रविवार, 24 सितंबर 2017

बेटा तुम से ना होगा, गांधीगीरी से होगा- पार्ट 3...खुशदीप



स्वच्छता और खुले में शौच की समस्या पर पिछली दो पोस्ट पर विस्तार से लिख चुका हूं. आज उसी विषय की ये तीसरी और अंतिम कड़ी है. कुछ लिखूं, इससे पहले पिछली पोस्ट पर आई एक टिप्पणी का ज़िक्र करना चाहूंगा. भाई चौहान अजय ने ये टिप्पणी भेजी-
मेरे गाँव मे समस्या ये है की पीने का पानी तक मुहैया नहीं कर पा रही है सरकार। विदर्भ मे इस वर्ष भी सूखा पडा है। यहां जीने का संघर्ष है और सरकार की सोच सडांध मारते शौचालय जैसी हो गई है

समस्या वाकई विकराल है. गांव में पानी जैसी बुनियादी चीज़ ही उपलब्ध नहीं है, ऐसे में भारत जैसे विशाल ग्रामीण आबादी वाले देश को दो साल में ODF (खुले में शौच से मुक्त) बनाने का लक्ष्य रखना कितना व्यावहारिक है, कह नहीं सकता. 50-60 करोड़ लोगों को खुले में शौच से रोकने के लिए मनाना भागीरथ कार्य से कम नहीं है. जैसे कि मैंने पिछली पोस्ट में उदाहरण दिए कि कुछ जगह अधिकारी अति उत्साह में इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए अमानवीय कृत्य करने से भी गुरेज नहीं कर रहे.
ये कहने-सुनने में बड़ा अच्छा लगता है कि शहर-गांव में घर-घर में शौचालय होना चाहिए. बिल्कुल होना चाहिए. शहरों में मलीन बस्तियों को छोड़ दिया जाए तो करीब-करीब हर घर में शौचालय उपलब्ध है. शहरों में समस्या घरों में नहीं बल्कि सार्वजनिक स्थानों पर साफ़-सुथरे शौचालयों की कमी की है. अगर कहीं हैं भी तो वो या तो इतने गंदे हैं कि कोई उनमें जाने की हिम्मत नहीं कर सकता. या फिर कुछ गैर सरकारी संगठनों के हवाले हैं, जो देश-विदेश से बड़े अनुदान मिलने के बावजूद इन्हें दुकानों की तरह चला रहे हैं. किसी गरीब आदमी को एक बार हल्के होने के लिए पांच रुपए कीमत देना ज़रूर अखरता होगा. यही वजह है कि जब ट्रेन से सफ़र किया जाए तो सुबह-सुबह शहरों के बाह्य क्षेत्रों में पटरियों, नालों के किनारे ऐसे दृश्य देखने को मिल जाते हैं कि खिड़कियों को बंद रखना ही बेहतर रहता है.
गांवों पर जाने से पहले शहरों की ही बात कर ली जाए. क्या यहां स्थानीय प्रशासन पर्याप्त संख्या में साफ़-सुथरे पब्लिक टॉयलेट्स उपलब्ध करा पा रहे हैं. स्लम्स की बात छोड़िए, अच्छी रिहाइशी बस्तियों या बाज़ारों में भी इनकी भारी कमी है. नोएडा के सेक्टर 16-ए में स्थित फिल्म सिटी की ही बात कीजिए. यहां तमाम बड़े न्यूज चैनल्स और मीडिया संस्थानों के दफ्तर हैं. लेकिन पूरी फिल्म सिटी में एक भी पब्लिक टॉयलेट नहीं हैं. यहां सिर्फ दफ्तरों में काम करने वाले ही नहीं बड़ी संख्या में दूसरे लोग भी आते हैं. अब ऐसे में अचानक नेचर कॉल आना किसी मुसीबत से कम नहीं.
चलिए मायानगरी मुंबई की बात की जाए. यहां बैंड स्टैंड पर शाहरुख़ ख़ान और सलमान ख़ान जैसे सुपरस्टार्स के आशियाने हैं. समुद्र का किनारा होने की वजह से यहां बड़ी संख्या में लोग रोज़ पहुंचते हैं. पास ही मछुआरों की बस्ती भी है. पिछले दिनों यहां सलमान ख़ान जिस गैलेक्सी अपार्टमेंट बिल्डिंग में रहते हैं, उसी से कुछ दूरी पर बीएमसी ने पोर्टेबल टॉयलेट्स की व्यवस्था की. अब सलमान ख़ान के घर के सामने सी-व्यू के साथ टॉयलेट का दृश्य कैसे बर्दाश्त किया जाता. सलमान ख़ान के पिता सलीम ख़ान ने इस पर कड़ा ऐतराज़ जताते हुए बीएमसी को खड़का डाला. आखिरकार मेयर को बीएमसी को वहां टॉयलेट हटाने का निर्देश देना पड़ा.
ख़ैर ये तो रही शहरों की बात, अब आते हैं गांवों पर, जहां अब भी करोड़ों लोग खुले में शौच के लिए खेतों में जाते हैं. स्वच्छ भारत अभियान के तहत मध्य प्रदेश में भी खुले में शौच से रोकने के लिए सरकार की ओर से बड़ी कोशिशें की जा रही हैं. सीहोर मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान का गृह जिला है. यहीं के एक गांव में 8 से 13 साल के कुछ बच्चे सुबह ही उठ जाते हैं. ये खुद को डिब्बा डोल गैंग के सदस्य बताते हैं. इनका काम जहां भी नितकर्म करता कोई दिखाई दे या जाता दिखाई दे तो उसके डिब्बे से पानी गिराने का होता है.
यहां ये नहीं भूलना चाहिए कि सरकार की ओर से की जाने वाली सख्ती से जो नतीजे आएंगे, वो दीर्घकालिक नहीं होंगे. इसके लिए सूझ-बूझ और गांव समुदायों को साथ लेकर चलने की आवश्यकता है. वैसी ही सूझ-बूझ जैसे कि देश में पोलियो उन्मूलन अभियान के दौरान अपनाई गई. स्वच्छ भारत मिशन की री-ब्रैंडिंग और री-लॉन्चिंग में अगर कुछ सबसे कारगर हो सकता हैं तो वो है- सामुदायिक नेतृत्व में पूर्ण सेनिटेशन (Community Led Total Sanitation-CLTS).  

सामुदायिक और सहकार की भावना कितना क्रांतिकारी बदलाव कर सकती है, ये हमने वर्गीज़ कुरियन जैसे प्रणेता के नेतृत्व में आणंद में अमूल दुग्ध क्रांति के दौरान देखा. दूध की मार्केटिंग तो सरकारी स्तर पर कई और राज्यों में भी होती है, लेकिन वो क्यों अमूल की तरह एक राष्ट्रीय मिशन का रूप क्यों नहीं ले पाई. फर्क कुरियन की ईमानदारी के साथ भ्रष्टाचार रहित उस सामूहिक भावना का है, जहां हर घरेलू दुग्ध उत्पादक ने अमूल मिशन को सफल बनाना अपनी खुद की ज़िम्मेदारी समझा. ऐसा ही कुछ देश में स्वच्छता अभियान के साथ भी होना चाहिए.

यहां ये भी समझना चाहिए कि गांवों में खुले में शौच जाने वाले लोगों को ये आदत सदियों से पीढ़ी दर पीढ़ी विरासत में मिली है. ये आधारभूत से ज्यादा व्यावहारिक और सामाजिक-सांस्कृतिक परिवेश वाली समस्या है. इसके लिए करोड़ों लोगों को तैयार करने के लिए जोर जबरदस्ती नहीं बल्कि अभिनव तरीकों का प्रयोग किया जाना चाहिए.

