शुक्रवार, 21 जुलाई 2017

1983 में जो कपिल ने किया वही 2017 में हरमनप्रीत ने किया...खुशदीप

भारतीय महिला क्रिकेट में मिताली राज और झूलन गोस्वामी के नाम ही अब तक आपने सुन रखे होंगे शायद...अब हरमनप्रीत कौर, राजेश्वरी गायकवाड़, शिखा पांडे, सुषमा वर्मा, दीप्ति शर्मा, पूनम यादव, वेदा कृष्णमूर्ति, पूनम राउत, स्मृति मंधाना इन नामों को भी ज़ेहन में बिठा लीजिए...जिस तरह भारत की ये शेरनियां फॉर्म में हैं उससे मुझे पूरा विश्वास है कि आने वाली 23 जुलाई के बाद इनका नाम भारत के घर-घर में जाना जाने लगेगा...भारतीय महिला क्रिकेट टीम पहली वर्ल्ड कप जीत से अब बस एक हाथ दूर है...रविवार को इंग्लैंड को उसी के मैदान में मात देकर भारत को वर्ल्ड चैंपियन बनना है...

गुरुवार को मिताली राज के कुशल नेतृत्व में सेमीफाइनल मुकाबले में भारतीय टीम ने जिस तरह डिफेंडिंग वर्ल्ड चैंपियन ऑस्ट्रेलिया को अपने सामने घुटने टिकवाए, उसकी जितनी तारीफ की जाए कम है...ध्यान रहे कि इसी वर्ल्ड कप के लीग मुकाबले में ऑस्ट्रेलिया ने भारत को 8 विकेट से परास्त कर इकतरफा जीत हासिल की थी...भारत ने सेमीफाइनल मैच में ऑस्ट्रेलिया को 36 रन से मात देकर उसे घर वापसी का टिकट थमा दिया...इस जीत की सूत्रधार रहीं पंजाब की दिलेर कुड़ी हरमनप्रीत कौर...भारत ने इस मैच में अपनी पारी में कुल 281 रन बनाए जिसमें से अकेली हरमनप्रीत कौर ने 115 गेंद में 171 रन नॉट आउट जड़ डाले...20 चौक्के और 7 छक्के लगाकर हरमनप्रीत ने ऑस्ट्रेलिया की बोलिंग का कचूमर निकाल दिया...

फोटोृृ- हरमनप्रीत कौर की फेसबुक वॉल से साभार


हरमनप्रीत कौर ने लगभग वैसा ही कारनामा किया जैसा कि 1983 में कपिलदेव ने ज़िम्बाब्वे के ख़िलाफ़ 175 रन ठोंक कर किया था...कपिल पाजी की वो पारी भारतीय पुरुष क्रिकेट के लिए डिफाइनिंग मोमेंट थी...तो  गुरुवार को हरमनप्रीत कौर की आतिशी पारी भारतीय महिला क्रिकेट के लिए टर्निंग प्वाइंट साबित होगी...इस मैच में भारतीय बैटिंग में हरमन का साथ जहां कप्तान मिताली राज ने 36 रन बना कर दिया...वहीं बोलिंग में दीप्ति शर्मा, शिखा पांडे और वेटरन झूलन गोस्वामी के सामने ऑस्ट्रेलिया की नामी बैट्सवूमेन की एक नहीं चली...

उम्मीद है कि जिस तरह विराट कोहली, एम एस धोनी, युवराज, शिखर धवन, रोहित शर्मा, भुवनेश्वर, रविंद्र जडेजा, हार्दिक पांड्या का नाम देश का बच्चा बच्चा जानता है, वैसे ही अब भारतीय महिला क्रिकेट टीम की सदस्यों के साथ भी होगा...इन महिला खिलाड़ियों की भी ब्रैंड एंडोर्समेंट में वैसे ही पूछ होगी जैसी कि पुरुष क्रिकेटर्स की होती है...भारतीय महिला टीम की वर्ल्ड कप जीत देश में और बच्चियों को भी क्रिकेट या अन्य खेलों में करियर बनाने के लिए प्रेरित करेंगी...अगर किसी कारण ये टीम वर्ल्ड कप नहीं भी जीतती तो भी इन्होंने फाइनल में पहुंच कर इतिहास तो रच ही दिया है...इसलिए इनकी घर वापसी पर भी वैसा ही जश्न होना चाहिए जैसा कि पुरुष क्रिकेट टीम का जीत के बाद होता है...

वर्ल्ड कप में भारतीय टीम के इस दमदार प्रदर्शन के लिए कप्तान मिताली राज की जितनी प्रशंसा की जाए वो कम है...मिताली के लिए तो वैसे भी ये टूर्नामेंट जीवन भर के लिए यादगार रहेगा...इसी वर्ल्ड कप में मिताली ने पहले इंग्लैंड की शॉर्ले एडवर्डस के सबसे ज्यादा 5992 रन का वर्ल्ड रिकॉर्ड तोड़ा फिर वो 6000 रन का माइलस्टोन पार करने वाली भी दुनिया की पहली क्रिकेटर बन गईं...


दिग्गज ऑस्ट्रेलिया के ख़िलाफ़ सेमीफाइनल मैच में जिस तरह मिताली ने शानदार कप्तानी की वो भी देखने लायक थी...बस अब देश में सब दुआ कीजिए कि 23 जुलाई को लॉर्ड्स क्रिकेट ग्राउंड में भारत की लाडलियों के हाथों में वर्ल्ड कप की चमचमाती ट्रॉफी के साथ वैसे ही तिरंगा आसमान पर लहराता दिखे जैसा कि 25 जून 1983 को कपिल डेविल्सने कर दिखाया था...

सोमवार, 17 जुलाई 2017

नोएडा में मेड को लेकर टकराव की घटना पर याद आई 'पत्नीश्री की मददगार'...खुशदीप


नोएडा की एक हाईप्रोफाइल रिहायशी सोसायटी में बीते हफ्ते जम कर हंगामा हुआ...सेक्टर 78 में स्थित महागुन सोसायटी मे एक मेड को लेकर हिंसा की नौबत आ गई...दरअसल मेड के परिजनों का आरोप था कि उसे फ्लैट मालिक ने घर में बंधक बना कर दो दिन तक पीटा...फिर उसे गंभीर हालात में सोसायटी के पास फेंक दिया गया...इस मेड की गंभीर हालत में तस्वीर सोशल मीडिया पर भी वायरल हुई...दूसरी ओर, सोसायटी के लोगों का कहना है कि मेड को चोरी के आरोप में पकड़ा गया, जिसके सबूत सीसीटीवी फुटेज में मौजूद हैं और पुलिस को इसकी सूचना दी गई थी...बताया जा रहा है कि मेड के समर्थन में दूसरी मेड्स, उनके परिजनों और उनके गांव के लोगों ने बीते बुधवार को सोसायटी पर हल्ला बोल दिया...उनके और सोसायटी के सिक्योरिटी गार्ड्स के बीच पत्थरबाजी भी हुई...  

इस घटना में कौन दोषी है, कौन नहीं, ये पता लगाना पुलिस का काम है और वो लगा भी लेगी...लेकिन मेरा इस पोस्ट को लिखने का मकसद दूसरा है...दरअसल महानगरों का जीवन ऐसा हो चला है कि यहां मेड के बिना शायद ही किसी घर का गुजारा चलता हो...यहां अधिकतर न्यूक्लियर परिवार ही रहते है...पति-पत्नी दोनों ही काम पर जाते हों तो घर में साफ़-सफ़ाई, बर्तन से लेकर खाना बनाने तक का काम मेड के ही जिम्मे रहता है...छोटे बच्चों वाले घरों में उनकी देखरेख का काम भी मेड ही करती हैं...ऐसे में एक दिन मेड ना आए तो घर की हालत समझी जा सकती है...

देश के दूरदराज से विकास की दृष्टि से पिछड़े इलाकों से लोगों का पलायन महानगरों की ओर हुआ है...इनमें पुरुष लेबर से जुड़े काम में रोजगार तलाशते हैं...वहीं महिलाएं घरों में मेड के तौर पर आजीविका ढूंढ लेती हैं...मेड रखने के लिए भी दिल्ली-नोएडा जैसे शहर में पुलिस पहले पुलिस वेरीफिकेशन कराना जरूरी है...लेकिन अब भी बड़ी संख्या में लोग इसे झंझट का काम मानते हैं और बिना वेरीफिकेशन ही मेड रख लेते हैं...मेड भी इन दिनों आपस में एकजुटता बना कर काम करती हैं...कोई मेड किसी घर के मालिक या मालकिन पर खराब बर्ताव का आरोप लगा कर काम करना बंद कर दें तो बाकी सभी मेड भी वहां काम करने से इनकार कर देती हैं...यहीं नहीं कोई मेड वहां काम करना भी चाहे तो बाकी सभी उस पर दबाव डालकर रोक देती हैं...

नोएडा की घटना कोई मामूली बात नहीं है...ये सामाजिक ताने-बाने में बढ़ती जा रही दूरियों की ओर इशारा है...आर्थिक दृष्टि से अब देश में कई वर्ग बन गए हैं...लेकिन क्या एक दूसरे के बिना किसी का अस्तित्व बनाए रखना मुमकिन है? जब एक नए शहर का प्रोजेक्ट बनाया जाता है तो वहां सिर्फ आर्थिक दृष्टि से मजबूत लोगों को बसाने के बारे में ही नहीं सोचा जाता...वहां मार्केट, लेबर क्लास, सब्जी मंडी हर तरह के तबकों के रहने के लिए जगहें चिह्नित की जाती हैं...जिस तरह गाड़ी चार पहियों पर चलती है उसी तरह समाज भी अलग-अलग तबकों के पहियों के सहारे ही आगे बढ़ता है...अगर कोई ये समझता है कि वो अकेले पहिए से ही गाड़ी को भगा कर ले जाएगा तो ये उसकी नादानी के सिवा कुछ नहीं है...

हमारे देश की सरकार का कंसेप्ट वेलफेयर सरकार का है...यानि ये देखना उसकी जिम्मेदारी है कि कल्याणकारी योजनाओं का समाज के सभी वर्गों को लाभ मिले...खास तौर पर जो वंचित हैं, जो आखिरी पायदान पर खड़े हैं, उन तक भी तरक्की की बयार पहुंचे...सरकार के अलावा ये समाज के हर वर्ग की भी जिम्मेदारी है कि वो सह-अस्तित्व के सिद्धांत का सम्मान करे...अपने लिए उन्नति-प्रगति के रास्ते तैयार करे तो जरूरतमंदों के दुख-दर्द को भी अपने दिल में महसूस करे...

नोएडा की घटना मेड पर केंद्रित है...इसी को लेकर मुझे 28 अगस्त 2009 को लिखी पोस्ट 'पत्नीश्री की मददगार' आ गई...पढ़ेंगे तो आज भी प्रासंगिक लगेगी...आप भी इस विषय पर अपने विचार रखें, बहस को नया आयाम दें तो अच्छा रहेगा...

पत्नीश्री की मददग़ार

आप सोच रहे होंगे कि मैं किस मददग़ार की बात कर रहा हूं. जनाब माया नाम की ये वो मोहतरमा है जो एक दिन घर में अपने चरण ना डालें तो घर में भूचाल-सा आ जाता है. अपना तो घर में बैठना तक दूभर हो जाता है. पत्नीश्री के मुखारबिन्दु से बार-बार ये उदगार निकलते रहते हैं- यहां मत बैठो, वहां मत बैठो. एक तो ये मेरी जान का दुश्मन लैप-टॉप. मैं सुबह से घर में खप रही हूं. इन्हें है कोई फिक्र. पत्नीश्री का ये रूप देखकर अपुन फौरन समझ जाते हैं, आज माया घर को सुशोभित करने नहीं आने वाली है.

