गुरुवार, 13 अगस्त 2015

आज़ादी के जश्न से पहले यह विडियो ज़रूर देखें...खुशदीप



15  अगस्त आ गया है...आज़ादी का दिन...हम खुशकिस्मत हैं कि आज़ाद देश में जन्मे और जीवन में जो बनना चाहा, उसके लिए हमें अपनी योग्यता और क्षमता के अनुसार अवसर मिले...समाज में बिना किसी चुनौती के...बिना कोई तिरस्कार सहे...लेकिन सभी इतने भाग्यशाली नहीं हैं...आपने कभी इसी देश में रहने वाले उस समुदाय के बारे में सोचा है, जिसके लिए हाल तक किसी फॉर्म में जेंडर का कॉलम भरना ही टेढ़ी खीर था...

इसी समुदाय का कोई सदस्य अगर अपनी पसंद का करियर चुनना चाहता है, उसके पास तमाम योग्यता और क्षमता के साथ आगे बढ़ने का जज़्बा भी है लेकिन क्या उसके लिए रास्ता उतना ही आसान होता है जितना कि हम तथाकथित सामान्य लोगों के लिए...हम खुद को सामान्य कैसे कह सकते हैं अगर हम इस समुदाय (हिजड़ा या ट्रांसजेंडर्स) को खुशी के मौकों पर नाचने-गाने के अलावा कहीं और देख ही नहीं सकते...

भला हो सुप्रीम कोर्ट का जिसने 14 फरवरी 2014 को ऐतिहासिक फैसले में इस समुदाय को थर्ड जेंडर की पहचान दी...यहीं नहीं सरकार से इन्हें सामाजिक और आर्थिक तौर पर पिछड़े समुदाय के तौर पर नौकरियों और शिक्षा में आरक्षण देने के लिए भी कहा। लेकिन सिर्फ कोर्ट के फैसले पर ही बात खत्म नहीं हो जाती...इस समुदाय को पूरा न्याय तब मिलेगा जब समाज भी इनके लिए अपनी सोच को बदले...इस बात को समझे कि इस समुदाय को भी सम्मान के साथ रहने का अधिकार है जितना कि मुझे और आपको...मेरा यही मानना है कि नौकरियों और शिक्षा में अगर किसी को वास्तव में ही आरक्षण की ज़रूरत है तो इसी समुदाय को है।

यथार्थ पिक्चर्स ने 12 अगस्त को यू-ट्यूब पर एक विडियो अपलोड किया है...एक बार इस विडियो को देखिए...यकीन मानिए और कुछ कहने की ज़रूरत ही नहीं रह जाएगी....

(यू ट्यूव विडियो...आभार यथार्थ पिक्चर्स)

संसद की 'दीवार'...खुशदीप



संसद में जो कुछ आज हुआ, पहले कांग्रेस के सवाल और फिर सुषमा स्वराज के जवाब, उन्हें सुनकर फिल्म दीवार और उसमें लिखे सलीम-जावेद के डॉयलॉग बहुत याद आए....





संसद की दीवार

हमें एक ललित लिस्ट मिली है, जिसमें उन लोगों के नाम हैं जो भगौड़ों की मदद करते है, उनसे मदद लेते हैं, और भी ऐसे कई काम जो कानून की नजर में गुनाह हैंऔर उस लिस्ट में एक नाम तुम्हारा भी है ...लो इस पर साइन कर दो….

क्या है ये?

इसमे लिखा है कि तुम अपने सारे गुनाह कबूल करने को तैयार हो... तुम सब बताओगे कि कब किस भगौड़े की मदद की, कब किस भगौड़े या उसके करीबियों से मदद ली...परिवार के लोगों को लाभ पहुंचाने के लिए कब क्या क्या किया...सब सच बताओगे...फिर इस इस्तीफ़े पर साइन कर दो....


