सोमवार, 13 मार्च 2017

BJP चक्रवर्ती सम्राट, समाजवादी घर को लगी आग़ घर के चराग़ से : खुशदीप


पांच राज्यों के चुनाव नतीजे आने के बाद स्थिति स्पष्ट हो गई है. उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में भगवा सुनामी ने विरोधियों को तिनके की तरह उड़ा दिया. पंजाब में कैप्टन के दम के आगे सब प्रतिद्वंद्वी बेदम साबित हुए. गोवा और मणिपुर में कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर जरूर उभरी है लेकिन स्पष्ट बहुमत से दूर रही. दोनों राज्यों में अब बीजेपी जोड़-तोड़ से सरकार बनाने की फिराक में है. कांग्रेस ने गोवा को लेकर सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटा दिया है. मणिपुर की लड़ाई में भी ऐसा ही हो तो कोई आश्चर्य नहीं. गोवा और मणिपुर में सरकार किसी भी पार्टी की बने, अस्थिरता की तलवार हमेशा सिर पर लटकी रहेगी.

पहले बात करते हैं उत्तर प्रदेश की. राजनीतिक दृष्टि से देश का सबसे अहम राज्य. आबादी के हिसाब से बात की जाए तो उत्तर प्रदेश विश्व के पांचवें सबसे ज्यादा आबादी वाले देश के बराबर है. उत्तर प्रदेश के नतीजों से साफ है कि बीजेपी के मास्टर रणनीतिकार अमित शाह राज्य में ब्रैंड मोदी की मार्केंटिंग वैसे ही करने में सफल रहे हैं जैसे कि 2014 लोकसभा चुनाव में की गई थी. 1985 के बाद पहला मौका है कि किसी राजनीतिक दल को उत्तर प्रदेश में 250 से अधिक सीटों का आंकड़ा पार किया है. 1985 में उत्तर प्रदेश से उत्तराखंड अलग नहीं हुआ था. तब भी कांग्रेस ने इंदिरा गांधी की हत्या के बाद सहानुभूति की लहर के दम 425 सदस्यीय विधानसभा में 269 सीट जीतने में ही कामयाबी पाई थी.

उत्तर प्रदेश में इस बार ऐसा क्या हुआ कि कमल की चमक के आगे साइकिल, पंजा, हाथी सभी निस्तेज हो गए. मोदी-शाह की टीम ने जिस तरह उत्तर प्रदेश में बीजेपी के रथ से सभी प्रतिद्वंद्वियों को रौंदा वो चुनावी इतिहास में हमेशा याद किया जाएगा.

यूपी में बीजेपी के चमत्कारिक प्रदर्शन से पहले बात कर ली जाए राज्य के दो बड़े राजनीतिक क्षत्रपों की नाकामी की. यानि समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी की जिनके इर्दगिर्द पिछले डेढ़ दशक से सत्ता की धुरी घूमती रही है.
  
घर को आग लग गई घर के ही चिराग से

समाजवादी पार्टी के घर की फूट ने ही अखिलेश यादव के सत्ता में दोबारा लौटने के सपने को चकनाचूर कर दिया. राजनीति के रण में सेनापति के लिए बहुत जरूरी होता है अपने घर को एकजुट रखे. इसी मोर्चे पर अखिलेश पूरी तरह नाकाम साबित हुए. पिता मुलायम हो या चाचा शिवपाल यादव समाजवादी पार्टी के साथ रहते हुए भी अखिलेश के लिए अपनी नाराजगी का इजहार करते रहे. रही सही कसर मुलायम सिंह की दूसरी पत्नी साधना गुप्ता ने आखिरी चरण के चुनाव से पहले अखिलेश के खिलाफ मुंह खोल कर पूरी कर दी.

अखिलेश के लिए पैर पर दूसरा कुल्हाड़ी मारने वाला कदम कांग्रेस के साथ गठजोड़ करना रहा. कांग्रेस से हाथ मिलाने से समाजवादी पार्टी को कोई फायदा नहीं हुआ. पारंपरिक यादव वोटों के अलावा मुस्लिम वोट समाजवादी पार्टी को उतने ही मिले जितने कांग्रेस से गठबंधन किए बगैर भी मिलते हैं. अखिलेश ने कांग्रेस के लिए 114 सीटें छोड़ी थीं, लेकिन कांग्रेस सीटें जीतने के मामले में दहाई का आंकड़ा भी नहीं छू सकी.

यूपी में एसपी-कांग्रेस गठबंधन ने युवा वोटरों को लुभाने के लिए पूरा जोर लगाया. 'यूपी के लड़के' हो 'यूपी को ये साथ पसंद है' जैसा कोई भी नारा कारगर साबित नहीं हुआ. युवा वोटरों ने भी गठबंधन की जगह कमल पर बटन दबाना ज्यादा पसंद नहीं हुआ. अखिलेश विकास को लेकर अपनी सकारात्मक छवि को भी वोटों में तब्दील करने में सफल नहीं हो सके.

अखिलेश के लिए 'गुजरात के गधों' वाला बयान' देना भी भारी पड़ा. इस बयान पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जिस तरह गधे को मेहनती बताकर पलटवार किया, उसका मतदाताओं में सकारात्मक संदेश गया.

सातवें और आखिरी चरण के चुनाव से एक दिन पहले लखनऊ में संदिग्ध आतंकी सैफुल्ला के एनकाउंटर ने आतंकवाद के मुद्दे को फिर फ्रंट पर ला दिया. इस घटना का बनारस और आसपास के क्षेत्रों में ऐन मतदान के दिन असर पड़ा.

बीएसपी के लिए वजूद बचाए रखने का सवाल

मायावती उत्तर प्रदेश के चुनाव नतीजे आने के बाद धांधली की शिकायत कर रही हैं. कायदे से उन्हें मंथन करना चाहिए कि आखिर पहले क्यों बीएसपी का लोकसभा चुनाव में सफाया हुआ और अब विधानसभा चुनाव में भी पार्टी की बुरी गत हुई. 2007 में मायावती ने सवर्णों को साथ जोड़कर सोशल इंजीनियरिंग के दम पर सत्ता हासिल की थी. लेकिन अब तमाम कोशिशों के बाद भी मायावती अपने पारंपरिक जाटव वोट बैंक के अलावा अन्य वर्गों को साथ लाने में नाकाम रहीं. इस चुनाव में 100 मुस्लिम उम्मीदवार उतारने का दांव भी मायावती के लिए काम नहीं आया. बीएसपी के लिए रही सही कसर पूर्वी उत्तर प्रदेश में आपराधिक छवि के मुख्तार अंसारी एंड कंपनी से हाथ मिलाकर पूरी हो गई.

शाह से बड़ा कोई रणनीतिकार नहीं 

ये सही है कि ब्रैंड मोदी यूपी चुनाव में सभी प्रतिद्वंद्वियों पर भारी पड़ा लेकिन इसका सारा श्रेय बीजेपी के मास्टर चुनावी रणनीतिकार अमित शाह को जाता है.  बीजेपी ने सीएम के लिए अपना उम्मीदवार प्रोजेक्ट किए बिना ये चुनाव लड़ा और पार्टी में सभी वर्गों के नेताओं को एकजुट रखा. प्रदेश में पार्टी के सभी दिग्गज नेताओं को उम्मीद बनी रही कि चुनाव के बाद मुख्यमंत्री के लिए उनके नाम पर भी विचार हो सकता है.

