शुक्रवार, 26 अगस्त 2016

'भारत माता की जय' तो इस माता की क्यों नहीं...खुशदीप



वो सिर पर लाश ढो रहा था,
और पूरा भारत सो रहा था...



वो कौन?  किसकी लाश? वो दाना मांझी और लाश उसकी पत्नी अमांग की...

ओडिशा के भूख के लिए अभिशप्त कालाहांडी ज़िले के भवानीपटना गांव के रहने वाले दाना मांझी की ये तस्वीर...पत्नी की लाश सिर पर...साथ चलती बिलखती 12 साल की बिटिया चौला...ये तस्वीर तमाचा है भारत के विकास के तमाम दावों पर...गांव से करीब 60 किलोमीटर दूर अस्पताल में मंगलवार रात को टीबी से पीड़ित अमांग की मौत हुई...मौत होते ही अस्पताल वाले दाना मांझी पर दबाव डालने लगे कि लाश को अस्पताल से हटाओ...किसी तरह रात काटी...बुधवार सुबह दाना ने पत्नी की लाश कपड़े में बांधी और पैदल ही घर की ओर चल दिया...


 ये हालत तब है जब दाना मांझी ने अस्पताल को पहले से ही जानकारी दे दी थी कि वो बहुत निर्धन है और उसके पास शव को घर ले जाने के लिए वाहन की व्यवस्था के पैसे नहीं है...है तो दाना मांझी इनसान ही...रास्ते में थका तो लाश उसके हाथों से छूटी भी...किसी तरह सँभाला...मां की लाश और पिता की बेबसी देखकर नन्ही सी जान चौला का रोना तो निकलना ही था...

दाना इसी हाल में 12 किलोमीटर तक चलता रहा...तब कुछ लोगों के हाथ-पैर मारने के बाद एंबुलेंस की व्यवस्था हो सकी...बुधवार शाम को अमांग का अंतिम संस्कार हुआ...मामले ने तूल पकड़ा तो अस्पताल के अधिकारी अपनी खाल बचाने के लिए सफाई देने लगे कि दाना मांझी किसी को बिना बताए ही अस्पताल से पत्नी की लाश ले गया...वाह...इसे कहते हैं चोरी और सीनाजोरी...

कालाहांडी की कलेक्टर वृंदा डी ने बताया कि जब उन्हें इस घटना का पता चला तो उन्होंने अमांग की लाश को एंबुलेस से ले जाने की व्यवस्था की...कलेक्टर के मुताबिक उन्होंने एक योजना से दाना मांझी को दो हज़ार रुपए दिलवाए...रेडक्रॉस से भी दस हज़ार रुपए मिलेंगे...वाह कलेक्टर साहिबा बड़ा एहसान किया आपने...

इस साल के शुरू में भी झारखंड-ओडिशा की सीमा के पास जैतगढ़ के गोधूलि गांव से भी एक ऐसी ही घटना सामने आई थी...वहां सावित्री नाम की महिला को अपने पति के अंतिम संस्कार के लिए पैसे जुटाने को अपने दो बेटों को गिरवी रखना पड़ा था...
 
कालाहांडी से बहुत दूर हम दिल्ली में बैठे सारी सुख सुविधाएं भोगते हुए दाना मांझी के दर्द का रोना रो रहे हैं...सोशल मीडिया पर तस्वीर पर डालकर अपने फ़र्ज़ की रस्म अदायगी कर रहे हैं...यहां सवाल ये भी है कि जो मीडियाकर्मी दाना मांझी की तस्वीरें खींच रहे थे, वीडियो बना रहे थे, उन्होंने क्या किया...बेशक उन्होंने अपनी ड्यूटी पूरी की और इस घटना को दुनिया के सामने लाए...लेकिन वो साथ ही ये भी तो कर सकते थे कि वाहन की व्यवस्था कर अंपाग की लाश को गांव तक छोड़ आते...ये ठीक वैसा ही है जैसे कि आत्मदाह कर रहे किसी इनसान की तस्वीरें खीची जाती रहें, वीडियो बनाए जाते रहें...हालांकि चंद पत्रकारों को साधुवाद भी है जिन्होंने तत्काल हल्ला मचा कर प्रशासन को जगाया और दाना मांझी के लिए 12 किलोमीटर चलने के बाद एंबुलेंस की व्यवस्था हो सकी...सवाल यहां सिस्टम से कि 12 किलोमीटर लाश सिर पर उठा कर चलना भक्या कम बड़ी त्रासदी है...

