बुधवार, 24 अगस्त 2016

मोदी सरकार की आलोचना पर मुझे सुनाने वालों ये डिबेट भी देख लो...खुशदीप

दोस्तों, एक सज्जन मेरे पीछे हाथ धोकर पड़ गए थे कि मैं केंद्र की मौजूदा सरकार की बहुत आलोचना करता हूं...इसके लिए उन्होंने और उनके चेले चपाटों ने मुझे बहुत अपशब्द भी कहे...यहां तक कि मेरी पोस्ट पर कॉमेंट करने वाले मेरे कुछ सम्मानित मित्रों को भी नहीं बख्शा गया..आज ऐसे ही लोगों की आंखें खोलने के लिए मैं अपनी दो साल पुरानी एक डिबेट का लिंक दे रहा हूं...डिबेट 1984 के सिख विरोधी दंगों के 30 साल पूरे होने पर 1 नवंबर 2014 को हुई थी...तब तक मोदी सरकार को सत्ता में आए 6 महीने हो चुके थे...

इस डिबेट से पहले गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने दंगा पीड़ित सिखों के लिए 5-5 लाख रुपए मुआवज़े का एलान किया था जिसे उस वक्त मॉडल कोड ऑफ कंडक्ट की वजह से रोक लिया गया था ...इस डिबेट का मुद्दा था कि क्या 30 साल में पीडित सिखों को इनसाफ़ मिला...या सिर्फ़ राजनीति ही होती रही... 

पंजाब विधानसभा चुनाव जल्दी होने वाले हैं...आप देखेंगे कि हर चुनाव की तरह इस बार भी इन चुनाव में 1984 के दंगे मुद्दा बनेंगे...पीड़ितों के जो हमदर्द बनते हैं, उनका मकसद पीड़ितों को इनसाफ़ दिलाना नहीं बल्कि इस मुद्दे को ज़्यादा से ज़्यादा देर तक ज़िंदा किए रखना है...आपसे अनुरोध है कि इस डिबेट को पूरा देखिएगा...

एक बात मीडियाकर्मियों के लिए भी, क्या टीवी पर शालीन चर्चा नहीं हो सकती जिसमें हर किसी की बात सुनी जाए और वो साफ़ साफ़ समझ भी आए...साथ ही बहस में आम लोगों को भी हिस्सा लेने का मौका दिया जाए...

देखिए-सुनिए और फिर अपनी राय से मुझे जरूर अवगत कराइएगा, जिससे कि मैं खुद को बेहतर बना सकूं...


मंगलवार, 23 अगस्त 2016

अमर ब्लॉगर डॉक्टर अमर कुमार के बिना 5 साल...खुशदीप


आज जिस तरह का दौर है, उसमें कोई दूसरे की सुनने को तैयार नहीं है...राजनीति, धर्म, जाति से बंधी अपनी विचारधाराएं हैं, जिनमें आलोचना सुनने का किसी के पास संयम नहीं है...सब अपने मठाधीशों के पीछे हैं...मठाधीशों के अपने हित हैं, स्वार्थ है...ऐसे में इनसानियत, मेल-मोहब्बत की बातों के लिए किसी के पास फुर्सत ही कहां हैं...करीब 6 साल पहले मैंने 'न हिंदू, न मुसलमान...वो बस इनसान' नाम से एक  कहानी लिखी थी...उसी कहानी पर डॉक्टर अमर कुमार की ये टिप्पणी मिली थी...डॉ अमर कुमार कौन? 2011 से पहले के सारे हिंदी ब्लॉगर उन्हें जानते हैं...आज डॉक्टर साहब की 5वीं पुण्यतिथि है...उनके बारे में और जानने से पहले उनकी टिप्पणी पढ़ लीजिए...

यदि यह कहानी ही है, तो यह एक ठँडे मन और शान्त चरित्र की कहानी है,
किसी भी तरह का उन्माद विवेक के सारे रास्तों पर नाकेबन्दी कर देता है ।
जब विवेकहीन या कहिये कि कुटिल पथप्रदर्शक जान बूझ कर अनपढ़ बना कर रखे गये जनसमूह को यह नारा दें कि, तर्क मत करो.. अपने समर्पण को सिद्ध करो, तो कोई क्या उम्मीद करे ?
खुशदीप, यहाँ अनपढ़ का अर्थ साक्षरता से कुछ अलग भी है !
लगता है, हम सब एक बड़े षड़यन्त्र के मध्य जी रहे हैं, अपने स्वार्थों और अहमन्यता के चलते बुद्धिजीवी वर्ग तटस्थता में ही अपना परिष्कार देखता है । फिर भी तुम बस लगे रहो, लगे रहो खुशदीप भाई ! तुम्हारे सँग सरकिट की भूमिका मैं निभा लूँगा ।

डॉक्टर साहब की ये टिप्पणी मुझे 11 अप्रैल 2010 को अपनी इस पोस्ट पर मिली थी...डॉक्टर साहब का एक-एक शब्द मायने रखता था...जीवन का सार लिए होता था...जिस किसी ब्लॉगर को भी पोस्ट पर डॉक्टर साहब की ट्रेडमार्क इटैलिक टिप्पणी मिल जाती थी वो धन्य हो जाता था...