अमित शाह ने जब टिकटों का बंटवारा किया था तो उन्हें जरूर कुछ आलोचनाओं का सामना करना पड़ा था लेकिन जिस तरह उन्होंने जातिगत समीकरणों को साधा उससे साबित हो गया है कि उनसे बड़ा चुनावी रणनीतिकार इस वक्त देश में और कोई नहीं हो. पिछले कुछ विधानसभा चुनावों को देखें तो बीजेपी की नीति रही है कि किसी राज्य में जो जाति भी सबसे प्रभावी है, उसके सामने बाकी सभी जातियों को जोड़ा जाए. बीजेपी ने ये कार्ड हरियाणा में गैर जाटों, गुजरात में गैर पटेलों और महाराष्ट्र में गैर मराठाओं को साथ जोड़कर चला. अब यही दांव उसने यूपी में गैर यादव ओबीसी और गैर जाटवों को लुभा कर अपने खेमे में लाने से चला. नतीजों से साबित है कि ये दांव बीजेपी को यूपी में खूब फला भी. नोटबंदी से बड़ा मुद्दा यूपी में कानून और व्यवस्था की बदहाली का साबित हुआ.

पंजाब में अमरिंदर की कैप्टन पारी

75 साल की उम्र में भी कैप्टन अमरिंदर सिंह ने पंजाब में कांग्रेस को शानदार जीत दिलाकर साबित कर दिया कि उनमें अब भी कितना दमखम है. ये जीत कांग्रेस से ज्यादा खुद कैप्टन की जीत है. पंजाब में चिट्टे (नशे) और भ्रष्टाचार के मुद्दों ने चुनाव से पहले ही ये साफ कर दिया था कि मतदाताओं ने बादल एंड कंपनी को इस बार सत्ता से बेदखल करने का मन बना रखा था. लेकिन वहां ये बड़ा सवाल था कि मतदाता किस पर अधिक भरोसा जताएंगे- केजरीवाल की झाड़ू पर या पहले भी देखे-परखे कैप्टन अमरिंदर के हाथ पर. पंजाब के मतदाताओं ने कैप्टन के अनुभव पर अधिक भरोसा किया. बीजेपी पंजाब में अकाली दल की जूनियर पार्टनर थी, इसलिए बादल परिवार के खिलाफ लोगों की नाराजगी का खामियाजा उसे भी भुगतना पड़ा. केजरीवाल कई महीनों से पंजाब में मेहनत कर आम आदमी पार्टी के लिए माहौल बनाने का प्रयास कर रहे थे, लेकिन पार्टी में चुनाव से पहले ही फूट और मुख्यमंत्री के लिए किसी सशक्त सिख उम्मीदवार को ना पेश कर पाना आम आदमी पार्टी की सबसे बड़ी कमजोरी साबित हुआ. केजरीवाल के लिए ये संतोष की बात हो सकती है कि वो पंजाब विधानसभा का चुनाव उन्होंने पहली बार लड़ा और वो राज्य में अकाली-बीजेपी गठबंधन को पीछे धकेल कर दूसरे नंबर की पार्टी बन गई.

उत्तराखंड बीजेपी का, गोवा-मणिपुर में खंडित जनादेश

उत्तर प्रदेश और पंजाब के अलावा दूसरे राज्यों की बात की जाए तो उत्तराखंड में भी भगवा सुनामी चली है. उत्तराखंड के अस्तित्व में आने के बाद जो उसका छोटा सा चुनावी इतिहास है उसमें राज्य के मतदाताओं ने किसी भी पार्टी को लगातार दूसरी बार सत्ता नहीं सौंपी है. इस बार के नतीजे भी अलग नहीं है. हरीश रावत के नेतृत्व में कांग्रेस को उत्तराखंड में करारी हार मिली है. पार्टी के कई कद्दावर नेताओं ने चुनाव से पहले बगावत कर बीजेपी का दामन थामा था. बीजेपी ने ऐसे नेताओं को टिकट भी खूब दिया. इसको लेकर बीजेपी के कुछ नेताओं ने असंतोष भी जताया था. लेकिन नतीजे आने के बाद बीजेपी का टिकटों का बंटवारा सही साबित हुआ.

जहां तक गोवा की बात की जाए तो बीजेपी को मौजूदा मुख्यमंत्री लक्ष्मीकांत पर्सेकर की हार से झटका लगा है. लेकिन यहांं बीजेपी छोटे दलों के दम पर सरकार बनाने की कोशिश में है. मनोहर पर्रिकर दिल्ली में रक्षा मंत्री का पद छोड़ गोवा में वापस डेरा डाल चुके हैं. कांग्रेस इतनी आसानी से यहां बाजी हाथ से नहीं देना चाहती, इसलिए सुप्रीम कोर्ट पहुंच चुकी है. सुप्रीम कोर्ट ने कांग्रेस की अर्जी सुनवाई के लिए मंज़ूर भी कर ली है. गोवा जैसी ही स्थिति मणिपुर में है. यहां 2002 से ही कांग्रेस के इबोबी सिंह एकछत्र राज्य करते आ रहे हैं. लेकिन इस बार बीजेपी ने राज्य में पहली बार दमदार उपस्थिति दिखाते हुए इबोबी सिंह तगड़ी टक्कर दी है. मणिपुर में भी सत्ता की कुंजी अन्य और निर्दलीय विधायकों के हाथ में दिखाई दे रही है. यहां भी कांग्रेस से कम सीट हासिल करने के बावजूद बीजेपी सरकार बनाने के लिए हाथ-पैर मार रही है. यहां सियासी ऊंट किस करवट बैठेगा, ये देखना दिलचस्प होगा. हॉर्स ट्रेडिंग यहां पूरे शवाब पर रहने की संभावना है. मणिपुर में आर्म्ड फोर्सेस स्पेशल पावर एक्ट के खिलाफ डेढ़ दशक तक अनशन करने वाली इरोम शर्मिला ने पहली बार चुनावी राजनीति में कदम रखा लेकिन मात्र 90 वोट ही हासिल कर सकीं. उन्होंने नतीजे आने के बाद राजनीति छोड़ने का एलान किया है.






मंगलवार, 25 अक्तूबर 2016

मुलायम कुनबे की कलह में मौजूद है बॉलिवुड का पूरा मसाला...खुशदीप

समाजवादी पार्टी के कुनबे की कलह में बॉलिवुड की किसी पॉवर-पैक्ड इमोशनल फिल्म वाला पूरा मसाला मौजूद है. क्या नहीं है इस कहानी में- बाप-बेटे का टकराव, चाचा-भतीजे में हाथापाई, राजनीतिक विरासत के लिए लड़ाई, सौतेली मां-सौतेला भाई, सौतेली मां का अपनी कोख से जन्मे पुत्र के लिए मोह, 'आउटसाइडर्स' का परिवार में दखल जिन पर एक पक्ष विलेन होने का आरोप लगाता है. 