दाना मांझी और अमांग को लेकर एक सवाल उनसे, जो भारत माता की जय कहते नहीं थकते...जितने खाए-अघाए होते हैं, नारा भी उतनी हो ज़ोर से निकलता है...आख़िर भारत माता है कौनमहज़ ज़मीन का बड़ा टुकड़ा...या इस पर रहने वाले लोग...क्या इन्हीं लोगों में भारत माता की आत्मा नहीं बसती...क्या अमांग एक मां नहीं थी?  क्या वो भारत का हिस्सा नहीं थी? 

भारत का संविधान भी हम भारत के लोग से शुरू होता है...संविधान को सारी शक्ति भी देश के लोगों से ही प्राप्त है...क्या सच में ऐसा हैअगर ऐसा है तो अमांग जैसी माता की जय क्यों नहींजब तक अमांग जैसी एक भी मां को इस हाल में दुनिया से अलविदा कहना पड़ता है, भारत माता की जय सच्चे अर्थों में नहीं हो सकती...

हम को मन की शक्ति देना, मन विजय करे,
दूसरों की जय से पहले, खुद को जय करे...

बुधवार, 24 अगस्त 2016

मोदी सरकार की आलोचना पर मुझे सुनाने वालों ये डिबेट भी देख लो...खुशदीप

दोस्तों, एक सज्जन मेरे पीछे हाथ धोकर पड़ गए थे कि मैं केंद्र की मौजूदा सरकार की बहुत आलोचना करता हूं...इसके लिए उन्होंने और उनके चेले चपाटों ने मुझे बहुत अपशब्द भी कहे...यहां तक कि मेरी पोस्ट पर कॉमेंट करने वाले मेरे कुछ सम्मानित मित्रों को भी नहीं बख्शा गया..आज ऐसे ही लोगों की आंखें खोलने के लिए मैं अपनी दो साल पुरानी एक डिबेट का लिंक दे रहा हूं...डिबेट 1984 के सिख विरोधी दंगों के 30 साल पूरे होने पर 1 नवंबर 2014 को हुई थी...तब तक मोदी सरकार को सत्ता में आए 6 महीने हो चुके थे...

इस डिबेट से पहले गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने दंगा पीड़ित सिखों के लिए 5-5 लाख रुपए मुआवज़े का एलान किया था जिसे उस वक्त मॉडल कोड ऑफ कंडक्ट की वजह से रोक लिया गया था ...इस डिबेट का मुद्दा था कि क्या 30 साल में पीडित सिखों को इनसाफ़ मिला...या सिर्फ़ राजनीति ही होती रही... 

पंजाब विधानसभा चुनाव जल्दी होने वाले हैं...आप देखेंगे कि हर चुनाव की तरह इस बार भी इन चुनाव में 1984 के दंगे मुद्दा बनेंगे...पीड़ितों के जो हमदर्द बनते हैं, उनका मकसद पीड़ितों को इनसाफ़ दिलाना नहीं बल्कि इस मुद्दे को ज़्यादा से ज़्यादा देर तक ज़िंदा किए रखना है...आपसे अनुरोध है कि इस डिबेट को पूरा देखिएगा...

एक बात मीडियाकर्मियों के लिए भी, क्या टीवी पर शालीन चर्चा नहीं हो सकती जिसमें हर किसी की बात सुनी जाए और वो साफ़ साफ़ समझ भी आए...साथ ही बहस में आम लोगों को भी हिस्सा लेने का मौका दिया जाए...

देखिए-सुनिए और फिर अपनी राय से मुझे जरूर अवगत कराइएगा, जिससे कि मैं खुद को बेहतर बना सकूं...