मैं इस पर साइन करने के लिए तैयार हूं...लेकिन अकेले नहीं...जाओ पहले उस आदमी का साइन लेकर आओ जिसने अपने एक करीबी को अंकल सैम की जेल से छुड़ाने के लिए भोपाल गैस बॉम्बर को देश से भागने दिया...जाओ पहले उस आदमी का साइन लेकर आओ जिसने दलाली के तोपची को छुपने और देश से भागने में मदद की...इसके बाद मामा बॉय तुम जिस कागज पर कहोगे मैं साइन करने को तैयार हूं...

दूसरो के पाप गिनाने से तुम्हारे अपने पाप कम नहीं होगें...ये सच्चाई नहीं बदल सकती कि तुम भगौड़े की मदद के ज़िम्मेदार हो...और जब तक ये दीवार बीच में हैं हम एक छत के नीचे नहीं रह सकते...संसद में सत्तापक्ष और विपक्ष एक साथ नहीं रह सकते...हम यहां से जा रहे हैं...चलिए नेताजी अपनी साइकिल लेकर हमारे साथ बाहर चलिए...

तुम्हें जाना हो तो जाओ नेताजी नहीं जाएंगे...

हमने कहा नेताजी हमारे साथ चलो...

नेताजी दबी आवाज़ में पहली बार बोलते हैं...नेताजी यहीं रुकेंगे...

नहीं नेताजी तुम ऐसा नहीं कर सकते...हम जानते हैं नेताजी साम्प्रदायिकता का कितना विरोध करते हैं...हम जानते हैं नेताजी विपक्ष की एकता के लिए कितना जोर देते हैं...नेताजी यहां नहीं रुक सकते...

नेताजी....मामा बॉय तुम भूल रहे हो कि सीबीआई का तोता अब तुम्हारे कब्ज़े में नहीं रहा...सीबीआई का तोता अब इनके पिंजड़े में है...इसलिए नेताजी यहीं रुकेंगे...तुम्हे जाना है तो जाओ...





शुक्रवार, 26 जून 2015

जापानी बुलेट ट्रेन की सफ़ाई, हमारी ट्रेन की धुलाई...खुशदीप

अगर सब सही रहा तो भारत की पहली बुलेट ट्रेन यात्रियों के साथ 2023 तक दौड़ने लगेगी। मुंबई-अहमदाबाद के बीच बुलेट ट्रेन कॉरिडोर बनाने में एक लाख करोड़ रुपये खर्च होंगे। अभी दोनों शहरों के बीच 534 किलोमीटर की दूरी नापने में सबसे फास्ट ट्रेन शताब्दी एक्सप्रेस को 7 घंटे लगते हैं। बुलेट ट्रेन की अधिकतम स्पीड 320 किलोमीटर होगी। यानी पौने दो घंटे से भी कम समय में मुंबई से अहमदाबाद पहुंचा जा सकेगा। किराया एसी 1 सफ़र के किराये से बस डेढ़ गुणा होगा। आज के हिसाब से देखा जाए तो 2800 रुपये। अमीर आदमी चाहें तो दोनों शहरों के बीच विमान की जगह बुलेट ट्रेन से ही डेली पैसेन्जरी भी कर सकेंगे। मंथली पास बनवा लेंगे तो और सस्ता पड़ेगा।

जापान में बुलेट ट्रेन को तोहोकू शिन्कान्सेन (हायाबूसा ट्रेन) कहा जाता है। इन ट्रेनों को जापान की प्रगति और कुशलता का पर्याय माना जाता है। जापान में ये ट्रेन ही फास्ट नहीं है बल्कि इनकी देखरेख और साफ़-सफ़ाई से जुड़ा स्टाफ भी इतनी द्रुत गति से काम करता है कि आप की आंखें खुली की खुली रह जाएंगी। इस संबंध में एक विडियो आजकल वायरल हो रहा है।

अमेरिकी पत्रकार चार्ली जेम्स के तैयार किए इस विडियो में देखा जा सकता है कि एक ट्रेन का सफ़र खत्म होने के बाद दूसरा सफ़र शुरू करने में सिर्फ 7 मिनट मिलते हैं। इन 7 मिनट में ही ट्रेन को कैसे चकाचक कर दिया जाता है, आप इस विडियो में देख सकते हैं। जापान के तोक्यो स्टेशन से हर दिन 300 बुलेट ट्रेन रवाना होती हैं, जिनसे 4 लाख यात्री यात्रा करते हैं।