इसे ऐसे भी समझना चाहिए जब देश में कंप्यूटर आया था तो सब इसे अजूबा समझते थे. दरअसल, भौतिक विज्ञान के जड़त्व के नियम के मुताबिक जो चीज़ जैसी है, वो वैसी ही रहना चाहती है. इसलिए लोगों का बरसों से चला आ रहा व्यवहार बदलना भी टेढ़ी खीर से कम नहीं. कंप्यूटर आने से पहले सरकारी दफ्तरों में टाइप राइटर से ही काम होता था. कर्मचारियों को टाइप राइटर से काम करने की आदत पड़ी हुई थी. उन्हें जब पहली बार कंप्यूटर पर काम करने के लिए कहा गया तो उन्होंने कहा कि नहीं उनके लिए तो टाइप राइटर ही ठीक है. तब देश में कंप्यूटर क्रांति के प्रणेता सैम पित्रोदा ने एक सुझाव कर्मचारियों के सामने रखा. उन्होंने कर्मचारियों से कहा कि आप एक महीना बस कंप्यूटर पर काम करके देखो. अगर आप इसे फिर भी सुविधाजनक ना समझो तो इन्हें वापस लेकर आपको दोबारा टाइपराइटर लौटा दिए जाएंगे. एक महीने तक कर्मचारियों ने कंप्यूटर पर मजबूरन काम करना स्वीकार कर लिया. एक महीने बाद उनसे पूछा गया कि क्या कंप्यूटर की जगह फिर टाइप राइटर पर लौटना पसंद करेंगे, तो सभी ने मना कर दिया. क्योंकि तब तक उन्हें कंप्यूटर की सुविधा और आराम समझ आने लगा था. अब उसी का नतीजा देखिए, देश भर में किसी दफ्तर की कल्पना क्या बिना कंप्यूटर के की जा सकती है.

कुछ कुछ ऐसे ही तरीके भारत को स्वच्छ करने या खुले में शौच से मुक्त बनाने के लिए भी अपनाए जाने चाहिएं. Community Led Total Sanitation- CLTS  भी ऐसा ही कदम है. इसके तहत किसी समुदाय (ग्राम सभा, पंचायत, गांव के लोग) को एकत्र किया जाता है. फिर किसी फील्ड को-ऑर्डिनेटर के जरिए उन्हें खुले में शौच से जुड़े स्वास्थ्य संबंधी तमाम पहलुओं के बारे में समझाया जाता है. उन्हें आसान भाषा में समझाया जा सकता है कि खुले में शौच नहीं जाने से कितनी बीमारियों से खुद को और बच्चों को बचाया जा सकता है. साथ ही अस्पताल, दवाइयों पर होने वाला खर्च बचाकर कितना आर्थिक लाभ भी हो सकता है.



लेकिन यहां लगातार समुदाय के साथ संवाद की जरूरत है. उन्हें सेलेब्रिटीज का सहयोग लेकर इस दिशा में एजुकेशन फिल्में प्रोजेक्टर पर दिखाई जा सकती है. कैसे ये मुद्दा महिलाओं के सम्मान से भी जुड़ा है. कैसे हर साल स्वच्छता की कमी से डायरिया जैसी बीमारियों से लाखों शिशुओं को मौत के मुंह में जाने से रोका जा सकता है?  

कोशिश रहे कि ऐसा संदेश हर जगह हवा में तैरने लगे कि घर में शौचालय होना सामाजिक प्रतिष्ठा का सवाल है. और जब इसके लिए सरकार भी सब्सिडी दे रही है तो फिर इसे बनाने में हर्ज भी क्या है.

CLTS  में लगातार संवाद से पूरा समुदाय सामूहिक रूप से फैसला करता है कि खुले में शौच करने को रोकना उसकी अपनी ज़िम्मेदारी है. फिर समुदाय खुद ही देखता है कि गांव के हर सदस्य को अच्छी तरह समझ आ जाए कि शौचालय का इस्तेमाल कितना लाभकारी है. जहां तक सरकार का सवाल है वो अपने स्तर पर समुदाय को इस काम में अपनी तरफ से पूरा प्रोत्साहन दे. साथ ही ये भी देखे कि उस गांव में पानी जैसे बुनियादी चीज़ की कमी है तो उसे दूर करने के लिए युद्ध स्तर पर प्रयास किए जाएं. सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट को कैसे गांव के ही आर्थिक लाभ में तब्दील किया जाए, इस पर भी काम किया जाए. जो समुदाय इस दिशा में त्वरित और अच्छा काम करके दिखाए, उसे जिला, राज्य, देश स्तर पर सम्मानित भी किया जाए. जिससे दूसरों को भी ऐसा करने के लिए प्रेरणा मिले.

CLTS के तहत जो भी बदलाव होगा वो टिकाऊ और दीर्घकालिक होगा. इसमें समुदाय खुद ही निगरानी समितियां बना सकता है. जो लोग बहुत समझाने पर भी नहीं मानते उन्हें फूल देना या माला पहनाने जैसे गांधीगीरी के रास्तों को भी अपनाया जा सकता है. खुले में शौच जाने वालों के नामों को नोटिस बोर्ड पर लिखना या लाउड स्पीकर पर उनके नामों का एलान करना. ये सभी अहिंसावादी तरीके हैं लेकिन इनमें नेमिंग एंड शेमिंग का भी पुट है. ये खुद समुदाय की ओर से ही किया जाता है और अंतिम निर्णय व्यक्ति पर ही छोड़ दिया जाता है.

मोदी सरकार ने 2 अक्टूबर, 2019 (महात्मा गांधी की 150वीं जयंती) तक देश को खुले में शौच से पूरी तरह मुक्त बनाने का लक्ष्य रखा हुआ है. कुछ राज्य ये डेडलाइन पाने के साथ ही ऐसे बाध्यकारी तरीके अपना रहे हैं जो CLTS की भावना के विपरीत हैं. जैसे कि हरियाणा सरकार ने हाल में घोषणा की है कि लोगों पर निगरानी रखने के लिए ड्रोन्स का इस्तेमाल किया जाएगा. मध्य प्रदेश में क़ानून के तहत घर में शौचालय नहीं होने पर पंचायत चुनाव लड़ने की अनुमति नहीं होगी. पड़ोसी राज्य छत्तीसगढ़ में एक सरपंच ने आदेश दिया कि जो लोग घर में शौचालय नहीं बनाएंगे वो सरकारी राशन की दुकानों से सामान लेने के हक़दार नहीं रहेंगे.

बिग ब्रदर जैसा बर्ताव जो कि अधिकतर सरकारी नीतियों और निर्देशों में झलकता है, दूसरे शब्दों में कहें तो सरकारी ज़ोर ज़बरदस्ती का उल्टा असर भी हो सकता है. सुरक्षित स्वच्छता के लाभ की ओर मुड़ने की जगह लोग इसके बैरी भी बन सकते है. ये स्थिति वाकई चिंताजनक होगी. ऐसे बैकलेश से बचना चाहिए क्योंकि हम जानते हैं कि स्वच्छ भारत अभियान अपने सबसे निर्णायक फेस में है. सत्तर के दशक में जबरन नसबंदी का लोगों में क्या प्रतिकूल असर हुआ था, किसी से छुपा नहीं है. समझदारी इसी में है कि समुदायों को आगे बढ़कर खुद ज़िम्मेदारी लेने दी जाए. ऐसा बदलाव पोलियो अभियान जैसे ही शत प्रतिशत अच्छे परिणाम लाएगा, भले ही इसमें वक्त कुछ ज़्यादा लगे.

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शुक्रवार, 22 सितंबर 2017

‘स्वच्छ भारत’ के लिए आवारा कुत्तों की गाड़ी में इनसान- पार्ट 2...खुशदीप

महात्मा गांधी की 150वीं जयंती, 2 अक्टूबर 2019 तक देश को खुले में शौच से पूरी तरह मुक्त बनाने का लक्ष्य रखा गया है. जैसे जैसे डेडलाइन निकट आ रही है, वैसे वैसे कुछ राज्यों में अधिकारी इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए किसी भी सूरत में जाने को तैयार हैं. पिछली Shitting Outside’ वाली पोस्ट के वादे के मुताबिक ऐसी ही कुछ घटनाओं का ज़िक्र कर रहा हूं. सब पिछले 3-4 महीने की हैं....
16 जून 2017, प्रतापगढ़, राजस्थान
शौच करती महिला की तस्वीर खींचने से रोका तो पीट-पीट कर मार डाला
भगवासा कच्ची बस्ती इलाके में प्रतापगढ़ नगर परिषद की टीम सुबह साढ़े छह बजे खुले में शौच करने वालों के ख़िलाफ़ अभियान के तहत पहुंची. शौच करती एक महिला की इस टीम ने फोटो खींची तो एक सामाजिक कार्यकर्ता मोहम्मद जफ़र ने इसका विरोध किया. आरोप है कि नगर परिषद टीम में शामिल लोगों ने 50 वर्षीय जफ़र की बुरी तरह पिटाई की, जिसकी वजह से उसकी मौत हो गई. जफ़र के रिश्तेदार की ओर से नगर परिषद के कर्मचारियों कमल, रितेश और मनीष के अलावा परिषद आयुक्त अशोक जैन के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कराई गई. पुलिस ने केस दर्ज कर लिया.
4 अगस्त 2017, अलिराजपुर, मध्य प्रदेश 

शराब की बोतलों पर स्टीकर में कुत्ता और इनसान  

मध्य प्रदेश के आदिवासी बहुल अलिराजपुर जिले में जिला प्रशासन ने आबकारी विभाग के साथ नया प्रयोग कर डाला. आबकारी विभाग ने खास स्टिकर छपवाए और ज़िले में सभी आधिकारिक ठेकों से बिकने वाली शराब की बोतलों पर चिपकवा दिया. इस स्टिकर में एक स्कैच भी दिया गया जिसमें एक तरफ कुत्ते को और एक तरफ इनसान को शौच करते दिखाया गया. साथ ही स्टिकर पर लिखा था- 'जानवर शौचालय का प्रयोग नहीं कर सकते... लेकिन आप तो कर सकते हैं न... क्या आपने अपना शौचालय बनवाया?' 