तो जनाब ऐसी है माया की माया. वैसे तो ये मायाएं हर घर में आती हैं लेकिन इन्हें नाम से इनके मुंह पर ही बुलाया जाता है. जब ये सामने नहीं होती तो इनके लिए नौकरानी, आया, बाई, माई, कामवाली और ज़्यादा मॉड घर हों तो मेड जैसे संवेदनाहीन शब्दों का इस्तेमाल किया जाता है. जैसे इंसान की कोई पहचान ही न हो. किटी पार्टी हो या कोई और ऐसा मौका जहां दो या दो से ज़्यादा महिलाओं की गपशप चल रही हो, वहां ये सुनने को मिल ही जाता है- इन कामवालियों ने तो नाक में दम कर रखा है. जितना मर्जी इनके साथ कर लो, लेकिन ये सुधरने वाली नहीं.

तो जनाब मैं अपनी पत्नीश्री की मददगार माया की बात कर रहा था. माया की तीन साल की एक बेटी है-लक्ष्मी और पति ढाबे पर काम करता है. काम क्या करता है, बस जो मेहनताना मिलता है, ज़्यादातर ढाबे पर ही दारू में उड़ा आता है. माया और उसके पति को यहां नोएडा में एक कोठी में रहने के लिए उसकी मालकिन ने एक छोटा सा टीन की छत वाला कमरा दे रखा है. अब ये भी सुन लीजिए कि ये मालकिन इस दयादृष्टि की माया से कीमत क्या वसूल करती है. कोठी की सफ़ाई, घास की कटाई, पेड़-पौधों में पानी देना, मालकिन के कहीं जाने पर कोठी की चौकीदारी करना और न जाने क्या-क्या. ज़रा सी चूक हुई नहीं कि बोरिया-बिस्तर उठा कर सड़क पर फेंक देने की धमकी. ठीक उसी अंदाज में जिस तरह कभी अमेरिका में गुलामी के दौर में अफ्रीकियों के साथ बर्ताव किया जाता था. ऐसी दासप्रथा नोएडा की कई कोठियों में आपको देखने को मिल जाएगी.

ऐसे हालात में माया को जब भी मैंने घर पर काम के लिए आते-जाते देखा, ऐसे ही लगा जैसे कि किसी तेज़ रफ्तार से चलने के कंपीटिशन में हिस्सा ले रही हो. अब जो मां काम पर आने के लिए छोटी बच्ची को कमरे में अकेली बंद करके आई हो, उसकी हालत का अंदाज़ लगाया जा सकता है. ऐसे में मेरी पत्नीश्री ने भी गोल्डन रूल बना लिया है जो भी दान-पुण्य करना है वो माया पर ही करना है. हां, एक बार पत्नीश्री ज़रूर धर्मसंकट में पड़ी थीं- पहले देवों के देव महादेव या फिर अपनी माया. दरअसल पत्नीश्री हर सोमवार को मंदिर में शिवलिंग पर दूध का एक पैकेट चढ़ाती थीं. दूध से शिवलिंग का स्नान होता और वो मंदिर के बाहर ही नाले में जा गिरता. सोमवार को इतना दूध चढ़ता है कि नाले का पानी भी दूधिया नज़र आने लगता. एक सोमवार मैंने बस पत्नीश्री को मंदिर से बाहर ले जाकर वो नाला दिखा दिया. पत्नीश्री अब भी हर सोमवार मंदिर जाती हैं...अब शिवलिंग का दूध से नहीं जल से अभिषेक करती हैं... और दूध का पैकेट माया के घर उसकी बेटी लक्ष्मी के लिए जाता है.. आखिर लक्ष्मी भी तो देवी ही है ना.

लक्ष्मी की बात आई तो एक बात और याद आई. मेरी दस साल की बिटिया है. पांच-छह साल पहले उसके लिए एक फैंसी साइकिल खरीदी थी. अब बिटिया लंबी हो गई तो पैर लंबे होने की वजह से साइकिल चला नहीं पाती थी... साइकिल घर में बेकार पड़ी थी तो पत्नीश्री ने वो साइकिल लक्ष्मी को खुश करने के लिए माया को दे दी. लेकिन बाल-मन तो बाल-मन ही होता है...हमारी बिटिया रानी को ये बात खटक गई...भले ही साइकिल जंग खा रही थी लेकिन कभी बिटिया की जान उसमें बसती थी..वो कैसे बर्दाश्त करे कि उसकी प्यारी साइकिल किसी और को दे दी जाए...वो लक्ष्मी को दुश्मन मानने लगी.. लाख समझाने पर आखिर बिटिया के कुछ बात समझ आई. दरअसल ये मेरी बिटिया का भी कसूर नहीं है. पब्लिक स्कूलों में एक्स्ट्रा करिकुलर एक्टिविटीज़, फ्रेंच-जर्मन भाषाएं न जाने क्या-क्या सिखाने पर ज़ोर दिया जाता है लेकिन ये छोटी सी बात कोई नहीं बताता कि एक इंसान का दिल दूसरे इंसान के दर्द को देखकर पिघलना चाहिए. हम भी बच्चों को एमबीए, सीए, डॉक्टर, इंजीनियर बनाने के लिए तो कोई कसर नहीं छोड़ना चाहते लेकिन ये कम ही ध्यान देते हैं कि हमारे नौनिहाल कुछ भी बनने से पहले अच्छे इंसान बने.

चलिए अब माया की गाथा यहीं निपटाता हूं. 10 बज गए हैं, माया अभी तक नहीं आई है और पत्नीश्री का पारा धीरे-धीरे चढ़ना शुरू हो रहा है..इससे पहले कि अपने लैपटॉप बॉस को पत्नीश्री के अपशब्द सुनने पड़ें, सीधे स्लॉग ओवर पर आता हूं.

रविवार, 16 जुलाई 2017

महफूज़ के बुलावे पर जुटे ब्लॉगर्स लेकिन मीट नाम से बिदके...खुशदीप

गुरुवार को ऑफिस में व्यस्त था...मोबाइल ऑफिस में मैं साइलेंट पर रखता हूं लेकिन आंखों के सामने ही रखता हूं ताकि पता चल जाए कि किसका है...वाइब्रेशन हुआ तो मोबाइल पर नज़र गई...महफूज़ अली का नाम फ्लैश हो रहा था...बात की तो दूसरी तरफ़ से हक़ वाले आदेश मेें आवाज़ आई...भईया परसों शनिवार को दोपहर 3 बजे 11, अमृता शेरगिल मार्ग पर पहुंचना है...एक छोटा सा गैट-टूगेदर रखा है...अब महफूज़ है तो शॉर्ट नोटिस के लिए आपको तैयार रहना ही होगा...ये टेंशन आपकी है महफूज़ की नहीं...महफूज़ का सीधा फंडा है...नो इफ़ - नो बट, ओनली जट...इसलिए दूसरे सब काम छोड़कर हाज़री लगाना लाज़मी था...गनीमत थी कि महफूज़ ने शनिवार मेरी छुट्टी वाला दिन चुना था...

रैंप पर ना सही लॉन पर ही मॉडलिंग सेशन 


 कुछ साल पहले भी महफूज़ ने इसी तरह इसी लोकेशन पर बुलाया था...यहां गज़ाला जी रहती हैं...उनकी पुरानी शानदार मेज़बानी आज तक याद थी...इसलिए जाने का ये भी एक अट्रैक्शन था...दिल्ली में कहीं आना जाना अब ओला-उबर कैब्स ने आसान कर दिया है...पहुंचते पहुंचते मुझे सवा तीन बज गए...
ओनली जेंट्स क्लब

मेन गेट पर ही टी-शर्ट्स में दो गबरू जवान बात करते दिखाई दिए...पीली टी-शर्ट वाला तो ख़ैर महफूज़ ही था...देखते ही गले मिलकर स्वागत किया...लेकिन नीली टी शर्ट में दूसरे गबरू जवान को गौर से देखा और मिलाने के लिए हाथ बढ़ाया तो ये क्या...
दो बांके गबरू जवान

अरे ये तो अपने डॉ टीएस दराल सर निकले...जिम जाने का दराल सर पर साफ़ नज़र आ रहा था...हैंडसम तो खैर पहले ही थे अब और निखरे दिख रहे थे...


लेडीज़ क्लब में घुसने की कोशिश करते महफूज़ और इसे कैमरे में कैद करते हितेश

अब सुनिए आगे की...जहां महफूज़ हो, वहां कोई गड़बड़ ना हो, ये भला कैसे हो सकता है...महफूज़ ड्राईंग रूम में जाने वाले गेट की चाबी ही ना जाने कहां रख कर भूल गए...इसलिए पिछले गेट से ही अंदर जाना पड़ा...गज़ाला जी किचन में तैयारियों में व्यस्त थीं, हमारी आवाज़ सुनकर बाहर आईं और चिरपरिचित मुस्कान के साथ हमारा अभिवादन किया...अंदर पहुंचे तो टाइम की पंक्चुअल अंजू चौधरी पहले से ही वहां मौजूूूद थीं...फिर धीरे धीरे और भी लोग आते गए...मुकेश कुमार सिन्हा, शाहनवाज़, तारकेश्वर गिरी, सुनीता शानू, वंदना गुप्ता, हितेश शर्मा, आलोक खरे, ब्रजभूषण खरे, संंजय (एनएसडी से जुड़े अभिनेता मॉम, तलवार जैसी कई फिल्मों में अभिनय कर चुके हैं), रमेश सिंह बिष्ट...

चाय की टेबल से ही अंदाज़ लगाइए शानदार मेज़बानी का 


पहले ड्राइंग रूम में ही कोल्ड ड्रिंक और स्नैक्स का दौर चलता रहा...साथ ही हंसी मजाक भी...पहले तो ब्लॉगर मीट के नाम पर ही ठहाके लगे...मैंने कहा भई अब ज़रा मीट नाम से परहेज ही किया करो...ना जाने किसे कब क्या गलतफ़हमी हो जाए कि कौन सा मीट है...आधा घंटा वहीं जमे रहे...आलोक खरे, रमेश सिंह बिष्ट, संजय कुमार और हितेश शर्मा से पहली बार मिला...मिल कर अच्छा लगा...हितेश नौजवान घुमक्कड़ी ब्लॉगर है...इनके ब्लॉग का नाम भी घुमक्कड़ी डॉट कॉम है...इस युवा में कुछ करने का जज्बा दिखा...डिजिटल वर्ल्ड में ही पूर्ण रोज़गार की संभावनाएं तलाशने की ओर अग्रसर हितेश की योजनाओं के बारे में जानना सुखद रहा...


गहन विमर्श के लम्हे को कैद करतीं सुनीता शानू, काली टी शर्ट में होस्ट गज़ाला


बातों में टाइम का पता ही नहीं लग रहा था कि फिर गज़ाला जी ने चाय के लिए बाहर लॉन के पास खुली बैठक में बुला लिया...इस घर में हर चीज़ में नफ़ासत दिखाई दी...और खुले लॉन के तो कहने ही क्या...दिल्ली जैसे भीड़-भाड़ वाले शहर में इस तरह की जगह दिल और दिमाग को बहुत सुकून देती है...इतना खूबसूरत नज़ारा देखकर सभी के मोबाइल फ्लैश चमकने लगे...हितेश के पास प्रोफेशनल कैमरा था...इसलिए वो भी अपना फोटोग्राफी का हुनर दिखाने लगे...फोटो खींचते वक्त हर बार की तरह सबसे लंबे होने की वजह से मुझे, शाहनवाज़ और तारकेश्वर को पिछली पंक्ति में खड़ा होना पड़ा...शाहनवाज़ ने चुटकी भी ली कि ये हमारे साथ नाइंसाफ़ी है...फोटो लिए जाते वक्त हम ढक जाते हैं और बस हमारा चांद सा मुखड़ा ही नज़र आता है...


