मंगलवार, 27 सितंबर 2016

सुषमा स्वराज का राजकुमार अवतार- जिनके घर शीशे के होते हैं वो...खुशदीप

विदेश मंत्री सुषमा स्वराज पर सोमवार को पूरी दुनिया की नजरें टिकी थीं कि वे संयुक्त राष्ट्र महासभा के 71वें अधिवेशन में क्या बोलती हैं. खास तौर पर आतंकवाद को लेकर. इसी मंच से कुछ दिन पहले पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने अपने भाषण में जिस तरह कश्मीर का मुद्दा उठाया था, उसे लेकर भी हर किसी को इंतजार था कि सुषमा किस तरह पलटवार करती हैं. सुषमा ने इस पर दो टूक कहा- "जिनके अपने घर शीशे के होते हैं वो दूसरों पर पत्थर नहीं उछाला करते."
सुषमा ने अपने भाषण में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की उसी लाइन को आगे बढ़ाया कि पाकिस्तान को दुनिया के मंच पर अलग-थलग करने के लिए भारत कोई कसर नहीं छोड़ेगा. सुषमा ने साथ ही विश्व समुदाय को भी चेताया कि आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में सभी को एकजुट होने की आवश्यकता है. सुषमा ने गिनाया कि भारत ने 1996 में अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद के खिलाफ व्यापक संधि के लिए प्रस्ताव दिया था, जिस पर आज तक किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंचा जा सका. सुषमा ने साथ ही संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्यों में विस्तार की जरूरत का हवाला देकर भारत के दावे को मजबूती के साथ रखा.
भारतीय समयानुसार सुषमा स्वराज ने शाम ठीक 7 बजकर 10 मिनट पर बोलना शुरू किया. सुषमा ने अपने भाषण की शुरुआत संयुक्त राष्ट्र के टिकाऊ विकास के लक्ष्य के एजेंडे के साथ की. फिर बताया कि स्वच्छता, जेंडर इक्वेलिटी, जलवायु परिवर्तन की दिशा में भारत क्या क्या कर रहा है. सुषमा ने ये भी बताया कि मेक इन इंडिया, डिजिटल इंडिया, जनधन योजना से भारत की तस्वीर कैसे बदल रही है.
सुषमा ने इन सब बातों के बाद आतंकवाद का मुद्दा उठाया. सुषमा ने कहा कि न्यूयॉर्क ने अभी 9/11 हमले की 15वीं बरसी मनाई है. न्यूयॉर्क ने हाल ही में कुछ दिन पहले एक और आतंकी हमले को देखा. सुषमा ने कहा कि हम इस शहर (न्यूयॉर्क) के दर्द को समझते हैं. उरी, पठानकोट में भी ऐसी ही ताकतों ने हमले किए. सीरिया और इराक मे भी दुनिया रोज की बर्बरता देख रही है.
सुषमा ने कहा,  "दुनिया को सबसे पहले ये समझना चाहिए कि आतंकवाद मानवाधिकारों का सबसे बड़ा उल्लंघन है. आतंकवादी किसी देश का नहीं बल्कि पूरी मानवता का अपराधी होता है. हमें ये देखना होगा कि आतंकवादियों को पनाह देने वाले कौन हैं? कौन उन्हे पैसे से, हथियारों से सहारा देता है? कौन उन्हें संरक्षण देता है. जो भी ऐसे बीज बोता है, वो इनके कड़वे फलों का स्वाद चखने के लिए भी तैयार रहे."
सुषमा ने कहा कि आतंकवाद ऐसा राक्षस बन चुका है जिसके पास अनगिनत चेहरे हैं. अनगिनत हाथ हैं, अनगिनत हथियार हैं. सुषमा ने विश्व समुदाय से अपील की कि आतंकवाद को जड़ से उखाड़ने के लिए सबको एकजुट हो जाना चाहिए. अपने सारे मतभेद, पुराने समीकरण भुलाकर आतंकवाद के राक्षस का खात्मा करना चाहिए. इसके लिए दृढ़ इच्छाशक्ति दिखाने की आवश्यकता है.
सुषमा ने पाकिस्तान का नाम लिए बिना कहा  कि अगर कोई देश आतंकवाद के खिलाफ मुहिम में शामिल नहीं होता तो उसे पूरी तरह अलग-थलग कर देना चाहिए. ऐसे देशों को चिह्नित किया जाना चाहिए जो घोषित आतंकवादियों को सरेआम अपनी जमीन पर जलसे करने देते हैं. ऐसे देशों की विश्व समुदाय में कोई जगह नहीं होनी चाहिए.