हालांकि रीयल लाइफ की इस स्टोरी का परिवेश दूसरा है लेकिन ये सत्तर के दशक की सुपरहिट फिल्म 'त्रिशूल' की याद दिलाता है. 1978 में रिलीज हुई 'त्रिशूल' की कहानी उस वक्त सलीम-जावेद ने लिखी थी, जिनका खुद का दर्जा सुपरस्टार्स से कम नहीं था. ये वो दौर था जब अमिताभ बच्चन की सिल्वर स्क्रीन के एंग्री यंगमैन के तौर पर पूरे भारत में तूती बोल रही थी. 'त्रिशूल' फिल्म की हाईलाइट पिता-पुत्र के तौर पर संजीव कुमार और अमिताभ का टकराव ही था.

'त्रिशूल' की तरह ही समाजवादी पार्टी कुनबे में भी परिस्थितियों ने पिता मुलायम सिंह यादव और बेटे अखिलेश यादव को आमने-सामने टकराव वाले मोड़ पर ला खड़ा किया. फिल्म में कारोबार को लेकर बाप-बेटा आमने सामने थे. तो मुलायम कुनबे में सियासी जमीन पर सुप्रीमेसी को लेकर बेटा बाप के सामने ताल ठोक रहा है. रील लाइफ और रीयल लाइफ के फर्क को जानने के लिए पहले संक्षिप्त में 'त्रिशूल' की कहानी जानना जरूरी है.

" फिल्म 'त्रिशूल' की कहानी राज कुमार गुप्ता (संजीव कुमार) और शांति (वहीदा रहमान) के लव-एंगल से शुरू होती है. राज बहुत महत्वाकांक्षी होता है इसलिए वो शांति को छोड़कर बड़े बिजनेसमैन की बेटी कामिनी (गीता सिद्धार्थ) से शादी कर लेता है. शांति पेट में राज की निशानी को लेकर राज की जिंदगी से दूर चली जाती है. शांति फिर बेटे विजय को जन्म देती है और हर तरह की कठिनाई सह कर उसे पढ़ा लिखा कर बड़ा करती है. विजय (अमिताभ बच्चन) दिल में इसी आग को लेकर जवान होता है कि उसके बाप ने सिर्फ अपनी खुदगर्जी के लिए उसकी मां के साथ धोखा किया.

विजय फिर पिता की सारी खुशियां छीन कर उसे बर्बाद कर देने के इरादे से दिल्ली आता है. दिल्ली में उसके पिता राज की कंस्ट्रक्शन कंपनी की धाक होती है. विजय अपनी कंपनी खड़ी कर  एक के बाद एक झटके देते हुए राज के कारोबार को खत्म कर देता है. ऐसा करते हुए विजय कहीं से राज को ये पता नहीं चलने देता कि वो उनका बेटा है. राज जब बिल्कुल अकेला रह जाता है तो विजय उसे अपना सच और मां शाति के बारे में बताता है. ऐसे में राज के सामने पश्चाताप की आग में जलने के अलावा और कोई रास्ता नहीं होता." 

ये तो खैर फिल्म की कहानी थी. सलीम-जावेद की क्रिएटिविटी जितनी चाहे ड्रॉमेटिक-लिबर्टी ले सकती थी. लेकिन रीयल लाइफ में ये सब नहीं हो सकता. रीयल लाइफ में क्रिएटिविटी नहीं सब कुछ स्वत: (स्पॉन्टेनियस) होता है. जैसा कि मुलायम सिंह परि-'वार' में हुआ. इस रीयल स्टोरी में पिता के दूसरी महिला से संबंध काफी वक्त तक बेटे से ही छुपे रहे. यहां बेटा सियासत के ऊंचे मकाम यानी मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचा तो वो पिता की मेहरबानी से ही. लेकिन अब ये बेटा पिता की सरपरस्ती से अलग होकर अपनी पहचान खुद बनाना चाहता है. ऐसे सभी लोगों को दरकिनार करना चाहता है जिनके लिए वो समझता है कि वे सब पिता के कंधे पर बंदूक रखकर उस पर निशाना साध रहे हैं. साथ ही ये बेटा कैसे भूल सकता है कि पिता ने दूसरी महिला से संबंध जोड़कर उसकी मां के साथ नाइंसाफी की. 

1973 में अखिलेश यादव के जन्म से करीब 6 साल पहले ही मुलायम यूपी में विधायक बन चुके थे. राम मनोहर लोहिया को आदर्श मानने वाले मुलायम एक एक कर राजनीति की सीढ़ियां चढ़ते जा रहे थे. साथ ही घर में भी पत्नी मालती देवी के साथ उनके रिश्ते में कोई अड़चन नहीं थी. मुलायम जहां राजनीति में व्यस्त थे, वहीं मालती देवी घर पर इतने बड़े-यादव कुनबे की सरपरस्ती बखूबी कर रही थीं.

इस रीयल लाइफ स्टोरी में सब कुछ ठीक चल रहा था, इसमें नया मोड़ मुलायम सिंह के जीवन में साधना नाम की महिला के प्रवेश के बाद आया. मुलायम और साधना के बीच उम्र में 20 साल का अंतर था. तब तक मुलायम यूपी के कद्दावर नेता बन चुके थे. मुलायम सिंह और साधना की प्रेम कहानी कब शुरू हुई इस बारे में आधिकारिक जानकारी किसी के पास नहीं है. मुलायम सिंह की पहली पत्नी मालती देवी को झटका नहीं लगे इसलिए साधना से अपने रिश्ते को मुलायम ने  छुपाए रखा.

खास बात यह थी कि मुलायम की तरह खुद साधना भी शादीशुदा थी और उनकी शादी फर्रुखाबाद जिले के व्‍यापारी चुंद्रप्रकाश गुप्‍ता से हुई थी. मुलायम सिंह के खिलाफ आय से अधिक संपत्ति वाले मामले की जांच के दौरान सीबीआई की स्टेट्स रिपोर्ट में दर्ज है कि साधना गुप्ता और चंद्र प्रकाश गुप्ता की शादी 4 जुलाई 1986 को हई थी. अगले साल 7 जुलाई 1987 को प्रतीक का जन्म हुआ था. उसके बाद साल 1990 में साधना और चंद्रप्रकाश के बीच औपचारिक तलाक हो गया.

नब्बे के दशक के अंतिम दौर में अखिलेश को साधना और प्रतीक  के बारे में पता चला, उन्हें यकीन नहीं हुआ, लेकिन बात सच थी. बहरहाल, 2003 में अखिलेश की मां मालती देवी का बीमारी से निधन हो गया. मुलायम और साधना के संबंध की जानकारी मुलायम परिवार के अलावा अमर सिंह को थी. मालती देवी के निधन के बाद साधना जोर देने लगीं कि मुलायम उन्हें अपनी आधिकारिक पत्नी मान लें, लेकिन पारिवारिक दबाव, ख़ासकर अखिलेश यादव के विरोध चलते मुलायम इस रिश्ते को कोई नाम नहीं देना चहते थे.

इस बीच साधना ने 2006 में अमर सिंह से संपर्क कर आग्रह किया कि वह नेताजी को रिश्ते की बात को सार्वजनिक तौर पर मानने के लिए मनाएं. लिहाज़ा, अमर सिंह के प्रयास के बाद 2007 में मुलायम सार्वजनिक तौर पर साधना को अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार करने के लिए तैयार हो गए. इस घटनाक्रम से मुलायम परिवार में फिर हलचल तेज हो गई. अखिलेश के विरोध को नजरअंदाज कर मुलायम ने आय से अधिक संपत्ति से संबंधित मुकदमे में सुप्रीम कोर्ट में एक हलफनामा दिया जिसमें उन्होंने साधना को पत्नी और प्रतीक को बेटे के तौर पर स्वीकार किया.

