप खुद भी समाज का कैसा भला कर रहे हैं....खास तौर पर उन युवा लड़कों का, जिनकी शिक्षा या रहन-सहन का स्तर ऐसा नहीं है जो भले-बुरे की तमीज़ कर सकें...

    नागरिकों की सुरक्षा की ज़िम्मेदारी जितनी पुलिस और सरकार की है, उतनी ही समाज के हर वर्ग की है...खास तौर पर फिल्मों से जुड़े उन नुमाइंदों की, जिनमें युवा वर्ग अपना अक्स ढूंढता रहता है...उनके जैसे दिखने-बनने की कोशिश करता है...

    दरिंदों की दिल्ली या दाग़दार दिल्ली के बैनर लेकर सरकार और पुलिस के ख़िलाफ़ प्रदर्शन करने वाले भी इस और ज़रा ध्यान दे...वो क्यों नहीं ऐसी बेहूदा फिल्में और गाने बनाने वालों का विरोध करते...क्यों नही उनका बॉयकॉट कर देते...

    जो लोग ऐसी फिल्में देखने जाते हैं, उनसे भी गांधीगिरी के ज़रिए ऐसी फिल्मों को बढ़ावा ना देने की अपील क्यों नहीं की जाती...

    ऐसे फिल्मकारों से मेरा भी कहना है...

    ओ जनता तुम्हे, ओ जनता तुम्हे,
    सड़कों पर कूट देगी,
    तुम लिख के ले लो...

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    दिल्ली में 99 फ़ीसदी अब भी 'दिलदार' हैं...खुशदीप

  • Tuesday, April 23, 2013
  • by
  • Khushdeep Sehgal


  • कुंठित और मानसिक विकृति के दो पिशाचों की वजह से एक फूल जैसी बच्ची को घोर यातना सहनी पड़ी...इन पिशाचों के लिए बड़ी से बड़ी सज़ा भी कम है...

    लेकिन इसके आगे क्या...इन्हें सरेआम गोली से उड़ा भी दिया जाए तो क्या गारंटी के साथ कहा जा सकता है कि इस तरह के अपराध समाज में फिर नहीं होंगे...

    क्या दरिंदों की दिल्ली कह देने से ही हमारी ज़िम्मेदारी खत्म हो जाती है...समस्या इससे कहीं बड़ी है...हमें सोचना होगा कि हमारे समाज में इस तरह के विकार क्यों पनप रहे हैं...हमें उसी जड़ पर चोट करनी चाहिए...

    दिल्ली यूनिवर्सिटी में हर साल बाहर से हज़ारों छात्र (लड़कियां भी) अपना भविष्य संवारने के लिए एडमिशन लेने आते हैं...क्या वो सभी असुरक्षित हैं...

    बार बार पूरी दिल्ली को दरिंदों या हैवानों की बस्ती बताने से बाहर से पढ़ने आई इन छात्राओं के घरवालों के दिलों पर क्या बीतती होगी...

    जिस तरह पांचों उंगलियां बराबर नहीं होती उसी तरह सारे पुलिस वाले भी शैतान नहीं होते...ऐसा नहीं होता तो वारदात के दो दिन में ही अपराधी नहीं पकड़े जाते...

    आज चिंता से ज़्यादा सतर्क रहने की ज़रूरत है...सभी नागरिक अपनी ज़िम्मेदारी को निभाए...आसपास असामान्य प्रवृत्ति का कुछ होता दिखे या कोई संदिग्ध व्यक्ति दिखे तो हरकत में आ जाए...

    खुद विरोध करने की स्थिति में हो तो ज़रूर करें...अन्यथा पुलिस को रिपोर्ट करें...सामूहिक रूप से पुलिस पर दबाव बनाएं...