ये विडियो यू ट्यूब पर जनवरी में डाला गया था। तोक्यो मेट्रोपॉलिटन गर्वंमेंट ने जेम्स और कई अंग्रेज़ी भाषी पत्रकारों को शहर आने का न्योता दिया था। लेकिन ये विडियो हाल में वायरल हुआ, जब भारतीय और फ्रेंच वेबसाइट ने इसे शेयर किया। अब तक बीस लाख से ज़्यादा लोग इस विडियो को देख चुके हैं।

विडियो अपलोड करने वाले पत्रकार जेम्स का कहना है कि मैं ये पकड़ना चाहता था कि जापानी लोग अपने काम में कितना आनंद और कितना गर्व महसूस करते हैं। कितनी बारीकी और कितनी तेज़ी से ये सुनिश्चित करते हैं कि लोगों को ट्रेन में सफ़र करना सुखद लगे। समयबद्ध ढंग से काम पूरा होने के बाद कतार में लग कर क्लीनिंग स्टाफ का झुकना अपने आप में ही उनके समर्पण की गवाही देता है। देखिए ये विडियो-



आशा करता हूं कि हम भारतीयों में भी काम के लिए ऐसा समर्पण और तेज़ी शीघ्र देखने को मिलेगी। फिलहाल तो ये स्लॉग ओवर मुलाहिजा फरमाइए।

स्लॉग ओवर 

भारतीय रेल में सफ़र के साथ-साथ मुफ़्त स्नान की भी सुविधा-


उम्मीद करता हूं कि हमारे देश में भी ये तस्वीर शीघ्र ही पलटेगी। क्यों...सुन रहें हैं ना प्रभु। मेरा आशय रेल मंत्री सुरेश प्रभु से है। ये वही सुरेश प्रभु हैं जिन्हें 21 जून को अंतरराष्ट्रीय योग दिवस पर कोच्चि में शवासन करते-करते झपकी लग गई थी। और इस नज़ारे की फोटो किसी ने ट्वीटर पर डाल दी और वो सोशल मीडिया पर वायरल भी हो गई।



प्रभु चैन से सोना है तो जाग जाइए... 

मंगलवार, 23 जून 2015

योगा इज़ रॉकिंग...इट्स न्यू फिनॉमनन...इट्स रिइन्वेन्टेड...खुशदीप



योग अब योगा हो गया है। योग जो कभी ऋषि-मुनियों तक सीमित था। अब मैंगो मैन (आम आदमी) की पहुंच में आ गया है। ये बात अलग है कि लालू प्रसाद कहते हैं कि योग की ज़रूरत गरीबों को कतई नहीं है। लालू के मुताबिक योग की ज़रूरत उन लोगों को है जिनके शरीर पर चर्बी चढ़ी हुई है। जो गरीबों का पैसा खाकर तोंद वाले हो गए हैं। सीपीएम महासचिव सीताराम येचुरी तो एक कदम और आगे बढ़ गए। उन्होंने योग के आसनों की तुलना कुत्ते की हरकतों से कर डाली। उन्होंने रविवार को भुवनेश्वर में कहा, जब कुत्ता उठता है तो शरीर के अगले हिस्से को खींचता है और पैर को बढ़ाता है। इसके साथ ही वह गहरी सांस लेता है।येचुरी को इस तरह की टिप्पणी के लिए ट्विटर पर बहुत बुरा-भला भी सुनना पड़ा।

लालू हों या येचुरी, दोनों का कहने का लबोलुआब यही था कि वे योग के विरोधी नहीं है। योग जीवन को संवारने में मदद करता है। लेकिन इससे पहले ज़रूरी है कि भूख और अकाल को दूर किया जाए। योग के फायदों को कोई नकार नहीं सकता। ये सिर्फ देश में ही नहीं विदेश में भी माना जाने लगा है। लेकिन योग से बड़ी कुछ और भी प्राथमिकताएं हैं समस्याओं से भरे इस देश में। योग का राजनीतिकरण जितना ग़लत है, उतना ही ग़लत है योग को एक धर्म विशेष से जोड़ कर देखना। हां इतना ज़रूर सच है कि योग प्राचीन भारत की देन था। योगा आधुनिक इंडिया की विषयवस्तु है। 