यकीनन अखिलेश को ये घटनाक्रम नागवार गुजरा. साधना की परिवार में एंट्री के लिए अखिलेश ने अमर सिंह को ही जिम्मेदार माना. कोई भी बेटा हो पिता के दूसरी महिला के साथ संबंध को अपनी मां के साथ अन्याय ही मानेगा. बताते हैं कि मार्च 2012 में मुख्यमंत्री बनने तक अखिलेश ने साधना को कोई तरजीह नहीं दी.

अखिलेश का ये रवैया मुलायम को पसंद नहीं आया. मुलायम के दखल पर अखिलेश को बैकफुट पर जाना पड़ा. साधना अपने चहेते अफसरों को मनपसंद पोस्टिंग दिलाने लगीं. द संडे गार्डियनने सितंबर 2012 में मलाईदार पोस्टिंग पाने वाले अफसरों की सूची छापी. बताया गया कि ये सारी पोस्टिंग साधना की सिफारिश पर ही हुईं. वहीं, साधना ने अपने बेटे प्रतीक के भी रियल इस्टेट कारोबार में जड़े जमाने में कोई कसर नहीं छोड़ी. बताया जाता है कि साधना लीड्स यूनिवर्सिटी से पढ़े प्रतीक को राजनीति में भी लाना चाहती है. लेकिन प्रतीक अभी इसके लिए इच्छा नहीं दिखा रहे. हालांकि प्रतीक की पत्नी अपर्णा को जरूर समाजवादी पार्टी अगले विधानसभा चुनाव के लिए लखनऊ कैंट से अपना उम्मीदवार घोषित कर चुकी हैं.

मुलायम बेशक कह रहे हैं कि उनका परिवार एक है. लेकिन रिश्तों में जो दरार आ गई है, वो शायद ही कभी भर सके. मुलायम जहां छोटे भाई शिवपाल यादव और अमर सिंह की खुली तरफदारी कर रहे हैं. वहीं मुलायम के चचेरे भाई राम गोपाल यादव को राजनीतिक गलियारों में अखिलेश का चाणक्य माना जा रहा है. ये वहीं राम गोपाल यादव हैं जिनके लिए  मुलायम ने कहा है कि वो उनकी बात को कोई महत्व नहीं देते.

बॉलिवुड फिल्म की स्टोरी को ढाई-तीन घंटे में बांधा जा सकता है. लेकिन समाजवादी कुनबे की रीयल स्टोरी के साथ ऐसा नहीं किया जा सकता.


यही कहा जाएगा...पिक्चर अभी बाकी है दोस्त....

बुधवार, 5 अक्तूबर 2016

अब न्यूज़ भी हुई फरमाइशी...खुशदीप


छोटे होते थे तो ऑल इंडिया रेडियो पर फरमाइशी या मनपसंद गाने सुनना बड़ा अच्छा लगता था...अब न्यूज़ भी मनपसंद हो चली है. पर्सनलाइ्ज्ड न्यूज़...जो आपके मतलब का है उसे देखने-पढ़ने-सुनने के लिए आपको माध्यम भी मिल ही जाएंगे...

ऐसे माहौल में ये जानने-समझने की सुध किसे है कि पूर्ण सत्य क्या है...वो भी तब जब सबको पता है कि अर्द्धसत्य झूठ से भी ज्यादा खतरनाक होता है...

तटस्थता को ताक पर रखकर अब देश भी वैचारिक धरातल में बंट गया है... जिसकी जो सेट सोच है, उससे एक इंच आगे पीछे नहीं होना चाहता...(इसमें आपके साथ-साथ मैं खुद भी शामिल हूं)

अजीब हाल हो चला है...कोई कह क्या रहा है और उसे बताया क्या जा रहा है...देशभक्ति या राष्ट्रप्रेम को इस तरह पेश किया जा रहा है जैसे इस पर एक खास विचारधारा वाले लोगों का ही पेटेंट है...सेना, जो देश का गौरव है, उसकी कार्रवाइयों को पब्लिक डोमेन पर लाकर बहस का विषय बना दिया गया है.

ये तो भारतीय लोकतंत्र की खूबसूरती और हमारी सेना का अनुशासन है कि वो पूरे मनोयोग और समर्पण से हमेशा अपनी ड्यूटी को अंजाम देती रहती है...वो चाहे युद्धकाल हो या शांतिकाल...सेना ने देश में कभी अपने अधिकार क्षेत्र का अतिक्रमण नहीं किया (बस ऑपरेशन ब्लू स्टार के दौरान कुछ गिनती के सैनिकों की हरकत अपवाद है)...

दिक्कत ये है कि कोई सेलेब्रिटी बयान देता है तो वो आप तक पूरा नहीं पहुंचता...सेलेब्रिटी से सवाल पूछे जाते हैं और वो उनका जवाब देते हैं...या किसी कार्यक्रम-इवेंट में उनके कहे को खबर बना लिया जाता है...अब अपने हिसाब से ही उस पर बहस कराई जाती है...चुन चुन कर ऐसे लोगों को बुलाया जाता है कि वो उस सेलेब्रिटी की बखिया उधेड़ सकें...

अभी ऐसे दो वाकयों का जिक्र करना चाहता हूं...सलमान खान और ओम पुरी...सलमान की ये बात तो बड़ी हाईलाइट हुई कि वो पाकिस्तानी कलाकारों को बॉलिवुड में काम करने देने के पक्ष में हैं, लेकिन इस पर किसी ने जोर नहीं दिया कि सलमान ने उरी हमले के जवाब में सर्जिकल स्ट्राइक को प्रॉपर जवाब बताया था...कहा था एक्शन का रिएक्शन होना जरूरी है...लेकिन सलमान के पूरे बयान को किसने सुना...

इसी तरह ओम पुरी ने कहा कि पाकिस्तानी कलाकारों के देश में काम करने देने या ना करने देने पर फैसला सिर्फ भारत सरकार ले सकती है, क्योंकि वही उन्हें वीजा या वर्क परमिट देती है..दूसरे इस मुद्दे पर फैसला लेने वाले कौन होते हैं...ओम पुरी की ये बात तो पकड़ी गई...लेकिन इस पर किसी ने ध्यान नहीं दिया कि उन्होंने सर्जिकल स्ट्राइक के लिए सरकार की तारीफ करते हुए कहा कि पहली बार देश में राजनीतिक नेतृत्व ने इच्छाशक्ति दिखाई...वरना देश अतीत में उरी से बड़े भी कई हमलों का दंश झेल चुका है...काश ओम पुरी का भी पूरा बयान सुना गया होता...