एक ग्राहक ने इस तरह के स्टीकर को सरासर गलत बताया. उसने कहा कि स्टिकर में संदेश देना तो ठीक था लेकिन ऐसी तस्वीर देने की क्या जरूरत थी. जिला प्रशासन और आबकारी विभाग ने इस प्रयोग को सही करार देते हुए कहा कि अलिराजपुर आदिवासी बहुल जिला है इसलिए यहां जनजागृति की अधिक आवश्यकता है.

13 सितंबर 2017, अशोक नगर, मध्य प्रदेश
घर में टॉयलेट का इस्तेमाल नहीं किया, दो शिक्षक निलंबित 
अशोक नगर जिले में दो शिक्षकों को खुले में शौच ना जाने संबंधी शासन के आदेश की अवहेलना के आरोप में निलंबित कर दिया गया. इनमें एक सहायक अध्यापक महेंद्र सिंह यादव अपने गांव सिलपटी में खुद खुले में शौच करने जा रहे थे. वहीं गांव रांवसर में तैनात सहायक अध्यापक प्रकाश प्रजापति को इसलिए निलंबित कर दिया गया कि उनकी पत्नी घर में शौचालय होने के बावजूद खुले में शौच करने गई थी. जिला शिक्षा अधिकारी आदित्य नारायण मिश्रा ने दोनों शिक्षकों के आचरण को कदाचरण की श्रेणी में माना.
14 सितंबर 2017, बिलासपुर, छत्तीसगढ़
आवारा कुत्ते पकड़ने वाली गाड़ी में इनसानों को कैद कर शहर में घुमाया
बिलासपुर नगर निगम की टीम खुले में शौच करने वालों के ख़िलाफ़ अभियान के तहत सुबह निकलती है. दर्जन भर लोग उसकी पकड़ में आते हैं. इन सब को आवारा कुत्ते और अन्य पशु पकड़ने वाली गाड़ी में भर दिया जाता है. फिर उन्हें शहर भर में घुमाया जाता है. खुले जंगले वाली गाड़ी में पशुओं की जगह इनसानों को कैद जिसने भी देखा वो हैरान रह गया. 

एक घंटे तक ऐसे ही घुमाने के बाद उन्हें छोड़ा गया. साथ ही उनसे नारे भी लगवाए गए- खुले में शौच नहीं करेंगे, दूसरों को भी मना करेंगे. इस तरह की कार्रवाई पर आपत्ति जताते हुए सामाजिक कार्यकर्ता सलीम काजी ने निगम आयुक्त को चिट्ठी लिखी. सलीम काजी ने कहा कि ये अमानवीय कार्रवाई सीधे सीधे संविधान के अनुच्छेद 21 में लोगों को मिले बुनियादी अधिकारों का उल्लंघन है. ये अनुच्छेद लोगों को जीवन या व्यक्तिगत स्वतंत्रता में राज्य के अतिक्रमण से बचाने की गारंटी देता है.  

19 सितंबर 2017, बैतूल, मध्य प्रदेश

घर में टॉयलेट ना बनवाने पर प्रति सदस्य 7,500 रुपए हर महीने जुर्माना 

बैतूल जिले के रंभा खेड़ी गांव में घरों में शौचालय नहीं बनवाने पर घर के प्रत्येक सदस्य पर 75,00 रुपए प्रति महीना के हिसाब से जुर्माना लगाया गया है. 57 परिवारों पर ये जुर्माना लगा है. इनमें कुंवर लाल का परिवार भी शामिल है. कुंवर लाल के घर में 10 सदस्य हैं इसलिए उनके परिवार पर हर महीने जुर्माने की राशि 75,000 रुपए बैठती है. ये जुर्माने का फ़रमान रंबा खेड़ी गांव की पंचायत की मुखिया राम रती बाई ने सुनाया है. इन परिवारों को जारी नोटिस में कहा गया है कि जुर्माने की राशि नहीं भरी तो क़ानूनी कार्रवाई की जाएगी. राम रती बाई के मुताबिक घर में शौचालय बनाने के लिए सरकार की ओर से सहायता राशि मिलने के बावजूद इन लोगों ने शौचालय नहीं बनवाया. कई बार आगाह करने के बावजूद उन्होंने नहीं सुनी तो जुर्माना लगाना पड़ा. 57 परिवारों में से कुछ ने और मोहलत देने की मांग की है, वहीं कुछ का कहना है कि उनके पास पैसे नहीं हैं जो शौचालय का निर्माण करवा सकें.   


ये सब घटनाएं आपने पढ़ लीं. अब ये जान लेना भी ज़रूरी है कि देश की करीब आधी आबादी अब भी सुरक्षित सेनिटेशन सुविधाओं से वंचित है. इन सभी को खुले में शौच करने से रोकने के लिए मनाने की चुनौती बहुत बड़ी है. ये काम सख्ती से नहीं उन्हें दिल से तैयार करने से ही हो सकता है. इसके लिए क्या क्या किया जा सकता है, अगली पोस्ट में पढ़िएगा. फिलहाल सख्ती का क्या उलटा असर हो सकता है, वो इस बुज़ुर्ग की बानगी इस वीडियो में देखिए... 
 क्रमश:
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‘खुले में शौच’ बनाम ‘Shitting Outside’- पार्ट 1...खुशदीप