मंगलवार, 23 अगस्त 2016

अमर ब्लॉगर डॉक्टर अमर कुमार के बिना 5 साल...खुशदीप


आज जिस तरह का दौर है, उसमें कोई दूसरे की सुनने को तैयार नहीं है...राजनीति, धर्म, जाति से बंधी अपनी विचारधाराएं हैं, जिनमें आलोचना सुनने का किसी के पास संयम नहीं है...सब अपने मठाधीशों के पीछे हैं...मठाधीशों के अपने हित हैं, स्वार्थ है...ऐसे में इनसानियत, मेल-मोहब्बत की बातों के लिए किसी के पास फुर्सत ही कहां हैं...करीब 6 साल पहले मैंने 'न हिंदू, न मुसलमान...वो बस इनसान' नाम से एक  कहानी लिखी थी...उसी कहानी पर डॉक्टर अमर कुमार की ये टिप्पणी मिली थी...डॉ अमर कुमार कौन? 2011 से पहले के सारे हिंदी ब्लॉगर उन्हें जानते हैं...आज डॉक्टर साहब की 5वीं पुण्यतिथि है...उनके बारे में और जानने से पहले उनकी टिप्पणी पढ़ लीजिए...

यदि यह कहानी ही है, तो यह एक ठँडे मन और शान्त चरित्र की कहानी है,
किसी भी तरह का उन्माद विवेक के सारे रास्तों पर नाकेबन्दी कर देता है ।
जब विवेकहीन या कहिये कि कुटिल पथप्रदर्शक जान बूझ कर अनपढ़ बना कर रखे गये जनसमूह को यह नारा दें कि, तर्क मत करो.. अपने समर्पण को सिद्ध करो, तो कोई क्या उम्मीद करे ?
खुशदीप, यहाँ अनपढ़ का अर्थ साक्षरता से कुछ अलग भी है !
लगता है, हम सब एक बड़े षड़यन्त्र के मध्य जी रहे हैं, अपने स्वार्थों और अहमन्यता के चलते बुद्धिजीवी वर्ग तटस्थता में ही अपना परिष्कार देखता है । फिर भी तुम बस लगे रहो, लगे रहो खुशदीप भाई ! तुम्हारे सँग सरकिट की भूमिका मैं निभा लूँगा ।

डॉक्टर साहब की ये टिप्पणी मुझे 11 अप्रैल 2010 को अपनी इस पोस्ट पर मिली थी...डॉक्टर साहब का एक-एक शब्द मायने रखता था...जीवन का सार लिए होता था...जिस किसी ब्लॉगर को भी पोस्ट पर डॉक्टर साहब की ट्रेडमार्क इटैलिक टिप्पणी मिल जाती थी वो धन्य हो जाता था...

डॉ. अमर कुमार को हमसे बिछुड़े आज पूरे 5 साल हो गए...डॉक्टर साहब ने 23 अगस्त 2011 को दुनिया को अलविदा कहा...ये वो वक्त था जब हिंदी ब्लॉगिंग पूरे उफ़ान पर थी...फेसबुक तब आ तो गया था लेकिन ऐसा दैत्याकार नहीं था, जैसा कि अब है. ...जिसकी डॉयनासोर रूपी छाया में ब्लॉगिंग भी दब कर रह गई...

ये मेरा दुर्भाग्य था कि दीवाली वाले दिन 5 नवंबर 2010 को मेरे पिता का साथ छूटा था...और साढ़े नौ महीने बाद डॉ अमर कुमार पंचतत्व में विलीन हो गए...मैं जीवन में कभी डॉक्टर साहब को साक्षात नहीं देख सका...जनवरी 2011 की बात है, मैं भतीजी की शादी में हिस्सा लेने लखनऊ गया था...वहीं डॉक्टर साहब का रायबरेली से फोन आया था कि गाड़ी भेज देता हूं, आकर मिल जाओ...लेकिन लखनऊ में शादी के समारोहों में व्यस्तता के चलते बहुत इच्छा होने के बाद भी डॉक्टर साहब से मिलने नहीं जा पाया...तब डॉक्टर साहब से फोन पर मैंने माफ़ी मांगते हुए कहा था कि अगली बार जब लखनऊ आऊंगा, आपसे मिलने ज़रूर आऊंगा...लेकिन मुझे क्या पता था कि वो दिन कभी नहीं आ पाएगा...