होता ये भी है कि सेलेब्रिटी से उन्हें तैश में लाने वाले सवाल भी किए जाते हैं...ऐसे में सेलेब्रिटी भी झल्लाहट में कुछ कह सकता है जो पॉलिटिकली करेक्ट ना हो...ये कलाकार होते हैं, राजनीति के मंझे खिलाडी नहीं, जो सवाल का जवाब देने की जगह अपनी ही गाते रहने में माहिर होते हैं...
सेना की हर कोई बात करता है...शहीदों की बात की जाती है...लेकिन युद्ध, आतंकी हमले या आपात स्थितियों में ही इनकी याद क्यो की जाती है...थोड़ा वक्त बीतते ही इन्हें भुला कर सब अपने रूटीन लाइफ मे जुट जाते हैं...कौन फिर इन सैनिकों के परिवारों की मदद के लिए आगे आता है...पाक कलाकारों पर व्यर्थ की बहस में उलझने से ये कहीं सार्थक रहता कि उरी के शहीदो के परिवारों के लिए कोई अभियान चलाया जाता,,,

आखिर में एक सवाल का जवाब दीजिए, आप-हम में से या देश के नेताओं में से कितने ऐसे होंगे जिन्होंने अपने बच्चों को सेना में करियर बनाने के लिए भेजा...या यही सर्वे करा लिया जाए कि देश के कितने नौनिहाल ऐसे होंगे जो सेना में जाने को करियर की पहली पसंद बताते हो...
मैंं साठ के दशक में पैदा हुआ था, तब 10 साल के अर्से में ही भारत ने तीन युद्ध 1962, 1965 और 1971 लड़े थे...उसी दौर में सन ऑफ इंडिया फिल्म का गाना बड़ा प्रसिद्ध हुआ था- "नन्हा मुुन्ना राही हूं, देश का सिपाही हूं, बोलो मेरे संग जय हिंद, जय हिंद..." उस वक्त स्कूलों में बच्चे फैंसी ड्रेंस कंपीटिशन में भी मिलिट्री ड्रेस पहन कर जाते थे तो खूब तालियां बटोरते थे...


आखिर हम 'जय हिंद' कहना क्यों भूल गए हैं..

शनिवार, 1 अक्तूबर 2016

सर्जिकल स्ट्राइक्स, सबूत, सरकार और सवाल...खुशदीप


पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (पीओके) में 28-29 सितंबर की रात को सर्जिकल स्ट्राइक्स पर हमारे देश की ओर से आधिकारिक तौर पर जो जानकारी दी गई, उस पर यकीन नहीं  करने की कोई वजह नहीं है. पीओके में आतंकवादियों के 6 ठिकाने ध्वस्त किए गए और डबल डिजिट में आतंकवादी मारे गए.

पाकिस्तान की छटपटाहट
पाकिस्तान इस बारे में क्या कह रहा है, वो मायने नहीं रखता. पाकिस्तान सरकार और वहां की फौज का 28-29 सितंबर की रात के बारे में इतना ही कहना है कि एलओसी पर क्रॉस बॉर्डर फायरिंग हुई थी जिसमें दो पाकिस्तानी सैनिक मारे गए. जहां पाकिस्तान का आधिकारिक स्टैंड ये है तो वहां का विपक्ष कुछ और ही राग अलाप रहा है. 30 सितंबर की रात को लाहौर से 40 किलोमीटर दूर रायविंड में पाकिस्तान के विपक्षी नेता इमरान खान की बड़ी रैली हुई. इमरान ने नवाज शरीफ के भ्रष्टाचार के खिलाफ उन्हें सत्ता से हटाने के लिए मुहिम छेड़ रखी है. इस रैली में इमरान के सहयोगी नेता शेख रशीद ने नवाज शरीफ पर आरोप लगाया कि इमरान की मुहिम को नाकाम बनाने के लिए सरहद पर तनाव गढ़ा गया है.

भारत में विपक्ष सरकार के साथ
खैर, पाकिस्तान में विपक्ष क्या कह रहा है, उससे क्या लेना? हमारे देश का विपक्ष इस मामले में मजबूती से एकजुट होकर सरकार के साथ खड़ा है. कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तारीफ करते हुए कहा कि बीते ढाई साल में पहली बार उन्होंने प्रधानमंत्री लायक कोई काम किया.

जारी नहीं किए जाएंगे वीडियोग्राफी सबूत
दो देशों के बीच तल्ख रिश्ते हों तो एक दूसरे के दावों को काटना और अपने हिसाब से तस्वीर पेश करना स्वाभाविक प्रक्रिया है, इसमें असामान्य जैसा कुछ नहीं है. भारत की तरफ से कहा गया है कि सबूत के तौर पर सर्जिकल स्ट्राइक्स की वीडियोग्राफी मौजूद है, लेकिन इसे सार्वजनिक नहीं किया जाएगा. जरूरत पड़ने पर ही जारी किया जाएगा.

भारत सरकार ने सर्जिकल स्ट्राइक्स की वीडियोग्राफी को फिलहाल जारी नहीं करने का फैसला किया है तो इसके पीछे अनेक कारण हो सकते हैं. ये भी हो सकता है कि पाकिस्तान ने जब खुद ही स्टैंड लिया है कि सर्जिकल स्ट्राइक्स हुई ही नहीं तो वो एलओसी पर ऐसी कोई हिमाकत नहीं करेगा जिससे कि तनाव और बढ़े. ये स्थिति भारत को सूट करती है. ऐसे में सर्जिकल स्ट्राइक्स के सबूत पेश किए जाते हैं तो पाकिस्तान की सरकार और फौज पर वहां के आवाम की ओर से जवाबी कार्रवाई के लिए फिर दबाव बढ़ेगा.

संयुक्त राष्ट्र प्रेषक दल को नहीं दिखा सरहद पर कुछ
पाकिस्तान जहां कह रहा है कुछ नहीं हुआ वहीं संयुक्त राष्ट्र जा कर शिकायत भी कर रहा है कि भारत तनाव बढ़ा रहा है. वहीं संयुक्त राष्ट्र भी इसी लाइन पर चल रहा है कि एलओसी पर भारत की ओर से ऐसा कुछ नहीं किया गया है जिसका संयुक्त राष्ट्र नोटिस ले. संयुक्त राष्ट्र महासचिव बान की मून के प्रवक्ता स्टीफ़ान दुजारिक ने कहा है कि संयुक्त राष्ट्र के सैन्य प्रेक्षक दल ने भारत और पाकिस्तान नियंत्रण रेखा पर कोई गोलीबारी सीधे तौर पर नहीं देखी है. दुजारिक के मुताबिक सीजफायर के इन कथित उल्लंघन के बारे में खबरों से जानकारी मिली है. प्रेक्षक दल उस सिलसिले में संबंधित अधिकारियों से बातचीत कर रहा है. बता दें कि संयुक्त राष्ट्र का सैन्य प्रेक्षक दल भारत और पाकिस्तान के बीच नियंत्रण रेखा पर 1971 में लागू किए गए संघर्ष विराम की निगरानी करता है.

वहीं, बीबीसी की रिपोर्ट के मुताबिक संयुक्त राष्ट्र में भारत के राजदूत सैय्यद अकबरउद्दीन ने संयुक्त राष्ट्र के दावों को ख़ारिज करते हुए कहा, "जो तथ्य हैं वह किसी के देखने या न देखने से बदल नहीं जाते हैं और न ही किसी के मानने या न मानने से सच बदल जाता है. जो तथ्य हैं वह तो तथ्य ही रहते हैं और हमने तथ्य सामने रख दिए हैं और हम उसी पर कायम हैं."
जिस तरह का घटनाक्रम चल रहा है, उसमें हो सकता है कि भारत की ओर से आधिकारिक तौर पर जल्दी ही सर्जिकल स्ट्राइक्स को लेकर और विस्तृत जानकारी दी जाए लेकिन इसके सबूत के तौर पर कोई वीडियोग्राफी या फोटोग्राफ्स जारी किए जाएंगे, इसकी संभावना कम ही है.