पांच दिन पहले नवाज शरीफ के दिए भाषण का सुषमा ने करारा जवाब दिया. सुषमा ने कहा कि नवाज शरीफ ने दो बातें कहीं. पहली कश्मीर में कथित तौर पर मानवाधिकारों का उल्लंघन. सुषमा ने कहा इस पर मैं कहना चाहूंगी कि जिनके घर खुद शीशे के होते हैं वो दूसरों पर पत्थर नहीं उठाया करते. सुषमा ने साथ ही बलूचिस्तान में यातनाओं की पराकाष्ठा का हवाला दिया.
सुषमा ने नवाज शरीफ की दूसरी बात गिनाई कि भारत दोनों देशों के बीच बातचीत के लिए शर्ते लगा रहा है. इस पर सुषमा ने कहा कि नवाज शरीफ को मोदी सरकार के शपथ ग्रहण समारोह के लिए न्योता दिया गया था तो वो कोई शर्त नहीं था. सुषमा ने कहा कि मैं खुद दिसंबर 2015 में व्यापक द्विपक्षीय बातचीत के लिए इस्लामाबाद गई थी तो वो कोई शर्त के तहत नहीं था. या पीएम मोदी काबुल से दिल्ली लौटते हुए लाहौर रुके थे तो वो किसी शर्त  के तहत नहीं था. सुषमा ने कहा कि हमने कभी ईद की शुभकामनाएं दी तो कभी क्रिकेट की, कभी स्वास्थ्य के बारे में पूछा तो ये सब शर्तों के तहत नहीं था. सुषमा ने कहा  कि लेकिन हमें बदले में पाकिस्तान ने क्या दिया- पठानकोट, उरी, बहादुर अली. सुषमा ने कहा कि बहादुर अली तो पाकिस्तान की नापाक हरकतों का जिंदा सबूत है हमारे पास.
सुषमा ने कहा कि अगर पाकिस्तान समझता है कि वो हमारा कोई हिस्सा हमसे छीन लेगा तो हम उसे बताना चाहते हैं कि वो कभी इस मंसूबे में कामयाब नहीं होगा. जम्मू और कश्मीर भारत का अभिन्न हिस्सा है और हमेशा रहेगा. पाकिस्तान इसे लेकर किसी मुगालते में ना रहे.
सुषमा ने भाषण के आखिर में विश्व समुदाय को भी चेताया कि भारत ने 1996 में सीसीआईटी (अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद पर व्यापक संधि) का प्रस्ताव  दिया था. लेकिन 20 साल बीतने के बाद भी इस पर किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंचा जा सका. सुषमा ने कहा कि आज ऐसे अंतरराष्ट्रीय मानक बनाए जाने की जरूरत है जिससे आतंकवादियों को सजा दी जा सके और उनका प्रत्यर्पण किया जा सके.
सुषमा ने 19 मिनट के भाषण में ये भी कहा कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा  परिषद 1945 में अस्तित्व में आई थी. लेकिन तब से अब तक दुनिया में बहुत कुछ बदल चुका है. इसके लिए परिषद के स्थायी और अस्थायी, दोनों ही सदस्यों में विस्तार की जरुरत है.
सुषमा ने अपने भाषण में पाकिस्तान को बेनकाब करने के लिए प्रभावी ढंग से अपनी बात रखी. लेकिन नवाज शरीफ की तरह उन्होने अपने भाषण के अधिकतर हिस्से को  एक ही मुद्दे पर केंद्रित नहीं रखा. उन्होंने आतंकवाद पर पाकिस्तान को खरी खरी सुनाने के साथ दुनिया के सामने तेजी से बदल रहे भारत की सुनहरी तस्वीर रखने की भी कोशिश की है. बहरहाल, सुषमा अच्छी वक्ता हैं, उन्होंने एक बार फिर इसे साबित किया. तभी तो आम आदमी पार्टी के नेता कुमार विश्वास  ने यूएन में सुषमा का भाषण सुनने के बाद उनके लिए सिंहनी शब्द का इस्तेमाल किया.

रविवार, 25 सितंबर 2016

नोटवा से आई, बोटवा से आई, समाजवाद बबुआ अब हार्वर्ड से आई...खुशदीप


समाजवाद बबुआ धीरे धीरे आई,

समाजवाद उनके धीरे धीरे आई,

हाथी से आई, घोड़ा से आई,

अँगरेजी बाजा बजाई,

नोटवा से आई,

बोटवा से आई...