    ज़रूरत मेलोड्रामे की नहीं, बल्कि चीज़ों को अलग नज़रिये से देखने की है...हम बदलेंगे तो समाज बदलेगा...समाज बदलेगा तो ये देश बदलेगा...
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    ब्लडी मंडे क्यूं आया ख़ून चूसने...खुशदीप

  • Monday, April 22, 2013
  • by
  • Khushdeep Sehgal

  • आज मंडे है...मंडे का नाम अगर आप संडे को सुन लें तो आपको क्या हो जाता है...काम पर जाने वाले हों या स्कूल-कॉलेज जाने वाले बस यही मलाल करते रहते हैं, यार ये मंडे इतनी जल्दी क्यों जाता है...इसी मंडे की महिमा पर आजकल टीवी और एफएम रेडियो चैनल्स पर एक गाना बड़ा पॉपुलर हो रहा है...
    पढ़िए, देखिए, धुनिए...शायद आपकी भी दुखती रग इसके साथ जुड़ी हो....

    ए ले, फिर आ गया तू फेस उठा के,

    दम लेगा क्या मेरी जान खा के,

    ख़ून चूसने तू आया ख़ून चूसने,

    ब्लडी ख़ूनी मंडे क्यूं आया ख़ून चूसने.
    तू जा रे जा रे जा, कबूतर जा,

    मैं नहीं जाना, मैं नहीं जाना,
    मैं नहीं जाना बिस्तर को छोड़ के,

    ख़ून चूस ले तू मेरा ख़ून चूस ले,
    ब्लडी मंडे तू चाहे ख़ून चूस ले,

    डररर...
    माना तेरे नाम में है मन एक बार,
    तो तू मन की करेगा क्या रे मनडे,

    काहे पाये ना क़रार जब तक तू ना यार,

    गाढ़े सनडे की कब्र पर झंडे,
    अस्सी ख़ून के शिकारी सोमवार,

    मैंने नहीं जाना, मैंने नहीं जाना,

    सनडे है दिलदार देके मैया का प्यार,
    मुझे लोरियां गा के जो सुलाये,

    पर तेरा है विचार, के मैं शंख हूं यार,
    पूरे पावर से मुझे बजाये,
    अस्सी ख़ून के शिकारी सोमवार,

    कान खुजाना, कान खुजाना, कान खुजाना,
    उंगली घुसेड़ के,

    ख़ून चूस ले तू मेरा ख़ून चूस ले...

    फिल्म – गो गोआ गोन
    गायक – सचिन, प्रिया पांचाल

    गीत – इरशाद कामिल
    संगीत – सचिन-जिगर
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    हिंदी ब्लॉगिंग में ये 'तीसरा' कौन है...खुशदीप

  • Friday, April 19, 2013
  • by
  • Khushdeep Sehgal

  • हिंदी ब्लॉग जगत बहुत दिनों से हाइबरनेशन यानि शीतनिद्रा में था...भला हो जर्मन डायचे वेले का जो इसने शीतनिद्रा को भंग किया...लगता है हर ब्लॉगर तरकश के सारे तीरों के साथ उठ खड़ा हुआ है...कुछ पुरस्कारों के समर्थन में, कुछ विरोध में...कुछ नामितों के समर्थन में, कुछ नामितों के विरोध में...एक नामित, दूसरे नामित के विरोध में....और जो इनमें से कुछ नहीं, वो भी चिंतित है...हिंदी ब्लॉगिंग के इतिहास को लेकर... सुनहरे भविष्य को लेकर...हाय ऐसे ही हो-हल्ला मचता रहा तो बाहर वाले क्या सोचेंगे...कैसे होगा हिंदी का उत्थान...

    अरे भाई जी, ये हो-हल्ला ही तो किसी ज़िंदा कौम की पहचान है...

    क्या ख़ूब कह गए हैं साहिर लुधियानवी साहब...

    मैं ज़िन्दा हूं यह मुश्तहर कीजिए,
    मेरे क़ातिलों को ख़बर कीजिए’...

    अब हाइबरनेशन का ज़िक्र किया है तो पहले इसका ठीक से मतलब भी जान लिया जाए...इस संदर्भ में इंटरनेट पर खोजने पर सुरक्षित गोस्वामी का लेख बहुत सटीक लगा...सुरक्षित जी लिखते हैं...