एलओसी पार कर गए भारतीय जवान का पेंच
पीओके में घुसकर सर्जिकल स्ट्राइक्स के रोमांच में देश में दो और बातों पर कम ही ध्यान गया. सर्जिकल स्ट्राइक्स के कुछ ही घंटे बाद राष्ट्रीय राइफल्स का जवान चंदू बाबूलाल चव्हाण एलओसी पार कर पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में चला गया और वहां गिरफ्तार कर लिया गया. भारत की ओर से बयान दिया गया कि ये जवान आर्मी पोस्ट पर तैनात था और गलती से एलओसी पार कर गया और उसका सर्जिकल स्ट्राइक्स से किसी तरह का जुड़ाव नहीं था. केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह का कहना है कि अपने जवान को वापस लाने के लिए हर संभव कोशिश की जा रही है. मीडिया में सूत्रों के हवाले से ऐसी रिपोर्ट भी आई कि चंदू बाबूलाल चव्हाण की सीनियर अधिकारी से बहस हुई थी और इसी के बाद वो नाराजगी में अपने हथियार के साथ एलओसी पार कर दूसरी तरफ चला गया. वहां पहुंचते ही पाकिस्तानी सैनिकों ने उसे गिरफ्तार कर लिया.

सरहद पर जिस तरह का तनाव है, उसमें इस बात की संभावना कम ही है कि भारतीय जवान को पाकिस्तान आसानी से भारत के हवाले कर दे. इस संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता कि पाकिस्तान चंदू बाबूलाल चव्हाण का हवाला देकर अपने हिसाब से कोई फर्जी कहानी गढ़े और उसे भारतीय जवान के कबूलनामे पर आधारित बताए. पाकिस्तान उसी कहानी को यूएन जैसे अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उठाने का प्रयास भी कर सकता है.

20 सितंबर को भी एलओसी पार कर हुआ था ऑपरेशन!  
इस घटनाक्रम के अलावा एक और बात हुई थी. द क्विंटनाम की वेबसाइट ने उरी आतंकी हमले के ठीक एक दिन बाद 20 सितंबर को भी एलओसी पार जाकर भारतीय सेना के ऐसे ही सर्जिकल स्ट्राइकके बारे में रिपोर्ट प्रकाशित की थी. लेकिन तब भारतीय सेना की और से उस रिपोर्ट का खंडन कर दिया गया था. द क्विंट के मुताबिक तब उस रिपोर्ट पर कई तरह की प्रतिक्रियाएं सामने आईं और कुछ लोगों ने खबर की सत्यता पर भी सवाल उठाए.

द क्विंट का कहना है कि वो अपनी रिपोर्ट पर कायम है. इसके लिए उसकी ओर से भारत के डीजीएमओ लेफ्टिनेंट रणबीर सिंह के गुरुवार को प्रेस कॉन्फ्रेंस में दिए बयान का हवाला भी दिया- डीजीएमओ ने गुरुवार को बताया कि पाक अधिकृत कश्‍मीर में आतंकवादी कैंप को बर्बाद करने के लिए सीमा पार सर्जिकल स्ट्राइक किए गए हैं. ऐसा ही एक स्ट्राइक 28-29 सितंबर की रात को हुआ, जिसमें कई आतंकवादियों को मार गिराया गया.

द क्विंट ने दावा किया है उसने नए हालात में फिर से पड़ताल कर 20 सितंबर को भारतीय सेना के एलओसी पार जाकर ऑपरेशन करने की स्टोरी को दुरुस्त पाया. हालांकि उसमें तथ्यात्मक कुछ त्रुटियां थी जिसे अब सुधार दिया गया है. वेबसाइट के मुताबिक पहले उसने 20 सितंबर के ऑपरेशन में स्पेशल फोर्स के पारा 2 के जवान शामिल बताए थे, जबकि  हकीकत में पारा 9 के जवानों ने इसमें हिस्सा लिया था. वेबसाइट की रिपोर्ट में सूत्रों के हवाले से कहा गया था कि पीओके में स्थित तीन आतंकवादी कैंपों पर हमला किया गया था, जिसमें 10 से 12 आतंकवादियों को ढेर कर दिया गया था. हमारे जवानों को पूरे ऑपरेशन में कोई नुकसान भी नहीं हुआ था.

द क्विंट की सूत्रों के हवाले से रिपोर्ट के मुताबिक हमारे जवान 20 सितंबर को पीओके की सीमा में 8 से 13 किलोमीटर तक अंदर गए थे. जब तक पाकिस्तान के हुक्मरानों को इस ऑपरेशन की जानकारी मिलती, तब तक काफी देर हो चुकी थी. तब ऐसी भी रिपोर्ट आई थी कि पाकिस्तान ने पूरे इलाके को 'नो फ्लाई जोन' घोषित कर दिया था. कुछ देर बाद पाकिस्तान की तरफ के उस इलाके में एफ-16 विमान की कई उड़ानें भरने की बातें भी कही गई थीं. वेबसाइट की रिपोर्ट में सूत्रों से ऐसी जानकारी मिलने की बात कही गई थी कि उस ऑपरेशन के बाद मनसेहरा और मुजफ्फराबाद में बाकी बचे आतंकवादी कैंप को खत्म कर दिया गया या फिर वहां से हटा लिया गया था.

द क्विंट की रिपोर्ट में 20 सितंबर की जिस घटना का हवाला दिया गया था, उसका भारत की ओर से आधिकारिक तौर पर खंडन किया गया, इसलिए उसे सच ना भी माना जाए, लेकिन एक बात हैरान करने वाली है जिस तरह रिपोर्ट में 20 सितंबर के ऑपरेशन का जिक्र किया गया, कमोवेश वैसा ही सब कुछ 28-29 सितंबर की रात को सर्जिकल स्ट्राइक्स के दौरान भी हुआ. और इसकी जानकारी खुद डीजीएमओ ने गुरुवार को बाकायदा प्रेस कॉन्फ्रेंस करके दी.

पाकिस्तान के झूठ को बेनकाब करने का मौका


ऐसे हालात में सवाल कुछ और भी हैं. अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पाकिस्तान को अलग-थलग करने में मोदी सरकार की कूटनीति अभी तक कारगर साबित हुई है. अब कश्मीर पर पाकिस्तान के झूठे विलाप को सुनने वाला अंतरराष्ट्रीय समुदाय में कोई नहीं है. पाकिस्तान जिस तरह अब भारत के सर्जिकल स्ट्राइक को फर्जी बता रहा है, भारत पर तनाव बढ़ाने का आरोप लगा रहा है, इस पर उसे विश्व मंच पर बेनकाब करने के लिए भी मोदी सरकार के पास अच्छा मौका है. भारत सरकार को सोचना है कि वो 28-29 सितंबर की रात को जो एलओसी के पार जाकर जो कुछ हुआ, उसके सबूतों को लेकर किस हद तक जाकर पारदर्शिता अपनाई जा सकती है. जाहिर है सेना की रणनीति या हितों से कोई समझौता नहीं किया जा सकता है, लेकिन दुनिया को विश्वसनीयता का संदेश देने के लिए सीमा में रह कर अगर कुछ सबूत सार्वजनिक किए जा सकते हैं तो उन्हें अवश्य किया जाना चाहिए. ऐसा किया जाता है तो पाकिस्तान अपने मिथ्याप्रचार में नंगा होगा और मोदी सरकार का कद और बढ़ेगा, देश में भी और दुनिया में भी. 