गोरख पाण्डेय ने 1978 में ये कविता लिखी थी तो मुलायम सिंह यादव  39 साल के थे. तब तक वो उत्तर प्रदेश सरकार में मंत्री भी बन गए थे. विधायक तो खैर वो 1967 में ही बन गए थे. खुद को राम मनोहर लोहिया और चौधरी चरण सिंह का शिष्य बताने वाले मुलायम ने खुद की समाजवादी पार्टी बेशक 1992 में बनाई लेकिन समाजवाद के लिए उनका झुकाव युवावस्था से ही रहा.

आज 1978 नहीं 2016 है. 38 साल का अरसा बीत चुका है. मुलायम 77 साल के हो चले हैं और उनके बेटे और यूपी के सीएम अखिलेश यादव अब 43 साल के हैं. मुलायम अपने कुनबे में कलह को लेकर जिस तरह की चुनौती का सामना आज कर रहे हैं, वैसा उन्होंने जिंदगी में पहले कभी नहीं किया. कभी पहलवानी के शौकीन रहे  मुलायम राजनीति के अखाड़े  में विरोधियों को चित करने के लिए एक से बढ़ कर एक दांव जानते हैं, लेकिन अपने कुनबे के घमासान  को शांत करना उनके लिए भी टेढ़ी खीर साबित हो रहा है. एक खेमे में छोटे भाई शिवपाल यादव हैं. तो दूसरे खेमे में पुत्र अखिलेश हैं. शिवपाल अब पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष हैं, उन्हें 'आउटसाइडर्स' का समर्थन बताया जा रहा है, वहीं अखिलेश के पीछे मुलायम के चचेरे भाई प्रोफेसर राम गोपाल यादव खड़े बताए जा रहे हैं. परिवार में सबसे ज्यादा पढ़े रामगोपाल को समाजवादी का थिंकटैंक माना जाता रहा है.


शिवपाल ने दोबारा पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष की कमान संभालते ही अखिलेश के समर्थक युवा नेताओं को किनारे लगाना शुरू कर दिया है, वहीं नेताजी (मुलायम सिंह) ने खुद 'आउटसाइडर' अमर सिंह को पार्टी का राष्ट्रीय महासचिव बना दिया. ये वो फैसले हैं जो शायद ही अखिलेश खेमे को रास आएं. अमर सिंह से पार्टी के सबसे बड़े मुस्लिम चेहरे आजम खान की खुन्नस किसी से छुपी नहीं है.

अब ऐसे में सवाल उठता है कि जब कुनबे में ही इतनी घमासान है तो समाजवादी पार्टी चुनाव के लिए कैसे खुद को तैयार करेगी? वो भी तब जब यूपी में चुनाव के लिए थोड़ा ही वक्त बचा है. मुलायम को शिवपाल के सांगठनिक कौशल पर भरोसा है, वहीं राजनीति में दूसरों को साधने के लिए उन्हें अमर सिंह से बेहतर कोई नजर नहीं आता. मुलायम की कोशिश अखिलेश को चेहरा बनाकर अपने पुराने भरोसेमंद मोहरों के जरिए ही यूपी चुनाव की वैतरणी पार करने की है.

वहीं, अखिलेश अब अपने हिसाब से यूपी चुनाव में जाना चाहते हैं. इसीलिए उन्होंने यूपी चुनाव के लिए पार्टी टिकट बांटने का अधिकार अपने पास रखा है. अखिलेश चुनाव में अपनी ऐसी छवि के साथ जाना चाहते हैं कि युवा पीढ़ी की जरुरतों को उनसे बेहतर कोई नहीं समझता. साथ ही विकास के लिए जो ऊर्जा चाहिए वैसी और किसी नेता के पास नहीं है. अखिलेश ने युवाओं  के लिए पहले अपने झोले से लैपटॉप निकाले, इस बार वो स्मार्टफोन्स देने का वादा कर रहे हैं. अखिलेश की पूरी कोशिश है कि उन्हें लेकर यही संदेश जनता में जाए कि वो बाहुबल की राजनीति को पसंद नहीं करते. यूपी के युवाओं को ऐसा लगे कि अखिलेश नए जमाने के साथ कदमताल करने में पीछे नहीं है.