यूपी वाला ठुमका लगाऊं कि हीरो जैसे नाच कर दिखाऊं


फोटो के साथ खाने-पीने का दौर भी चल रहा था...यहां पीने का अर्थ चाय, पानी और कोल्ड ड्रिंक्स ही निकाला जाए...चलिए अब आपको खाने में क्या क्या था वो भी बता ही देते हैं...इडली साम्भर, नारियल चटनी, खांडवी, समोसा, कई तरह की बर्फी आदि...सब इतना स्वाद कि डायटिंग पर होते हुए भी काफ़ी कुछ चट कर गया...गज़ाला जी को पिछली बार की मेज़बानी का अब तक याद था कि मैं चाय में चीनी नहीं लेता...इसलिए वो मेरे लिए बिना चीनी वाली चाय अलग से लेकर आईं...


तू खींच मेरी फोटो, तू खींच मेरी फोटो...


अब इतना पढ़ने के बाद आप सोच रहे होंगे कि ब्लॉगिंग पर भी कोई बात हुई या नहीं...पहली बात तो ये कि बहुत अर्से बाद सब आपस में मिल रहे थे...इसलिए अनौपचारिक बातों पर ज़्यादा ज़ोर रहा...फिर भी सबसे पहले तो इस बात पर खुशी जताई गई कि एक जुलाई से हिन्दी ब्लॉगिंग में दोबारा जान फूंकने की मुहिम को जिस तरह का समर्थन मिला वो वाकई बहुत उत्साहवर्धक है...हर ब्लॉगर शिद्दत के साथ चाहता है कि ब्लॉगिंग की पुरानी चहल-पहल लौटे और अब इसे लेवल 2 की तरह लेते हुए ऊंचे मकाम पर ले जाया जाए...

आज की इस मुलाकात में चर्चा हुई कि किस तरह ब्लॉगर्स सामूहिक प्रयास से आर्थिक मॉडल खड़ा कर सकते हैं...अब बड़े बड़े मल्टीनेशनल प्लेटफॉर्म्स की हिन्दी समेत तमाम भारतीय भाषाओं के कंटेंट पर नज़र है...अंग्रेजी उनके लिए अब सेचुरेशन लेवल पर आ गई है...इसलिए उन्हें भारत में सारी संभावनाएं क्षेत्रीय भाषाओं में ही दिखाई दे रही हैं...इसलिए ब्लॉगर्स को अब कंटेंट को लेकर बहुत सजग हो जाना चाहिए कि उसे कैसे ज़्यादा से ज़्यादा पाठक मिलें...अगर 100-200 ब्लॉगर्स में ही नेटवर्किंग तक हम अपना दायरा सीमित रखेंगे तो बात नहीं बनने वाली...हम आपस में ही टिप्पणियां देते-लेते हुए ही खुश ना हों...हमें अपना पाठक वर्ग बढ़ाते हुए डिजिटल प्रेसेंस की आवश्यकताओँ जैसे SEO (सर्च इंजन ऑप्टिमाइजेशन), Key Words, SMO (सोशल मीडिया ऑप्टिमाइजेशन) के बारे में भी बुनियादी जानकारी रखनी होगी...जब आपके पास पाठक वर्ग बनने लगेगा तो जिन प्लेटफॉर्म्स को कंटेंट की जरूरत है वो आपको अपने साथ जोड़ना पसंद करेंगे...जाहिर है इससे आपके लिए आर्थिक लाभ की भी अच्छी संभावनाएं बनेंगी...आपकी कोशिश यही होनी चाहिए कि कैसे अच्छे से अच्छा कंटेंट देकर अपने पाठक बढ़ाते जाएं...

इसके अलावा आज की बैठक में हिंदी ब्लॉगिंग के लिए चिट्ठा जगत और ब्लॉगवाणी जैसे मज़बूत एग्रीगेटर दोबारा खड़े करने की आवश्यकता जताई गई...ऐसा ठिकाना जहां सभी को हर पुराने नए ब्लॉगर्स की ताजा पोस्ट आते ही उसकी जानकारी मिल जाए...एग्रीगेटर कोई भी हो उसे अच्छी तरह चलाने के लिए हर साल कुछ न्यूनतम खर्च आता है...इसकी भरपाई एग्रीगेटर चलाने वाला अपनी जेब से ही करता रहे तो ये भी सही नहीं है....अब सही मायने में एग्रीगेटर हमारीवाणी (शाहनवाज़) और ब्लॉग सेतु (केवल राम) ही बचे हैं...इन्हें मज़बूती के साथ चलाना है तो 100 से 500 रुपए तक सालाना अंशदान हर ब्लॉगर आसानी से कर सकता है...इस बारे में शाहनवाज़ और केवल राम को साझा प्रस्ताव तैयार कर मेल के जरिए सभी ब्लॉगर्स को भेजना चाहिए...

एक और बात पर चर्चा हुई...अख़बार और वेबपोर्ट्ल्स को आजकल कंटेंट की आवश्यकता होती है तो उन्हें ब्लॉगर्स से बढ़िया मुफ्त का माल और कहां मिलता है...यहां आपको एक बात समझनी चाहिए कि कोई आपकी सामग्री इस्तेमाल करता है तो आप पर एहसान नहीं करता...ये आपकी बौद्धिक संपदा है, जिसे किसी को भी आपकी अनुमति के बिना उठा लेने का अधिकार नहीं है...आप सिर्फ अपना नाम देखकर और अखबार में छपे हैं ये सोचकर ही खुश मत हो जाया करें...इसकी कीमत भी वसूल करें...अखबार जब किसी का लेख छापता है तो उसे आर्थिक भुगतान करता है या नहीं...आखिर वो चैरिटी के लिए तो काम कर नहीं रहे...वो प्रोफेशनली पैसा कमा रहे हैं तो फिर उन्हें ब्लॉगर्स को भुगतान करने में परेशानी क्यों...इस पर ब्लॉगर्स को मिलकर एक नीति बनानी चाहिए...एकता में शक्ति है, ये ब्लॉगर्स का मूलमंत्र होना चाहिए...

ये तो रही आज की बैठक की बातें...आप सब भी, ब्लॉगिंग को मज़बूत करने के लिए क्या-क्या किया जा सकता है, इस पर अपनी राय से सभी को अवगत  कराएं...#हिन्दी_ब्लॉगिंग का कारवां अब जो दोबारा शुरू हुआ है उसे रूकने नहीं देना है...

जय हिन्द...जय #हिन्दी_ब्लॉगिंग






मंगलवार, 11 जुलाई 2017

पटौदी-शर्मिला से शुरू हुआ क्रिकेट-बॉलिवुड कनेक्शन...खुशदीप


भारत में और कुछ चले ना चले क्रिकेट और सिनेमा खूब चलते हैं...ब्रैंड एंडोर्समेंट की बात हो तो फिल्म स्टार्स और क्रिकेटर्स से ज्यादा पूछ किसी की नहीं...फिल्म स्टार्स और क्रिकेटर्स के आपसी रिश्ते भी 'म्युचुअल एडमायरिंग सोसाइटी' जैसे है...क्रिकेटर्स और हीरोइन्स के अफेयर के कई किस्से सामने आ चुके हैं...

फिल्म स्टार्स में इक्का दुक्का ही ऐसे होंगे जिन्हें प्रोफेशनल क्रिकेट खेलने का अनुभव होगा...लेकिन आजकल जानेमाने क्रिकेटर्स जरूर एक्टिंग में भी हुनर दिखाते नजर आते हैं बेशक ये एड फिल्मस के लिए ही हो...मैदान में जहां वो चौक्के-छक्के मारते नजर आते हैं वहीं स्टूडियोज में डॉयलॉग्स भी बखूबी बोलते नजर आते हैं. मार्केटिंग का जमाना है इसलिए क्रिकेटर्स अपनी ब्रैंड वैल्यू को भुनाना भी जान गए हैं. ये तो है आज की बात...बीते जमाने में कई क्रिकेटर्स ने सीधे बड़े पर्दे पर आ कर एक्टिंग में भी किस्मत आजमानी चाही...ये बात अलग है कि ये सारे क्रिकेटर्स 'वन फिल्म वंडर' ही बन कर रह गए...इन क्रिकेटर्स की कहानी से रू-ब-रू होने से पहले एक दिलचस्प वाकया...

फोटो सौजन्य : क्रिकेटहाईलाइट्स डॉट कॉम 

साठ के दशक में डैशिंग और हैंडसम कप्तान मंसूर अली खान पटौदी का जादू सभी के सिर चढ़ कर बोलता था...आक्रामक कप्तानी हो या बैटिंग, कवर पर चीते जैसी फील्डिंग, नवाब पटौदी की हर अदा निराली थी...1961 में 20 साल की उम्र में टेस्ट करियर की शुरुआत करने वाले पटौदी 1962 में 21 साल 77 दिन की उम्र में वो भारतीय टीम के कप्तान बन गए...दुनिया में सबसे कम उम्र में कप्तान बनने का रिकॉर्ड पटौदी के नाम 42 साल तक कायम रहा...भारत में आज भी सबसे कम उम्र में कप्तान बनने का रिकॉर्ड उन्हीं के नाम है... 

पटौदी के टेस्ट क्रिकेट में पदार्पण के तीन साल बाद बॉलिवुड में बंगाल की बाला शर्मिला टैगोर ने 'कश्मीर की कली' बन कर करियर का आगाज किया...पटौदी और शर्मिला की पहली मुलाकात 1965 में एक कॉमन फ्रेंड के घर पर हुई...शर्मिला की खूबसूरती पर पटौदी पहली ही नजर में फिदा हो गए...बताते हैं कि पटौदी ने शर्मिला को इम्प्रैस करने के लिए रेफ्रिजेरेटर जैसा कीमती गिफ्ट भी दिया था...धीरे-धीरे शर्मिला को भी पटौदी पसंद आने लगे...बताया जाता है कि पटौदी मैदान पर जब भी कुछ खास करते थे तो शर्मिला सेट पर मौजूद सभी लोगों को चाय-समोसे की पार्टी देती थीं...लेकिन दोनों के परिवारों को ये रिश्ता पसंद नहीं था...पटौदी खानदान नहीं चाहता था कि फिल्मों में काम करने वाली लड़की दुल्हन बनकर घर आए...वहीं शर्मिला का सभ्रांत परिवार नहीं चाहता था कि उनकी लड़की दूसरे धर्म में शादी करे...लेकिन मियां-बीवी राजी तो क्या करेगा काजी वाली कहावत पटौदी-शर्मिला के रिश्ते में सही साबित हुई..

आखिर 27 दिसंबर, 1969 को वो दिन भी आया जब शर्मिला नवाब पटौदी से निकाह करने के बाद आयशा सुल्ताना बन गईं...रील लाइफ में उन्होंने शर्मिला टैगोर नाम से ही काम करना जारी रखा...पटौदी और शर्मिला की शादी के बाद कयास लगाए जाते थे कि ये जोड़ी ज्यादा दिन तक साथ नहीं रह पाएगी...ये बात अलग है कि 42 साल तक दोनों का शानदार साथ रहा...ये साथ 22 सितंबर 2011 को 70 साल की उम्र में नवाब पटौदी के इंतकाल के साथ टूटा...

यहां ये भी गौर करने लायक है कि मंसूर अली खान पटौदी के पिता इफ्तिखार अली खान पटौदी भी क्रिकेटर थे. उनके नाम इंग्लैंड और भारत, दोनों देशों की टीमों से टेस्ट खेलने की उपलब्धि दर्ज है...हालांकि पटौदी खानदान में क्रिकेट की विरासत मंसूर अली खान पटौदी तक ही सीमित होकर रह गई लगती है...पटौदी और शर्मिला की तीन संतान हैं- सैफ अली खान, सबा अली खान और सोहा अली खान...