सर्जिकल स्ट्राइक के बाद आगे क्या? जंग होती है तो क्या होंगे उसके मायने...खुशदीप

आतंकियों को अपनी जमीन पर घुसपैठ करने से रोकने का भारत को पूरा अधिकार है. इसी अधिकार के तहत 28-29 सितंबर की रात को भारतीय सेना ने LOC को पार कर सर्जिकल स्ट्राइक्स में 6 आतंकी ठिकानों को नेस्तनाबूद कर दिया. अब सवाल है इसके बाद क्या? क्या पाकिस्तान बदले में कोई कार्रवाई करेगा? क्या सरहद का ये तनाव बड़ी जंग में तब्दील हो जाएगा?

पाकिस्तान ने बेशक भारत के सर्जिकल स्ट्राइक्स के दावे को खारिज कर दिया. इसे महज क्रॉस बार्डर फायरिंग करार दिया. लेकिन हकीकत ये है कि पाकिस्तान के हुक्मरान और फौज अब बहुत दबाव में हैं. पाकिस्तान मे विपक्ष के नेता और आवाम अब भारत को जवाब देने के लिए पूरा जोर डालेंगे. ठीक वैसे ही जैसे उरी आतंकी हमले के बाद पाकिस्तान को सबक सिखाने के लिए मोदी सरकार पर भारत में हर तरफ से दबाव पड़ रहा था.

याद कीजिए, 2013 में पाकिस्तान ने भारतीय सैनिकों पर LOC पार करने का आरोप लगाया था. ये भी कहा था कि भारतीय सैनिकों की फायरिंग में एक पाकिस्तानी सैनिक मारा गया था. लेकिन भारत के तत्कालीन आर्मी चीफ जनरल बिक्रम सिंह ने पाकिस्तानी दावे का खंडन किया था. उनकी ओर से कहा गया था कि हमारे जवान LOC क्रॉस नहीं करते और ना ही हमारी ओर से उकसावे वाली कोई कार्रवाई की जाती है. अगर कोई पाकिस्तानी सैनिक मारा गया होगा तो वो जवाबी कार्रवाई के तहत की जाने वाली क्रॉस बॉर्डर फायरिंग में मारा गया होगा. लेकिन 2013 की तुलना में अब स्थिति बिल्कुल विपरीत है.

भारत LOC पार कर सर्जिकल स्ट्राइक की बात कर रहा है जबकि पाकिस्तान इसका खंडन कर रहा है. पाकिस्तान के मुताबिक भारतीय सैनिकों की ओर से LOC क्रॉस नहीं की गई और दो पाकिस्तानी सैनिकों की मौत क्रॉस बार्डर फायरिंग में हुई. पाकिस्तान इसी स्टैंड पर टिका रहता है तो दोनों देशों के बीच तत्काल किसी बड़े टकराव की संभावना कम ही है.

हां, अगर घरेलू दबाव की वजह से पाकिस्तान की ओर से सरहद पर अब कोई हरकत की जाती है तो दोनों देशों के बीच मौजूदा तनाव बड़ी जंग में भी तब्दील हो सकता है. अगर ऐसा होता है तो दोनों देशों को आर्थिक दृष्टि से भारी नुकसान सहना पड़ सकता है. दोनों देशों के राजनीतिक और सैनिक नेतृत्व के जेहन में ये जरूर होगा कि जंग हुई तो जान-माल का कितना नुकसान होगा? आर्थिक रूप से इसकी क्या कीमत चुकानी पड़ेगी?

बड़ा सवाल ये भी है कि जंग से आर्थिक मोर्चे पर होने वाले नुकसान को सहने के लिए बेहतर स्थिति में कौन सा देश है. पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था पहले से ही जर्जर है और हाल के वर्षों में उसकी पूरी कोशिश इसे स्थिरता देने की रही है. ऐसी स्थिति में पाकिस्तान क्या भारत के साथ बड़ी जंग का जोखिम मोल लेना चाहेगा.

टकराव की आर्थिक कीमत की बात की जाए तो जहां तक दोनों देश के बीच कारोबार का सवाल है, वो इतना बड़ा नहीं है कि उसे लेकर ज़्यादा कोई फिक्र की जाए. लेकिन मौजूदा हालात जारी रहते हैं तो दोनों देशों की अर्थव्यवस्था पर दूरगामी असर पड़ेगा.

अनुमानों के मुताबिक करगिल जंग की कीमत भारत को 10,000 करोड़ रुपए पड़ी थी. और उसके बाद रक्षा बजट में 18 फीसदी की बढ़ोतरी की गई. 1998-99 में रक्षा बजट 39,897 करोड़ रुपए था तो करगिल युद्ध वाले वर्ष 1999-2000 में इसे 47,071 करोड़ रुपए किया गया. जाहिर है कि रक्षा बजट में बढ़ोतरी करने के लिए दूसरे मंत्रालयों के आवंटन और विकास कार्यक्रमों के लिए रकम में कटौती करनी पड़ी. किसी विकासशील देश के लिए ऐसा करना कितना भारी हो सकता है, ये समझा जा सकता है.

अगर अब जंग होती है, चाहे वो पारंपरिक हथियारों से लड़ी जाए या न्यूक्लियर वॉरहेड्स के साथ. कोई अनुमान भी नहीं लगा सकता कि इंसानी जानों के नुकसान के साथ आधारभूत ढांचे, पर्यावरण और पुनर्वास पर होने वाले खर्च के तौर पर कितनी बड़ी कीमत चुकानी होगी? पारंपरिक युद्ध में 50,000 गोलों और आर्टिलरी पर ही मोटा खर्च होता है. अब कल्पना कीजिए कि न्यूक्लियर जंग होती है तो आर्थिक रूप से उसकी मार कितनी बड़ी होगी?