एनवायर्नमेंट इंजीनियरिंग के ग्रेजुएट अखिलेश अब पिता की राजनीतिक छत्रछाया से बाहर निकल अपनी छवि को खुद गढ़ना चाहते है. इसके लिए उन्होंने देश में किसी पर नहीं बल्कि हॉर्वर्ड यूनिवर्सिटी के स्टीव जार्डिंग पर भरोसा किया है. जार्डिंग हार्वर्ड केनेडी स्कूल में पब्लिक पॉलिसी (जन नीति) पढ़ाते हैं. 1980 से ही वे कैम्पेनर, मैनेजर, राजनीतिक सलाहकार और रणनीतिकार की भूमिकाएं निभाते आ रहे हैं. उनकी सेवाएं लेने वाले दिग्गजों में अमेरिकी राष्ट्रपति पद की उम्मीदवार हिलेरी क्लिंटन, अमेरिका के पूर्व उपराष्ट्रपति अल गोर और स्पेन के पीएम मारिआनो रेजोय शामिल है.  



अखिलेश सरकार ने लगातार दूसरी बार सत्ता में आने के लिए जार्डिंग को पार्टी के चुनाव अभियान की जिम्मेदारी सौंपी है. जार्डिंग समाजवादी पार्टी को कई मुद्दों पर पहले ही सलाह दे रहे थे. लेकिन अब वो स्ट्रैटेजिस्ट के तौर पर आधिकारिक रुप से जुड़ गए हैं.

जार्डिंग फिलहाल अखिलेश सरकार की जन कल्याणकारी योजनाओं के पब्लिसिटी कैम्पेन को नए सिरे से धार देने में लगे हैं. उन्हीं की सलाह पर समाजवादी पेंशन योजना की ब्रैंड एंबेसडर के तौर पर एक्ट्रेस विद्या बालन को जोड़ा गया है. जार्डिंग चुनाव प्रचार के माइक्रोलेवल प्रबंधन को तय करने के साथ और भी बहुत कुछ कर रहे हैं. जार्डिंग की टीम देहाती क्षेत्रों में रह कर ग्राउंड रिपोर्ट सीधे अखिलेश को भेज रही हैं. इन रिपोर्ट के आधार पर जिला अधिकारी 24 घंटे में एक्शन ले रहे हैं.

जार्डिंग का ये भी मानना है कि यूपी क्षेत्र और आबादी  के हिसाब से इतना बड़ा है  कि पूरे प्रदेश के लिए पार्टी का एक ही चुनाव घोषणापत्र काम नहीं कर सकता. पश्चिमी उत्तर प्रदेश के गन्ना किसानों की दिक्कतें अलग हैं और बुदेलखंड के किसानों की अलग. इसलिए हर क्षेत्र के हिसाब से रणनीति बनाई जानी चाहिए. जार्डिंग पार्टी के उम्मीदवारों को भी ट्रेंड करेंगे कि वोटरों से कैसे संवाद करना है और क्षेत्र के मुद्दों को कैसे हैंडल करना है.

अब  देखना दिलचस्प होगा  कि समाजवादी पार्टी में कौन सा समाजवाद दिशा देगा. वो समाजवाद जिसकी मुलायम दशकों से नुमाइंदगी करते रहे हैं. या हार्वर्ड से इम्पोर्ट किया गया स्टीव जार्डिंग का समाजवाद, जिस पर अखिलेश दांव खेल रहे हैं.

वाकई समाजवाद बबुआ धीरे धीरे आई...

(This article of mine is already published in Ichowk.in)

शनिवार, 24 सितंबर 2016

मोदी का भाषण : कान खोल कर सुन ले पाकिस्तान...खुशदीप


उरी आर्मी बेस पर आतंकी हमले के बाद भारत-पाकिस्तान रिश्तों में तनाव चरम पर है. ऐसे में हर किसी को इंतजार था कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पाकिस्तान को क्या संदेश देते हैं. हमले के एक हफ़्ता बीतने के बाद प्रधानमंत्री कोझीकोड में बीजेपी की राष्ट्रीय परिषद की बैठक में बोलने के लिए सामने आए. पीएम मोदी ने इस भाषण में नपे-तुले शब्दों का इस्तेमाल किया. मोदी के भाषण में पाकिस्तान को लेकर अहम बातें ये रही-

1 पाकिस्तान के हुक्मरान ये कान खोल कर सुन ले कि हम उरी में अपने 18 जवानों के बलिदान को व्यर्थ नहीं जाने देंगे. हम पाकिस्तान को दुनिया भर में अलग-थलग यानी अकेला रहने को मजबूर कर देंगे.