सैफ और सोहा ने मां शर्मिला के नक्शे कदम पर चलते हुए एक्टिंग को अपनाया. वहीं सबा ने जूलरी डिजाइनिंग को करियर बनाया. सैफ अली खान की पहली पत्नी अमृता सिंह से दो संतान हैं- बेटी सारा अली खान और बेटा इब्राहिम अली खान...सारा अली खान बॉलिवुड में आगाज करने को तैयार हैं वहीं 16 साल के इब्राहिम अली खान की क्रिकेट को करियर बनाने में दिलचस्पी नजर नहीं आती...सैफ अली खान की दूसरी पत्नी करीना कपूर से एक संतान है तैमूर अली खान...तैमूर का जन्म 20 दिसंबर 2016 को लंदन में हुआ...अभी ये अंदाज लगाना मुश्किल है कि तैमूर की बड़े होकर दादा-पड़दादा की तरह क्रिकेट में दिलचस्पी जगती है या नहीं... 

मंसूर अली खान पटौदी-शर्मिला टैगोर के बाद क्रिकेटर-फिल्म स्टार जोड़ी के सिलसिले को पाकिस्तान के पूर्व ओपनर मोहसिन खान ने भारत में अपने जमाने की मशहूर हीरोइन रही रीना रॉय से शादी कर आगे बढ़ाया...1 अप्रैल 1983 को हुई ये शादी ज्यादा साल तक नहीं चल सकी...

क्रिकेट और ग्लैमर वर्ल्ड के रिश्ते में अगले नाम जुड़े स्टाइलिश बैट्समैन अजहरूद्दीन और संगीता बिजलानी के...अजहरूद्दीन ने पहली पत्नी नोरीन को तलाक देकर 1996 में संगीता बिजलानी से शादी की...हालांकि बाद में इन दोनों की राहें भी अलग हो गईं...अजहरूद्दीन के ऊपर बनी फिल्म 'अजहर' में इस रिश्ते को भी दिखाया गया था...

हाल के दिनों में क्रिकेटर्स और फिल्म स्टार्स के बीच जोड़ियां बनने का सिलसिला और तेज हुआ है...पहले टर्बनेटर के नाम से मशहूर स्पिनर हरभजन सिंह ने एक्ट्रेस गीता बसरा से शादी की...फिर युवराज सिंह भी हेजल कीच के जीवन साथी बन गए...हाल में टीम इंडिया के सीमर रह चुके जहीर खान ने चक दे फेम एक्ट्रेस सागरिका घाटगे के साथ सगाई की है....इन दिनों भारतीय क्रिकेट की धड़कन माने जाने वाले कप्तान विराट कोहली और फिल्म स्टार अनुष्का शर्मा के अफेयर के चर्चे भी पिछले काफी समय से सुने जा रहे हैं...   

अगली कड़ी में पढ़िएगा वो कौन सा क्रिकेटर है जो सबसे पहले बड़े पर्दे पर हीरो के तौर पर नजर आया...ये क्रिकेटर तो एक फिल्म से आगे नहीं बढ़ सका...लेकिन इस क्रिकेटर के साथ जिस एक्ट्रेस ने अपने करियर का आगाज किया था, उसने आगे चलकर बॉलिवुड में खूब नाम कमाया और अमिताभ बच्चन के साथ भी कई हिट फिल्मों में काम किया...साथ ही और भी ढेर सारे क्रिकेटर्स की कहानी जो बड़े पर्दे पर तो चमके लेकिन सिर्फ एकाध फिल्म में ही...

#हिन्दी_ब्लॉगिंग 

शनिवार, 8 जुलाई 2017

छोरियां अभी तो छोरों से कम ही दिखें...खुशदीप


तारीख- 18 जून 1983

जगह- टर्नब्रिज, वेल्स

ये तारीख और जगह बहुत खास है...या यूं कहिए कि भारत के क्रिकेट की टर्निंग प्वाइंट है ये तारीख...इस दिन एक शख्स ने अकेले दम पर भारतीय क्रिकेट का वो आधार तैयार किया जिसने उस टूर्नामेंट में ना सिर्फ भारत को पहला वर्ल्ड कप दिलाया बल्कि देश में क्रिकेट के सुनहरे काल की बुनियाद रख दी...ये शख्स और कोई नहीं भारत के पूर्व कप्तान कपिल देव हैं...उस तारीख को भारत का मैच जिम्बाब्वे जैसी अपेक्षाकृत नौसिखिया टीम से था...भारत पहले बैटिंग कर रहा था...लेकिन ये क्या एक के बाद एक भारत के दिग्गज बैट्समैन पवेलियन लौटने लगे...17 रन बनते बनते भारत के पाँच विकेट डाउन...गावस्कर 0, श्रीकांत 0, मोहिन्द्र अमरनाथ 5, संदीप पाटिल 1 और यशपाल शर्मा 9 रन बना कर चलते बने...7वें नंबर पर बैटिंग करने कपिल उतरे...तब तक सबने मान लिया था कि भारत गया काम से और वर्ल्ड कप में उसकी चुनौती खत्म...लेकिन कपिल ने हार नहीं मानी...अकेले दम पर लड़ने का फैसला किया...रोजर बिन्नी, मदन लाल और सैयद किरमानी जैसे पुछल्ले बैट्समैन ने कुछ कुछ देर टिके रह कर कपिल का साथ दिया...भारत की पारी खत्म हुई तो स्कोर था 8 विकेट पर 266 रन...इसमें अकेले कपिल का स्कोर था 175 रन...कपिल ने ये रन महज़ 138 गेंद में 16 चौक्कों और 6 छक्कों की मदद से बनाए...फिर भारत ने 235 रन पर जिम्बाब्वे को आल आउट कर मैच 31 रन से जीत लिया...

आज इस मैच को याद कराने का मेरा ख़ास मकसद है...इसमें रोमांच, हीरोइज्म़, सुखद नतीजा वो सभी कुछ था जो  किसी को भी क्रिकेट का मुरीद बना देता...लेकिन अब बताता हूं असली बात...मैं कॉलेज में था और इस मैच की रनिंग कमेंट्री दोस्तों के साथ रेडियो पर सुन रहा था...सांसें रोक देने वाली कपिल की बैटिंग को मैं टीवी पर नहीं देख पाया...मैं क्या दुनिया में कोई भी क्रिकेट प्रेमी इस मैच को टीवी पर नहीं देख सका...ना ही बाद में किसी ने इस मैच की रिकॉर्डिंग को देखा...दरअसल, इस मैच की रिकॉर्डिग हुई ही नहीं थी...उस दिन बीबीसी में हड़ताल की वजह से कोई कैमरामैन मैदान में नहीं पहुंचा...सभी क्रिकेटप्रेमी कपिल के करिश्मे को टीवी पर देखने से वंचित रह गए...मुझे और मेरे दोस्तों को मैच की कमेंट्री रेडियो पर सुनते यही मलाल हो रहा था कि काश टीवी पर इसे देख पाते...गुस्सा भी बहुत आ रहा था...लेकिन भारत मैच जीत गया और बाद में वर्ल्ड कप भी जीता...उस खुमार में सारा गुस्सा काफ़ूर हो गया...

जैसा गुस्सा उस दिन आया, वैसा ही आज स्टार स्पोर्ट्स 2 चैनल पर आया...दरअसल, आज यानि 8 जुलाई को इंग्लैंड के लीसेस्टर में महिला ओडीआई वर्ल्ड कप में भारत और साउथ अफ्रीका के बीच मैच खेला गया...इस मैच में विशेष तौर पर भारत की कप्तान मिताली राज पर पूरी दुनिया की नजरें थीं...मिताली राज आज के मैच में 41 रन बना लेंती तो दुनिया में वनडे मैचों में 6000 रन पूरे करने वाली दुनिया की पहली महिला क्रिकेटर बन जातीं...अफसोस मिताली आज के मैच में ये उपलब्धि हासिल नहीं कर सकीं और साउथ अफ्रीका के ख़िलाफ़ मैच में बिना खाता खोले ही पवेलियन लौट आईं...भारत मैच भी हार गया...मुझे पूरा विश्वास है कि मिताली जल्दी ही ये उपलब्धि हासिल कर, शायद अगले मैच में ही, दुनिया में तिरंगे का मान बढ़ाएंगी...मिताली वैसा ही इतिहास कायम करने में सफल रहेंगी जैसा कि कभी पुरुष क्रिकेट में सुनील गावस्कर और फिर सचिन तेंदुलकर ने बनाया था...(मिताली पर शुक्रवार को मैंने आंकड़ों के साथ पूरी पोस्ट लिखी थी)...



छुट्टी वाले दिन मैं बड़े चाव के साथ आज भारत और साउथ अफ्रीका का मैच देखने बैठा...इसी आस के साथ मिताली को इतिहास बनाते देखूंगा...स्टार स्पोर्ट्स 2 चैनल पर अभी तक महिला वर्ल्ड कप के मैच आते रहे हैं...सोचा कि आज भी मैच आएगा...लेकिन दोपहर बाद मैच शुरू होने के वक्त चैनल लगाया तो जो मैच देखना था वो नदारद...आज कोई 1983 की तरह बीबीसी जैसी हड़ताल भी नहीं थी...फिर क्या वजह ये मैच नहीं दिखाने की...इसके पीछे की वजह है पुरुष प्रधान मानसिकता...जो चैनल के कर्ताधर्ताओं से लेकर मार्केटिंग एजेंट्स तक सभी जगह हावी है...ये मैच इसलिए नहीं दिखाया गया क्योंकि इंग्लैंड और साउथ अफ्रीका की पुरुष टीमों के बीच लॉर्ड्स पर टेस्ट मैच खेला जा रहा था, जिसे दिखाना इन पुरुष प्रधान सोच वालों के लिए ज़्यादा ज़रूरी था...अरे ये मैच दिखाते तो महिलाओं का मैच भी दिखाते चाहे दूसरे चैनल पर ही सही...ये तो अच्छा है कि इंटरनेटी युग है...इसलिए इंटरनेट के जरिए Hotstar  पर 5 मिनट के विलंबित प्रसारण के साथ भारत और साउथ अफ्रीका महिला वर्ल्ड कप मैच देखने को मिल गया...

अब यहां दिमाग में एक कल्पना कीजिए...मान लीजिए पुरुषों का वर्ल्ड कप हो रहा है...वहीं साथ ही किन्हीं दो देशों में महिला टीमों के बीच टेस्ट मैच हो रहा है...तो क्या कोई टीवी प्रसारक ऐसी ज़ुर्रत करेगा कि पुरुषों के वर्ल्ड कप मैच को ना दिखाकर महिलाओं के टेस्ट मैच को दिखाए...हर्गिज नहीं दिखाएगा जाएगा...क्योंकि दुनिया पुरुष प्रधान सोच और बाज़ारवाद से चलती है...महिलाओं के मैच को टीवी पर दिखाना टीआरपी के नजरिए से फिलहाल बिकाऊ सौदा नहीं है, इसलिए उसे गिराने के फैसले में पलक झपकने का भी वक्त नहीं लिया...

हम अपने देश पर ही आते हैं...ज़रा दिल पर हाथ रख कर बताइए कि जैसे हम क्रिकेट में सचिन तेंदुलकर, महेंद्र सिंह धोनी, विराट कोहली आदि को सिर आंखों पर बिठाते हैं, वैसे हमने क्या कभी मिताली राज या बोलिंग लीजेंड झूलन गोस्वामी को मान दिया है...एक ही खेल है...खेल के प्रशासक भी वही हैं, फिर ये भेदभाव क्यों? स्टार पुरुष क्रिकेटर्स पर पैसों की बरसात तो महिला स्टार क्रिकेटर्स पर क्यों नहीं...मिताली राज और झूलन गोस्वामी दोनों की उम्र आज 34 वर्ष है...दोनों ही डेढ़ दशक से भी ज्यादा से भारत की अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में नुमाइंदगी कर रही हैं...मिताली राज 2004 में ही कप्तान बन गई थीं...इतने लंबे समय तक तो शायद भारतीय पुरुष टीम में कोई भी कप्तान नहीं रहा...महेंद्र सिंह धोनी भी नहीं...