डॉ. अमर कुमार को हमसे बिछुड़े आज पूरे 5 साल हो गए...डॉक्टर साहब ने 23 अगस्त 2011 को दुनिया को अलविदा कहा...ये वो वक्त था जब हिंदी ब्लॉगिंग पूरे उफ़ान पर थी...फेसबुक तब आ तो गया था लेकिन ऐसा दैत्याकार नहीं था, जैसा कि अब है. ...जिसकी डॉयनासोर रूपी छाया में ब्लॉगिंग भी दब कर रह गई...

ये मेरा दुर्भाग्य था कि दीवाली वाले दिन 5 नवंबर 2010 को मेरे पिता का साथ छूटा था...और साढ़े नौ महीने बाद डॉ अमर कुमार पंचतत्व में विलीन हो गए...मैं जीवन में कभी डॉक्टर साहब को साक्षात नहीं देख सका...जनवरी 2011 की बात है, मैं भतीजी की शादी में हिस्सा लेने लखनऊ गया था...वहीं डॉक्टर साहब का रायबरेली से फोन आया था कि गाड़ी भेज देता हूं, आकर मिल जाओ...लेकिन लखनऊ में शादी के समारोहों में व्यस्तता के चलते बहुत इच्छा होने के बाद भी डॉक्टर साहब से मिलने नहीं जा पाया...तब डॉक्टर साहब से फोन पर मैंने माफ़ी मांगते हुए कहा था कि अगली बार जब लखनऊ आऊंगा, आपसे मिलने ज़रूर आऊंगा...लेकिन मुझे क्या पता था कि वो दिन कभी नहीं आ पाएगा...

डॉक्टर साहब के जाने के बाद मैंने अपनी एक पोस्ट में लिखा था-   

मौत को भी ज़िंदादिली सिखा देने वाले शख्स को आखिर मौत कैसे हरा सकती है...कैसे ले जा सकती है ब्लॉग जगत के सरपरस्त को हम सबसे दूर...दर्द को भी कहकहे लगाना सिखा देने वाले डॉ अमर कुमार का शरीर बेशक दुनिया से विदा हो गया लेकिन जब तक ये ब्लॉगिंग रहेगी उनकी रूह, उनकी खुशबू हमेशा इसमें रची-बसी रहेगी...टिप्पणियों में छोड़ी गई उनकी अमर आशीषों के रूप में...कहते हैं इंटरनेट पर छोड़ा गया एक एक शब्द अमर हो जाता है...और उनका तो नाम ही अमर था...अमर मरे नहीं, अमर कभी मरते नहीं....डॉक्टर साहब अब ऊपर वाले की दुनिया को ब्लॉगिंग सिखाते हुए हम सबकी पोस्टों को भी देखते रहेंगे...

मुझे तो आज भी हमेशा यही लगता है कि मेरी पोस्ट पर डॉक्टर साहब की टिप्पणी आएगी...ओए खुशदीपे या खुशदीप पुत्तर...


एक बात और, मैं पिछले 5 साल से डॉक्टर साहब के सुपुत्र डॉक्टर शांतनु के संपर्क में हूं...इस वक्त वो दिल्ली में जिस हॉस्पिटल में कार्यरत है, वो मेरे घर के पास ही स्थित है...शांतनु बेटा पर डॉक्टर साहब के संस्कारों की पूरी छाप है...दूसरों के काम आने का जज़्बा उसमें भी कूट कूट कर भरा है...हो भी क्यों ना...इंसानियत का पाठ उसे विरासत में जो मिला है...


(इस लिंक पर जाकर आप डॉक्टर साहब को उनकी टिप्पणियों से ही दी गई इन ब्ल़ॉगर्स की श्रद्धांजलियों को पढ़ सकते हैं-  अनूप शुक्ल, सतीश सक्सेना, बीएस पाबला, डॉ अनुराग आर्य, शिखा वार्ष्णेय, राजीव तनेजा, रचना, रश्मि रवीजा, ZEAL-डॉ दिव्या)

रविवार, 21 अगस्त 2016

ओमरान को देख दुनिया रोई लेकिन वो खुद नहीं...खुशदीप






ओमरान दाकनीश अब ठीक है...3 साल के मासूम के ज़ख्मों को साफ कर अस्पताल से डिस्चार्ज कर दिया गया है...लेकिन ओमरान के साथ खेलने वाला उसका 10 साल का भाई अली दाकनीश अब इस दुनिया में नहीं रहा...शनिवार को उसकी अस्पताल में मौत हो गई...ओमरान के साथ उसके माता-पिता, एक भाई और दो बहनें ज़रूर सुरक्षित हैं...

युद्ध की मार झेल रहे सीरिया के एलेप्पो शहर से इस हफ्ते आई ओमरान की तस्वीर और वीडियो को जिसने भी  देखा वो विचलित हुए बिना नहीं रह सका...हवाई हमले के तत्काल बाद मलबे की धूल और ख़ून से सना ओमरान का सपाट चेहरा युद्ध की तबाही का प्रतीक बन गया है...ओमरान की ख़ामोशी चीख चीख कर कहती लगी, देख इनसान, तून्हें दुनिया को क्या बना दिया है...