2. पाकिस्तान के मौजूदा हुक्मरानों से बात करना व्यर्थ है क्योंकि वो आतंकवाद के आकाओं के लिखे भाषण पढ़ते हैं और कश्मीर का रोना रोते हैं.

3. पाकिस्तान का आवाम अपने हुक्मरानों से पूछे कि जब वो पीओके, गिलगित-बाल्टिस्तान, सिंध, खैबर पख्तूनवा और बलूचिस्तान जैसे क्षेत्रों को नहीं संभाल पा रहे हैं तो कश्मीर की किस मुंह से बात कर रहे हैं.

4. पाकिस्तान का आवाम आतंकवाद और अपने हुक्मरानों की साठगांठ के खिलाफ लड़ने के लिए खुद सड़कों पर आए.

5. पाकिस्तान के आवाम से कहा कि आओ लड़ाई लड़ते हैं- बेरोजगारी के खिलाफ, भूख के खिलाफ, अशिक्षा के खिलाफ, नवजात-प्रसूताओं की मौतों के खिलाफ, फिर देखते हैं कि लड़ाई में कौन जीतता है भारत या पाकिस्तान.

6. पाकिस्तान के जो हुक्मरान कहते थे कि 1000 साल तक लड़ाई लड़ेंगे वो काल में समा गए. 

7. पाकिस्तान का नाम लिए बिना कहा कि एक पड़ोसी देश की वजह से एशिया रक्तरंजित है और इसी वजह से 21वीं सदी एशिया की नहीं बन पा रही है.

8. पाकिस्तान का आवाम सोचे कि 1947 में बंटवारे के बाद आज भारत कहां है और पाकिस्तान कहां है, आज भारत दुनिया भर को सॉफ्टवेयर का निर्यात करता है और पाकिस्तान आतंकियों का.

9. उरी में हमला कर 18 जवानों को शहीद कर दिया गया. पाकिस्तान एक हमले में कामयाब रहा लेकिन पिछले कुछ महीनों में आतंकी हमलों की 17 कोशिशों को हमारे जवानों ने नाकाम किया. इन घटनाओं में 110 से ज्यादा आतंकी मारे गए.

10. हमारे जवानों के लिए शस्त्र खिलौना हैं, उनकी असली ताकत सवा सौ करोड़ भारतवासियों का मनोबल है.

प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में जो कुछ भी कहा वो पाकिस्तान को एक तरह से कड़ी चेतावनी भी था और साथ ही एक स्टेट्समैन की तरह दुनिया को संदेश भी देने का था. ये संदेश था कि पाकिस्तान के हुक्मरानों की गैर जिम्मेदाराना हरकतों के बावजूद भारत पूरे धैर्य और विवेक के साथ अपने फैसले करता है. भारत अपने साथ साथ एशिया और विश्व का भविष्य एकता, शांति और सद्भावना में देखता है. भारत के सवा सौ करोड़  नागरिक अपने देश की आन-बान-शान के लिए पूरी तरह समर्पित हैं. और पाकिस्तान जैसे देश के हुक्मरान आतंकियों  के साथ मिल कर शांति और प्रगति के खिलाफ काम कर रहे है तो भारत के साथ-साथ एशिया और दुनिया के अन्य देशों की भी जिम्मेदारी है कि वो उन्हें अलग-थलग कर दे. प्रधानमंत्री मोदी ने इस काम के लिए पाकिस्तान के आवाम का आह्वान किया कि वो समझे कि उनके समृद्ध और सुरक्षित भविष्य के लिए क्या अच्छा है, और इसके लिए वो अपने हुक्मरानों पर दबाव डालें. 