यहां अगर मैं कहूं कि रातों रात भेदभाव खत्म हो जाएगा और महिलाओं से खेलों में बराबरी का व्यवहार होने लगेगा तो ये सिर्फ कोरी कल्पना ही होगी...फिर ये भेदभाव कैसे खत्म होगा...ये तभी होगा जब हम सबसे पहले अपनी मानसिकता बदलेंगे...अधिक से अधिक बेटियां खेल में करियर बनाने के लिए आगे आएं...कोई मिताली-झूलन जी-तोड़ मेहनत कर नाम कमाएं तो उन्हें भी बीसीसीआई, सरकार और प्रायोजकों की तरफ़ से वैसा ही प्रोत्साहन मिले जैसा कि पुरुष स्टार क्रिकेटर्स को मिलता है...ऐसा माहौल बनेगा तो अधिक लड़कियां खेलों की ओर प्रेरित होंगी...क्रिकेट ही क्यों, हर खेल में ही क्यों नहीं...यहां दंगलफिल्म का डॉयलॉग याद आता है, मेडल छोरा लाए या छोरी, मेडल तो मेडल ही होता है, उससे मान तो तिरंगे का ही बढ़ता है...अब दंगल में कोई तो बात होगी जो चीन जैसे खेल प्रधान देश में भी उसका जादू सिर चढ़ कर बोल रहा है...

भारत में सानिया मिर्जा (टेनिस), साइना नेहवाल, पीवी सिंधू (बैडमिंटन) जैसी कुछ खिलाड़ी अपनी मेहनत से ऊंचे मकाम पर पहुंची लेकिन जहां महिलाओं की टीम स्पर्धाओं का उल्लेख होता है तो उन्हें कवरेज के लिहाज से बोरिंग ही माना जाता है...कवरेज में सबसे ज्यादा भेदभाव होता है...रिसर्च बताती हैं कि स्पोर्ट्स मीडिया आउटलेट्स महिलाओं के गेम की कवरेज को हल्के में लेते हैं...सुस्त कैमरावर्क, कम एक्शन रीप्ले और सब स्टैंडर्ड कमेंट्री...जबकि आज के प्रतिस्पर्धात्मक युग में विजिबिलिटी ही मैटर करती है...

महिला खेलों को देखने के लिए जितने दर्शक बढ़ेंगे, उतना ही उनसे भेदभाव खत्म होगा...मार्केट फोर्सेज भी मजबूर होंगी...महिला खेलों के लिए अधिक स्पॉन्सर्स आगे आएंगे...उन्हें मेहनताने के तौर पर अच्छी रकम मिलेगी...ब्रैंड इमेजिंग वाली कंपनियां महिला खिलाड़ियों को भी तवज्जो देने लगेंगी...

अभी ये तर्क दिया जाता है कि महिला खेल स्पर्धाओं को अधिक दर्शक नहीं मिलते, इसलिए उन्हें टीवी और मार्केट में ज्यादा भाव नहीं दिया जाता...लड़कियां स्पोर्ट्स को करियर बनाने के लिए ज्यादा आगे आएं...साथ ही स्पॉन्सरशिप्स, कवरेज, खेल संगठनों और आयोजकों में भी पूर्व खिलाड़ी रह चुकी महिलाओं और कुशल महिला प्रशासकों को अधिक जगह मिले तो उनकी सुनी भी जाएगी...अभी तो उनकी भागीदारी ना के बराबर है...इस दिशा में खेल मंत्रालय समेत राज्य सरकारों को भी ध्यान देना होगा...योग्य  महिला खिलाड़ियों को छात्रवृत्ति, सरकारी नौकरी देकर पुरुस्कृत किया जाना चाहिए...उन्हें ये चिंता नहीं होनी चाहिए कि स्पोर्ट्स को करियर बनाने से सम्मानित जिंदगी जी पाएंगी या नहीं...

यहां हम सब को सोच बदलनी होगी...अभी पाकिस्तान के पूर्व क्रिकेट कप्तान और सीमर वकार यूनुस ने ट्वीट में कहा है कि महिलाओं के वनडे मैचों के लिए ओवर्स की संख्या 50 से घटा कर 30 कर देनी चाहिए...ये खेल को अधिक मनोरजंक और प्रतिस्पर्धात्मक बनाएगा...कम ओवर होंगे तो तेज गति होगी मतलब ज्यादा दर्शक आएगे...यूनुस के मुताबिक 50 ओवर महिलाओँ के लिए बहुत ज्यादा होते हैं यानि इतने ओवर्स खेलने के लिए जितना स्टैमिना होना चाहिए उतना महिलाओं के पास नहीं होता...वकार यूनुस ने अपनी बात को सही साबित करने के लिए ये तर्क भी दिया है कि टेनिस में भी तो पुरुषों के लिए मैच में 5 सेट और महिलाओं के लिए सिर्फ 3 सेट ही रखे जाते हैं...यूनुस ये लिखना भी नहीं भूले कि उनके बयान को महिलाओं को लेकर भेदभाव से जोड़ कर नहीं देखा जाना चाहिए और ना ही उनके मन में कोई दुर्भावना है...

इस सोच के पीछे वकार के अपने तर्क हो सकते हैं लेकिन इसका सटीक जवाब ऑस्ट्रेलिया की क्रिकेटर एलिसा हीली ने दिया...हीली ने कहा कि महिलाओँ के 50 ओवर के मैच में 530 रन बनना क्या मनोरंजक नहीं है...एक ही  मैच में दो खिलाड़ियों ने शानदार प्रदर्शन किया...हीली महिला वर्ल्ड कप में हुए ऑस्ट्रेलिया-श्रीलंका मैच का हवाला दे रही थीं...इस मैच में श्रीलंका की चमारी अट्टापट्टू ने 178 रन की पारी खेली...इसका जवाब ऑस्ट्रेलियाई कप्तान मेग लेनिंग ने 152 रन नाबाद की पारी से अपनी टीम को जिता कर दिया...

आपने सब बातें पढ़ लीं लेकिन अभी सबसे अहम आना बाकी हैं...वो है एक पत्रकार के सवाल में भारतीय महिला टीम की कप्तान मिताली राज का जवाब...दरअसल इस वर्ल्ड कप के लिए भारत से इंग्लैंड रवानगी से पहले बेंगलुरू में मिताली राज से किसी पत्रकार ने ये सवाल पूछ लिया था कि उनका सबसे पसंदीदा पुरुष क्रिकेटर कौन है? इस सवाल का जवाब देने में मिताली ने एक मिनट की भी देर नहीं लगाई...मिताली ने पलटकर कहा कि यही सवाल पुरुष क्रिकेटर्स से क्यों नहीं पूछा जाता कि उनकी पसंदीदा महिला क्रिकेटर कौन सी हैमिताली ने कहा कि मुझसे ये सवाल अक्सर किया जाता है...क्यों मेरा पसंदीदा क्रिकेटर पुरुष ही होना चाहिए, महिला क्रिकेटर क्यों नहीं...

मिताली ने सुलझा हुआ जवाब दिया कि पुरुष क्रिकेटर्स को लेकर कोई दुर्भावना नहीं है...बल्कि पुरुष क्रिकेटर्स ने कुछ मानदंड तय कर रखे हैं जहां तक महिला क्रिकेटर्स को पहुंचना है...हम इसलिए पुरुषों का क्रिकेट देखते हैं कि हमारा स्तर भी उन तक पहुंच जाएं...मिताली ने ये बात मानी कि महिला क्रिकेटर्स को लेकर अब स्थिति में बदलाव आना शुरू हुआ है...इसके लिए बीसीसीआई की कोशिशों की उन्होंने तारीफ भी की...मिताली ने कहा कि पहले महिला क्रिकेट मैचों का टीवी पर प्रसारण नहीं होता था इसलिए उनके बारे में कोई ज्यादा जानता नहीं था...लेकिन बोर्ड ने पिछली दो सीरीज का टीवी प्रसारण किया है...इसके अलावा सोशल मीडिया के आने से भी महिला खिलाड़ियों के हक में आवाज उठने लगी है....

मिताली की आखिरी बात पर ही मेरा जोर है...सोशल मीडिया हमारे हाथ में है...वहां तो हम महिला खिलाड़ियों के हक़ में पुरजोर आवाज़ उठा ही सकते हैं...ऐसा होगा तो खेल के कर्णधारों पर दबाव बढ़ेगा...महिला खिलाड़ियों को अधिक से अधिक मौके, मान-सम्मान मिले, यही हमारी कोशिश होनी चाहिए...यहां सवाल पुरुष खिलाड़ियों को कम कर आंकने का नहीं बराबरी का है...हमारे छोरे कमाल के हैं तो हमारी छोरियां भी किसी से कम हैं के...


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शुक्रवार, 7 जुलाई 2017

8 जुलाई को तैयार रहें इतिहास बनता देखने के लिए...खुशदीप


शनिवार, 8 जुलाई 2017, दोपहर बाद 3.30 बजे, जगह लीसेस्टर...




तैयार हो जाइए, अपनी आंखों से इतिहास बनता देखने के लिए...अगर सब कुछ सही रहा तो महिला क्रिकेट में भारत के लिए वही होने जा रहा है जो पुरुष क्रिकेट में कभी सुनील गावस्कर और सचिन तेंदुलकर ने किया....गावस्कर के नाम दुनिया का पहला दस हजारी टेस्ट रन वाला क्रिकेटर बनने की उपलब्धि दर्ज है...वहीं सचिन ने दुनिया में सर्वाधिक 15,921 टेस्ट रन, सर्वाधिक 18,426 वनडे रन (कुल 24,417) का करिश्मा अपने नाम दर्ज कर रखा है....

ये तो थे क्रिकेट के भगवान की बात...अब क्रिकेट की देवी की भी बात कर ली जाए...जी हां, बात कर रहा हूं भारतीय क्रिकेट टीम की कप्तान और क्लासिक बल्लेबाज मिताली राज की...मिताली इतिहास रचने से सिर्फ 41 रन की दूरी पर खड़ी हैं...अगर सब सही रहा तो पूरी संभावना है कि मिताली 8 जुलाई 2017 को वो कारनामा कर देंगी जो अब दुनिया में किसी महिला क्रिकेटर ने नहीं किया....शनिवार को 34 वर्षीय मिताली अगर 41 रन बनाती हैं तो वो महिला ओडीआई क्रिकेट में 6000 रन पूरे करने वाली क्रिकेटर बन जाएंगी....मिताली इंग्लैंड की शार्लेट एडवर्ड्स (191 मैच, 5,992 रन) से सिर्फ 33 रन पीछे हैं...मिताली शनिवार को अपने 182वें मैच में शार्लेट को पीछे छोड़ते हुए 6000 रन बनाने वाली पहली महिला क्रिकेटर बनें, यही हर भारतीय देखना चाहता है...

मौजूदा महिला ओडीआई वर्ल्ड कप में जिस तरह भारतीय टीम और खुद कप्तान मिताली का फॉर्म का चल रहा है, उसने हर भारतीय का सीना गर्व से चौड़ा कर दिया है...सेकेंड डाउन बैटिंग करने आने वाली मिताली राज ने 26 जून 1999 को आयरलैंड के खिलाफ ओडीआई मैच से अपने इंटरनेशनल करियर का आगाज़ किया था...अब तक 181 ओडीआई मैचों में मिताली 51.81 के औसत से 5,959 रन बना चुकी हैं...ओडीआई के अलावा मिताली ने 10 टेस्ट मैच में 663 रन और 63 टी20 मैचों में 1,708 रन बनाए हैं...सचिन का ओडीआई क्रिकेट में औसत 44.83 रहा है.... 