यही वजह है कि सीएनएन जैसे पेशेवर और खांटी न्यूज़ चैनल की बेहद अनुभवी एंकर केट बोलडॉन भी ओमरान से जुड़ी रिपोर्ट दिखाते वक्त तमाम कोशिश के बाद भी अपने आंसुओं पर नियंत्रण नहीं रख सकीं...

ये वही एंकर हैं जो अपने सख्त सवालों से किसी की भी छुट्टी कर देने के लिए जानी जाती हैं...लेकिन ओमरान की रिपोर्ट दिखाते वक्त उनका दूसरा चेहरा ही दिखा...लगा कि उनके अंदर की मां ओमरान को इस हाल में देखकर विचलित है...और दौड़ कर ओमरान को एंबुलेंस की कुर्सी से उठाकर गले लगा लेना चाहती है...वैसे जिसने भी ओमरान की तस्वीर या वीडियो देखा, उस का यही मन किया....



अब सुनिए, सीएनएन एंकर केट ने रिपोर्टिंग के वक्त रूंधी आवाज में क्या कहा..."जिस चीज़ ने मुझे स्ट्राइक किया वो है कि हम सब की आंखें गीली हैं, लेकिन इस बच्चे की आंख में एक भी आंसू नहीं है। वो एक बार भी नहीं चिल्लाया। तय है कि वो पूरी तरह सदमे में है। ओमरान को एंबुलेंस में छोड़ा गया है, अकेले बहते ख़ून के साथ..बचावकर्मी फिर मलबे के बीच गए हैं, ये तलाशने की शायद कोई और जीवित वहां फंसे हों...ओमरान हैरान है कि कुछ लम्हे पहले वो अपने घर में सुरक्षित था। युद्ध और अफरातफरी के उन्माद और हड़बड़ी में सब खो गया...

रिपोर्ट के आखिर में केट फूट फूट कर रो पड़ी। ये कहते हुए- "ये ओमरान है। ये ज़िंदा है। हम चाहते हैं कि आप ये बात जानें...



ओमरान का ट्रीटमेंट करने वाले डॉक्टर्स और नर्स ने बताया कि अस्पताल में भी वो पूरी तरह ख़ामोश रहा...बस एक दो बार अपने मां-बाप के बारे में पूछा...डॉक्टर्स ने ये भी बताया कि उसी दिन ओमरान की तरह 15 साल से कम उम्र के दर्जन से ज़्यादा बच्चे ट्रीटमेंट के लिए लाए गए...

ओमरान के वीडियो को पहले दो दिन में ही दुनिया में डेढ़ करोड़ से ज़्यादा लोग देख चुके हैं...ओमरान के पिता अबू अली अब किसी से भी बात करते डर रहे हैं...उन्हें ख़ौफ़ है कि ओमरान के चेहरे के सिंबल बन जाने की वजह से उनके परिवार को सीरिया सरकार समर्थित सैनिक कहीं नुकसान ना पहुंचाएं...ओमरान का परिवार जिस अपार्टमेंट में रहता था वो एलेप्पो के बाह्य क्षेत्र में स्थित है...ये इलाका विद्रोहियों के कब्ज़े वाला माना जाता है....ये साफ़ नहीं हुआ कि ओमरान का घर सीरियाई सेना के हवाई हमले में ध्वस्त हुआ या सीरियाई राष्ट्रपति असद के समर्थक रूस के हवाई हमले में...हालांकि रूस की और से ऐसी किसी कार्रवाई से इनकार किया गया है...

बताया गया है युद्ध क्षेत्र में नागरिकों का इलाज करने वाले डॉक्टर्स ने कुछ दिन पहले ही अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा को सख्त चिट्ठी लिखकर नाराज़गी जताई थी...इस चिट्ठी में कहा गया था कि यहां के नागरिकों को आपके आंसुओं और हमदर्दी की ज़रूरत नहीं है...दुआएं भी नहीं चाहिएं...उन्हें बस एक्शन चाहिए...जिससे कि निर्दोषों के मारे जाने का सिलसिला बंद हो सके...

दुनिया की महाशक्तियों के दंभ और उनकी कठपुतलियों ने कई इलाकों को दोज़ख़ बना दिया है...यही वजह है कि आतंक फैलाने के जो भी असल में ज़िम्मेदार हैं, उनके ख़िलाफ़ एकजुट होकर ठोस लड़ाई नहीं हो पा रही है...काश इनसान को अक्ल आए और निर्दोषों के मारे जाने का सिलसिला बंद हो...फिर किसी ओमरान का लाख सवाल करता ऐसा चेहरा दुनिया को ना देखना पड़े...काश...

आमीन...