प्रधानमंत्री मोदी के इस संयत भाषण से भारत में उन लोगों को जरूर निराशा हुई होगी जो कि उनसे वैसे ही जोशीले और पराक्रम वाली बातों को सुनने की उम्मीद कर रहे थे जैसे कि वो विपक्ष में रहते हुए किया करते थे. जाहिर है विपक्ष में होते हुए मोदी कह सकते थे कि पाकिस्तान में घुसकर सबक सिखाना चाहिए.लेकिन मोदी अब प्रधानमंत्री हैं और इस तरह के बयान नहीं दे सकते. प्रधानमंत्री ने जो कुछ आज कहा उससे ये संकेत भी मिल गया  कि सोमवार को विदेश मंत्री सुषमा स्वराज न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र महासभा में क्या भाषण देने वाली है. भारत की छवि दुनिया के सामने हमेशा जिम्मेदार और विवेकशील देश की रही है. इस वक्त पाकिस्तान को छठी का दूध दिला देने वाले भाषणों से दुनिया के सामने गलत संदेश जा सकता है. पाकिस्तान को इस वक्त पूरी दुनिया आतंकवाद की आइवी लीग के मेजबान’ की तरह देखने लगी है. पाकिस्तान के कश्मीर राग को इस वक्त पूरी दुनिया में कोई भी देश नहीं सुन रहा. ऐसे में शब्दों या कार्रवाई के तौर पर किसी भी तरह की आक्रामकता पाकिस्तान को दुनिया में अलग-थलग करने संबधी अभियान को नुकसान पहुंचा सकती है.

प्रधानमंत्री मोदी के भाषण में एक और नोट करने वाली अहम बात ये रही कि वे विपक्ष में रहते हुए कहते थे कि आजादी के बाद इतने साल तक कांग्रेस ने राज किया लेकिन कोई सार्थक काम नहीं किया, और भारत को विश्व में जो दर्जा मिलना चाहिए था वो नहीं मिल पाया. लेकिन आज मोदी ने अपने भाषण में पाकिस्तान के आवाम को चेताते हुए कहा कि भारत और पाकिस्तान दोनों एक साथ आजाद हुए, लेकिन आज भारत कहां हैं और पाकिस्तान कहां हैंभारत आज पूरी दुनिया को सॉफ्टवेयर निर्यात करता है और पाकिस्तान आतंकवादियों का. 

बहरहाल, मोदी ने आज गैलरी के लिए भाषण देने की जगह ऐसी बातों को प्राथमिकता दी जिससे कि वो दुनिया के सामने अपनी छवि एक स्टेट्समैन की पेश कर सकें.

शनिवार, 27 अगस्त 2016

सोशल साइट्स पर अपने नहीं सपने होते हैं...खुशदीप






सोशल नेटवर्किंग साइट्स को ही सब कुछ मान लेने वालों को एक फिल्म ज़रूर देखनी चाहिए- वेटिंग’…अनु मेनन की डायरेक्ट की ये फिल्म इस साल मई में रिलीज हुई थी...इस फिल्म में नसीरूद्दीन शाह और कल्कि केकला की मुख्य भूमिकाएं थीं...अधेड़ शिव (नसीर) और युवा तारा (कल्कि), दोनों के जीवनसाथी अस्पताल में कॉमा में हैं...शिव और तारा की अचानक अस्पताल के वेटिंग रूम में मुलाकात होती है...दोनों अकेले ही अपनी-अपनी जंग लड़ रहे है…

बड़े दुःख के साथ जीते हुए भी उम्मीद के साथ लड़ना फिल्म का संदेश हैं...आप को जो कहना चाह रहा हूं, उससे पहले फिल्म का ये ट्रेलर देख लीजिए...और इसके सबसे आख़िरी डॉयलॉग पर ख़ास ध्यान दें...



ट्रेलर आपने देख लिया...तारा (कल्कि) का डॉयलॉग आपने सुन लिया...तारा जो कहती है उससे यही लगता है कि वो सोशल साइट्स पर अति सक्रिय रही है...उसके ट्विटर पर 5800 फॉलोअर्स हैं…फेसबुक पर 1500 से ज़्यादा फ्रैंड्स हैं...लेकिन अस्पताल में उसका साथ देने के लिए कोई भी नहीं है....वो अकेले ही जंग लड़ रही है...तारा जब ट्विटर का नाम लेती है तो शिव (नसीर) बड़ी मासूमियत के साथ कहते हैं- ट्विटर क्या होता है?”