डॉक्टर साहब के जाने के बाद मैंने अपनी एक पोस्ट में लिखा था-   

मौत को भी ज़िंदादिली सिखा देने वाले शख्स को आखिर मौत कैसे हरा सकती है...कैसे ले जा सकती है ब्लॉग जगत के सरपरस्त को हम सबसे दूर...दर्द को भी कहकहे लगाना सिखा देने वाले डॉ अमर कुमार का शरीर बेशक दुनिया से विदा हो गया लेकिन जब तक ये ब्लॉगिंग रहेगी उनकी रूह, उनकी खुशबू हमेशा इसमें रची-बसी रहेगी...टिप्पणियों में छोड़ी गई उनकी अमर आशीषों के रूप में...कहते हैं इंटरनेट पर छोड़ा गया एक एक शब्द अमर हो जाता है...और उनका तो नाम ही अमर था...अमर मरे नहीं, अमर कभी मरते नहीं....डॉक्टर साहब अब ऊपर वाले की दुनिया को ब्लॉगिंग सिखाते हुए हम सबकी पोस्टों को भी देखते रहेंगे...

मुझे तो आज भी हमेशा यही लगता है कि मेरी पोस्ट पर डॉक्टर साहब की टिप्पणी आएगी...ओए खुशदीपे या खुशदीप पुत्तर...


एक बात और, मैं पिछले 5 साल से डॉक्टर साहब के सुपुत्र डॉक्टर शांतनु के संपर्क में हूं...इस वक्त वो दिल्ली में जिस हॉस्पिटल में कार्यरत है, वो मेरे घर के पास ही स्थित है...शांतनु बेटा पर डॉक्टर साहब के संस्कारों की पूरी छाप है...दूसरों के काम आने का जज़्बा उसमें भी कूट कूट कर भरा है...हो भी क्यों ना...इंसानियत का पाठ उसे विरासत में जो मिला है...


(इस लिंक पर जाकर आप डॉक्टर साहब को उनकी टिप्पणियों से ही दी गई इन ब्ल़ॉगर्स की श्रद्धांजलियों को पढ़ सकते हैं-  अनूप शुक्ल, सतीश सक्सेना, बीएस पाबला, डॉ अनुराग आर्य, शिखा वार्ष्णेय, राजीव तनेजा, रचना, रश्मि रवीजा, ZEAL-डॉ दिव्या)

रविवार, 21 अगस्त 2016

ओमरान को देख दुनिया रोई लेकिन वो खुद नहीं...खुशदीप






ओमरान दाकनीश अब ठीक है...3 साल के मासूम के ज़ख्मों को साफ कर अस्पताल से डिस्चार्ज कर दिया गया है...लेकिन ओमरान के साथ खेलने वाला उसका 10 साल का भाई अली दाकनीश अब इस दुनिया में नहीं रहा...शनिवार को उसकी अस्पताल में मौत हो गई...ओमरान के साथ उसके माता-पिता, एक भाई और दो बहनें ज़रूर सुरक्षित हैं...

युद्ध की मार झेल रहे सीरिया के एलेप्पो शहर से इस हफ्ते आई ओमरान की तस्वीर और वीडियो को जिसने भी  देखा वो विचलित हुए बिना नहीं रह सका...हवाई हमले के तत्काल बाद मलबे की धूल और ख़ून से सना ओमरान का सपाट चेहरा युद्ध की तबाही का प्रतीक बन गया है...ओमरान की ख़ामोशी चीख चीख कर कहती लगी, देख इनसान, तून्हें दुनिया को क्या बना दिया है...

यही वजह है कि सीएनएन जैसे पेशेवर और खांटी न्यूज़ चैनल की बेहद अनुभवी एंकर केट बोलडॉन भी ओमरान से जुड़ी रिपोर्ट दिखाते वक्त तमाम कोशिश के बाद भी अपने आंसुओं पर नियंत्रण नहीं रख सकीं...