शनिवार, 20 अगस्त 2016

‘जय सिंधू, जय हिंदू’ कहने वालों को आप क्या कहेंगे...खुशदीप



पीवी सिंधू...साक्षी मलिक...दीपा कर्माकर...साइना नेहवाल, सानिया मिर्ज़ा...नाज़ हैं हमें देश की इन बेटियों पर...या यूं कहे कि देश की सारी बेटियों पर...रियो ओलंपिक में साक्षी ने पहले कुश्ती में ब्रॉन्ज जीत कर मेडल का सूखा मिटाया...और फिर सिंधू ने बैडमिंटन में सिल्वर जीत कर इतिहास रच दिया...देश की पहली ओलंपिक सिल्वर मेडलिस्ट बेटी बनकर...शुक्रवार को गोल्डन मुकाबले में भी उन्होंने पहला गेम जीतकर वर्ल्ड नंबर 1 कैरोलिना (स्पेन) के एक बार तो छक्के छुड़ा दिए थे...सिंधू फाइनल में हारी ज़रूर लेकिन सवा अरब देशवासियों का दिल जीत लिया...

क्रिकेट से इतर किसी खेल में देश को इस तरह जश्न मनाने के मौके कम ही मिलते हैं...जिस तरह पूरा देश सांस रोक कर सिंधू का फाइनल मुकाबला देख रहा था, वो क्रिकेट के रोमांच से कहीं कम नहीं था...बल्कि अधिक ही था...सिंंधू की उपलब्धि पर क्या मीडिया और क्या सोशल मीडिया, हर किसी ने अपनी तरह से हर्ष व्यक्त किया...मैंने खुद भी तत्काल फेसबुक और ट्विटर पर खुशी जताई...

ट्विटर पर ऐसा करते वक्त अचानक एक ट्वीट पर नज़र पड़ी...ये ट्वीट डॉ अरविंद मिश्रा का था...बड़े विद्वान व्यक्ति हैं...हिंदी के अधिकतर ब्लॉगर इनसे परिचित हैं...फेसबुक पर भी सक्रिय रहते हैं...सिंधू का ओलंपिक फाइनल मुकाबला ख़त्म होने के तत्काल बाद डॉ मिश्रा ने ट्वीट किया...क्या ट्वीट किया आप खुद ही पढ़ लीजिए...


"जय सिन्धू, जय हिन्दू"...

अब इसे पढ़ने के बाद कहने को कुछ रह जाता है क्या...बस सिर पीट लेना ही बाक़ी रह जाता है... क्या खेल का भी कोई मज़हब हो सकता है...

सिंधू हो या साक्षी पूरे देश को उन पर गुमान है...देश का हर नागरिक उनकी उपलब्धि पर गौरवान्वित है...ठीक वैसे ही जैसे टेनिस में सानिया मिर्जा कई इंटरनेशनल टूर्नामेंट जीत कर देश और देशवासियों का मान बढ़ाती रही है...

यहां डॉ मिश्रा से मेरा एक सवाल है...जैसे कि उन्होंने सिंधू की जीत के साथ हिंदू शब्द जोड़ने की कोशिश की...अगर ऐसे ही सानिया की हर जीत के बाद कोई ऐसा लिखे तो कैसा लगेगा...

जय मिर्ज़ा, जय मुसलमान...

यक़ीनन ये पढ़ना बहुत बुरा लगेगा...अगर ये बुरा है तो फिर डॉ मिश्रा ने जो लिखा तो वो बुरा क्यों नहीं...निश्चित रूप से वो भी बहुत बुरा है...

सिंधू हो या साक्षी या फिर सानिया, सभी देश की बेटियां हैं...वो बेटियां जिन्होंने पूरी दुनिया में भारत का नाम ऊँचा किया है...खेल को, खिलाड़ियों को, भगवान के वास्ते, अल्लाह के वास्ते, किसी खांचे में बांटने की कोशिश मत कीजिए...बांटने के खेल के लिए पहले से ही इस देश की राजनीति कम है क्या...


शुक्रवार, 19 अगस्त 2016

इस मासूम ख़ामोशी ने मुझे अंदर तक हिला दिया...खुशदीप


इस तस्वीर को गौर से देखिए...एक-दो मिनट के लिए बच्चे के चेहरे का हर भाव पढ़ने की कोशिश कीजिए...

आप भी कहेंगे कि पीवी सिंधू ने रियो ओलंपिक में सिल्वर मेडल पक्का करने वाली पहली भारतीय महिला एथलीट होने का इतिहास रचा है, ऐसे जश्न के माहौल में मैं आपको इस बच्चे की तस्वीर दिखा रहा हूं...

यकीन मानिए 22 साल से पत्रकारिता कर रहा हूं, लेकिन आज इस बच्चे की तस्वीर और वीडियो को देखकर जितना हिला हूं, वैसा पहले कभी नहीं हुआ...चलिए पहले आप वीडियो भी देख लीजिए...


वीडियो आपने देख लिया...अब आपको इस बच्चे के बारे में बताता हूं...इस 5 साल के मासूम का नाम है ओमरान दाकनीश...ये बच्चा सिविल वॉर की मार सह रहे सीरिया के एलेप्पो शहर में रहने को अभिशप्त है...ओमरान का वीडियो और तस्वीर एलेप्पो शहर पर हवाई हमले के बाद की है...ओमरान को एक बिल्डिंग से रेस्क्यू के बाद एंबुलेस के अंदर कुर्सी पर लाकर बिठाया गया है...