ख़ैर ये तो रहा योग का गंभीर पहलू। अब आइए कुछ काल्पनिक चीज़ों पर विचार किया जाए। जैसे कि-

शहरों और योजनाओं के नाम जैसे किसी पार्टी विशेष के राज में उसके नेताओं पर रख दिए जाते हैं, ऐसा ही योग  के आसनों के साथ होने लगे तो...मसलन कांग्रेस के राज में जवाहरासन, इंदिरासन, राजीवासन आदि आदि...एनडीए के राज में नमामि योगा, अटलासन आदि। कुछ आसन दिवंगत महापुरुषों जैसे कि श्यामा प्रसाद मुखर्जी, दीनदयाल उपाध्याय को भी समर्पित किए जा सकते हैं।

आम आदमी पार्टी का योग अपने करेक्टर के मुताबिक अलग छाप लिए होगा। धरने के लिए इस पार्टी के हर सदस्य के पास चटाई पहले से ही तैयार रहती है। आप के नेताओं के आसन अलग तरह होंगे। ये गुस्से में नाक में हवा भर कर निकालने में माहिर हैं। ये साथ ही बिना बोले हवा में भी हाथ-पैर चलाएंगे। ये ऐसा कर विरोध जाहिर करेंगे कि केंद्र सरकार के कहने पर एलजी ने उन्हें योग के लिए जगह देने में पक्षपात किया। इन्होंने योग वाली जगह पर तख्तियां भी साथ टांग लीं। जिन पर लिखा था...यही तो स्कैम है, ऐसे नहीं चलेगा।

मुलायम सिंह यादव की पार्टी का योग समाजवादी होगा लेकिन यहां योग के लिए चटाई हासिल करने की सिर्फ एक योग्यता ज़रूरी होगी...मुलायम सिंह के परिवार का सदस्य होना।

तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जयललिता की पार्टी के सदस्य योग सिर्फ एक आसन का ही प्रयोग करेंगे। साष्टांग दंडवत आसन।

ये तो पढ़े आपने योग के राजनीतिक पहलू। अब जानिए योग को लेकर खुफ़िया पत्रकारों की टीम की ओर से कुछ ऐसी जानकारियां, जिन्हें जानकर अर्णब गोस्वामी की इन्वेस्टिंग टीम भी रश्क करने लगेगी कि वो अपने सूत्रों से ऐसी ब्रेकिंग न्यूज़ क्यों नहीं जुटा पाए।

रिपोर्ट नंबर 1

योग रंगभेदी साज़िश है। सदियों श्वेतों ने इस दुनिया पर राज किया है। अब गेहूंआ और अश्वेतों ने इसका तोड़ निकाला है। सूर्य के साथ इसे जोड़ कर पेश किया। सूर्य के नीचे योग किया जाएगा तो रंग काला होगा। योग का प्रचार जैसे जैसे दुनिया में होगा, श्वेतों की संख्या कम होती जाएगी और गेहूंआ-अश्वेतों का एक दिन दुनिया में बोलबाला हो जाएगा।

(नोट- फेयर एंड लवली क्रीम के निर्माताओं ने इस प्रोजेक्ट को बैक करने का फैसला किया है। जितने लोग श्याम वर्ण के होंगे, उतनी ही उनकी क्रीम की बिक्री ज़्यादा होने की संभावनाएं बनेंगी।)