खुले में शौच लिखना-पढ़ना आंखों को बड़ा खटकता है.खास तौर पर हम शहरों, वो भी मेट्रो में रहने वाले लोगों के लिए. हां, अगर इसके लिए ‘Shitting Outside’ का इस्तेमाल किया जाए तो ये सम्मानजनक भी हो जाएगा और स्वीकार्य भी. अब क्या करें अंग्रेज़ी की महत्ता ही कुछ ऐसी है. हिंदी और अंग्रेज़ी के इन दो जुमलों में जितना फ़र्क है वैसा ही कुछ कुछ इस वक्त भारत में स्वच्छता के मिशन को लेकर हो रहा है. कहा जा रहा है कि गांधी ने अंग्रेज़ों से आजादी के लिए सत्याग्रह का रास्ता अपनाया था, वहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अब देश को गंदगी से आज़ादी दिलाने के लिए स्वच्छताग्रहका नारा दे रहे हैं.
मोदी ने महात्मा गांधी की 150वीं जयंती (2 अक्टूबर 2019) तक भारत को ODF (Open Defecation Free)  यानि खुले में शौच से मुक्तबनाने का लक्ष्य रखा है. क्योंकि डेडलाइन में अब दो साल का ही वक्त बचा है, इसलिए अब देश के कुछ राज्यों में किसी भी सूरत में इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए साम-दाम-दंड-भेदसभी तरीके अपनाए जा रहे हैं. विषय बड़ा खुश्क है, लेकिन देश के हर नागरिक की तवज्जो चाहता है.
पहले थोड़े से आंकड़ों की बात कर ली जाए. वित्त मंत्री अरुण जेटली ने 21 सितंबर 2017 को अपने ब्लॉग में लिखा है कि 2014 में देश के महज़ 39 फीसदी लोगों तक ही सुरक्षित सेनिटेशन के साधन उपलब्ध थे. जेटली के दावे के मुताबिक बीते 3 साल में 68 फीसदी लोग सुरक्षित सेनिटेशन के साधन वाले हो गए हैं. अगर इस दावे पर यकीन किया जाए तो वाकई ये चमत्कारिक कार्य हुआ है. इसका अर्थ यही निकलेगा कि अब देश में सिर्फ 30 करोड़ लोग ही ऐसे बचे हैं जिनके घर में टॉयलेट की सुविधा नहीं है. हालांकि अंतरराष्ट्रीय स्वास्थ्य एजेंसियों के मुताबिक देश में अब भी 56 करोड़ लोग हैं जो खुले में शौच जाते हैं. आंकड़ों पर मतभेद हो सकते हैं. लेकिन तब भी करोड़ों की संख्या वाले इन लोगों को ऐसी किसी बात के लिए कैसे चुटकियों में मनाया जा सकता है जो उनके पुरखे सदियों से करते आए हैं. ये सिर्फ़ इन्फ्रास्ट्रक्चर से जुड़ी समस्या नहीं है जिसके लिए मोटा बजट रख कर निपटा जा सके. ये समस्या व्यवहार से जुड़ी है. इसके सामाजिक निहितार्थ है जो करोड़ों लोगों की जीवनशैली से जुड़े हैं जो पीढ़ी दर पीढ़ी उन्हें विरासत में मिली है.
इंदिरा गांधी ने कभी कहा था कि उनके पास जादू की छड़ी नहीं है जो वो घुमाएं और देश से महंगाई दूर हो जाए. यही बात स्वच्छता के इस मिशन के लिए भी कही जा सकती है कि कोई जादू की छड़ी घुमाई जाए और पूरा देश स्वच्छ हो जाए. ये समस्या लोगों के व्यवहार से जुड़ी है, इसलिए उन्हें प्यार से ही इसके लिए समझाया जा सकता है. डंडे के ज़ोर पर नहीं. डंडा चलाने का नतीजा क्या होता है ये देश सत्तर के दशक में संजय गांधी की ओर से शुरू किए जबरन परिवार नियोजन (नसबंदी) के दौरान देख चुका है. इसी संदर्भ में दूसरा सकारात्मक उदाहरण भी है. वो है देश में पोलियो अभियान की कामयाबी का. विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के निर्देशन में ये अभियान चलाया गया. बेशक इसमें लंबा वक्त लगा लेकिन अंतत: वो वांछित परिणाम मिल गए जिनके लिए ये शुरू किया गया था.
ये दो उदाहरण हमारे सामने हैं. अब स्वच्छता मिशन को लेकर भी ये हमारे लिए सीख और प्रेरणा दोनों हो सकते हैं. रास्ता हमें चुनना है. शार्ट कट ये है कि हमने एक तारीख तय कर दी है और उस दिन तक हर हाल में भारत को खुले में शौच से मुक्त कराना है. अब भले ही इसके लिए कुछ भी किया जाए. इस दिशा में आगे बढ़ने से पहले ये सोचना भी ज़रूरी है कि हमारे देश में साक्षरता दर कितनी है. हम शहर में रहने वाले जिस तरह स्वच्छता को लेकर भाषण पिला सकते हैं, लच्छेदार बातें कर सकते हैं, उसी मापदंड से देश के ग्रामीण अंचलों में रहने वाली बड़ी आबादी को नहीं हांक सकते. चुनौती बड़ी है, इसके लिए मेहनत भी बड़ी करनी होगी. लेकिन जो भी होगा वो प्यार से समझाने-बुझाने से ही होगा. अब भले ही इसमें लंबा वक्त लगे.
ये विषय गहन है, इसलिए इसे एक पोस्ट में नहीं समेटा जा सकता. इस पर रिसर्च के साथ सिलसिलेवार लिखने की कोशिश करूंगा. इस पोस्ट में इतना ही, अगली कड़ी में ज़िक्र करूंगा कि देश के कुछ हिस्सों में लोगों को खुले में शौच से रोकने के लिए किस-किस तरह के तरीके अपनाए जा रहे हैं.
क्रमश:

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शनिवार, 16 सितंबर 2017

पेट्रोल के दाम कैसे तय होते हैं जान कर दंग रह जाएंगे आप (पार्ट 2)...खुशदीप


पेट्रोल प्राइजिंग का खेल किस तरह आपकी, मेरी, हम सबकी जेब जला रहा है, इस पर कल की पोस्ट को ही आगे बढ़ा रहा हूं. पहले आप ये जान लीजिए कि हमारे देश में कच्चा तेल ही आयात किया जाता है. बाकी कच्चे तेल को रिफाइन करने से लेकर विभिन्न पेट्रोलियम उत्पादों (पेट्रोल, डीजल, एलपीजी, केरोसिन आदि) में तब्दील करने का सारा काम देश में ही होता है. इसलिए किसी भी रिफाइन्ड पेट्रोलियम प्रॉडक्ट को विदेश से आयात नहीं किया जाता. लेकिन देश की ऑयल कंपनियां उनकी प्राइजिंग ऐसे ही तय करती हैं जैसे कि उन्हें काल्पनिक तौर पर विदेश से मंगाया जा रहा हो.



इसे ऐसे समझिए कि कोका-कोला दुनिया में सभी जगह बिकता है. इसके लिए तमाम देशों में कोका कोला उत्पादन के प्लांट भी लगे हुए हैं. रॉ मैटेरियल की स्थानीय कीमतें, लेबर चार्जेस के हिसाब से कोका कोला की रिटेल प्राइज विभिन्न देशों में अलग अलग होती हैं. जैसे कि कोका कोला की जो पैट बॉटल भारत में 35 रुपए की है वही लंदन में 110 रुपए की है. अब मान लीजिए कोका कोला की इसी बॉटल को लंदन से इम्पोर्ट कर भारत में लाया जाए तो इसकी कीमत बीमा, शिपिंग चार्ज, फ्रेट रेट, कस्टम ड्यूटी आदि लगाकर उपभोक्ता तक पहुंचते पहुंचते लगभग डेढ़ गुनी यानि 150 रुपए की हो जाएगी.       

भारत की ऑयल कंपनियां (रिफाइनरी) इसी फंडे यानि इम्पोर्ट पैरिटी प्राइजिंग से अपने उत्पादों की कीमतें तय करती हैं. यानि काल्पनिक तौर पर माना जाता है कि अगर किसी रिफाइन्ड  प्रॉडक्ट (जैसे कि रेडिमेड पेट्रोल) को विदेश से मंगाया जाता तो उस पर क्या क्या खर्च बैठता. अब इसे ऐसे समझिए कि रिफाइन्ड पेट्रोल सब देश में ही बन रहा है लेकिन उसकी रिफाइनरी कीमत ऐसे तय कर रही है जैसे कि विदेश से मंगा रही हो. ये सब कुछ प्राइजिंग में जोड़ा जा रहा है कि पहले इंटरनेशनल पोर्ट तक प्रोडक्ट को लाने और फिर उसे जहाज से भारत लाने में कितना काल्पनिक खर्च आएगा. फिर उसमें इंश्योरेंस, कस्टम ड्यूटी कितनी लगेगी. 

2010 में एक संसदीय समिति को सरकार की ओर से बताया गया था कि एक बैरल क्रूड (कच्चे तेल) को रिफाइन करने पर रिफाइनरी को दो डॉलर खर्च आता है. साथ ही रिफाइनरी की जो भी लागत आती है उसमें से 80 फीसदी क्रूड मंगाने पर ही खर्च होता है और बाकी 20 फीसदी अन्य चीजों पर. इसका सीधा मतलब है कि क्रूड की अंतराष्ट्रीय कीमतों के चढ़ने-गिरने का रिफाइनरी के खर्च पर 80  फीसदी प्रभाव पड़ना चाहिए.  

एक सरकारी कमेटी ने ऑयल कंपनियों की ओर से कीमतें तय करने के लिए एक फॉर्मूला तय कर रखा है. उसके हिसाब से अगर डॉलर 64 रुपए में मिल रहा है और कच्चे तेल की प्रति बैरल कीमत 30 डॉलर है तो पेट्रोल रिफाइनरी को पेट्रोल के प्रति लीटर दाम मिलने चाहिए 13.44 रुपए. अगर कच्चे तेल की प्रति बैरल कीमत 50 डॉलर है तो रिफाइनरी प्रति लीटर 22.33 वसूल कर सकती है. 13 सितंबर के रेट के हिसाब से कच्चे तेल का रेट प्रति बैरल 52.36 डॉलर था तो रिफाइनरी को एक लीटर तेल के अधिकतम 23.35 रुपए मिलने चाहिए थे. लेकिन वो वसूल रही है 26.65 रुपए. यानि 3.30 रुपए अधिक कीमत रिफाइनरी की ओर से वसूली जा रही है.     