नसीर का ये एक वाक्य ही सोशल साइट्स की वास्तविकता बताने के लिए काफ़ी है...दरअसल, महानगरों में अब इनसान को न्यूक्लियर परिवार में रहना पड़ता है...पहले की तरह संयुक्त परिवार बहुत कम बचे हैं...ऐसे में काम के तनाव से उसे राहत देने वाले सिर्फ पत्नी और बच्चे ही होते हैं...अगर इनसान बिल्कुल अकेला है तो मुश्किल और बड़ी है...ऐसे में वो खुद के सुकून के लिए सोशल साइट्स का सहारा लेता है...आभासी रिश्ते ढूंढता है...रीयल लाइफ में अपनों और दोस्तों से कम ही मिलता जुलना होता है...इसलिए अपने हर सुख-दुःख, उपलब्धि को सोशल साइट्स पर ही बांटता रहता है...अस्पताल में भर्ती हो तो स्टेट्स डालता है कि ज़्यादा से ज़्यादा लोग उसका हाल पूछें...कुछ नित नई अपनी फोटो डालते हैं...लाइक्स और कॉमेंट्स पाकर ही वो खुश हो जाते हैं...देखा मुझे चाहने वाले कितने लोग हैं...

इन्हीं भ्रांतियों को तोड़ता है फिल्म वेटिंग के ट्रेलर का आख़िरी डॉयलॉग...बताता है कि सोशल साइट्स का एडिक्शन कैसी मृग मरीचिका है...ऐसा नहीं कि सोशल साइट्स के सब नुकसान ही नुकसान हैं...सोशल साइट्स पर 7 साल का मेरा अनुभव कहता है कि मुझे यहां कुछ नए बहुत अच्छे लोगों का साथ मिला...विशेष तौर पर ब्लॉगिंग से...हम वर्चुअल स्पेस से हटकर आपस में मिले...दोस्त बने...खुद के लेखन में धार आई...विचारों की अदला-बदली ने खुद के विकास में बहुत साथ दिया...पहचान बनाने में मदद की...कई बार एक-दूसरे के काम भी आए...लेकिन यहां तक तो सब ठीक है...दिक्कत वहां है जहां इनसान ये जन्मसिद्ध अधिकार मानने लग जाए कि सोशल साइट्स के सारे रिश्ते हमारी हां में ही हां मिलाएं....हमें कोई निजी दुःख हो तो सारे लाइन लगाकर हमारा हाल पूछने के लिए आ जाएं...अगर कोई ऐसा सोचने लगता है तो वो ग़लती करता है...भूल जाता है कि वर्चुअल स्पेस (सोशल साइट्स) पर सपने होते हैं, अपने नहीं...हर एक को समझना चाहिए कि हर व्यक्ति अपने-अपने तरीके से ज़िंदगी की जंग लड़ रहा है...वो अपनों के लिए वक्त नहीं निकाल पा रहा तो आभासी रिश्तों के लिए क्या निकालेगा...

काम वहीं अपने आएंगे, जिनसे वो सोशल साइट्स में अपने ढूंढने की वजह से दूर होता जा रहा है...

आख़िर में मेरे प्रिय कलाकार धर्मेंद्र की फिल्म अपने का ये गाना सुनिए...

बाक़ी सब सपने होते हैं,

अपने तो अपने होते हैं...



(नोट- एक्ट्रेस कल्कि केकला का हिंदी में सही नाम आम लोग तो क्या मीडियाकर्मी भी नहीं लिखते, सब अंग्रेज़ी की स्पेलिंग देखकर कल्कि कोचलिन ही लिखते हैं...कल्कि ने अपने नाम का सही उच्चारण खुद बताया था, यक़ीन नहीं होता तो जब कभी आपको कहीं कल्कि मिले तो खुद ही पूछ लीजिएगा)

शुक्रवार, 26 अगस्त 2016

'भारत माता की जय' तो इस माता की क्यों नहीं...खुशदीप



वो सिर पर लाश ढो रहा था,
और पूरा भारत सो रहा था...



वो कौन?  किसकी लाश? वो दाना मांझी और लाश उसकी पत्नी अमांग की...

ओडिशा के भूख के लिए अभिशप्त कालाहांडी ज़िले के भवानीपटना गांव के रहने वाले दाना मांझी की ये तस्वीर...पत्नी की लाश सिर पर...साथ चलती बिलखती 12 साल की बिटिया चौला...ये तस्वीर तमाचा है भारत के विकास के तमाम दावों पर...गांव से करीब 60 किलोमीटर दूर अस्पताल में मंगलवार रात को टीबी से पीड़ित अमांग की मौत हुई...मौत होते ही अस्पताल वाले दाना मांझी पर दबाव डालने लगे कि लाश को अस्पताल से हटाओ...किसी तरह रात काटी...बुधवार सुबह दाना ने पत्नी की लाश कपड़े में बांधी और पैदल ही घर की ओर चल दिया...