ये वही एंकर हैं जो अपने सख्त सवालों से किसी की भी छुट्टी कर देने के लिए जानी जाती हैं...लेकिन ओमरान की रिपोर्ट दिखाते वक्त उनका दूसरा चेहरा ही दिखा...लगा कि उनके अंदर की मां ओमरान को इस हाल में देखकर विचलित है...और दौड़ कर ओमरान को एंबुलेंस की कुर्सी से उठाकर गले लगा लेना चाहती है...वैसे जिसने भी ओमरान की तस्वीर या वीडियो देखा, उस का यही मन किया....



अब सुनिए, सीएनएन एंकर केट ने रिपोर्टिंग के वक्त रूंधी आवाज में क्या कहा..."जिस चीज़ ने मुझे स्ट्राइक किया वो है कि हम सब की आंखें गीली हैं, लेकिन इस बच्चे की आंख में एक भी आंसू नहीं है। वो एक बार भी नहीं चिल्लाया। तय है कि वो पूरी तरह सदमे में है। ओमरान को एंबुलेंस में छोड़ा गया है, अकेले बहते ख़ून के साथ..बचावकर्मी फिर मलबे के बीच गए हैं, ये तलाशने की शायद कोई और जीवित वहां फंसे हों...ओमरान हैरान है कि कुछ लम्हे पहले वो अपने घर में सुरक्षित था। युद्ध और अफरातफरी के उन्माद और हड़बड़ी में सब खो गया...

रिपोर्ट के आखिर में केट फूट फूट कर रो पड़ी। ये कहते हुए- "ये ओमरान है। ये ज़िंदा है। हम चाहते हैं कि आप ये बात जानें...



ओमरान का ट्रीटमेंट करने वाले डॉक्टर्स और नर्स ने बताया कि अस्पताल में भी वो पूरी तरह ख़ामोश रहा...बस एक दो बार अपने मां-बाप के बारे में पूछा...डॉक्टर्स ने ये भी बताया कि उसी दिन ओमरान की तरह 15 साल से कम उम्र के दर्जन से ज़्यादा बच्चे ट्रीटमेंट के लिए लाए गए...

ओमरान के वीडियो को पहले दो दिन में ही दुनिया में डेढ़ करोड़ से ज़्यादा लोग देख चुके हैं...ओमरान के पिता अबू अली अब किसी से भी बात करते डर रहे हैं...उन्हें ख़ौफ़ है कि ओमरान के चेहरे के सिंबल बन जाने की वजह से उनके परिवार को सीरिया सरकार समर्थित सैनिक कहीं नुकसान ना पहुंचाएं...ओमरान का परिवार जिस अपार्टमेंट में रहता था वो एलेप्पो के बाह्य क्षेत्र में स्थित है...ये इलाका विद्रोहियों के कब्ज़े वाला माना जाता है....ये साफ़ नहीं हुआ कि ओमरान का घर सीरियाई सेना के हवाई हमले में ध्वस्त हुआ या सीरियाई राष्ट्रपति असद के समर्थक रूस के हवाई हमले में...हालांकि रूस की और से ऐसी किसी कार्रवाई से इनकार किया गया है...

बताया गया है युद्ध क्षेत्र में नागरिकों का इलाज करने वाले डॉक्टर्स ने कुछ दिन पहले ही अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा को सख्त चिट्ठी लिखकर नाराज़गी जताई थी...इस चिट्ठी में कहा गया था कि यहां के नागरिकों को आपके आंसुओं और हमदर्दी की ज़रूरत नहीं है...दुआएं भी नहीं चाहिएं...उन्हें बस एक्शन चाहिए...जिससे कि निर्दोषों के मारे जाने का सिलसिला बंद हो सके...

दुनिया की महाशक्तियों के दंभ और उनकी कठपुतलियों ने कई इलाकों को दोज़ख़ बना दिया है...यही वजह है कि आतंक फैलाने के जो भी असल में ज़िम्मेदार हैं, उनके ख़िलाफ़ एकजुट होकर ठोस लड़ाई नहीं हो पा रही है...काश इनसान को अक्ल आए और निर्दोषों के मारे जाने का सिलसिला बंद हो...फिर किसी ओमरान का लाख सवाल करता ऐसा चेहरा दुनिया को ना देखना पड़े...काश...