रिफाइनरी की आर्थिक सेहत को इस तरह भी समझिए. इंडियन ऑयल कंपनी का 2016 की तुलना में 2017 में खर्च 3 फीसदी घट गया है, वहीं मुनाफे में 58 फीसदी की बढोतरी हुई है. इंडियन ऑयल ने 2016-17 में कुल 17,242 करोड़ रुपए मुनाफा कमाया है. सरकार को ऑयल कंपनियों से डिविडेंट मिलता है. बीते साल सरकार को इन कंपनियों से 8 से 10 हजार करोड़ डिविडेंट के मिले. इस साल जनवरी में सरकार ने ऑयल कंपनियों को साफ किया है कि उसे एक साल में 16 हजार करोड़ डिविडेंट के तौर पर मिलने चाहिए.

अब तक आप समझ ही होंगे कि तेल के इस खेल में किसकी चांदी हो रही है. अब इसके अलावा भी देखिए कि ऑयल पीएसयू के पैसे का इस्तेमाल किस तरह होता है. इस साल 27 मई से 18 जून के बीच मोदी सरकार के 3 साल पूरे होने पर 543 जिलो में सबका साथ, सबका विकास सम्मेलनों का आयोजन किया गयाटाइम्स ऑफ इंडिया में इस साल 30 मई को प्रकाशित रिपोर्ट के मुताबिक इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन, ओएनजीसी, हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉरपोरेशन आदि ऑयल पीएसयू को 223 कार्यक्रमों की जिम्मेदारी दी गई. 20 जून 2017 को इंडियन एक्सप्रेस में छपी रिपोर्ट के अनुसार ऐसे एक एक कार्यक्रम पर 50-50 लाख रुपए तक खर्च किए गए. 

6 जून 2017 को इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के मुताबिक सरकार ने ऑयल एंड गैस पीएसयू से गुजरात के साधु बेट में बन रही स्टैच्यू ऑफ यूनिटी प्रोजेक्ट के लिए 200 करोड़ रुपए देने के लिए कहा. यहां सरदार सरोवर बांध के पास सरदार पटेल की 182 मीटर ऊंची प्रतिमा लगाई जानी है. ऑयल एंड नेचुरल गैस कमीशन (ONGC)  और इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन से 50-50 करोड़ देने के लिए कहा गया. वहीं ऑयल इंडिया लिमिटेड, गेल इंडिया लिमिटेड, भारत पेट्रोलियम, हिन्दुस्तान पेट्रोलियम के जिम्मे 25-25 करोड़ रुपए आए. इन्हें कॉरपोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी (सीएसआर) के तहत ये रकम देने के लिए कहा गया.    

स्लॉग ओवर

पेट्रोल पर काफ़ी भारी भरकम आपने पढ़ लिया...पेट्रोल के दामों की चिंता से मुक्त होना है तो मक्खन वाला नुस्ख़ा अपनाइए जो उसने मुझे बताया...उसने कहा...

ओ बाओजी लोकि एवें ई पेट्रोल दियां कीमतां वधन ते शोर पाउंदे रहदें ने...साणूं वेखो साणूं कोई फ़र्क नहीं पैंदा...आपां पहलां वी विक्की विच 100 रुपए दा पेट्रोल पवांदे सी, हुणे वी 100 दा ई पवांदे वां...दसो साडि जेब तो एक्स्ट्रा की गया...नहीं नहीं दसो...


(अरे बाऊजी लोग ऐसे ही पेट्रोल की कीमतें बढ़ने पर शोर मचाते है...हमें देखो, हमें कोई फ़र्क नहीं पड़ता...मैं पहले भी विक्की में 100 रुपए का पेट्रोल डलवाता था, अब भी 100 रुपए का ही डलवाता हं...वताओ मेरी जेब से एक्स्ट्रा क्या गया...नहीं नहीं बताओ...)

जानिए पेट्रोल का सारा खेल चुटकियों में (पार्ट 1)...खुशदीप





2009 में शाहिद कपूर की एक फिल्म आई थी कमीने...उसी फिल्म के एक गाने के बोल थे-

आजा आजा दिल निचोड़े,
रात की मटकी फोड़े,
कोई गुडलक निकाले,
आज गुल्लक तो फोड़े,
है दिल दिलदारा मेरा तेली का तेल,  
कौड़ी कौड़ी पैसा पैसा पैसे का खेल,
चल चल सड़कों पे होगी ठैन ठैन
डैन टड़ैन...डैन टड़ैन...डैन टड़ैन...


ऐसा ही तेली का तेल, कौड़ी कौड़ी पैसे का खेल’  देश में ऑयल कंपनियों और सरकार की ओर से खेला जा रहा है. इसी खेल से हमारी-आपकी जेब में आग लगी हुई है. पेट्रोल और डीजल की कीमतें 2014 के बाद सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच गई हैं. आज यानि 15 सितंबर को मुंबई में उपभोक्ता को पेट्रोल के दाम 79.54 रुपए प्रति लीटर चुकाने पड़ रहे हैं. 

चार मेट्रो शहरों में पेट्रोल के दाम प्रति लीटर (15 सितंबर 2017)
मुंबई- 79.54 रुपए
दिल्ली- 70.43 रुपए
कोलकाता- 73.17 रुपए
चेन्नई- 73.01 रुपए

 आखिर क्यों पेट्रोल के दाम पिछले 3 साल में सबसे ऊंचे स्तर पर हैंऐसा क्या हो गया है जो कच्चे तेल (क्रूड) के अंतरराष्ट्रीय दाम गिरने के बावजूद भारत में पेट्रोलियम उत्पादों के दाम बढ़ते जा रहे हैं. तेल के खेल की बारीकियों को आसान भाषा में समझना बहुत ज़रूरी है. क्योंकि ये मसला हम और आप सभी से जुड़ा है...

चलिए सबसे पहली बात, जब 2014 में मोदी सरकार ने केंद्र में सत्ता संभाली थी तो उस वक्त कच्चे तेल के अंतरराष्ट्रीय दाम 108 डॉलर प्रति बैरल थे. वहीं आज की तारीख में कच्चे तेल के अंतरराष्ट्रीय दाम 53 डॉलर प्रति बैरल हैं. यानि कच्चे तेल के अंतरराष्ट्रीय दामों में इस दौरान 53 फीसदी की कमी आई है. फिर इसका फायदा हम और आप जैसे उपभोक्ताओं को क्यों नहीं मिला? क्यों मुंबई में पेट्रोल 80 रुपए छू रहा है. कच्चे तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमतों से देश में पेट्रोल उत्पादों की कीमत को जोड़कर देखना बड़ा जेनेरिक सा है. इसकी पेचीदगियों को समझना ज़रूरी है.

आपने देखा होगा कि जब कच्चे तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमतों का हवाला दिया जाता है या पड़ोस देशों में भारत की तुलना में पेट्रोल-डीजल के कम दामों की बात कही जाती है, तो सत्ता पक्ष की ओर से तर्क दिए जाते हैं कि पेट्रोल कंपनियां घाटे में हैं, सब्सिडी घटाई जानी चाहिए या खत्म की जानी चाहिए. पेट्रोल उत्पादों के दामों की डि-कंट्रोलिंग की वकालत भी ऐसे ही तर्कों का नतीजा है. 
   
चलिए अब सीधे देश में चल रहे तेल के खेल पर आते हैं-

जैसा कि आप सभी जानते हैं कि कच्चा तेल यानि ब्लैक गोल्ड अरब देशों में सबसे ज़्यादा होता है. रूस में भी इसकी प्रचुरता है. इसके साथ ही अमेरिका में शेल तेल (कच्चे तेल का विकल्प) खूब निकलने लगा है. यही वजह है कि कच्चे तेल की मांग गिरने की वजह से सऊदी अरब जैसे तेल निर्यातक देशों का बाजा बजा हुआ है. कच्चे तेल के दाम गिरने की वजह से अरब देशों की अर्थव्यवस्था ही हिली हुई है. 

भारत अरब देशों से कच्चे तेल का आयात करता है तो ये वहां से समुद्र के रास्ते जहाजों से हमारे बंदरगाहों तक पहुंचता है. वहां से ये सीधे तेल कंपनियों की रिफाइनरी में पहुंचता है. वहां से रिफाइन होकर पेट्रोल, डीजल ऑयल टैंकरों के जरिए पेट्रोल पंपों तक पहुंचता है. वहां से हमारी गाड़ियों में.