 ये हालत तब है जब दाना मांझी ने अस्पताल को पहले से ही जानकारी दे दी थी कि वो बहुत निर्धन है और उसके पास शव को घर ले जाने के लिए वाहन की व्यवस्था के पैसे नहीं है...है तो दाना मांझी इनसान ही...रास्ते में थका तो लाश उसके हाथों से छूटी भी...किसी तरह सँभाला...मां की लाश और पिता की बेबसी देखकर नन्ही सी जान चौला का रोना तो निकलना ही था...

दाना इसी हाल में 12 किलोमीटर तक चलता रहा...तब कुछ लोगों के हाथ-पैर मारने के बाद एंबुलेंस की व्यवस्था हो सकी...बुधवार शाम को अमांग का अंतिम संस्कार हुआ...मामले ने तूल पकड़ा तो अस्पताल के अधिकारी अपनी खाल बचाने के लिए सफाई देने लगे कि दाना मांझी किसी को बिना बताए ही अस्पताल से पत्नी की लाश ले गया...वाह...इसे कहते हैं चोरी और सीनाजोरी...

कालाहांडी की कलेक्टर वृंदा डी ने बताया कि जब उन्हें इस घटना का पता चला तो उन्होंने अमांग की लाश को एंबुलेस से ले जाने की व्यवस्था की...कलेक्टर के मुताबिक उन्होंने एक योजना से दाना मांझी को दो हज़ार रुपए दिलवाए...रेडक्रॉस से भी दस हज़ार रुपए मिलेंगे...वाह कलेक्टर साहिबा बड़ा एहसान किया आपने...

इस साल के शुरू में भी झारखंड-ओडिशा की सीमा के पास जैतगढ़ के गोधूलि गांव से भी एक ऐसी ही घटना सामने आई थी...वहां सावित्री नाम की महिला को अपने पति के अंतिम संस्कार के लिए पैसे जुटाने को अपने दो बेटों को गिरवी रखना पड़ा था...
 
कालाहांडी से बहुत दूर हम दिल्ली में बैठे सारी सुख सुविधाएं भोगते हुए दाना मांझी के दर्द का रोना रो रहे हैं...सोशल मीडिया पर तस्वीर पर डालकर अपने फ़र्ज़ की रस्म अदायगी कर रहे हैं...यहां सवाल ये भी है कि जो मीडियाकर्मी दाना मांझी की तस्वीरें खींच रहे थे, वीडियो बना रहे थे, उन्होंने क्या किया...बेशक उन्होंने अपनी ड्यूटी पूरी की और इस घटना को दुनिया के सामने लाए...लेकिन वो साथ ही ये भी तो कर सकते थे कि वाहन की व्यवस्था कर अंपाग की लाश को गांव तक छोड़ आते...ये ठीक वैसा ही है जैसे कि आत्मदाह कर रहे किसी इनसान की तस्वीरें खीची जाती रहें, वीडियो बनाए जाते रहें...हालांकि चंद पत्रकारों को साधुवाद भी है जिन्होंने तत्काल हल्ला मचा कर प्रशासन को जगाया और दाना मांझी के लिए 12 किलोमीटर चलने के बाद एंबुलेंस की व्यवस्था हो सकी...सवाल यहां सिस्टम से कि 12 किलोमीटर लाश सिर पर उठा कर चलना भक्या कम बड़ी त्रासदी है...

दाना मांझी और अमांग को लेकर एक सवाल उनसे, जो भारत माता की जय कहते नहीं थकते...जितने खाए-अघाए होते हैं, नारा भी उतनी हो ज़ोर से निकलता है...आख़िर भारत माता है कौनमहज़ ज़मीन का बड़ा टुकड़ा...या इस पर रहने वाले लोग...क्या इन्हीं लोगों में भारत माता की आत्मा नहीं बसती...क्या अमांग एक मां नहीं थी?  क्या वो भारत का हिस्सा नहीं थी? 

भारत का संविधान भी हम भारत के लोग से शुरू होता है...संविधान को सारी शक्ति भी देश के लोगों से ही प्राप्त है...क्या सच में ऐसा हैअगर ऐसा है तो अमांग जैसी माता की जय क्यों नहींजब तक अमांग जैसी एक भी मां को इस हाल में दुनिया से अलविदा कहना पड़ता है, भारत माता की जय सच्चे अर्थों में नहीं हो सकती...

हम को मन की शक्ति देना, मन विजय करे,
दूसरों की जय से पहले, खुद को जय करे...