रिपोर्ट नंबर 2
आडवाणी जी बहुत खुश हैं। खुश भी क्यों ना हों, आख़िर आपातकाल के लौटने की उनकी आशंका सच जो साबित होती जा रही है। आडवाणी ने इसके लिए मोदी सरकार के योग दिवस कार्यक्रम का हवाला दिया। बीजेपी के ओरिजनल लौहपुरुष ने कहा कि आपातकाल में घुटनों पर झुकने के लिए कहा जाता तो हुक्मरानों के विश्वासपात्र झुकने की जगह धरती पर रेंगने लगते थे। योग के ज़रिए भी ऐसा ही अभ्यास कराया जा रहा है।

रिपोर्ट नंबर 3
योग दिवस पर राजपथ पर योग के लिए 35,985 लोग जुटे। इस कारनामे का गिनीज़ बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में एंट्री पाना निश्चित है। इससे पहले 19 नवंबर 2005 को ग्वालियर में 29,973 छात्रों ने सामूहिक योग कर गिन्नीज़ बुक में जगह पाई थी। राजपथ पर सामूहिक योग जैसे कार्यक्रम के पीछे सत्ता पक्ष का एक और मकसद है। इस तरह के कार्यक्रमों से बल्क में ऑक्सीजन खींच कर विरोधियों की सांस बंद की जा सकती है।


(डिस्क्लेमर- ये पोस्ट योग का निर्मल हास्य आसन है, कोई इसे गंभीरता से लेता है तो ये उसके अपने रिस्क पर होगा)

रविवार, 21 जून 2015

नेताजी की इमेज ब्रैंडिंग के मायने....खुशदीप



Early to bed, early to rise, work like hell and advertise…

(जल्दी सोओ, जल्दी उठो, जहन्नुम की तरह काम करो और प्रचार करो...)

अब ये चाहे Laurence J. Peter ने कहा हो या केबल न्यूज़ नेटवर्क (सीएनएन) के संस्थापक Ted Turner III ने, लेकिन ये मंत्र है अनमोल। आप किसी भी फील्ड में हों, यदि इस मंत्र का पालन करते हैं तो सफलता निश्चित है। इस वाक्य में work like hell  सबसे अहम है। यानी जहन्नुम की तरह हाड़तोड़ मेहनत। लेकिन देश की राजनीति में अब कुछ और ही नज़ारा देखने को मिल रहा है।

यहां काम तो जो हो रहा है, सो हो रहा है। लेकिन प्रचार में दिन-रात कोई कसर नहीं छोड़ी जा रही है। अब चाहे ये केंद्र सरकार हो या किसी और राज्य की सरकार। अपना ढिंढोरा पीटने में कोई पीछे नहीं है। ढिंढोरा भी पार्टी का नहीं, व्यक्ति-विशेष का ही पीटा जाता है।

आपको याद होगा कि हाल में सुप्रीम कोर्ट ने सरकारी विज्ञापनों को लेकर आदेश जारी किया था। इस आदेश में  कहा गया था सरकारी विज्ञापन लोगों तक जानकारी पहुंचाने के लिए हैं ना कि किसी नेता की छवि बनाने के लिए। सुप्रीम कोर्ट ने सरकारी विज्ञापनों में नेताओं के फोटो के इस्तेमाल पर भी पाबंदी लगा दी। सिर्फ राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और देश के मुख्य न्यायाधीश को ही इस आदेश से अलग रखा गया। हालांकि ये तय करना इन तीनों पर ही छोड़ दिया गया कि किसी विज्ञापन में उनकी तस्वीर छपे या नहीं। ये बात अलग है कि सुप्रीम कोर्ट का आदेश आने के बाद भी तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जे जयललिता और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव इसका उल्लंघन करते दिखे। इनकी फोटो के साथ इनका गुणगान करने वाले कई-कई पन्नों के विज्ञापन छपे। हालांकि अब विज्ञापनों में फोटो तो नहीं दिख रही है। लेकिन इसका भी तोड़ ढूंढ लिया गया है। जैसे कि नोएडा के व्यस्तम इलाके जीआईपी मॉल के पास उत्तर प्रदेश सरकार का बड़ा सा सिनेमा के स्क्रीन जितना होर्डिंग लगा है। जिस पर लगातार अखिलेश और उनकी सरकार के कामकाज का गुणगान करने वाली फिल्में चलती रहती हैं। इससे वाहन चलाने वालों का ध्यान बंटने से दुर्घटना का कितना ख़तरा है, इसकी ओर किसी का ध्यान नहीं है।