तस्वीर और वीडियो में ओमरान का लहूलुहान चेहरा देखा जा सकता है...वो पूरा मलबे की गर्त से ढका हुआ है...ओमरान ना रो रहा है, ना चिल्ला रहा है...शांति से रेस्क्यू वर्कर्स को अपना काम करते देख रहा है...चार बच्चों, एक शख्स को और बचा कर लाया जाता है...फिर एंबुलेंस सभी को लेकर अस्पताल चली जाती है...नहीं पता कि ओमरान के मां-बाप कहां हैं...ज़िंदा भी हैं या नहीं...

ओमरान जब एंबुलेंस के अंदर कुर्सी पर बैठा था तो उसकी एक मासूम हरकत ने मुझे अंदर तक झिंझोड़ कर रख दिया...ओमरान अपना बायां हाथ माथे तक ले जाता है...माथे को छूकर हाथ वापस लाता है...हाथ पर ख़ून लगा देखता है...फिर घबरा कर झट से हाथ को कुर्सी के कपड़े से मिटाने की कोशिश करता है...लेकिन रहता पूरी तरह ख़ामोश ही है...उफ़ ओमरान, तुम्हारी ये शांति बड़े से बड़े तूफ़ानों पर भारी है...

बच्चे की टी-शर्ट को गौर से देखें तो उस पर पॉपुलर कार्टून कैट-डॉग को देखा जा सकता है...ख़ून और धूल से ढका हुआ...कैट डॉग यानि कुत्ते बिल्ली की जन्मजात लड़ाई...बच्चे ओमरान की तस्वीर और वीडियो में मुझे कुछ बिम्ब दिखाई दिए...लड़ाई, जंग, हिंसा के बिम्ब...उनकी निरर्थकता के बिम्ब...

ये भी समझ आया कि हिरोशिमा और नागासाकी की तबाही के बाद भी इनसान ने कुछ नहीं सीखा...अहम की जंग और सर्वश्रेष्ठ होने के दंभ में वो खुद ही दुनिया का सर्वनाश करने पर तुला है...सरहदें जो उसने खुद बनाई हैं, उनके नाम पर मरने-मारने पर उतारू है...अपने हिंसक इरादों को स्वीकार्यता देने के लिए मज़हब को ढाल बना रहा है...जंग के बोल बोलना बहुत आसान है...जंग के दंश सहना बहुत मुश्किल...

किसे है मासूम ओमरान का चेहरा पढ़ने की फुर्सत...

काश...

  


गुरुवार, 18 अगस्त 2016

ऋषि कपूर जी! राखी गुलज़ार समेत महिलाओं पर भद्दे ट्वीट्स ह्यूमर नहीं बेहूदगी हैं...खुशदीप

ऋषि कपूर 63 साल के हो चले हैं...लेकिन हरकतें अब भी इनकी चिंटू बाबा वाली ही हैं...जनाब का संबंध बॉलिवुड की फर्स्ट फैमिली यानि कपूर खानदान से है...आजकल इन्हें फिल्मों में एक्टिंग से ज़्यादा मज़ा ट्विटर पर औरों को टीज़ करने में आ रहा है...ठीक वैसे ही बेहूदगी के अंदाज़ में जैसे कि केआरके (कमाल राशिद ख़ान) जैसा नमूना करता रहा है...

ऋषि कपूर को भी शायद ये गलतफ़हमी हो गई है कि उनका सेंस ऑफ ह्यूमर गज़ब का है...और वो जो कुछ भी उल्टा-सीधा ट्वीट करते हैं, वो बहुत पसंद किया जाता है...इसी चक्कर में वो शालीनता की हदें भी पार कर रहे हैं...उनके तीन ट्वीट हाल में काफ़ी विवादित हुए हैं...सबसे ताज़ा मामला बीते ज़माने की एक्ट्रेस राखी गुलज़ार को लेकर उनके ट्वीट का है...

राखी उम्र में ऋषि से 6 साल बड़ी हैं...कई फिल्मों में दोनों साथ काम भी कर चुके हैं...कभी-कभी में ऋषि ने राखी के बेटे का किरदार निभाया था...दूसरा आदमीमें ऋषि ने ऐसे लड़के का किरदार निभाया था जो अपनी उम्र से बड़ी महिला (राखी) को प्रेमिका के तौर पर देखने लगता है...संयोग है कि इसी फिल्म को ए दिल है मुश्किल के नाम से दोबारा बनाया जा रहा है...इसमें ऋषि वाला किरदार उनके बेटे रणबीर कपूर निभा रहे हैं और राखी वाले रोल में ऐश्वर्या राय बच्चन को कास्ट किया गया है...

हां तो बात हो रही थी ऋषि कपूर के ताजा ट्वीट की...ऋषि कपूर ने रक्षा बंधन के मौके पर राखी बांधने को अपने ह्यूमर का टच देने की कोशिश की है...ऋषि कपूर ने इसके लिए सत्तर के दशक की फिल्म 'कस्मे वादे' का एक फोटो अपलोड किया है...इसमें एक्ट्रेस राखी एक खंभे से बंधी दिख रही हैं...इस फिल्म में राखी के साथ अमिताभ बच्चन और रणधीर कपूर (ऋषि कपूर के बड़े भाई) की अहम भूमिकाएं थीं...ऋषि कपूर ने फोटो के साथ ही लिखा है- 

Visuals for tying Rakhee’. Enjoy sisters! (‘राखी को बांधने का दृश्य, बहनें आनंद लें)...