     'बयॉलजी में एक शब्द प्रयोग होता है - हाइबरनेशन...हिंदी में इसे शीत निद्रा कहते हैं...आपने सुना होगा कि ध्रुवीय भालू, कछुए, मेंढक और सांप जैसे बहुत से जानवर सर्दियों में जमीन के नीचे ऐसी जगह में छिप जाते हैं, जहां ठंड का असर उन पर न हो...वहां उस सुरक्षित जगह पर वे पूरे मौसम यानी तीन या चार महीने तक लगातार सोए रहते हैं....इसी लंबी नींद की अवस्था को हाइबरनेशन या शीत निद्रा कहते हैं.... 

    असल में प्रतिकूल मौसम की वजह से शरीर के लिए आवश्यक ऊर्जा देने वाला भोजन उन्हें पर्याप्त मात्रा में नहीं मिल पाता, इसलिए वे अंडरग्रांउड हो जाते हैं और महीनों नींद जैसी अवस्था में पडे़ रहते हैं...उस समय अत्यंत धीमी गति से बस उनकी सांस चलती रहती है, जो उन्हें जीवित रखती है...इस दौरान वे खाना- पीना या शिकार या कोई भी अन्य गतिविधि नहीं करते, जैसे बेहोशी या कोमा की स्थिति में हों...उनके शरीर में पहले से जमा चर्बी और पोषक तत्वों से उनका जीवन बचा रहता है...जब मौसम बदलता है, तब वे उस शीत निद्रा से जागते हैं, धीरे-धीरे जमीन से बाहर निकलते हैं और सामान्य जीवन में फिर से लौट आते हैं...

    इसी प्रकार आपने यह भी सुना होगा कि प्राचीन काल में हिमालय में अनेक योगी समाधि की अवस्था में महीनों, सालों बैठे रहते थे...इस अवस्था में वे भी अपने शरीर की सुध- बुध खो बैठते थे....यदि समाधि लंबे समय की है तो उनके जटा- दाढ़ी बढ़ जाती थी और कभी- कभी तो शरीर पर दीमक भी लग जाते थे... 

    मनुष्य प्राकृतिक रूप से शीत निदा जैसी कोई अवस्था नहीं प्राप्त करता...संभवत: हमारे प्राचीन ऋषि-मुनियों ने अन्य जीवों की शीत निदा को देख कर ही अपने तप और साधना द्वारा यह अवस्था प्राप्त करने की विधि विकसित की होगी...साधक बताते हैं कि एक तो इस अवस्था में जाने पर जीवित रहने के लिए शरीर से ऊर्जा का क्षय न्यूनतम होता है...इस तरह से मनुष्य जीवन का भी संचय करता है और अपनी ऊर्जा का भी, जिसे वह बाद में किसी बड़े उद्देश्य के लिए लगा सकता है...इसके अलावा, साधक यह भी कहते हैं कि समाधि में सत, चित और आनंद की अवस्था प्राप्त होती है, जो अन्यथा नहीं मिल सकती...इस प्रकार ऐसे योगी सैकड़ों साल तक शुद्घ, बुद्घ और चैतन्य बने रह सकते हैं.'..

    हिंदी ब्लॉगिंग के निष्क्रिय कालखंडों को भी इसी हाइबरनेशन से जोड़ कर देखा जा सकता है...अब डायचे वेले की टंकार पर हिंदी ब्लॉगिंग के भी सभी ऋषि-मुनि अपनी कंदराओं से बाहर निकल आए हैं...कुछ शांत प्रवचन करते हुए तो कुछ दुर्वासा ऋषि का रौद्र रूप लेकर...जहां टिप्पणियां सरस्वती नदी की धार जैसे लुप्त हो गई थी, वहां अब कई पोस्टों पर उनका उफ़ान ख़तरे के निशान को पार कर चुका है...

    चलिए अब ये हंगामा जिस पर बरपा है, उसकी भी बात कर ली जाए...सम्मान-पुरस्कार...खास तौर पर इनके साथ मिलने वाले प्रशस्ति-पत्र पर...मेरे एक मित्र ने इनकी निरर्थकता पर बड़ा दिलचस्प ऑब्जर्वेशन दिया है...उसका कहना है कि इस काग़ज के टुकड़े  से तो टिश्यू पेपर अच्छा है...कुछ काम तो आता है...प्रशस्ति पत्र को उलटे ज़िंदगी भर संभालने का टंटा और करना पड़ता है...