यहां 13 सितंबर को देश में पेट्रोल-डीजल के जो दाम थे, उसको लेकर एक आसान हिसाब जानिए. उस दिन रिफाइनरी से एक लीटर पेट्रोल खरीदने का दाम 26.65 रुपए था. इस पर रिफाइनरी यानि ऑयल कंपनी का मार्केटिंग मार्जिन और पेट्रोल पंप पर पहुंचाने का खर्च 4.05 और जोड़िए. फिर इस पर सेट्रल टैक्स लगाइए 21.48 रुपए. यानि डीलर (पेट्रोल पंप मालिक) को एक लीटर पेट्रोल 52.48 रुपए का पड़ा. यही पेट्रोल डीलर ने आप-हम जैसे उपभोक्ताओं को दिल्ली में 70.38 रुपए प्रति लीटर बेचा. ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि उसने अपनी कमीशन 3.24 रुपए प्रति लीटर के साथ 14.96 रुपए लोकल टैक्स (वैट) और सेस के भी जोड़े.

13 सितंबर 2017 दिल्ली के रेट 
रिफाइनरी से पेट्रोल खरीदने के दाम-           26.65 रु लीटर
मार्केटिंग मार्जिन, पेट्रोल पंप तक पहुंचाने का खर्च-   04.05  रु लीटर
सेंट्रल टैक्स (एक्साइज ड्यूटी आदि)-                         21.48  रु लीटर
                                                                           -------------------------
पेट्रोल डीलर को पेट्रोल की कीमत                            52.48 रु लीटर

डीलर का मुनाफ़ा-                                                  03.24  रु लीटर
लोकल टैक्स (वैट) और सेस                                     14.96 रु लीटर
                                                                            ----------------------------
दिल्ली में उपभोक्ता को खर्च करने पड़े                     70.38 रु लीटर


इसे दूसरी तरह भी समझिए. पेट्रोल के वास्तविक दाम कितने थे और उस पर टैक्स कितना लगा. रिफाइनरी, डीलर का मुनाफा, ट्रांसपोर्टेशन का सब खर्च मिलाकर एक लीटर पेट्रोल सिर्फ 33.94 (26.05+4.05+3.24)  रुपए का ही था लेकिन दिल्ली में इस पर सेंट्रल और लोकल टैक्स लग गया 36.44 (21.48+14.96) रुपए. यानि टैक्स पेट्रोल की कीमत से भी ज्यादा हो गया. दिल्ली में उपभोक्ता पर ये टैक्स का बोझ 107 %  बैठा.

दिल्ली में 13 सितंबर को पेट्रोल 70.38 रुपए प्रति लीटर बिक रहा था तो उसी दिन मुंबई में पेट्रोल 79.48 रुपए प्रति लीटर बिक रहा था. यानि मुंबई के उपभोक्ताओं को टैक्स का बोझ और ज्यादा उठाना पड़ रहा है. ये इसलिए है क्योंकि वहां लोकल टैक्स के रेट ज्यादा होने के साथ सूखे के लिए सेस (उपकर) भी उपभोक्ताओं से वसूला जाता है.        

ऐसे भी कहा जा सकता है कि एक लीटर पेट्रोल की जो वास्तविक कीमत है, उससे कहीं ज़्यादा पैसा टैक्स के तौर पर सरकारों (केंद्र और राज्य) के पास जा रहा है. सीधी सी बात है कि केंद्र और राज्य सरकारों की ओर से एक्साइज ड्यूटी और अन्य टैक्सों को कम कर दिया जाता है तो हमें पेट्रोल-डीजल भी सस्ता मिलने लगा. सिर्फ पेट्रोल-डीजल ही नहीं, कच्चे तेल से बनने वाले अन्य उत्पाद भी- जैसे कि पेट्रोलियम व्हाइट जेली (पैराफिन वैक्स), टॉर (कोलतार) एविएशन फ्यूल, एलपीजी, केरोसिन, नैफ्था, पैट बॉटल्स, खास किस्म के टायर (आर्टिफिशियल रबर से बनने वाले जो कि पेट्रो प्राडक्ट है) आदि.


पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतें कम करने की बात आती है तो केंद्र की ओर से तर्क दिए जाते हैं कि राज्य सरकारों को लोकल टैक्स कम करने चाहिएं. जब केंद्र से ये पूछा जाता है कि वो अपने हिस्से की ड्यूटी कम क्यों नहीं करती, तो इस पर पेट्रोलियम मंत्रालय का जवाब है कि ये ड्यूटी तय करना उसका नहीं वित्त मंत्रालय का काम होता है. केंद्र की ओर से ये तर्क भी दिया जाता है कि पेट्रोल पर सेंट्रल टैक्स के तौर पर जो पैसा आता है वो विकास कार्यों पर खर्च होता है. केंद्र के मुताबिक एक्साइज ड्यूटी का 42 फीसदी हिस्सा तो राज्यों को ही भेज दिया जाता है.
 
पेट्रोलियम मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का कहना है कि देश भर में हर जगह पेट्रोल-डीजल समान कीमत पर मिले इसके लिए ज़रूरी है कि लोकल टैक्सों को हटाकर इसे जीएसटी व्यवस्था में लाया जाए. इसके लिए राज्य सरकारों को तैयार होना होगा. अब राज्य सरकारों के राजस्व का मोटा हिस्सा पेट्रोलियम उत्पादों पर टैक्स से ही आता है. जहां तक जीएसटी की बात है तो उसकी अधिकतम दर देश में 28 फीसदी ही है. लेकिन पेट्रोलियम उत्पादों पर उससे कहीं ज्यादा टैक्स फिलहाल वसूले जा रहे हैं. ऐसे में हकीकत तो यही है कि ना तो केंद्र और ना ही राज्य सरकारें पेट्रोलियम उत्पादों से अपने राजस्व में कमी नहीं आने देना चाहतीं.

हैरानी की बात है कि नेपाल, श्रीलंका जैसे देशों में जहां भारत से पेट्रोलियम उत्पाद भेजे जाते हैं वहां भी पेट्रोल की कीमतें भारत से कम है. इन दो देशों में क्या सभी पड़ोसी देशों में पेट्रोल के दाम भारत से कम हैं-

पाकिस्तान -  43.58 रुपए
श्रीलंका-   53.84
नेपाल- 61.53
भूटान- 62.17
चीन- 64.74
बांग्लादेश- 69.21 रुपए

अगर दुनिया की बात की जाए तो सबसे सस्ता पेट्रोल वेनेजुएला में 64 पैसे प्रति लीटर मिलता है. और सबसे महंगा नॉर्वे में 130 रुपए प्रति लीटर.


तेल के इस खेल में अभी आपके लिए सबसे ज़्यादा चौंकाने वाला हिस्सा आना बाकी है. किस तरह ऑयल कंपनियों को पेट्रोलियम उत्पादों के मनमाने दाम तय करके मोटा मुनाफा कूटने का मौका दिया जा रहा है. और किस तरह फिर सरकार उनसे डिविडेंट लेकर अपना खजाना भर रही है. यही नहीं ऑयल कंपनियों (पीएसयू) को सरकार के कहने पर किन-किन कामों के लिए पैसे लगाने पड़ रहे हैं वो जानना भी आपको हैरान करेगा. वो सब अगली कड़ी में...

क्रमश:

#हिन्दी_ब्लॉगिंग

गुरुवार, 14 सितंबर 2017

बुलेट ट्रेन तो ठीक अहमदाबाद-गांधीनगर मेट्रो पर भी कुछ बता दो...खुशदीप

बुलेट ट्रेन का बड़ा हल्ला है...सरकार कह रही है कि अहमदाबाद और मुंबई के बीच 2022 से बुलेट ट्रेन दौड़ने लगेगी...आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जापान के प्रधानमंत्री शिंजो आबे के साथ इस प्रोजेक्ट की आधारशिला रखेंगे...



जापान इस प्रोजेक्ट में साथ दे रहा है तो उम्मीद है कि टाइम से पूरा हो ही जाएगा...वैसे इसी बुलेट की चकाचौंध में मुझे कोई बताएगा कि वर्ष 2010 में शुरू किए गए ये दो प्रोजेक्ट फिलहाल किस स्टेज तक पहुंचे हैं- 

1. MEGA - मेट्रो एक्सप्रेस लाइन फॉर गांधीनगर एंड अहमदाबाद

2. स्टैच्यू ऑफ यूनिटी (सरदार सरोवर के पास साधु बेट में लगाई जाने वाली सरदार पटेल की प्रतिमा)

जहां तक MEGA यानि अहमदाबाद-गांधीनगर मेट्रो की बात है तो इन दो शहरों की दूरी महज़ 26.5 किलोमीटर है...2010 में ये परियोजना मंज़ूर होने के बावजूद साकार रूप लेने में इतना वक्त क्यों ले रही है...