अगर ऋषि कपूर अपनी इस बेहूदगी को ह्यूमर मानते हैं तो सिर पीट लेने को दिल करता है...एक सीनियर एक्ट्रेस को इस तरह मज़ाक का विषय बनाना...वो भी राखी जैसे त्योहार के साथ जोड़कर...ऋषि जी आपने सिर्फ एक्ट्रेस राखी का ही नहीं बल्कि बहन-भाई के पवित्र रिश्ते का भी उपहास उड़ाया है...

लगता है ऋषि जी, ट्विटर पर खास तौर पर महिलाओं का मज़ाक उड़ाना आपका शगल बन गया है...राखी से पहले भी आपने अभी हाल में ट्विटर पर दो और महिलाओं को भी अपने तथाकथित ह्यूमर का निशाना बनाया...इनमें एक महिला अमेरिका के राष्ट्रपति पद की उम्मीदवार हिलेरी क्लिंटन थीं तो दूसरी अमेरिकी टेलीविजन स्टार किम  कार्दाशियन.... हिलेरी क्लिंटन के लिए फोटो के साथ ऋषि कपूर ने ये ट्वीट किया-

इतिहास खंगाला जा रहा है...ABjr (अभिषेक बच्चन) का इसके लिए शुक्रिया...अगर ये सही नहीं था, तो इसने बुरा स्वाद छोड़ा होगा”…



दरअसल ऋषि कपूर की मंशा उस कुख्यात घटना की ओर इशारा करने की थी जिसमें हिलेरी क्लिंटन के पति और अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बिल क्लिंटन और व्हाईट हाउस की पूर्व इंटर्न मोनिका लेंविस्की शामिल बताए गए थे...ऋषि कपूर को हिलेरी पर ऐसा ट्वीट करने के लिए ट्विटर यूजर्स ने ट्रॉल किया...लेकिन ऋषि पर कोई असर नहीं पड़ा...

कुछ ही दिन बाद ऋषि कपूर ने अपने ट्वीट के ज़रिए किम कार्दाशियन की खिल्ली उड़ाई...उन्होंने किम के एक फोटो के साथ उनकी ड्रेस की तुलना प्याज की बोरी से कर डाली...ऋषि कपूर ने साथ ही ट्वीट में लिखा- मैश बैग में प्याज...


इस पर एक ट्विटर यूजर ने लिखा- चिंटू सर, आपकी उम्र के साथ आपकी शरारतें बढ़ रही हैं”…

अब सवाल यहां ये उठता है कि ऋषि कपूर एक के बाद एक महिलाओं को ही ऐसे बेहूदे ट्वीट्स का निशाना क्यों बना रहे हैं...इस तरह अपना वक्त जाया करने की जगह ऋषि कपूर को कुछ कंस्ट्रक्टिव सोचना चाहिए...ये भी गौर करना चाहिए कि वो किस ग्रेट राज कपूर के बेटे हैं...उनके पिता ने बॉलिवुड को दुनिया में पहचान दिलाने वाला जो बैनर आरके फिल्म्स खड़ा किया था, वो आज किस धूल के पीछे खो गया है...

दरअसल, यहां फर्क समझना होगा, राज कपूर बहुत युवा थे तभी उन्होंने अपनी काबलियत और मेहनत से आरके फिल्म्स का बैनर खड़ा कर दिया था...ऐसा नहीं कि राज कपूर के पिता पृथ्वीराज कपूर कोई छोटी मोटी हस्ती थे...लेकिन पृथ्वीराज कपूर ने राज कपूर को खुद अपनी मेहनत से कुछ बनने का जज़्बा सिखाया...

राज कपूर ने अपने करियर की शुरुआत क्लैपर बॉय के तौर पर की...फिर निर्देशक केदार शर्मा का असिस्टेंट बनकर फिल्ममेकिंग की बारीकियां सीखीं...राज कपूर ने इसके लिए कड़ी मेहनत की...बेटों के जवान होने से पहले ही राज कपूर इंडस्ट्री के द ग्रेट शोमैन बन गए थेउन्होंने कल, आज और कल’  से बड़े बेटे रणधीर कपूर को लॉन्च किया...फिर ऋषि कपूर को पहले बाल कलाकार के तौर पर मेरा नाम जोकर में और फिर हीरो के रुप में बॉबी से इंडस्ट्री को रू-ब-रू कराया...सबसे छोटे बेटे राजीव कपूर ने किसी और निर्देशक के साथ  अपने करियर की शुरुआत की लेकिन राजीव को भी उनकी सबसे बड़ी हिट फिल्म राम तेरी गंगा मैलीपिता राज कपूर ने ही दी....  

कहने का निचोड़ यही है कि अपने बेटों को राज कपूर ने मुंह में चाँदी के चम्मच की तरह बॉलिवुड का करियर दिया...लेकिन अपनी युवावस्था में जो मेहनत की थी वो पाठ बेटों को सिखाना शायद भूल गए...अगर ऐसा किया होता तो ऋषि कपूर भी आज बेहूदे ट्वीट्स की जगह फिल्म इंडस्ट्री को कुछ पॉजिटिव देने की सोच रहे होते...महिलाओं पर भद्दे मज़ाक करने की जगह आरके फिल्म्स में दोबारा जान फूंकने की बात सोच रहे होते...