मंगलवार, 27 सितंबर 2016

सुषमा स्वराज का राजकुमार अवतार- जिनके घर शीशे के होते हैं वो...खुशदीप

विदेश मंत्री सुषमा स्वराज पर सोमवार को पूरी दुनिया की नजरें टिकी थीं कि वे संयुक्त राष्ट्र महासभा के 71वें अधिवेशन में क्या बोलती हैं. खास तौर पर आतंकवाद को लेकर. इसी मंच से कुछ दिन पहले पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने अपने भाषण में जिस तरह कश्मीर का मुद्दा उठाया था, उसे लेकर भी हर किसी को इंतजार था कि सुषमा किस तरह पलटवार करती हैं. सुषमा ने इस पर दो टूक कहा- "जिनके अपने घर शीशे के होते हैं वो दूसरों पर पत्थर नहीं उछाला करते."
सुषमा ने अपने भाषण में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की उसी लाइन को आगे बढ़ाया कि पाकिस्तान को दुनिया के मंच पर अलग-थलग करने के लिए भारत कोई कसर नहीं छोड़ेगा. सुषमा ने साथ ही विश्व समुदाय को भी चेताया कि आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में सभी को एकजुट होने की आवश्यकता है. सुषमा ने गिनाया कि भारत ने 1996 में अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद के खिलाफ व्यापक संधि के लिए प्रस्ताव दिया था, जिस पर आज तक किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंचा जा सका. सुषमा ने साथ ही संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्यों में विस्तार की जरूरत का हवाला देकर भारत के दावे को मजबूती के साथ रखा.
भारतीय समयानुसार सुषमा स्वराज ने शाम ठीक 7 बजकर 10 मिनट पर बोलना शुरू किया. सुषमा ने अपने भाषण की शुरुआत संयुक्त राष्ट्र के टिकाऊ विकास के लक्ष्य के एजेंडे के साथ की. फिर बताया कि स्वच्छता, जेंडर इक्वेलिटी, जलवायु परिवर्तन की दिशा में भारत क्या क्या कर रहा है. सुषमा ने ये भी बताया कि मेक इन इंडिया, डिजिटल इंडिया, जनधन योजना से भारत की तस्वीर कैसे बदल रही है.
सुषमा ने इन सब बातों के बाद आतंकवाद का मुद्दा उठाया. सुषमा ने कहा कि न्यूयॉर्क ने अभी 9/11 हमले की 15वीं बरसी मनाई है. न्यूयॉर्क ने हाल ही में कुछ दिन पहले एक और आतंकी हमले को देखा. सुषमा ने कहा कि हम इस शहर (न्यूयॉर्क) के दर्द को समझते हैं. उरी, पठानकोट में भी ऐसी ही ताकतों ने हमले किए. सीरिया और इराक मे भी दुनिया रोज की बर्बरता देख रही है.
सुषमा ने कहा,  "दुनिया को सबसे पहले ये समझना चाहिए कि आतंकवाद मानवाधिकारों का सबसे बड़ा उल्लंघन है. आतंकवादी किसी देश का नहीं बल्कि पूरी मानवता का अपराधी होता है. हमें ये देखना होगा कि आतंकवादियों को पनाह देने वाले कौन हैं? कौन उन्हे पैसे से, हथियारों से सहारा देता है? कौन उन्हें संरक्षण देता है. जो भी ऐसे बीज बोता है, वो इनके कड़वे फलों का स्वाद चखने के लिए भी तैयार रहे."
सुषमा ने कहा कि आतंकवाद ऐसा राक्षस बन चुका है जिसके पास अनगिनत चेहरे हैं. अनगिनत हाथ हैं, अनगिनत हथियार हैं. सुषमा ने विश्व समुदाय से अपील की कि आतंकवाद को जड़ से उखाड़ने के लिए सबको एकजुट हो जाना चाहिए. अपने सारे मतभेद, पुराने समीकरण भुलाकर आतंकवाद के राक्षस का खात्मा करना चाहिए. इसके लिए दृढ़ इच्छाशक्ति दिखाने की आवश्यकता है.
सुषमा ने पाकिस्तान का नाम लिए बिना कहा  कि अगर कोई देश आतंकवाद के खिलाफ मुहिम में शामिल नहीं होता तो उसे पूरी तरह अलग-थलग कर देना चाहिए. ऐसे देशों को चिह्नित किया जाना चाहिए जो घोषित आतंकवादियों को सरेआम अपनी जमीन पर जलसे करने देते हैं. ऐसे देशों की विश्व समुदाय में कोई जगह नहीं होनी चाहिए.

पांच दिन पहले नवाज शरीफ के दिए भाषण का सुषमा ने करारा जवाब दिया. सुषमा ने कहा कि नवाज शरीफ ने दो बातें कहीं. पहली कश्मीर में कथित तौर पर मानवाधिकारों का उल्लंघन. सुषमा ने कहा इस पर मैं कहना चाहूंगी कि जिनके घर खुद शीशे के होते हैं वो दूसरों पर पत्थर नहीं उठाया करते. सुषमा ने साथ ही बलूचिस्तान में यातनाओं की पराकाष्ठा का हवाला दिया.
सुषमा ने नवाज शरीफ की दूसरी बात गिनाई कि भारत दोनों देशों के बीच बातचीत के लिए शर्ते लगा रहा है. इस पर सुषमा ने कहा कि नवाज शरीफ को मोदी सरकार के शपथ ग्रहण समारोह के लिए न्योता दिया गया था तो वो कोई शर्त नहीं था. सुषमा ने कहा कि मैं खुद दिसंबर 2015 में व्यापक द्विपक्षीय बातचीत के लिए इस्लामाबाद गई थी तो वो कोई शर्त के तहत नहीं था. या पीएम मोदी काबुल से दिल्ली लौटते हुए लाहौर रुके थे तो वो किसी शर्त  के तहत नहीं था. सुषमा ने कहा कि हमने कभी ईद की शुभकामनाएं दी तो कभी क्रिकेट की, कभी स्वास्थ्य के बारे में पूछा तो ये सब शर्तों के तहत नहीं था. सुषमा ने कहा  कि लेकिन हमें बदले में पाकिस्तान ने क्या दिया- पठानकोट, उरी, बहादुर अली. सुषमा ने कहा कि बहादुर अली तो पाकिस्तान की नापाक हरकतों का जिंदा सबूत है हमारे पास.
सुषमा ने कहा कि अगर पाकिस्तान समझता है कि वो हमारा कोई हिस्सा हमसे छीन लेगा तो हम उसे बताना चाहते हैं कि वो कभी इस मंसूबे में कामयाब नहीं होगा. जम्मू और कश्मीर भारत का अभिन्न हिस्सा है और हमेशा रहेगा. पाकिस्तान इसे लेकर किसी मुगालते में ना रहे.
सुषमा ने भाषण के आखिर में विश्व समुदाय को भी चेताया कि भारत ने 1996 में सीसीआईटी (अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद पर व्यापक संधि) का प्रस्ताव  दिया था. लेकिन 20 साल बीतने के बाद भी इस पर किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंचा जा सका. सुषमा ने कहा कि आज ऐसे अंतरराष्ट्रीय मानक बनाए जाने की जरूरत है जिससे आतंकवादियों को सजा दी जा सके और उनका प्रत्यर्पण किया जा सके.
सुषमा ने 19 मिनट के भाषण में ये भी कहा कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा  परिषद 1945 में अस्तित्व में आई थी. लेकिन तब से अब तक दुनिया में बहुत कुछ बदल चुका है. इसके लिए परिषद के स्थायी और अस्थायी, दोनों ही सदस्यों में विस्तार की जरुरत है.
सुषमा ने अपने भाषण में पाकिस्तान को बेनकाब करने के लिए प्रभावी ढंग से अपनी बात रखी. लेकिन नवाज शरीफ की तरह उन्होने अपने भाषण के अधिकतर हिस्से को  एक ही मुद्दे पर केंद्रित नहीं रखा. उन्होंने आतंकवाद पर पाकिस्तान को खरी खरी सुनाने के साथ दुनिया के सामने तेजी से बदल रहे भारत की सुनहरी तस्वीर रखने की भी कोशिश की है. बहरहाल, सुषमा अच्छी वक्ता हैं, उन्होंने एक बार फिर इसे साबित किया. तभी तो आम आदमी पार्टी के नेता कुमार विश्वास  ने यूएन में सुषमा का भाषण सुनने के बाद उनके लिए सिंहनी शब्द का इस्तेमाल किया.