घरेलू क्रिकेट में रेलवे की ओर से खेलने वाली मिताली  इंटरनेशनल क्रिकेट में 18 साल पूरे कर चुकी हैं...अगर सचिन का इंटरनेशनल करियर 24 साल का रहा तो मिताली का इतने साल तक अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में टिके रहना और अब भी गजब की फॉर्म में होना कम बड़ी उपलब्धि नहीं है क्या...

मिताली के नेतृत्व में भारतीय टीम मौजूदा वर्ल्ड कप में 4 लगातार जीत हासिल कर सेमीफाइनल के दरवाजे तक पहुंच चुकी है...अभी तक भारतीय टीम इस वर्ल्ड कप में मेजबान इंग्लैंड, वेस्ट इंडीज, पाकिस्तान और श्रीलंका को धूल चटा चुकी है...

जहां बैटिंग में मिताली राज भारतीय टीम की रीढ़ हैं वहीं बोलिंग में झूलन गोस्वामी के ऊपर ये जिम्मेदारी हैं...झूलन दुनिया में सबसे अधिक 901 ओडीआई विकेट लेने वाली महिला क्रिकेटर हैं...मिताली राज की ही उम्र यानि 34 वर्ष की झूलन की बोलिंग में दुनिया में नंबर 3 रैकिंग है.  मिताली राज की दुनिया में बैटिंग में नंबर 2 रैकिंग है...जिस फॉर्म में भारतीय टीम है, इस बार पूरी संभावना है कि पहली बार महिला वर्ल्ड कप भारत की झोली में आ जाए...

खैर अब आता हूं इस बात पर कि 'किक्रेट के भगवान' सचिन तेंदुलकर की तुलना में मिताली राज के रिकॉर्ड्स भी कम नहीं हैं...

- मिताली ने इस वर्ल्ड कप में अब तक चार मैचों में 71, 46, 8,  53 रन बनाए हैं...इस वर्ल्ड कप से पहले खेले गए 6 लगातार मैचों में मिताली का स्कोर था- 70*, 64, 73*,51*, 54 और 62*...इस तरह मिताली लगातार 7 अर्द्धशतक जड़ कर अंतरराष्ट्रीय रिकॉर्ड अपने नाम दर्ज कर लिया...

- मिताली अब तक दुनिया में सर्वाधिक 48 ओडीआई अर्धशतक जड़ चुकी है...उनसे पहले ये रिकॉर्ड इंग्लैंड की शारलट एडवर्ड्स के नाम था जिन्होंने 191 मैच में 46 हॉफ सेंचुरी ठोकी....

-100 से अधिक ओडीआई खेलने वालीं क्रिकेटर्स में दुनिया में सबसे अच्छा औसत 51.81 मिताली का है... 

-2004 में मिताली 21 साल की उम्र में भारतीय महिला टीम की सबसे युवा कप्तान बनी थीं...तब से अब तक वो 100 मैचों में भारत की कप्तानी कर चुकी हैं...जो कि भारत में किसी भी महिला क्रिकेट कप्तान के लिए रिकॉर्ड है...

-मिताली के नेतृत्व में भारतीय टीम ने 2005 से 2008 के बीच 3 एशिया कप में जीत हासिल की...मिताली के नेतृत्व में ही 2005 ओडीआई वर्ल्ड कप में भारत ने अब तक का श्रेष्ठ प्रदर्शन करते हुए दूसरा स्थान हासिल किया था...

-इंग्लैंड में पहली बार टेस्ट सीरीज में विजय पाने वाली भारतीय टीम की अगुआई भी मिताली ने ही की थी...

-मिताली का नाम विजडन ने 'क्रिकेट की 5 सर्वकालीन श्रेष्ठ खिलाड़ियों में से एक' के तौर पर शुमार किया है...

क्रिकेट में हर सुनहरा पल देख चुकीं मिताली का बस एक ही सपना अब तक अधूरा है...वो है महिला क्रिकेट में भारत को पहला वर्ल्ड कप दिलाना... हर भारतीय को दुआ करनी चाहिए कि मिताली के नेतृत्व में भारत की शेरनियां 23 जुलाई 2017 को लॉर्ड्स में खेले जाना वाला फाइनल भी जीतें और वर्ल्ड कप लेकर भारत लौंटे...

तथास्तु....   आमीन...  

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बुधवार, 5 जुलाई 2017

प्रणब दा को पीएम ना बनाना कांग्रेस की ऐतिहासिक भूल...खुशदीप


24 जुलाई 2017 से प्रणब मुखर्जी का नाम का लेते हुए राष्ट्रपति के साथ पूर्व जुड़ जाएगा...सवाल होंगे प्रणब दा का राष्ट्रपति के तौर पर कार्यकाल कैसा रहा? वो भी ऐसा कार्यकाल जिसमें 3 साल का वक्त उन्होंने नरेंद्र मोदी की अगुआई वाली एनडीए सरकार के साथ गुजारा...जन्मजात कांग्रेसी रहे प्रणब दा का धुर विरोधी विचारधारा का प्रतिनिधित्व करने वाली पार्टी की सरकार के साथ तालमेल बिठाना आसान नहीं माना जा रहा था...मई 2014 में मोदी सरकार ने केंद्र में सत्ता संभाली तो ऐसे कयास लगाने वालों की कमी नहीं थी कि राष्ट्रपति की गद्दी पर प्रणब दा जैसे मंझे राजनेता के होते उनसे हर मुद्दे पर पार पाना आसान नहीं होगा.

धुर विपरीत विचारधारा के साथ पटरी

अब जब प्रणब दा राष्ट्रपति के तौर पर कार्यकाल पूरा करने जा रहे हैं तो पीएम नरेंद्र मोदी समेत पूरी सरकार उनकी तारीफ करते नहीं थक रही है...मोदी तो प्रणब दा को पितातुल्य बता चुके हैं. मोदी का कहना है गुजरात से दिल्ली आकर जल्दी सैटल होना संभव नहीं होता, अगर प्रणब दा मदद नहीं करते. इतिहास और राजनीतिक शास्त्र में मास्टर्स के साथ लॉ की डिग्री रखने वाले प्रणब को धर्मनिरपेक्षता की घुट्टी उनके कांग्रेसी और स्वतंत्रता सेनानी पिता कामादा किंकर मुखर्जी और मां राजलक्ष्मी से मिली. 

प्रणब ने किसे बताया देश का अब तक का सबसे स्वीकार्य प्रधानमंत्री

पांच बार के राज्यसभा सदस्य और दो बार के लोकसभा सदस्य प्रणब के राजनीतिक करियर की मेंटर इंदिरा गांधी थीं. इंदिरा गांधी ने ही उन्हें पहली बार 1973 में केंद्र में राज्य मंत्री बनाया. इंदिरा की राष्ट्रपति रहते हुए ही प्रणब ने प्रशंसा भी की और उन्हें देश का सबसे अधिक स्वीकार्य प्रधानमंत्री भी बताया...

बता दें कि इंदिरा गांधी ने ही 1982 में प्रणब दा को वित्त मंत्रालय जैसा महत्वपूर्ण विभाग सौंपा. 1980 से 1985 तक प्रणब दा राज्यसभा में सदन के नेता रहे, इससे पता लगाया जा सकता है कि इंदिरा कैबिनेट में ही प्रणब का कद कितना बड़ा था. लेकिन 31 अक्टूबर 1984 को इंदिरा गांधी की हत्या के बाद से ही कांग्रेस प्रणब मुखर्जी की असली प्रतिभा को पहचानने में चूक करती रही या यूं कहें जानबूझकर नज़रअंदाज़ करती रही...

तीन मौकों पर प्रणब को पीएम बना सकती थी कांग्रेस 

कांग्रेस के सामने ऐसे कम से कम तीन मौके आए जब प्रणब मुखर्जी की वरिष्ठता, योग्यता को देखते हुए उन्हें आसानी से प्रधानमंत्री बनाया जा सकता था लेकिन नहीं बनाया गया. अगर ऐसा किया होता तो निश्चित रूप से कांग्रेस की ऐसी हालत नहीं होती जैसी कि आज है. कांग्रेस प्रणब को 33 साल पहले ही 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद प्रधानमंत्री बना सकती थी. उस वक्त भी प्रणब दा इंदिरा गांधी के बाद सरकार में सबसे बड़ा कद रखते थे. राजीव गांधी उस वक्त राजनीति के लिए नौसिखिए ही थे. राजीव को 1984 में बिना कैबिनेट की बैठक के ही राष्ट्रपति जैल सिंह ने प्रधानमंत्री नियुक्त कर दिया. इंदिरा की हत्या से उपजी सहानुभूति से कांग्रेस को तब लोकसभा चुनाव में प्रचंड बहुमत जरूर मिला लेकिन राजीव गांधी को 5 साल बाद ही चुनाव में शिकस्त के बाद सत्ता से हटना पड़ा. कांग्रेसी विश्वनाथ प्रताप सिंह ने ही बगावत कर बोफोर्स खरीद में कथित भ्रष्टाचार को लेकर ऐसे गोले दागे कि राजीव गांधी चुनाव में उनके सामने टिक नहीं सके. 1984 में कांग्रेस ने प्रणब दा जैसे सीज़न्ड व्यक्ति को प्रधानमंत्री बना दिया होता तो वो ना सिर्फ मजबूत सरकार देते बल्कि ऐसा पुख्ता आधार भी तैयार कर देते कि कुछ और राजनीतिक और संसदीय अनुभव हासिल करने के बाद राजीव गांधी देश का निपुणता के साथ नेतृत्व कर सकते. 


राजीव गांधी ने 1989 में सत्ता से हटने के बाद राजनीतिज्ञ के तौर पर बहुत कुछ सीखा....लेकिन 21 मई 1991 को हुए आतंकी हमले ने उन्हें हमेशा के लिए छीन लिया...राजीव गांधी की हत्या के बाद भी उपजी सहानुभूति का कांग्रेस को फायदा मिला...और अल्पमत से ही सही वो केंद्र में सरकार बनाने की स्थिति में आ गई. उस वक्त भी प्रणब दा से सीनियर नेता और कोई कांग्रेस में नहीं था. लेकिन तब प्रधानमंत्री के नाम के लिए नरसिंह राव के नाम पर मुहर लगी. राजनीतिक जानकार यहां इस थ्योरी का तर्क देते हैं कि किसी ज्यादा प्रभावशाली नेता को प्रधानमंत्री बनाने से कहीं '10, जनपथ' की अहमियत ही ना घट जाती. दिलचस्प बात ये है कि प्रधानमंत्री बनने से पहले नरसिंह राव स्वास्थ्य कारणों से राजनीति को टाटा-बॉय बॉय का मन बना रहे थे....लेकिन प्रधानमंत्री की गद्दी मिलते ही उनका स्वास्थ्य भी चोखा हो गया और वो पूरी ठसक के साथ सरकार चलाने लगे...यहां तक कि '10, जनपथ' को भी कई मौकों पर उन्होंने नजरअंदाज करने से गुरेज नहीं किया. 

प्रधानमंत्री पद के लिए प्रणब दा की तीसरी बार अनदेखी 2004 में हुई...सोनिया गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस ने कथित शाइनिंग एनडीए को धूल चटा दी थी...कांग्रेस के एकसुर में आग्रह करने के बाद भी सोनिया गांधी प्रधानमंत्री बनने को तैयार नहीं हुईं...यूपीए का नेतृत्व करने के लिए कांग्रेस ने डॉ मनमोहन सिंह को चुना...जबकि प्रणब मुखर्जी कहीं ज्यादा राजनीतिक अनुभव और प्रशासनिक योग्यता रखते थे...यूपीए के 10 साल के कार्यकाल में प्रधानमंत्री बेशक डॉ सिंह थे लेकिन कांग्रेस के लिए हर मुश्किल मौके पर प्रणब मुखर्जी ने संकटमोचक की भूमिका निभाई... ऐसे शख्स जिन्होंने यूपीए सरकार के दौरान करीब 80 मंत्रिमंडलीय समूहों की अध्यक्षता की...ये प्रणब का ही कमाल था कि सत्ता पक्ष हो या विपक्ष, सब उनकी बात को ध्यान से सुनते थे...ये उनके बारे में मशहूर रहा कि वो किसी को भी डपट सकते थे और सामने वाला बुरा भी नहीं मानता था...  