सोमवार, 15 अगस्त 2016

लाल चौक पर तिरंगा और जाह्नवी बिटिया को मेरी चिट्ठी...खुशदीप






जाह्नवी बेटा,

स्नेहाशीष

सबसे पहले आपको और हर भारतीय को स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं...आपकी बहुत इच्छा थी स्वतंत्रता दिवस पर श्रीनगर के लाल चौक पर तिरंगा फहराने की, जो वहां के दुर्भाग्यपूर्ण हालात की वजह से पूरी नहीं हो सकी...आपको रविवार यानी 14 अगस्त को स्थानीय प्रशासन ने श्रीनगर अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे से ही लौटा दिया...

श्रीनगर के एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी के मुताबिक आप 30 और लोगों के साथ श्रीनगर हवाई अड्डे पर पहुंची थी...आपके समेत 6 लोग चंडीगढ़ से और 25 अन्य लोग दिल्ली से फ्लाइट पकड़ कर पहुंचे थे...सभी को बिना कारण बताए ही उन्हीं विमान से वापस भेज दिया गया, जिनसे वो श्रीनगर पहुंचे थे...

श्रीनगर समेत पूरी घाटी के जैसे इन दिनों हालात है, उसे देखते हुए प्रशासन ने जिस तरह का कदम उठाया वो स्वाभाविक ही था...वो कोई ज़ोखिम नहीं ले सकता था...ये संभव था कि सेना का भारी बंदोबस्त कर लाल चौक पर आपसे तिरंगा फहरवा दिया जाता...लेकिन सेना को पहले ही वहां मुश्किल चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है...ऐसे में उसका ध्यान बंटवा कर इस काम में लगा दिया जाता तो ये उचित भी नहीं होता...

अब यहां ये सवाल उठ सकता है कि भारत की ज़मीन पर तिरंगा नहीं फहराएंगे तो कहां फहराएंगे भला? ये सवाल मोदी सरकार के दिल्ली की सत्ता में आने से पहले भी बड़ी शिद्दत के साथ पूछा जाता था, ज़ाहिर है अब भी पूछा जाएगा 

अब तो ये सवाल और भी प्रासंगिक है क्योंकि जम्मू-कश्मीर में भी सरकार में बीजेपी बराबर की भागीदार है? ख़ैर, मेरा आपको पाती लिखने का मकसद ऐसे सवालों में उलझना नहीं है...मेरा मकसद आप जैसी प्रखर बिटिया से संवाद करना है?  उस बिटिया से जिसमें अपार ऊर्जा, विलक्षणता और संभावनाएं नज़र आती हैं...

जाह्नवी बेटा आपने बीती 23 जुलाई को ऑनलाइन बयान में लाल चौक पर 15 अगस्त को तिरंगा फहराने की इच्छा जताई थी...आपने ये भी कहा था कि आप लाल चौक पर ही तिरंगा फहराना चाहती हैं क्योंकि वहां तिरंगे का अपमान हुआ था...आपका ये बयान उसी वक्त आया था जब आतंकी संगठन हिज़बुल मुजाहीदीन के कमांडर बुरहान वानी के सुरक्षा बलों की कार्रवाई में मारे जाने के बाद घाटी में हिंसक विरोध प्रदर्शन हो रहे थे...आपने अलगाववादियों और पाकिस्तानियों को खुले तौर पर चुनौती भी दी थी कि अगर वो रोक सकते हैं तो आपको तिरंगा फहराने से रोक कर दिखाएं...लेकिन प्रशासन ने ऐसी नौबत ही नहीं आने दी और आपको एक दिन पहले ही श्रीनगर से लौटा दिया...   

आपने 23 जुलाई को इस आशय का बयान दिया तब भी आपको देश के मीडिया में भरपूर सुर्खियां मिलीं...रविवार को आपको लौटा दिया गया तो भी मीडिया ने वैसा ही किया...आपने जो इच्छा जताई थी, उसका बिना सेना की सहायता लिए पूरा होना नामुमकिन था...बेटा, आप सिर्फ 15 साल के हो, आप शायद घाटी की वास्तविकता से परिचित ना हों लेकिन आश्चर्य है कि आपको इस बारे में किसी बड़े ने भी नहीं समझाया...उन 30 बड़े लोगों ने भी नहीं जो आपके साथ श्रीनगर पहुंचे...जो भी हुआ मीडिया को हेडलाइन्स ज़रूर मिल गई....

जाह्नवी बेटा, आपको मीडिया ने इस साल मार्च में भी हाथोंहाथ लिया था जब आपने जेएनयू छात्रसंघ के अध्यक्ष कन्हैया कुमार को कहीं भी, किसी भी वक्त खुली बहस करने की चुनौती दी थी...ये वो वक्त था जब आप दसवीं के  इम्तिहान से गुज़र रहीं थी...मुझे पूरी उम्मीद है कि आप जैसी मेधावी छात्रा ने दसवीं की परीक्षा भी बहुत अच्छे नंबरों से पास की होगी और अब ग्यारहवीं में पूरे मनोयोग से पढ़ाई कर रही होंगी...