दिल्ली की केजरीवाल सरकार का आजकल टीवी चैनलों पर दिखाया जा रहा, एक विज्ञापन भी विवाद के घेरे में है। इस विज्ञापन में बेशक केजरीवाल का चेहरा नहीं दिखाया गया हो, लेकिन इसके पात्र 11 बार केजरीवाल का नाम लेते हैं। ज़ाहिर है कि ये व्यक्ति विशेष की छवि चमकाने की कवायद ही है। बीजेपी इस विज्ञापन को वापस ना लिए जाने पर सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाने की बात कर रही है। अब ये बात दूसरी है कि बीजेपी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार का सबसे बड़ा हथियार ही प्रचार है।

केंद्र सरकार के मुखिया नरेंद्र मोदी का अंदाज़ थोड़ा जुदा है। सब जानते हैं कि मोदी से बड़ा इवेंट मैनेजर इस देश में कोई और नेता नहीं है। अंतरराष्ट्रीय योग दिवस का आयोजन इसकी बानगी है। मोदी सरकार का एक साल पूरा हुआ तो किस तरह ताबड़तोड़ रैलियां और मीडिया पर प्रचार हुआ, ये भी किसी से छुपा नहीं है। मीडिया मैनेजमेंट भी मोदी सरकार की बड़ी खूबी है। इस मामले में केजरीवाल अनाड़ी साबित हुए हैं। केजरीवाल की टीम में कुछ  अनुभवी पत्रकारों के होने के बावजूद मीडिया से संबंधों में तल्खी घटी नहीं बल्कि और बढ़ी। अब यही वजह है कि केजरीवाल सरकार जनता तक जो बात पहुंचाना चाहते हैं उसके लिए सरकारी खर्च पर धुंआधार प्रचार का सहारा लेना पड़ रहा है।

ये प्रचार ठीक उसी तरह का है जैसे कि चुनावी साल में सत्तारूढ़ पार्टियां इस देश में बरसों से करती रही हैं। चुनाव के दौरान सत्तारूढ़ दल ही नहीं विपक्ष भी किस तरह कॉरपोरेट के दम पर प्रचार पर बेतहाशा पैसा खर्च कर सकता है ये हमने पिछले साल लोकसभा चुनाव में देखा था। राजनीतिक दलों को कॉरपोरेट फंडिंग होती है, ये शाश्वत सत्य है। ये कॉरपोरट किस तरह फिर इसे भुनाते हैं, ये समझना भी कोई रॉकेट साइंस नहीं है।

लेकिन अब चुनाव बेशक चार-साढ़े चार साल दूर हो फिर भी सत्तारूढ़ दलों का ज़ोरदार प्रचार का ये नया ट्रेंड है। इमेज बिल्डिंग पर पानी की तरह पैसा बहाया जा रहा है...वो भी हमारे-आप जैसे टैक्सपेयर्स का पैसा...दिल्ली सरकार और केंद्र सरकार के बीच इगो की लड़ाई के बीच दिल्ली के आम आदमी की हालत ऐसी है जैसे कि चक्की के दो पाटों में उसे पीसा जा रहा है। जितना ध्यान मूंछ की इस लड़ाई पर दिया जा रहा है, इतना ही ध्यान अगर आम लोगों के हालात सुधारने पर दिया जाए तो यकीन मानिए इस तरह प्रचार की ज़रूरत ही नहीं पड़ेगी। बस सबको याद रखना होगा-

Work like hell to make the country a paradise (for its people)

स्लॉग ओवर

मक्खन घड़ी खरीदने के लिए बाज़ार गया।
दुकानदार से उसने घड़ी के दाम पूछे।
दुकानदार ने कहा....25 रुपये।
मक्खन...इतनी सस्ती, तुम इसमें कमाओगे क्या?