आमीन...

शनिवार, 20 अगस्त 2016

‘जय सिंधू, जय हिंदू’ कहने वालों को आप क्या कहेंगे...खुशदीप



पीवी सिंधू...साक्षी मलिक...दीपा कर्माकर...साइना नेहवाल, सानिया मिर्ज़ा...नाज़ हैं हमें देश की इन बेटियों पर...या यूं कहे कि देश की सारी बेटियों पर...रियो ओलंपिक में साक्षी ने पहले कुश्ती में ब्रॉन्ज जीत कर मेडल का सूखा मिटाया...और फिर सिंधू ने बैडमिंटन में सिल्वर जीत कर इतिहास रच दिया...देश की पहली ओलंपिक सिल्वर मेडलिस्ट बेटी बनकर...शुक्रवार को गोल्डन मुकाबले में भी उन्होंने पहला गेम जीतकर वर्ल्ड नंबर 1 कैरोलिना (स्पेन) के एक बार तो छक्के छुड़ा दिए थे...सिंधू फाइनल में हारी ज़रूर लेकिन सवा अरब देशवासियों का दिल जीत लिया...

क्रिकेट से इतर किसी खेल में देश को इस तरह जश्न मनाने के मौके कम ही मिलते हैं...जिस तरह पूरा देश सांस रोक कर सिंधू का फाइनल मुकाबला देख रहा था, वो क्रिकेट के रोमांच से कहीं कम नहीं था...बल्कि अधिक ही था...सिंंधू की उपलब्धि पर क्या मीडिया और क्या सोशल मीडिया, हर किसी ने अपनी तरह से हर्ष व्यक्त किया...मैंने खुद भी तत्काल फेसबुक और ट्विटर पर खुशी जताई...

ट्विटर पर ऐसा करते वक्त अचानक एक ट्वीट पर नज़र पड़ी...ये ट्वीट डॉ अरविंद मिश्रा का था...बड़े विद्वान व्यक्ति हैं...हिंदी के अधिकतर ब्लॉगर इनसे परिचित हैं...फेसबुक पर भी सक्रिय रहते हैं...सिंधू का ओलंपिक फाइनल मुकाबला ख़त्म होने के तत्काल बाद डॉ मिश्रा ने ट्वीट किया...क्या ट्वीट किया आप खुद ही पढ़ लीजिए...


"जय सिन्धू, जय हिन्दू"...

अब इसे पढ़ने के बाद कहने को कुछ रह जाता है क्या...बस सिर पीट लेना ही बाक़ी रह जाता है... क्या खेल का भी कोई मज़हब हो सकता है...

सिंधू हो या साक्षी पूरे देश को उन पर गुमान है...देश का हर नागरिक उनकी उपलब्धि पर गौरवान्वित है...ठीक वैसे ही जैसे टेनिस में सानिया मिर्जा कई इंटरनेशनल टूर्नामेंट जीत कर देश और देशवासियों का मान बढ़ाती रही है...

यहां डॉ मिश्रा से मेरा एक सवाल है...जैसे कि उन्होंने सिंधू की जीत के साथ हिंदू शब्द जोड़ने की कोशिश की...अगर ऐसे ही सानिया की हर जीत के बाद कोई ऐसा लिखे तो कैसा लगेगा...

जय मिर्ज़ा, जय मुसलमान...

यक़ीनन ये पढ़ना बहुत बुरा लगेगा...अगर ये बुरा है तो फिर डॉ मिश्रा ने जो लिखा तो वो बुरा क्यों नहीं...निश्चित रूप से वो भी बहुत बुरा है...

सिंधू हो या साक्षी या फिर सानिया, सभी देश की बेटियां हैं...वो बेटियां जिन्होंने पूरी दुनिया में भारत का नाम ऊँचा किया है...खेल को, खिलाड़ियों को, भगवान के वास्ते, अल्लाह के वास्ते, किसी खांचे में बांटने की कोशिश मत कीजिए...बांटने के खेल के लिए पहले से ही इस देश की राजनीति कम है क्या...