इंटरनेट पर जो जानकारी उपलब्ध है, उसके मुताबिक आपकी पढ़ाई लुधियाना के भाई रणधीर सिंह नगर में स्थित डीएवी पब्लिक स्कूल में हो रही है...आपके पिता अश्विनी बहल रीयल एस्टेट कारोबारी हैं जिनका कहना है कि उनका किसी राजनीतिक संगठन से कोई जुड़ाव नहीं रहा है...अश्विनी बहल पिछले 10 साल से रक्षा ज्योति फाउंडेशन नामक एनजीओ भी चला रहे हैं...इंटरनेट की जानकारी के मुताबिक आप इस एनजीओ से 2010 में जुड़ गई थीं, तब आपकी उम्र महज़ 9 साल की होगी...आप इस समय स्वामी विवेकानंद की बॉयोग्राफी पर काम कर रही हैं जिससे कि हर कोई उनके जीवन के बारे में अच्छी तरह जान सके...

मीडिया रिपोर्ट्स से ये भी पता चलता है कि आप प्रधानमंत्री के बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओऔर स्वच्छ भारत अभियान से बहुत प्रभावित रही हैं...स्वच्छता अभियान में योगदान के लिए आपको गणतंत्र दिवस पर सम्मानित भी किया गया...प्रधानंमंत्री की और से आपको प्रशस्ति पत्र भी भेजा गया....

जाह्नवी बेटा, छोटी सी उम्र से ही आपके सामाजिक कार्यों की तरफ रुझान के और भी कई उदाहरण मिलते हैं...जैसे कि आपने 2014 में नाबालिगों को तंबाकू-शराब बेचने वालों के खिलाफ स्टिंग ऑपरेशन किया था....

आप मदर टेरेसा से प्रभावित हैं और आपने कन्या भ्रूण हत्या के खिलाफ मां मेरा कि कसूर’  नाम से एक डॉक्यूमेंट्री भी बनाई है...इंटरनेट से ये भी पता चलता है कि आपने एडल्ट फिल्मों और सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर पॉर्न कंटेट के खिलाफ हाईकोर्ट का दरवाज़ा भी खटखटाया था...आप उस मामले की सुनवाई के दौरान स्कूल ड्रेस में ही कोर्ट में गई थीं...

आपके इन सब कार्यकलापों से आपकी सामाजिक प्रतिबद्धता स्पष्ट है...मैं चाहता हूं कि आप बड़ी होकर अपनी लीडरशिप क्वालिटी से समाज का सही मार्गदर्शन करें...लेकिन अभी आप सिर्फ 15 साल की हैं...मनोविज्ञान कहता है कि हर व्यक्ति को अपनी प्रशंसा सुननी अच्छी लगती है...लोकप्रिय होना कौन पसंद नहीं करता...

मीडिया में किसी को भी इतना स्थान मिले तो वो सातवें आसमान पर चढ़ सकता है...लेकिन कुछ परिस्थितियों में ये घातक भी हो सकता है...इनसान को ये लग सकता है कि वो जो कुछ भी करता है दुनिया उसे मान्यता दे और उसकी प्रशंसा करे...लेकिन ये हर स्थिति में संभव नहीं है...ऐसा भी होता है कि किसी को रातोंरात हीरो बनाकर ऊंचाई पर चढ़ा दिया जाता है, और फिर उसे ज़मीन पर उतारने में भी देर नहीं लगती...

इसे ऐसा भी समझे जा सकता है कि किसी बच्चे को कच्ची उम्र में ही रियलिटी टीवी शोज़ में भेज दिया जाता है....लेकिन वहां बच्चा नाकाम हो जाता है तो उसकी मनोस्थिति पर क्या असर पड़ता होगा, इसे समझा जा सकता है...हमारे समाज में किसी के वयस्क होने पर ही माना जाता है कि वो अपने बारे में अब स्वतंत्र निर्णय ले सकता है...यही वजह है कि हमारे देश में मताधिकार भी वयस्क होने पर ही मिलता है..

जाह्नवी, आप जीवन में जो बनना चाहती हैं, वो बन कर दिखाएं...आप ऊंचे से ऊंचे मकाम पर पहुंचे...लेकिन अभी आप उम्र के जिस दौर में हैं, उस बचपन को पूरी तरह जिएं...समाज में जो घट रहा है, उस पर नज़र रखें, लेकिन पढ़ाई जो इस वक्त आपके लिए सबसे ज़्यादा ज़रूरी हैं, उस पर भी पूरा फोकस रखें...क्योंकि आपके करियर के सारे रास्ते वहीं से खुलेंगे...ऐसे में प्रचार, राजनीति और मीडिया के मोहपाश से खुद को फिलहाल जितना बचाएं रख सकेंगी, उतना ही आपके लिए श्रेयस्कर होगा...ये बात आपके घर वाले भी अच्छी तरह समझते होंगे...

आपके उज्ज्वल भविष्य की कामना के साथ,

खुशदीप

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