अब आते हैं स्टैच्यू ऑफ यूनिटी पर...2014 लोकसभा चुनाव से पहले 2013 में इस परियोजना का बड़ा प्रचार-प्रसार किया गया था...टीवी पर तब इसके विज्ञापन भी खूब आए थे...

विश्व के सबसे ऊंचे स्मारक में स्थापित होने वाले इस प्रोजेक्ट के लिए सरदार पटेल के जन्मदिन वाले दिन 31 अक्टूबर 2013 को शिलान्यास हुआ था. तब कहा गया था कि 600 फुट ऊंची इस प्रतिमा के लिए देश भर में घर घऱ से लोहा इकट्ठा किया जाएगा...लोहा इकट्ठा किया भी गया...लेकिन बाद में साफ़ किया गया कि इस लोहे का इस्तेमाल सरदार पटेल की प्रतिमा के लिए नहीं बल्कि प्रोजेक्ट से जुड़े दूसरे काम में किया जाएगा...अब सुना है कि इस मूर्ति का निर्माण चीन में कराया जा रहा है....

इसी मुद्दे पर इस साल फरवरी में विपक्षी नेता शंकर सिंह वाघेला (अब कांग्रेस छोड़ चुके) ने गुजरात विधानसभा में निशाना साधा था कि सरकार की ओर से हर बात पर मेक इन इंडियाकी दुहाई दी जाती है फिर सरदार पटेल की मूर्ति को चीन से क्यों बनवाया जा रहा है...इस प्रोजेक्ट का ठेका लार्सन एंड टुब्रो कंपनी के पास है...ये कंपनी ही मूर्ति को चीन से बनवा रही है...

 स्लॉग ओवर

बुलेट ट्रेन भारत की पटरियों पर जब दौड़ेगी सो दौड़ेगी, अभी तो सड़क पर दौड़ने वाली इस बुलेट ट्रेन से काम चलाइए...


मंगलवार, 12 सितंबर 2017

धर्म की वजह से रोहिंग्या पर निर्वासन की तलवार?...खुशदीप

रोहिंग्या शरणार्थियों पर भारत सरकार की बोली बाक़ी दुनिया से अलग क्योंइस मुद्दे पर आने से पहले से बता दूं कि रोहिंग्या पर पहले दो पोस्ट विस्तार से लिख चुका हूं. जिन्होंने उन पोस्ट को नहीं पढ़ा, उनकी सुविधा के लिए लिंक ये हैं-.


अब इसी संदर्भ में विस्तार ये है कि आज यानि 11 सितंबर को इस मसले पर सुप्रीम कोर्ट में होने वाली सुनवाई 15 सितंबर तक के लिए स्थगित हो गई है. दरअसल, भारत के गृह मंत्रालय की ओर कुछ समय पहले राज्य सरकारों और केंद्र शासित प्रदेशों को निर्देश जारी किए गए हैं कि वे टास्क फोर्स बना कर भारत में रह रहे अवैध रोहिंग्या प्रवासियों की पहचान करे जिससे कि उन्हें डिपोर्ट कर वापस म्यांमार भेजा जा सके. गृह मंत्रालय के ऐेसे निर्देशों के ख़िलाफ़ दो रोहिंग्या मुसलमान शरणार्थियों ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है. वहीं चेन्नई के एक संगठन इंडिक कलेक्टिव और बीजेपी के पूर्व विचारक के एन गोविंदाचार्य ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर रोहिंग्या मुसलमानों की भारत में मौजूदगी को आंतरिक सुरक्षा के लिए खतरा बताया है, साथ ही इन्हें देश से निकालने की मांग की है. बता दें कि रोहिंग्या प्रवासियों में तकरीबन तकरीबन सारे मुसलमान हैं.     

संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार प्रमुख ने की भारत सरकार के रुख की निंदा

भारत सरकार के रुख, सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई से पहले सोमवार के एक और घटनाक्रम से आपको अवगत करा दूं. संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार प्रमुख जाएद राद अल हुसैन ने रोहिंग्या शरणार्थियों को लेकर भारत सरकार के रुख की निंदा की है. हुसैन ने एक बयान मे कहा कि वे भारत में रोहिंग्या शरणार्थियों को निकालने के लिए उठाए जा रहे मौजूदा कदमों की निंदा करते हैं, वो भी ऐसे समय जब उन्हें अपने देश में भीषण हिंसा का सामना करना पड़ रहा है.

रोहिंग्या को समुद्र में फेंकने या शूट करने नहीं जा रहे : रिजिजू

दरअसल, 5 सिंतबर को केंद्रीय गृह राज्य मंत्री किरन रिजिजू ने ऐसे टास्क फोर्स बनाने की बात कही थी जो भारत में रोहिंग्या शरणार्थियों की पहचान करेगा जिससे कि उन्हें डिपोर्ट (निर्वासित) किया जा सके. रिजिजू ने रोहिंग्या को अवैध प्रवासी बताते हुए कहा कि इनको कानून के अनुसार डिपोर्ट किए जाने की ज़रूरत है. रिजिजू के मुताबिक किसी को भारत को ये लेक्चर नहीं देना चाहिए कि वो शरणार्थियों से किस तरह पेश आए. रिजिजू ने कहा कि भारत की महान लोकतांत्रिक परंपरा है और सरकार उन्हें समुद्र में फेंकने या शूट करने नहीं जा रही है.

सुप्रीम कोर्ट में दो रोहिंग्या शरणार्थियों की याचिका

गृह मंत्रालय के मुताबिक भारत में 40,000 रोहिंग्या रह रहे हैं. सबसे ज्यादा जम्मू, सांबा में करीब 10,000 हैं. इसके अलावा हैदराबाद, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, दिल्ली-एनसीआर और राजस्थान में भी रोहिंग्या प्रवासी रह रहे हैं. 

जम्मू में रोहिंग्या के कैंप का एक दृश्य :  फोटो साभार निशा मसीह/HT

भारत में रह रहे रोहिंग्या लोगों में से 14,000 ही संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी उच्चायोग (UNHCR) में रजिस्टर्ड हैं. सुप्रीम कोर्ट में याचिका देने वाले दोनों रोहिंग्या भी UNHCR में रजिस्टर्ड हैं. मोहम्मद सलीमुल्लाह और मोहम्मद शाकिर नाम के इन याचिकाकर्ताओं का कहना है कि रोहिंग्या प्रवासियों ने म्यांमार से भागकर यहां शरण ली है क्योंकि उन्हें वहां व्यापक भेदभाव, हिंसा और खूनखराबे का सामना करना पड़ रहा था. उन्होंने ये गुजारिश भी की है कि उन्हें और दूसरे रोहिंग्या प्रवासियों को भारत से निकाल कर फिर म्यांमार ना भेजा जाए. ऐसा किया गया तो उन्हें फिर म्यांमार फौज और बौद्ध अल्ट्रा नेशनलिस्ट्स के भारी ज़ुल्मों का सामना करना पड़ेगा. इन्हीं याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट ने भारत सरकार से जवाब मांगा है.

चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा, जस्टिस ए एम खानविलकर और जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़ की बेंच इस मामले की सुनवाई कर रही है. जैसे कि संकेत मिल रहे हैं केंद्र सरकार की ओर से सुप्रीम कोर्ट से कहा जा सकता है कि प्रवासियों के निर्वासन के लिए जो निर्देश जारी किए गए हैं वो सभी अनडॉक्यूमेंटेड शरणार्थियों के लिए हैं ना कि सिर्फ रोहिंग्या के लिए. गृह मंत्रालय के सूत्रों ने पहले ही संकेत दे दिया कि ऐसी कोई अंडरटेकिंग सरकार की ओर से नहीं दी जाएगी कि अवैध प्रवासियों का डिपोर्टेशन नहीं किया जाएगा. साथ ही ये भी आश्वासन नहीं दिया जाएगा कि अवैध प्रवासियों की पहचान करने के लिए गृह मंत्रालय के निर्देश पर राज्यों में बने टॉस्क फोर्स को खत्म कर दिया जाएगा.  

रोहिंग्या पर वैध दस्तावेज की बाध्यता

केंद्र ये भी कह सकता है कि ये पहला मौका नहीं है जब गृह मंत्रालय ने अवैध प्रवासियों को देश से निकालने पर कोई स्टैंड लिया है. पहले भी सरकार की ओर से अवैध बांग्लादेशी प्रवासियों पर ऐसे निर्देश जारी किए गए हैं. सरकारी सूत्रों का कहना है कि जिन रोहिंग्या के पास वैध दस्तावेज होंगे (जैसे कि संयुक्त राष्ट्र की ओर से उपलब्ध दस्तावेज), उन्हें डिपोर्ट नहीं किया जाएगा. अब यहां ये सवाल उठ सकता है कि जो जान बचाने के लिए सिर पर पैर रख कर म्यांमार से भागे, जिनका सब कुछ वहां लुट गया वो वैध दस्तावेज कहां से साथ लाते?