दुकानदार...एक बार ले तो जाओ, कमाऊंगा तो बाद में, जब बार-बार यहां आओगे।

गुरुवार, 18 जून 2015

राजदीप ने एमएसजी प्रकरण में ग़लती मानी...खुशदीप

राजदीप सरदेसाई। वो पत्रकार जो किसी परिचय के मोहताज नहीं है।

सुधीर एस रावल। वो पत्रकार जिनके नाम से गुजरात में हर कोई वाकिफ़ है।



राजदीप को मैं पत्रकारिता के नाते ही जानता हूं, कभी रू-ब-रू होने का मौका नहीं मिला। सुधीर एस रावल से मैं बहुत अच्छी तरह परिचित हूं। वे बड़े भाई की तरह मेरा मार्गदर्शन करते हैं। पेशे से जुड़ा सवाल हो या पारिवारिक समस्या, मैं बिना किसी हिचक उन्हें बताता हूं। मुझे ये कहने में तनिक भी संकोच नहीं कि मेरे कठिनाई के वक्त में जिस तरह उन्होंने मेरा साथ दिया, उसे ताउम्र नहीं भुला सकता। विपरीत परिस्थितियों में भी किस तरह मनोबल ऊँचा रखा जाता है, ये मैंने उनसे सीखा। सुधीर एस रावल से मैंने सीखा कि मुश्किल हालात में होने के बावजूद उसूलों से कभी समझौता नहीं करना चाहिए।

राजदीप पिछले दिनों अहमदाबाद में थे तो सुधीर एस रावल ने उन्हें घेर लिया। राजदीप जो खुद तमाम बड़ी हस्तियों का इंटरव्यू लेते हैं, बड़ी मुश्किल से अपना इंटरव्यू देने के लिए तैयार हुए। वी टीवी के ऑफ द रिकॉर्ड’  कार्यक्रम के लिए ये इंटरव्यू हुआ। राजदीप ने साफ़गोई से तमाम सवालों का जवाब दिया। इस इंटरव्यू में हर मुद्दे को छुआ गया...

राजदीप का गुजरात कनेक्शन, देश में पत्रकारिता का परिदृश्य, नरेंद्र मोदी, मेडिसन स्क्वेयर गार्डन (एमएसजी) की घटना, गुजरात दंगे, मोदी सरकार के अब तक के कार्यकाल का मूल्यांकन, राजदीप की पारिवारिक बातें(पिता टेस्ट क्रिकेटर दिलीप सरदेसाई, पत्नी सागरिका घोष, डॉक्टरी और लॉ कर रहे बच्चे), किशोर-रफ़ी के गानों के लिए दीवानगी और राजदीप का अब क्रिकेट पर किताब लिखने का इरादा।

ये इंटरव्यू गुजराती-हिंदी में लिया गया लेकिन किसी भी हिंदीभाषी को आसानी से समझ आ सकता है। इंटरव्यू में हिंदी और अंग्रेज़ी में सब-टाइटल भी दिए गए हैं। आज पत्रकारिता जिस दौर से गुज़र रही है उसमें हर युवा पत्रकार को ये इंटरव्यू ज़रूर देखना चाहिए। सीखना चाहिए कि बिना शोर मचाए, कितनी सरलता और सहजता से सवाल पूछे जा सकते हैं। जवाब दिए जा सकते हैं। इस तरह कि हर देखने-सुनने वाले को नदी के सुगम प्रवाह की तरह सब समझ आता चला जाए।

शुक्रिया राजदीप। शुक्रिया सुधीर एस रावल।


बुधवार, 17 जून 2015

किस्सा तानाशाही के मिज़ाज का...खुशदीप



तानाशाही का एक मिज़ाज होता है। तानाशाह के सवाल पूछने पर या डांटने पर चुप रहने की ही रिवायत होती है। इसके ख़िलाफ़ जाकर कोई जवाब देने की हिमाकत कर देता है तो उसे भारी क़ीमत तो चुकानी ही पड़ेगी। इस पर आपको एक मज़ेदार किस्सा सुनाऊं उससे पहले मौजूदा वक्त के सबसे क्रूर तानाशाह किम जोंग उन का ज़िक्र करना चाहूंगा।