कांग्रेस ने कैसे मारी अपने पैर में कुल्हाड़ी  

2012 में कांग्रेस ने भावी राजनीतिक संभावनाओं के पैरों पर कुल्हाड़ी मारने वाला एक और काम किया...वो काम था प्रणब दा को सक्रिय राजनीति के पथ से हटाकर राष्ट्रपति बनाकर रायसीना हिल का रास्ता दिखा देना...अनुशासित सिपाही की तरह प्रणब दा ने इसे भी चुनौती की तरह लिया...प्रणब दा राष्ट्रपति बन गए लेकिन पिछले 5 साल में कांग्रेस किस गर्त में पहुंच गई, ये किसी से छुपा नहीं है...निश्चित तौर पर प्रणब दा अगर राष्ट्रपति ना बनकर कांग्रेस में ही राजनीतिक जिम्मेदारियों को अंजाम दे रहे होते तो गैंड ओल्ड पार्टी आज इतनी दयनीय स्थिति में नज़र नहीं आती...

मोदी सरकार के साथ कैसा रहा रिश्ता

चलिए ये तो रही कांग्रेस की प्रणब दा को प्रधानमंत्री ना बनाने की ऐतिहासिक भूल की बात...अब आते हैं कि प्रणब दा ने राष्ट्रपति बनने के बाद कैसे इस सर्वोच्च पद की गरिमा को और ऊंचा किया...राजनीतिक शख्स होने के बावजूद उन्होंने अपने 5 साल के पूरे कार्यकाल में एक भी ऐसा कदम नहीं उठाया जो 'राजनीतिक जुड़ाव' की ओर संकेत देता. कानून, सरकारी कामकाज की प्रक्रियाओं और संविधान की बारिकियों की बेहतरीन समझ रखने वाले प्रणब दा ने ऐसी हर बात को टाला जो सरकार के साथ टकराव की मंशा की ओर इशारा करती.... 

ऐसा भी नहीं कि प्रणब के पास मोदी सरकार ने जो भी सिफारिश भेजी उन्होंने आंख मूंद कर उस पर मंजूरी की मुहर लगा दी...जब भी प्रणब दा ने ज़रूरत समझी, मज़बूती के साथ मोदी सरकार से स्पष्टीकरण मांगे...कई मौके ऐसे आए जब प्रणब दा ने सवाल उठाए और वित्त मंत्री अरुण जेटली ने उन्हें संतुष्ट करने के लिए राष्ट्रपति भवन तक की दौड़ लगाई...

एक वक्त ऐसा भी आया जब एनडीए सरकार ने अध्यादेशों की झड़ी लगा दी थी...अपने एजेंडे को बढ़ाने के लिए ऐसा करना एनडीए सरकार की मजबूरी था क्योंकि उस वक्त राज्यसभा में विपक्ष का बहुमत होने की वजह से विधेयकों के नियमित रूट से आगे बढ़ना संभव नहीं था...अध्यादेशों को लेकर प्रणब दा ने कभी कोई टंगड़ी नहीं लगाई लेकिन मोदी सरकार को साथ ही नसीहत देना भी नहीं भूले...प्रणब ने इस तथ्य से अवगत कराया कि अध्यादेश लास्ट रिसॉर्ट (सबसे आखिरी विकल्प) होना चाहिए...साथ ही ये संदेश भी दिया कि अध्यादेश जारी करने के लिए सरकार की शक्तियां हद से बंधी हैं...

सवाल पूछे, टकराव टाला  

प्रणब के कार्यकाल में एक भी ऐसा मौका नहीं आया जब उन्होंने सांविधानिक अधिकार का इस्तेमाल करते हुए कैबिनेट से पास किसी अध्यादेश को लौटाया हो...हां, उन्होंने जब जरूरी समझा अपनी कानूनी टीम और विशेषज्ञों से सलाह ली, सरकार से स्पष्टीकरण भी खूब मांगे...2016 में मोदी सरकार ने अरुणाचल प्रदेश में अनुच्छेद 356 का इस्तेमाल कर राष्ट्रपति शासन लगाने का फैसला किया...राष्ट्रपति प्रणब आश्वस्त नहीं थे कि अरुणाचल में स्थिति इतनी विकट है कि राष्ट्रपति शासन लगाना जरूरी है...केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह को तब प्रणब दा को आश्वस्त करने में ऐड़ी-चोटी का जोर लगाना पड़ा था...

चुप नहीं बैठे असामान्य घटनाओं पर 

प्रणब दा ने अपने कार्यकाल में राजनीतिक मुद्दों पर टिप्पणी से हमेशा परहेज किया...लेकिन जब किसी मुद्दे ने जनमानस को आंदोलित किया तो वो चुप भी नहीं बैठे...जैसे जब शैक्षणिक संस्थानों में छात्र आंदोलित हुए तो उन्होंने 'बोलने की आजादी' का समर्थन किया...बीते दो वर्षों में लोगों को पीट-पीट कर मार डालने की घटनाओं को लेकर प्रणब दा ने हाल में संयत लेकिन सख्त प्रतिक्रिया दी...प्रणब दा ने कहा कि आने वाली पीढी हमसे जवाब मांगेगी, ये सवाल अपने आप से ही पूछता हूं...

राष्ट्रपति मुखर्जी ने सवाल के लहजे में ही कहा कि क्या हम इतने सजग हैं कि अपने बुनियादी मूल्यों की रक्षा कर सकें. मुखर्जी ये जताना नहीं भूले कि अंधकार और पिछड़ेपन की जो ताकते हैं उनके खिलाफ लोगों और मीडिया की सतर्कता ही सबसे बड़े प्रतिरोधक की भूमिका निभा सकती है... 

मुखर्जी का कार्यकाल एक और बात के लिए भी याद किया जाएगा...वो है अपने कार्यकाल में दया याचिकाओं को खारिज करना...प्रणब से ज्यादा दया याचिकाएं सिर्फ आर वेंकटरमण ने ही खारिज की थीं. वेंकटरमण 1987 से 1992 तक राष्ट्रपति रहे...इस दौरान उन्होंने 44 दया याचिकाएं खारिज की थीं...जबकि राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने 37 प्राथियों से जुड़ी 28 दया याचिकाओं को खारिज किया...बता दें कि प्रणब से पहले राष्ट्रपति रहीं प्रतिभा पाटिल ने सबसे ज्यादा 30 लोगों को फांसी के फंदे से बचाया था...वहीं प्रणब ने सिर्फ 7 फांसी की सजा ही माफ की...जाहिर है कि राजनीति की असाधारण समझ  रखने वाले प्रणब ने प्रशासनिक सख्ती की जब जरूरत समझी तो पीछे नहीं हटे...
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जानना चाहते हैं किस-किस राष्ट्रपति का सरकार से हुआ टकराव

ये तो रही प्रणब दा की कहानी...लेकिन उन से पहले जो-जो भी ऱाष्ट्रपति हुए उनके सरकार के साथ कैसे संबंध रहे, इस पर पूरी सीरीज मैंने 6 साल इसी ब्लॉग पर प्रकाशित की थी...वक्त मिले तो पढ़िएगा, सब पता चल जाएगा कि किस-किस राष्ट्रपति का सरकार के साथ टकराव हुआ था...एक तरह से इन 5 पोस्ट में आपको आज़ाद भारत के सत्ता-शिखर का पूरा इतिहास यहां पढ़ने को मिल जाएगा...

डॉ राजेंद्र प्रसाद-नेहरू की खींचतान

राधाकृष्णन से लेकर इमरजेंसी तक

जैल सिंह-राजीव गांधी के बीच तल्ख़ी

मंडल-कमंडल के दौर में राष्ट्रपति

नारायणन, कलाम, प्रतिभा का दौर 

मंगलवार, 4 जुलाई 2017

#ब्लॉगिंग_2.0 के लिए कितने तैयार हम...खुशदीप


#हिन्दी_ब्लॉगिंग के दूसरे संस्करण यानि #ब्लॉगिंग_2.0 का आगाज़ शानदार  रहा है...ब्लॉगिंग को दोबारा दमदार बनाने के इस यज्ञ में कोई भी ब्लॉगर अपनी आहुति देने से पीछे नहीं रहा...सवाल भी पूछे गए कि किसने तय कर दिया अंतरराष्ट्रीय हिन्दी ब्लॉग दिवस...किसने और क्यों चुना हैशटैग...मूल प्रस्ताव तो ये था कि हर महीने की 1 तारीख को सभी की ओर से 1-1 पोस्ट ज़रूर लिखी जाए...फिर कैसे ये अंतरराष्ट्रीय हिन्दी ब्लॉग दिवस में तब्दील हो गया...कैसे हैशटैग आ गया...कॉपीपेस्ट टिप्पणियां की गईं आदि आदि...

यहां मेरा मानना है कि कुछ चीज़ें इनसान के हाथ में नहीं होती...कोई अदृश्य शक्ति भी है जिसकी इच्छा अनुसार घटनाक्रम स्वयं आकार लेता चला जाता है...जो परिणाम सामने आया उसे देखते हुए सारे सवाल बेमानी है...

ताऊ रामपुरिया का आह्वान ही सही, क्या इसने फिर बिछड़े ब्लॉग जगत को दोबारा एक नहीं किया...1 जुलाई को क्या ब्लॉगर्स में पिछले जैसा उत्साह देखने को नहीं मिला...ब्लॉग्स पर जहां टिप्पणियों का सूखा पड़ गया था वो फिर हरे-भरे दिखाई दिए...इस पूरी कवायद का मकसद नेक था...ब्लॉग्स से फेसबुक आदि की ओर विमुख हो गए ब्लॉगर्स को ब्लॉगिंग की तरफ़ फिर लौटाया जाए...एक दिन में ऐसा नहीं हो सकता कि पुराना दौर फिर झटके से लौट आए...आज जब वक्त की सभी के पास कमी है, उसमें ये भी संभव नहीं कि एक ही दिन में सब पोस्ट पढ़ ली जातीं और फिर उसके विषय के अनुरूप टिप्पणियां भी कर दी जातीं...

यथासंभव ऐसा करने की कोशिश की गई...लेकिन जिन्हें कॉपीपेस्ट टिप्पणियां कहा गया उनमें भी ब्लॉगर्स को दोबारा सक्रिय होने के लिए प्रेरित करना, आभार प्रकट करना भी था...यहां ये समझा जाना चाहिए कि 1 जुलाई का दिन अपवाद था...ब्लॉग की पुरानी गलियों में लौटने का उत्सव था...

सिलसिला चल निकला है तो वो दौर भी जल्दी लौट आएगा जब खुद की पोस्ट लिखने के साथ दूसरों की पोस्ट आत्मसात करने के बाद सारगर्भित टिप्पणियां भी की जाएंगी...1 जुलाई को कुछ ऐसी पोस्ट भी आईं जिनमें ब्लॉगिंग के पिछले दौर को लेकर शिकवे-शिकायत किए गए थे...तंज भी थे...सम्मान की राजनीति पर सवाल उठाते हुए एक जनाब मर्यादा की सीमा लांघ गए और महिलाओं को लेकर आपत्तिजनक भाषा का इस्तेमाल कर बैठे...ये पूरी तरह अस्वीकार्य है...