    अब समझ आ रहा है कि अमर ब्लॉगर डॉ अमर कुमार जी ने ताउम्र कोई सम्मान या पुरस्कार क्यों स्वीकार नहीं किया...शायद चिकित्सकों को दिए जाने वाला प्रतिष्ठित डॉ बी सी रॉय अवॉर्ड भी नहीं...(इस बिंदु पर किसी को ज़्यादा जानकारी हो तो कृपया टिप्पणी के ज़रिए बताएं...डॉक्टर साहब ने खुद ही एक बार मेरी पोस्ट पर एक टिप्पणी के ज़रिए ये ज़िक्र किया था...मैं उस पोस्ट को ढूंढ नहीं पा रहा हूं...लेकिन डॉक्टर साहब के इस विलक्षण आयाम को लेकर और दुरूस्त होना चाहता हूं)...

    अंत में कवि धूमिल जी को नमन करते हुए पुरस्कारों की ये व्याख्या...

    एक आदमी,
    पुरस्कार बेलता है,
    एक आदमी पुरस्कार खाता है,
    एक तीसरा आदमी भी है,
    जो न पुरस्कार बेलता है, न पुरस्कार खाता है,
    वह सिर्फ़ पुरस्कार से खेलता है,
    मैं पूछता हूँ--
    'यह तीसरा आदमी कौन है ?'
    हिंदी ब्लॉग  की संसद मौन है...
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    क्या फिक्स हैं डायचे वेले अवार्ड्स?...खुशदीप

  • Tuesday, April 16, 2013
  • by
  • Khushdeep Sehgal
  • एक सज्जन मेरी एक पोस्ट पर अपनी टिप्पणी के ज़रिये ये सवाल उठा चुके हैं-...


    धन्यवाद...आपने मुझे इस क़ाबिल समझा कि मैं अकेले ही अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर किसी ब्लॉग को जिताने की क्षमता रखता हूं...



    इन सज्जन ने मेरा ब्लॉग नामित नहीं होने पर मेरी खीझ के बारे में सही कहा...क्योंकि ये मेरा शगल रहा है कि पहले तो मैं इस फ़िराक में रहता हूं कि सम्मान या अवार्ड कहीं भी बंट रहा हो-  गली-मुहल्ला, कस्बा-शहर, राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय, अपना नाम संभावितों की सूची में शामिल करा दूं...और फिर उसे लेने से मना कर दूं...इससे जो नाम होता है, आनंद मिलता है, उसका भला कहना ही क्या...अब डॉयचे वेले ने ये हिमाकत भला कैसे कर दी कि मेरे ब्लॉग का नाम नामांकित ब्लॉगों में शामिल नहीं किया...और मुझे उसे ठुकराने के परमानंद से वंचित कर दिया?

    ये बात दूसरी है कि जब ब्लॉग जगत में बहुत कम लोगों को ही पता था कि डॉयचे वेले ने इस साल बाब्स (बेस्ट ऑफ ब्लॉग्स) के लिए हिंदी को भी शामिल किया है और ब्लॉग्स के नाम 6 मार्च तक सुझाने के लिए कहा है तो मैंने इस पर 13 फरवरी को एक पोस्ट लिख मारी...उस पोस्ट में विस्तार से इन अवार्ड्स के बारे में बताया...यानि पूरे ब्लॉग जगत को पता चल गया कि इन अवार्ड्स के लिए किसी भी ब्लॉग का नाम 6 मार्च तक सुझाया जा सकता है...इस अवार्ड्स के बारे में प्रचार-प्रसार करने से मुझे ये नहीं पता था कि अपने पैर पर ही कुल्हाड़ी मार लूंगा...अरे जब बहुत कम लोगों को पता था तो चुपचाप बैठा रहता...अपने शुभचितकों से ज़्यादा से ज्यादा अपने ब्लॉग का ही सुझाव भेज देता...कम लोगों को पता रहता तो औरों के ब्लॉग के सुझाव भी कम जाते...यानि जूरी के सामने भी कम विकल्प ही रहते और झक मार कर मेरे ब्लॉग का चुनाव करना ही पड़ता...