रोहिंग्या याचिकाकर्ताओं की ओर से सुप्रीम कोर्ट में पैरवी जानेमाने वकील प्रशांत भूषण कर रहे हैं. प्रशांत भूषण ने सरकार से आश्वासन मांगा था कि सुप्रीम कोर्ट की ओर से याचिका के निस्तारण तक रोहिंग्या प्रवासियों के डिपोर्टेशन जैसा कोई कदम नहीं उठाया जाएगा. इस पर एडिशनल सोलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि वे सरकार की ओर से ऐसा कोई आश्वासन देने की स्थिति में नहीं है. इस पर सुप्रीम कोर्ट ने सरकार का रुख जानकर सुप्रीम कोर्ट में रखने के लिए कहा.

रोहिंग्या का निर्वासन नॉन रिफाउलमेंट के सिद्धांत का उल्लंघन

याचिका में कहा गया है कि प्रस्तावित डिपोर्टेशन भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार), अनुच्छेद 21 (जिंदगी और निजी स्वतंत्रता) के तहत सांविधानिक संरक्षणों के खिलाफ है. ये अनुच्छेद 51 (सी) के भी ख़िलाफ़ है जो हर व्यक्ति को समान अधिकार और स्वतंत्रता देता है. साथ ही ये नॉन रिफाउलमेंट के सिद्धांत का भी उल्लंघन करता है. भारत ने विभिन्न संधियों का अनुमोदन किया है जो नॉन रिफाउलमेंट के सिद्धांत को मान्यता देते हैं. इसके तहत शरणार्थियों को उस देश में नहीं भेजा जा सकता जहां उनकी जान को खतरा बना हो.

रोहिंग्या का मुद्दा बीती 25 अगस्त के बाद से पूरी दुनिया में छाया हुआ है. दरअसल, म्यांमार के राखिन प्रांत में रोहिंग्या चरमपंथियों के हमलों में 10 पुलिसकर्मियों और एक सैनिक की मौत के बाद म्यांमार की फौज ने बड़ा अभियान छेड़ रखा है. फौज पर पूरी रोहिंग्या आबादी पर भारी जुल्म बरपाने के आरोप लग रहे हैं. वहां दमन की जिस तरह की तस्वीरें अंतरराष्ट्रीय मीडिया में आ रही हैं वो विचलित करने वाली हैं. बीते दो हफ्ते में एक लाख से अधिक रोहिंग्या भाग कर बांग्लादेश पहुंच चुके हैं. बांग्लादेश में पहले से ही पांच लाख से ऊपर रोहिंग्या शरणार्थी हैं.

रोहिंग्या पर सरकार के सख्त रुख़ की वजह क्या?

भारत में जो रोहिंग्या हैं वो म्यांमार की ताजा हिंसा के दौरान वहां से भाग कर नहीं बल्कि पिछले 5 साल के दौरान आए हैं. रोहिंग्या के ख़िलाफ़ जिस तरह का रवैया म्यांमार की फौज और अल्ट्रा नेशनलिस्ट बौद्धों का है, उसकी दुनिया भर में भर्त्सना हो रही है. ऐसे में अंतरराष्ट्रीय समुदाय को भारत का रुख हैरान करने वाला लग रहा है. बता दें कि म्यांमार में नब्बे के दशक के दौरान लोकतंत्र समर्थन आंदोलन और नोबेल विजेता आंग सान सू की की नज़रबंदी के दौरान वहां के हज़ारों नागरिकों और राजनेताओं ने फौजी हुकूमत के कोप से बचने के लिए भारत में शऱण ली थी.

म्यांमार को भी छोड़िए. बीबीसी की एक रिपोर्ट में शकील अख्तर लिखते हैं कि दलाई लामा के नेतृत्व में हज़ारों तिब्बती आधी सदी से भारत में शरण ले कर रह रहे हैं. श्रीलंका में गृहयुद्ध के दौरान लाखों तमिल शरणार्थियों ने भारत में पनाह ली थी. बड़ी संख्या में नेपाली भी भारत में रह कर आजीविका कमाते हैं. ऐसे में सवाल उठता है कि सवा अरब की आबादी वाले देश में सरकार को कुछ हज़ार रोहिंग्या मुस्लिम शरणार्थियों से ही दिक्कत क्यों है?

कुछ पर्यवेक्षकों का मानना ​​है कि मोदी सरकार रोहिंग्या शरणार्थियों का विरोध कर 'हिंदू कार्डखेल रही है. उनका कहना है कि सरकार मुसलमानों को लेकर जब भी कोई सख्त कदम उठाती है या ऐसा कोई बयान सामने आता है तो इससे उसकी लोकप्रियता में वृद्धि होती है. क्या देश में ऐसे हालात की वजह से ही रोहिंग्या शरणार्थियों के सिर पर निर्वासन की तलवार लटकने लगी है?

भारत में इस वक्त मीडिया का एक वर्ग भी खुल कर सरकार के लिए बैटिंग कर रहा है. उसकी ओर से बहसों में रोहिंग्या शरणार्थियों को देश की सुरक्षा के लिए ख़तरा क़रार दिया जा रहा है. बताया जाता है कि इन शरणार्थियों के अलकायदा और इस्लामिक स्टेट जैसे चरमपंथी संगठनों से रिश्ते हैं और वे भारत में आतंकवाद का नेटवर्क फैला रहे हैं. ऐसे हालात में भारत के आम लोगों में भी रोहिंग्या प्रवासियों को लेकर संदेह पैदा हो रहे हैं.
रोहिंग्या शरणार्थियों के लिए इन परिस्थितियों में जीवन और मुश्किल हो गया है. म्यांमार के राखिन प्रांत में ये अपना सब कुछ लुटाने के बाद किसी तरह जान बचाकर ये यहां पहुंचे थे. बुनियादी सुविधाओं के अभाव के बावजूद ये लोग भारत छोड़कर फिर मौत के मुंह में नहीं जाना चाहते.

भारत में धर्म कभी नहीं रहा शरण का आधार

रोहिंग्या शरणार्थियों के बारे में मौजूदा सरकार की नीति कोई हैरत की बात नहीं है. नरेंद्र मोदी ने साल 2014 में अपने चुनाव अभियान के दौरान असम में कहा था कि वे केवल हिंदू शरणार्थियों को देश में आने देंगे. गैर हिंदू शरणार्थियों को शरण नहीं दी जाएगी और जो ग़ैर-हिंदू अवैध शरणार्थी देश में हैंउन्हें यहां से निकाल दिया जाएगा. राजनयिक से राजनेता बने राज्यसभा के पूर्व सांसद मणिशंकर अय्यर ने हाल में अपने एक लेख में इस मुद्दे पर विस्तार से लिखा है. अय्यर के मुताबिक गृह मंत्रालय ने सितंबर 2015 में पासपोर्ट अधिनियम और विदेशी नागरिक अधिनियम के तहत जारी अधिसूचना में सामान्य प्रवेश और रिहाइशी प्रक्रियाओं के तहत जो छूट हिंदूसिखईसाईजैनपारसी और बौद्धों को पड़ोसी देशों में जुल्म का सामना करने की स्थिति में दी है वैसी मुस्लिमों के लिए नहीं है. ये संविधानखास तौर पर संविधान के अनुच्छेद 21(ज़िंदगी और आजादी के बुनियादी अधिकार से संबंधित) और अनुच्छेद 14 (समानता के बुनियादी अधिकार से संबंधित) की भावना से मेल नहीं खाता. ये दोनों अनुच्छेद किसी भी व्यक्ति के धार्मिक संबंद्धता का उल्लेख किए बिना ये अधिकार प्रदान करते हैं.

यहां ये बता देना भी ज़रूरी है कि भारत में 2014 से पहले धर्म कभी शरण लेने का आधार नहीं रहा. किसे शरण देनी है इसके लिए यही देखा जाता था कि किसी व्यक्ति या समुदाय को उनके देश में किस तरह के हालात का सामना करना पड़ रहा है. शरण देने के लिए ये देखा जाता था कि कहीं उन्हें अपने देशों में सरकारी दमनचक्र तो नहीं भुगतना पड़ रहा?

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