जी हां, सही पकड़े हैं। उत्तर कोरिया के मौजूदा शासक किम जोंग उन। इस तानाशाह ने अपने रक्षा मंत्री ह्यॉन योंग चोल को इसी साल 30 अप्रैल को सरेआम तोप (एंटी एयर क्राफ् गन) से उड़ा दिया। चोल का कसूर था तो इतना कि तानाशाह शासक की मौजूदगी में उन्हें झपकी आ गई थी। इसके बाद चोल से कुछ पूछा गया तो उन्होंने जवाब देने का भी कसूर कर डाला। क्या हश्र हुआ, पूरी दुनिया ने देखा। 66 वर्षीय चोल वो व्यक्ति थे जो किम जोंग उन ही नहीं बल्कि उनके पिता किम जोंग इल के भी बरसों तक विश्वासपात्र रहे थे।

किम जोंग उन ने 12 दिसंबर 2013 को अपने फूफा जैंग सोंग थाएक को भी उनके 5 सहयोगियों के साथ गद्दारी' के आरोप में नंगा करके 120  शिकारी कुत्तों के सामने डलवा दिया था। इन कुत्तों को तीन दिन से भूखा रखा गया था।

अब सुनाता हूं वो किस्सा जिसका पोस्ट के शुरू में वादा किया था। एक तानाशाह राजा ने 10 जंगली कुत्ते पाल रखे थे। राजा को अपने किसी मंत्री की बात पसंद नहीं आती थी तो उस मंत्री को कुत्तों के सामने डाल दिया जाता था। ऐसे ही एक बार एक मंत्री की राय तानाशाह को पसंद नहीं आई। तानाशाह ने मंत्री को फौरन कुत्तों के आगे डालने का फ़रमान सुना डाला। मंत्री ने तानाशाह से कहा, मैंने 10 साल आपकी खिदमत की और आपने ये सिला दिया। मंत्री ने साथ ही गुहार लगाई कि सज़ा देने से पहले उसे कम से कम 10 दिन की मोहलत तो दी जाए।

तानाशाह मान गया। इसके बाद मंत्री उस बाड़े के प्रभारी के पास गया जहां जंगली कुत्तों को रखा गया था। मंत्री ने प्रभारी से कहा कि वे इन कुत्तों की दस दिन सेवा करना चाहता है। प्रभारी ये सुनकर हैरान हुआ। लेकिन मंत्री के बहुत आग्रह करने पर मान गया। मंत्री ने कुत्तों को खाना देने के साथ उनकी 10 दिन तक हर तरीके से देखभाल की। 10 दिन बीत गए तो मंत्री को सज़ा देने का वक्त आ गया।

तानाशाह राजा ने मंत्री को कुत्तों के आगे डालने का आदेश दिया। लेकिन खचाखच भरे सभागृह में जो हुआ उसे देखकर राजा समेत सब हैरान रह गए। सभी 10 जंगली कुत्ते मंत्री पर हमला करने की जगह उसके आगे पीछे दुम हिला रहे थे। कुछ प्यार से उसके पैर चाट रहे थे। परेशान राजा ने जानना चाहा कि माज़रा क्या है। खूंखार कुत्ते ऐसा बर्ताव क्यों कर रहे हैं?  इस पर मंत्री ने कहा...मैंने सिर्फ 10 दिन इन कुत्तों की सेवा की और इन्होंने उसे याद रखा। लेकिन आपकी मैंने 10 साल जी-जान से खिदमत की लेकिन मेरी एक ग़लती के आगे वो सब कुछ भुला दिया गया।

आख़िर तानाशाह को अपनी ग़लती का अहसास हो ही गया...

तानाशाह ने आदेश दिया कि मंत्री को भूखे भेड़ियों के सामने डाला जाए।

मॉरल ऑफ द स्टोरी- एक बार शासक वर्ग जो सोच लेता है, चाहे वो ग़लत ही सही, उसे अमली जामा पहनाकर ही छोड़ता है।