    ख़ैर चलिए...फिर 6 मार्च के बाद जूरी ने ब्लॉग्स को नामांकित करने का काम शुरू किया...जूरी के पास इतने सुझाव आ गए, उनमें भला मेरा दोयम दर्जे का देशनामा कहां टिकता...3 अप्रैल तक जूरी की ओर से नामांकित ब्लॉग्स की सूची भी जारी कर दी गई और इन ब्लॉग्स के लिए 7 मई तक वोट मांगे गए....इसकी सूचना भी मैंने सबसे पहले 3 अप्रैल को ही अपनी इस पोस्ट के ज़रिए ब्लॉग जगत को दी...इस बात की पुष्टि भी कुछ नामांकित ब्लॉगर्स की ओर से की गई कि उन्हें सबसे पहले ये खुशख़बरी मेरी पोस्ट से ही मिली...इस सूचना का प्रचार-प्रसार कर के भी मैंने गलती की...जब मुझे पता था कि मेरा ब्लॉग नामांकित ब्लॉग्स की सूची में नहीं है तो मुंह सिल लेता...हां, इन नामांकित ब्लॉग्स में से कोई पसंदीदा ब्लॉग होता तो बस उसके लिए ज़्यादा से ज़्यादा वोटिंग का अभियान चुपचाप कराता रहता...लेकिन नहीं जी, मुझे तो ढिंढोरा पीट कर आफ़त मोल लेने का शौक जो है...

    अब आख़िर में आता हूं सबसे महत्वपूर्ण सवाल पर...इन अवार्ड्स के लिए बड़े बड़े धुरंधर रह गए लेकिन एक शख्स इतने महान निकले कि उन्हें एक नहीं तीन-तीन जगह नामांकन मिल गया...बेहतरीन हिंदी ब्लॉग की श्रेणी में इन्हें दो नामांकन मिले...इसके अलावा 14 भाषाओं के ब्लॉग्स को मिलाकर बनाई गई सबसे रचनात्मक ब्लॉग की श्रेणी में भी इन्हें एक नामांकन मिला...वाकई बहुत प्रतिभाशाली होंगे ये शख्स...हा इसे संयोग ही कहा जा सकता है कि इस शख्स का परिचय हिंदी ब्लॉग्स को नामांकित करने वाले जूरी सदस्य से बहुत पहले से है...इसका सबूत है जूरी के इस सदस्य के अपने ब्लॉग के साइड-बार में लगा लिंक रोड....ये लिंक रोड हाल-फिलहाल का नहीं बहुत पुराना है...यानि तीन नामांकन पाने वाले शख्स पहले से ही जूरी सदस्य के पसंदीदा है और उनका नाम लिंक-रोड में दिए चुनींदा ब्लॉग्स में शामिल है...

    ऐसे में सवाल उठता है कि क्या ये महज़ इत्तेफ़ाक़ ही है कि कोई जूरी सदस्य जिसे पहले से ही जानता है, जिसके ब्लॉग को पसंद करता है, जिसका लिंक अपने ब्लॉग पर देता है, उसी को तीन-तीन नामांकन देने का ज़रिया बन जाए? ऐसे में क्या इसी शख्स के सिर पर बॉब्स का ताज सजना नहीं बनता है बॉस?....

    अब ये बात दूसरी है कि किसी मुकदमे के दौरान भी जज को पता चल जाता है कि मुकदमा लड़ने वालों में से कोई उसकी जान-पहचान का है तो वो खुद को उस मुकदमे की सुनवाई से अलग कर लेता है...लेकिन यहां तो जूरी सदस्य के हाथ में हर कदम पर अपनी पहचान के ब्लॉग को जिताने के लिए असीम ताकत है...

    ते कि मैं झूठ बोलया....


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    सुर्ख़ियों में

    आपकी बात

     
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