ये तो मैंने भी अपनी पोस्ट में लिखा था कि ब्लॉगर्स द्वारा खुद ही दूसरे ब्लॉगर्स का सम्मान किए जाने का तमाशा बंद होना चाहिए...ये विवादों को जन्म देने के साथ कटुता को भी बढ़ाता है...लेकिन ये सिर्फ़ मेरा मत था...कोई माने या ना माने, ये अपने हिसाब से हर ब्लॉगर को निर्णय लेने का अधिकार है...इसका ये मतलब कतई नहीं कि गढ़े मुर्दे उखाड़ते हुए सम्मान प्राप्त करने वालों को ही कटघरे में खड़ा कर दिया जाए...

खैर ये सब रही कड़वी बातें जिनका कुनैन की गोली की  तरह  ज़िक्र करना भी ज़रूरी था...#ब्लॉगिंग_2.0  को लेकर हम सभी को सकारात्मक सोच रखनी चाहिए...क्योंकि अब कंटेट उत्पादकों के लिए असीम संभावनाएं पैदा होने जा रही हैं...इसका संकेत मैंने हालिया पोस्ट में भी दिया था...अभी तक हम टिप्पणियों को ही किसी ब्लॉग की सफलता का पैमाना मानते थे...ये दिल को बहलाने के लिए ग़ालिब ख्याल तो अच्छा है लेकिन इसका नतीजा कुछ नहीं निकलने वाला है...टिप्पणियां सफलता की परिचायक नहीं बल्कि नेटवर्किंग की देन होती हैं...ये एक हाथ दे, दूसरे हाथ ले वाली कहावत को भी चरितार्थ करती है...

ब्लॉगिंग_2.0  में ऐसी बातों से ऊपर उठना होगा, टिप्पणियों का मोह छोड़ना होगा...जो आ जाएं वो ठीक, उसी पर संतोष करना चाहिए...इससे ज्यादा जरूरी है कि ऐसी कोशिश की जाए कि हमारा लिखा अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचे...अगर लेखन धारदार है, दूसरों को बांधने की क्षमता रखता है तो मुझे कोई संदेह नहीं कि आपकी पाठक संख्या हर दिन बढ़ती जाएगी...अच्छे लेखन के साथ उसकी इंटरनेट पर पहुंच बढ़ाने  के लिए कुछ तकनीकी ज्ञान भी रखा जाए तो कोई हर्ज़ नहीं है...

यहां मैं एक उदाहरण देता हूं...जैसे कि 1 जुलाई को सब  ब्लॉगर्स ने एक उद्देश्य से समान हैशटैग #हिन्दी_ब्लॉगिंग का हर जगह (ब्लॉग, फेसबुक, ट्विटर) पर इस्तेमाल किया तो उसके  फायदे भी सामने आए...गूगल पर आपने इस हैशटैग को डाला तो सभी ब्लॉगर्स की पोस्ट एक के बाद एक दिखने लगीं...यही फेसबुक पर हुआ और यही ट्विटर पर...

यहां मैं डिजिटल पत्रकारिता का अनुभव आपसे बांटना चाहता हूं...ट्विटर पर इन दिनों न्यूज़ सबसे पहले ब्रेक होती हैं...इसे ऐसे भी समझिए कि कोई चैनल किसी खास विषय पर प्राइम टाइम पर डिबेट कर रहा है...तो वो क्या करता है, वो भी इसके लिए एक हैशटैग तैयार करता है...फिर उसे ट्रेंड कराने में जी-जान लगा देता है...एक साथ कई लोग उस हैशटैग का इस्तेमाल कर डिबेट के बारे में ट्वीट करते हैं, रीट्वीट करते हैं...फिर लोग भी प्रतिक्रियाएं देते हुए पक्ष-विपक्ष में ट्वीट, रीट्वीट, लाइक, रिप्लाई करते है...वो हैशटैग इतनी बार इस्तेमाल होता है कि  वो खुद ही ट्रेंड करने लगता है...

यही टोटका ब्लॉगर्स को भी आजमाना चाहिए...एकजुटता में बड़ी शक्ति है...अंशुमाला का प्रस्ताव है कि हर महीने की 1 तारीख  को सभी ब्लॉगर एक पोस्ट लिखें...अब उसी दिन के लिए कोई  खास हैशटैग भी पहले से तय कर सभी ब्लॉगर्स उसका इस्तेमाल करें तो उससे फायदा ही फायदा होगा, नुकसान कुछ नहीं...ये हमने #हिन्दी_ब्लॉगिंग के हैशटैग के इस्तेमाल में अच्छी तरह देखा...

मेरा ये सब लिखने का निचोड़ यही है कि ब्लॉगिंग का सार्थक लाभ उठाना है तो अच्छा लिखना सबसे पहली शर्त है...रैंकिग  में ऊपर आना है तो नियमित लिखना भी बहुत ज़रूरी है...साथ ही ये भी ध्यान रखना होगा कि फेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम, गूगल प्लस का अधिक से अधिक पाठकों तक पहुंचने के लिए कैसे बेहतर इस्तेमाल किया जाए...व्हाट्सअप सोशल मीडिया नहीं लेकिन उसका भी सकारात्मक उपयोग किया जा सकता है...ये सोचिए कि आपके लेखन का दायरा सिर्फ़ 200-300 लोगों (ब्लॉगर्स, परिचितों) तक ही हर दिन सिमट कर ना रह जाए...ये हर दिन बढ़ता ही जाए...फिर एक दिन ऐसा भी आएगा कि आपको गूगल जैसे प्लेटफॉर्म या कंटेंट प्रोवाइडर्स खुद ही ढूंढने आने लगेंगे...

#ब्लॉगिंग_2.0 का ध्येय होना चाहिए...
Be Smart…Be Positive


स्लॉग ओवर

मक्खन और मक्खनी की शादी के बाद विदाई का वक्त आया...

मक्खनी के पिता बहुत भावुक हो गए...उन्होंने भरे गले से मक्खन को समझाना शुरू किया...बड़े नाज़ों से पाला है हमने बेटी को...कभी इसे किसी चीज़ की कमी महसूस नहीं होने दी...बस यही विनती है कि इसका ध्यान रखना दामाद जी...

मक्खन सब सुनता रहा...

ससुर साहब फिर शुरू हो गए...और क्या क्या बताऊं इसकी बातें...हाथों को आपस में जोड़कर ससुर साहब कहने लगे कि इत्ती सी थी ये बस इत्ती सी...

इस पर मक्खन शांत भाव से ससुर साहब को टोकते हुए बोला...


ये इत्ती सी थी और हम तो जैसे पैदा ही छह फुट के हुए थे...

रविवार, 2 जुलाई 2017

क्या ताऊ #हिन्दी_ब्लॉगिंग का ठेकेदार है...खुशदीप


1 जुलाई...अंतरराष्ट्रीय हिन्दी ब्लॉग दिवस...क्यों मना...किसने इस दिन को चुना...आदि आदि...ज़ाहिर है ऐसे सवाल पूछे जा रहे हैं...पूछे भी जाने चाहिए...सभी हिन्दी ब्लॉगर्स के मन में ये आने चाहिए...

कुछ कहूं इससे पहले अपनी इस पोस्ट के शीर्षक के औचित्य को स्पष्ट कर दूं...बिना कोई संकोच कह रहा हूं कि एक खांटी पत्रकार की तरह अपनी स्टोरी पर सब को आकर्षित करने के लिए ये ‘offensive  heading’ लगाई है...



अब आता हूं कि 1 जुलाई को अंशुमाला के प्रस्ताव पर ताऊ रामपुरिया की ओर से अंतरराष्ट्रीय हिंदी ब्लॉग दिवस का डंका बजाने और ताऊ के आदेश पर ही मेरी और से #हिन्दी_ब्लॉगिंग के हैशटैग की पहल करने का क्या असर हुआ...आप खुद ही बताइए कि 1 जुलाई को हम सबको ऐसा नहीं लगा कि हम फिर ब्लॉगिंग के 6-7 साल पहले वाले चहल-पहल दौर में पहुंच गए...ताऊ ने पुकारा और सब दौड़े चले आए...

क्या ब्लॉग, क्या फेसबुक और क्या ट्विटर, हर जगह शनिवार को #हिन्दी_ब्लॉगिंग छाया रहा...यही लगा कि हर हिन्दी ब्लॉगर शिद्दत के साथ चाहता है कि फिर दिल दो ब्लॉगिंग को...

1 जुलाई को हिन्दी ब्लॉगर्स ने ना सिर्फ जमकर पोस्ट लिखीं बल्कि टिप्पणियां भी खूब कीं...ऐसा उत्साह देखकर वाकई दिल कह उठा- 'ब्लॉगों में बहार है'...

बहुत सारी पोस्ट लिखी गई हैं...लेकिन मैं अब तक जितनी पोस्ट के लिंक ढूंढ पाया वो यहां दे रहा हूं...और भी जितने मिलेंगे वो इस पोस्ट में जोड़ते जाऊंगा...अगर किसी की पोस्ट छूट गई है तो यहां कमेंट में लिंक दे दें...

चलिए अब लीजिए 1 जुलाई की उन पोस्ट के लिंक जो मैं ढूंढ सका...ये बता दूं कि कई ब्लॉगर्स के एक से ज्यादा ब्लॉग भी हैं और उन्होंने हर ब्लॉग पर पोस्ट डाली लेकिन यहां एक ब्लॉगर की सिर्फ एक पोस्ट को ही लिया गया है...

1.Taau (PC Rampuria)


2.Sameer Lal

3. Khushdeep Sehgal

4. Kajal Kumar

5. Harkirat Heer

6.Mukesh Kumar Sinha

7. Gopal Krishna Awadhia

8. Somesh saxena

9. Satish Saxena

10. Rohit Kumar

11. Ravindra Prabhat

12.Soni Garg Goyal

13. Sonal Rastogi

14. Nirmala Kapila

15. Vinod Pandey

16. Harsh Vardhan Tripathi


17. Neeraj Goswami

18. T S Daral

19. Anup Shukla

20. Unmukt

21. Ravi Ratlami

22. Amit Srivastava

23. Anshumala

24.  Dinesh Rai Dwivedi

25. Atul Srivastava

26. Anurag Sharma

27. Vivek Rastogi

28. Lalit Sharma

29. Rashmi Ravija

30. Praveen Shah

31. Ajeet Gupta

32. Shikha Varshanay

33. Shahnawaz  

34. Archana Chaoji

35. Devendra Pandey

36. P C Godiyal

37.Rekha Srivastava

38. Raja Kumarendera Singh Sainger

39. Shefali Pande

40. Dilip Kabathekar

41. Mukesh Kumar Tiwari

42. Meenakshi

43. Kewal Ram

44. Bhartiya Nagrik

45. Dhiru Singh

46. Ashok Akela (Saluja)

47. Girish Billore Mukul

48. Antar Sohel

49. Ajay Kumar Jha

50. Roopchandra Shastri Mayank

51 Sarkari Naukari Blog

52 Gangasharan Singh

53 Sangita Puri

54. Kulwant Happy

55. Anulata Raj Nair

56. Sanjeeva Tiwari

57. Gagan Sharma

58. Y chaturvedi

59. Sadhna Vaid

60. Maira (Archana Chaoji)

61. Yunus Khan

62. Sanjay Bengani

63. Priyanka Gupta

64. Anju Sharma

65. Rajesh Utsahi

66. Himanshu Pandey67


67. Kamal Sharma

68. Sandhya Sharma

69. Rita Shekhar Madhu

70. Archana Tiwari


स्लॉग ओवर


ब्लॉगिंग, फेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम पर कई लोगों की आदत है कि अपनी हर छोटी बड़ी बात, फोटो आदि ठेल देते हैं...ऐसे में मक्खनी का मक्खन से ये सवाल पूरी तरह जायज़ हो जाता है...